महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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भूतभावन भोलानाथ की नगरी करुणा से चीत्कार कर रही थी और प्रायः उसी समय राजा टोडरमल के पुत्र राजा गोवर्धनधारी काशी के पण्डित शिरोमणि नारायण भट्ट जी, विश्वनाथ जी का नया मन्दिर बनवाकर शिवलिंग की प्रतिष्ठा कराने आए थे। मन्दिर में बड़ी धूमधाम थी। पण्डित मण्डली में हर जगह राजा गोबर्धन, धारीदास टंडन की जै-जैकार हो रही थी। फकीरों को अन्न दिया जा रहा था। नगर मे सबको शांत किया जा रहा था। एक भिखारी बोला- यहाँ सब बड़े बड़े पण्डित दिखाई दिए पर हमारे रामबोला बाबा के दरसन नहीं भये।”
“अरे भइया, जो गरीबों का साथ दे उसे बड़े लोग अपने बीच में नहीं बैठाते हैं। बाबा हमारे तुम्हारे हैं कि इनके हैं।” “सच्ची कहा मंगलू, बाबा हमार हैं। सुना है बिचारो की बाँह मे गिल्टी निकल आई है। आज कल वे बहुत पीड़ा पाय रहे हैं।”
तुलसीदास की कोठरी में टोडर आदि कई भक्तों की भीड़ जमा थी। तुलसी अपनी पीड़ा से विकल थे। बार-बार हनुमान को गोहराते थे- “है हनुमान हठीले, तुमने पहाड़ उठाया, लंका जलाई, बड़े-बड़े बलशाली राक्षसों को चुटकी बजाते मसल डाला, मेरी यह जरा सी पीर नही हरी जाती? मेरी ही सहायता करते समय क्या तुम बूढ़े हो गए हो? तुम्हारी शक्ति क्षीण हो गई है ? आओ मेरे साहब, मेरा कष्ट हरो। बड़ा काम करने को पड़ा है। राम जी का काम है हनुमान हठीले, मेरी लाज रखो।”
तभी एक सरकारी ओहदेदार के आने की सूचना मिली। टोडर उठकर बाहर गए। हाकिम को मुजरा इत्यादि करने के बाद उससे बातें करने पर टोडर ने जाना कि नये सूबेदार बनारस आये हैं और गोसाईं जी से मिलना चाहते हैं।
टोडर ने कहा- “हुजूर, भीतर चलकर महात्मा जी की हालत अपनी आँखों से देख लें। इस समय तो गिल्टी में बड़ी पीड़ा होने से वे कराह रहे हैं।”
हाकिम टोडर के साथ भीतर आया, सब लोग अदब से उठ खड़े हुए। हाकिम ने गोसाईं जी को झुककर सलाम की और कहा- “हुजूरे आली खानेखाना ने मुझे आपकी मिजाजपुर्सी के लिए भेजा है।”
“उनसे हमारा सलाम कहिएगा। उनके कुछ दोहे हमने सुने हैं। उन्हें हमारी सराहना की सूचना दीजिएगा और इस कृपा के लिए मेरा आभार भी प्रकट कीजिएगा।”
दूसरे दिन पैदलों और घुड़सवारों की सेना के साथ अपने हाथी पर अब्दुरहीम खानेखाना गोस्वामी तुलसीदास जी के दर्शनार्थ पधारे।उनके आने की सूचना पहले ही भेज दी गई थी। बड़ा सरकारी प्रबंध हुआ था। सूबेदार को देखने के लिए बाबा के निवास स्थान के आस पास बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। तुलसी और रहीम बड़े प्रेम से मिले। खानेखाना साधारण आसन पर बैठकर एक दूसरे से बातें करने लगे। उनके बंदी बनाए जाने के कारण रहीम ने क्षमा माँगी।उनके उपचार के लिए अपने खास हकीम को भिजवाने की बात भी कही। रहीम ने अकवर बादशाह के सम्बंध में कहा- "महाबली सब प्रकार अन्याईयों को कुचल रहें हैं। वे ऐसे धर्म का प्रतिपादन करते है जो मानव मात्र को एक कर सके।”
तुलसी बोले- "इसमें कोई संदेह नहीं कि अकबर शाह के काल में बड़ी व्यवस्था आई है। फिर भी समाज और शासन को और अधिक संगठित और न्यायशील होना चाहिए।”
“आपका कहना यथार्थ है गोस्वामी जी, अच्छा, तो अब आज्ञा लूँगा। स्वस्थ हो जायें तो एक दिन मुझे दर्शन देने की कृपा अवश्य करें। एक और निवेदन भी करना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप जैसे महात्मा महाकवि को राज्य संरक्षण मिलना चाहिए।मैं यदि शाहंशाह सलामत को आपको कोई जागीर प्रदान करने के लिए लिखूँ तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?”
तुलसी हँसे, बोले-“आपकी बड़ी कृपा है खानखाना साहब, परन्तु ….
हम चाकर रघुवीर के, पढ़ौ लिखौ दरबार।
तुलसी अब का होहिंगें, नर के मनसबदार।”
काशी की अँधेरी गलियों दर गलियों का जाल अपने कुतरे जाने की आशंका से सहसा चौकन्ना हो उठा था और उसे कुतरने वाले थे चूहे। घरों, खंडहरों और मैदानों के अँधेरें बिलों से रेंगते लड़खड़ाते चूहे निकलते, दो चार डग भरते और मर जाते थे। बिल्लियाँ तक अब उन्हें बिलों से बाहर देखकर नहीं झपटती थीं। एक घर से एक लड़का मरा हुआ चूहा दुम से पकड़कर हिलाता हुआ बाहर निकला और घूरे पर छोड़ आया। लौटकर घर पहुँचा तो माँ ने कहा- “अरे सिबुआ, तुम्हें बेटा एक बार और जाना पड़ेगा।”
"क्यो माँ“
“अरे बेटा, भंडारे वाली कोठरी के भीतर पाँच सात चूहे एक के पीछे एक लड़खड़ाते भए निकते और मर मर गए। ये क्या हुई गया है राम?”
दूसरे दिन घर घर में तेज बुखार फैल गया था। नगर के छोटे बड़े किसी भी वैद्य हकीम को दम मारने का अवकाश नही था। गिरजादत्त वैद्य के बैठक और चबूतरे पर भीड़ जमा थी। एक कह रहा था- "ये तो भगवान का कोप भया है भैया।”
दूसरा बोला-“पण्डित गंगाराम ज्योतिषी हमारे लाला से कहते रहे, भेरौं कि ये रुद्र बीसी पड़ी है जो न हुई जाय सो थोड़ा है।”
तीसरे ने कुछ सोच भरी मुद्रा में कहा- “भाई, हमनें तो इन दुइ तीन दिनों में यह अजमाया कि जिस घर से चूहे मरतें हैं, उसी घर में ये जानलेवा ज्वर आता हैं। हमारे पड़ोस में एक बुढ़िया, उसकी बहुरिया और पोते पोती, चारों के चारों पड़े हैं। चारों की बाँह में गिल्टियाँ निकली भई है। हमसे बिचारी का दुःख न देखा भया सो दवा लेवे आए हैं। यहाँ तो पानी देनेवाला भी कोई नही है।” पहले ने चिन्तित दुःखी स्वर में कहा-“हमरी घर में से बुखार में पड़ी है। अब हम भी जाने किसी दिन पड़ जायें। कौन ठिकाना। श्मशानों की ओर लाशें जा रहीं हैं। किसी के मुँह से बोल नहीं निकलता।किसी भी गली में घुसों, दो चार घरों से आती रोने चिल्लाने की आवाजें सुनने वाले के कलेजे पर आरियाँ चलाए बिना नही रहतीं।”
तुलसीदास रात के समय अकेले उदास मन, गलियों से गुजरते हुए कहीं जा रहें हैं। एक द्वार की कुण्डी खटखटाते हैं। एक तगड़ा सा युवक कुप्पी लिए बाहर निकलता है। गोस्वामी जी को देखते ही आश्चर्य चकित होकर जल्दी से कुप्पी चौखट पर रखकर चरण छूने को झुक कर पूछता है- “अरे बाबा, आप इतनी रात में?”
“जटा शंकर, मैं तुमसे एक भिक्षा माँगने आया हूँ।
“पहले भीतर तो चलें। हुकुम करें बाबा।”
क्रमशः
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