Monday, 7 August 2023

151

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
151-

पूरे नगर में यह कथा बाँचीं जाए।”
जिनकी दूकान पर तुलसीदास जी विराजमान थे, वह लाला जी आाश्चर्य चकित मुद्रा से गोस्वामी जी को देखते हुए बोले- “बड़ी अनोखी बात कह रहे हैं महाराज जी। सारे नगर में कथा कैसे बाचेंगे आप? आज यहाँ कल वहाँ?”

तुलसीदास हँसे, कहा- “और क्या करेंगे।हम रामचरितमानस सुनाने के साथ तुम लोगों को रामलीला भी दिखाएँगे। बोलिए, आज के समय में पूरी रामलीला का खर्चा कौन उठाएगा भला?”
लाला जी गंभीर भाव से सिर हिलाकर बोले- “आप बिलकुल ठीक कहते हैं। आजकल बाजार बहुत मंदा है। दिन दिन भर दुकान खोले बैठे रहते हैं, और किसी किसी दिन तो गाहक भगवान के दर्शन भी नही होते हैं। क्या धनी, क्या निर्धन सभी एक से दुखी हैं और देखिए फिर अकाल पड़ रहा है। जब गाँव में प्रलय आती है तो वहाँ की परजा सीधे शहरो की ओर ही दौड़ती है और शहरों में भी कोई कहाँ से भीख दे महराज? बुरे समय में बड़े बड़े लछमीवालों की लछमी भी लजवंती हो जाती है, बाहर नहीं निकलती।”
“इसीलिए तो हम बिन टके का महायज्ञ रचाएँगे। यह अकाल की स्थिति ही हमें इस समय विशेष रूप से रामलीला रचाने की प्रेरणा दे रही है। जन करुणा को करुणासागर राम की लीलाओं को देख देखकर अपनी भक्ति की थाह मिलेगी। देखो, राम जी ने चाहा तो अगले पितृ पक्ष के बाद नवरात्र में रामलीला प्रदर्शन के साथ साथ तुम्हें रामचरित मानस सुनाई जाएगी।” 
गली में खड़ा हुआ एक बोला- “बात बहुत ऊँची कह रहे हो बाबा। नट बाजीगरी तो बहुत होती है और भद्दे भद्दे स्वाँग भी गली गली में होते हैं।राम लीला होगी तो अच्छा मन भी अच्छा बनेगा।”
“यही बात है। देखो, राम ने चाहा तो उनकी लीला बड़े धूमधाम से होगी।”
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बेनीमाधव जी बड़े ध्यानमग्न होकर बाबा के संस्मरण सुन रहे थे।एकाएक पूछा-“गुरू जी, ये आपकी सारी योजना बिना पैसे कौड़ी के सफल कैसे हो सकी?” 
“जो काम धनबल नहीं कर सकता वह जनबल से सहज सम्भव हो जाता है। हम नगर में जहाँ कहीं डोलते हुए पहुँच जाते वहीं हमसे रामयण बाँचने का आग्रह किया जाता। हम भी फिर अपनी जुगाड़ में लग गए। 
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तुलसीदास ने ठठेरों कसेरों से कहा-“चौधरी, अबकी नौरातों में हम रामलीला करना चाहते हैं।”
बनारसी चौधरी बोला- “यह तो बड़ी अच्छी बात है महाराज। फिर हमारे लिए क्या आज्ञा होती है? ”
“देखो चौधरी, जब लीला होगी तो राम जी, सीता जी, लछ्मन जी आदि देवी देवताओं के लिए मुकुट होने चाहिए। रावण का दस सिर वाला मुखौटा होना चाहिए और भी देवी देवताओं असुरों के मुखौटे होने चाहिए।”
“महराज जी, मुखौटे हम बनवा देंगे। सियाराम, लछिमन, चारों भइयों के ताँबे के मुकुट हम बनाय देगें। बाकी और सजावट का सामान आप गोदे वालों से कहके बनवाइए। हम अपनी बिरादरी के हर आदमी को एक एक मुखौटा बनाने का जिम्मा सौंप देंगे। जैसे आप कहेंगें वैसे बन जाएँगें और किसी पर बोझ भी नहीं पड़ेगा।बर्तन बनाते भए पत्तरों की काँट तरास और छीजन में ही आपके काम लायक पीतल ताँबा निकल आएगा।”
तुलसी बोले- “तुम्हारी बिरादरी में जो लोग उत्साही हो उनको कहो कि लीला भी खेलें। धर्म का काम है, दूसरे अपना और सबका मन बहलेगा। ठीक कहता हूँ न चौधरी?” 
चौधरी हाथ जोड़कर बोला- “अरे, हमरी बिरादरीवालों में यह सुनके ही उमंग भर जाएगी।सोचेंगें हमें ही लीला भी करनी है। घबराइए नही, बड़ी जल्दी ही सबको इकट्ठा करके मैं ले आऊँगा।” 

तुलसीदास केवटों के चौधरी रामा से बातें करने के लिए जब नौका घाट पर पहुँचे तो वहाँ बड़ा उत्पात मचा हुआ था। लड़के एक बजरे को घेरे खड़े थे और उसके बन्द कमरे के सामने ललकार रहे थे- “सीधी तरह निकल आओ, लाला तो थोड़ा सा दंड देकर ही छोड़ देगें। नहीं तो कुठरिया का दरवाजा तोड़के मारते मारते तुम्हारा और उस निगोड़ी झुनिया का कचूमर निकाल डालेंगे, जिसने हमारी बिरादरी की नाक कटा रखी है।”
तट के ऊपर बड़े-बूढ़े केवटों की भीड़ खड़ी चुपचाप तमाशा देख रही थी। गोस्वामी जी के पहुँचते ही सब पैर छूने आगे बढ़े। उन्होंने पूछा- “यह किस बात का उत्पात हो रहा है, भइया?” 
रामा बोला- "क्या कहें महराज, कलिकाल है। झूरन साहु हम लोगों को कर्जा क्या देता है कि ब्याज में हमारी आबरू भी लूटता है। इसी बस्ती की एक चुड़ैल है महाराज, वही हर घर से उसके सिकार पकड़ पकड़कर लाती है। आज लड़कों ने पकड़ लिया है सो दंड दे रहे हैं।” 
लड़के तब तक कोठरी का द्वार तोड़कर झूरन और झुनिया को अन्दर से बाहर घसीट लाए और उनकी मरम्मत करने लगे। तुलसी ने कहा- “अच्छा है, जब सेर पर सवा सेर पड़ता है तभी दुष्ट मानतें हैं । जैसे कृष्ण ने नागनथैया की थी वैसे ही हमारे युवकों को दुष्टो की नागनथैया भी करनी चाहिए।” थोड़ी देर तक झूरन की धुनाई होती रही, फिर गोसाईं जी ने ही आगे पढ़कर उसे और झुनिया को कुछ युवकों के घेरे से मुक्त कराया। आदेश देकर सबको शान्त किया, फिर केवटों के चौधरी से कहा-“रामा भइया, हम राम लीला करवाना चाहते हैं।”
“यह कैसे होयगी गुसाईं जी ?”
“ये ऐसे होगी कि जब सियाराम जी, लछ्मन जी गंगा पार करके वन को जाएगें तो तुम्हीं उन्हें पार उतारोगे और राम जी के चरण पखार के अपना जीवन सार्थक करोगे।”
“सच्ची महाराज? ”
“हाँ, रामा, तुम यहाँ के केवटों के चौधरी हो, निषादराज से क्या कम हो?”
“अरे, गोसाईं जी, हम और हमारी सारी बिरादरी आपके साथ है। जैसे कहोगे वैसे करेंगे।”
हिरदे अहिर की गौशाला के तखत पर गोस्वामी जी विराजमान हैं। हिरदे तखत के नीचे सविनय बैठा हुआ कह रहा है- “इत्ती सी बात कहने के लिए आप दौड़ के आए। अरे, हमें कहलाय दिया होता तो हम आप आ जाते। बाकी हमारे जवान तो यह सुनते ही फड़क फड़क उठेंगे महाराज। स्वागँ भरने का चाव किसे नहीं होता और फिर राम जी के बानर बनने की बात सुनकर तो लड़के ऐसे मगन होंगे कि कुछ न पूछिए।”
“उन्हें वानर तो बनना ही है हिरदे, बाकी यह है कि स्वरूपों की सुरक्षा के लिए भी तुम्हें कुछ लठैत देने होंगे।
क्रमशः

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