महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
149-
वे राजी हो गए।
“यह सभा तो विश्वनाथ जी के मन्दिर में हुई थी न गुरू जी?”
“विश्वनाथ जी का यह मन्दिर उन दिनों निर्माणाधीन था किन्तु उसके पास ही यह पण्डित सभा जुड़ी। मैंने रामायण बाँचना आरम्भ कर दिया। राम जी का ऐसा स्नेह वर्षण हुआ वेनीमाधव, कि ज्यों ज्यों कथा आगे बढ़ती जाती थी, त्यों त्यों पण्डित मण्डली पर उसका प्रभाव भी बढ़ता जाता था। कथा के अन्तिम दिन….
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“राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल हरनि मनोमल हरनी।
संसृति रोग संजीवनी मूरी। राम कथा गावहिं स्रुति भूरी॥”
पंडित सभा में सभी के चेहरे मंत्रमुग्ध से लग रहे थे। स्वर की मधुरता, शब्दों का जादू और भक्ति रस की अजस्र निर्मल धार काशी के प्रमुखतम शंकर मतानुयायी सर्वमान्य महापण्डित परम चरित्रवान संन्यासी मधुसूदन जी सरस्वती के रोम रोम को आनन्दप्लावित कर रही थी। केवल बटेश्वर मिश्र और उनके जैसे कुछ लोग ही जले भुने जा रहे थे। मधुसूदन सरस्वती से लेकर सभा में बैठा हुआ प्रत्येक बोधवान संन्यासी और पण्डित का चेहरा उन्हें शत्रुवत लग रहा था।वे और उनके पक्ष के अंध शिवभक्त और कुटिल वैष्णव एक दूसरे को देख देखकर आँखें मिचमिचा रहे थे। खीझ, हार और क्रोध की चढ़ती उतरती लहरें उनके चेहरो को विद्रुप बना रहीं थीं।
कथा चलती रही। गोस्वामी जी ने अंतिम दोहा पढ़ा और पढ़ते पढ़ते राम के ध्यान में वे ऐसे मग्न हो गए कि उन्हें अपने तन बदन का होश तक न रहा। हाथ जोड़े बैठे हुए तुलसीदास की गौर काया संगमरमर की सजीव मूर्ति सी लग रही थी। उनके मुख पर परम सन्तोष और अपार आनन्द छाया हुआ था।
कथा समाप्त हुई, मधुसूदन जी सरस्वती भी कुछ देर तक आँखें मूँदे आनन्दमग्न बैठे रहे, फिर धीरे धीरे उनकी आँखें खुलीं। वे बड़े प्रेम से ध्यानावस्थित तुलसी दास को देखने लगे, फिर अपने आसन से उठे, तुलसीदास के पास आए और बड़े स्नेह से उनके सिर पर हाथ फेरने लगे। तुलसीदास की आँखें खुलीं, सिर उठाकर देखा, उन्हें लगा कि गंगा चन्द्र सर्पो और बाघाम्बर से विभूषित साक्षात् शिव उनके सिर पर हाथ फेर रहें हैं। जटाशंकरी गंगा की धारा उनके ग्रन्थ पर पड़ रही है। पृष्ठों की चौहद्दी अपना रूप परिवर्तित करके सात सीढ़ियों वाले एक विशाल सरोवर के रूप मे बढ़ती ही चली जा रही है। उसमें गंगा भरती ही चली जा रही है। धारा में , सरोवर की उठती लहरों में, जहाँ देखो वहीं सिया राम की छवि ही दिखलाई पड़ रही है। तुलसी गदगद हो उठे। मधुसूदन जी सरस्वती ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा-
“आनन्द कानने ह्मस्मिन् जंगमस्तुलसीतरु:।
कविता मंजरी यस्थ रामभ्रमरभूषिता॥”
सभा मण्डप से निकलकर भीड़ गली के
बाहर आ रही थी। रामचरित मानस ग्रन्थ काठ की पेटी में बन्द था। टोडर पेटी को अपने हाथों में लेकर तुलसी और गंगा राम के पीछे पीछे चल रहे थे। अनेक पण्डित तुलसीदास जी के साथ ही साथ चलते हुए उनकी प्रशँसा का सुमेर भी खड़ा करते चल रहे थे। सभा मण्डप के बाहर पचास लठैत खड़े थे।टोडर के पास पहुँचते ही वे लठैत उनके आगे पीछे, चारों ओर मजबूत दीवार बनकर चलने लगे। बटेश्वर मिश्र और उनकी दुष्ट मण्डली बड़ी तेजी के साथ लठैतों की भीड़ में धँसकर उन्हे बिखेरने का प्रयत्न करने लगी किन्तु सफल न हो सकी। बटेश्वर के सामने पड़नेवाला अहिर उनके आगे बढ़ने पर जब तनिक सा भी इधर उधर न हुआ तो लाल लाल आँखें निकालकर वे बोले-“सरक उधर, रस्ता दे।”
लठैत बोला- “इत्ता तो रस्ता पड़ा है महाराज, चले काहे नही जाते?”
बटेश्वर जी गरज उठे- “ससरऊ, जानता है हम कौन हैं? मै अभी का अभी तुमको भस्म कर सकता हूँ।”
अहिर युवक भी तेज पड़ा, वह भी आँखें निकालकर बोला- “ए बटेसुर महराज, जो तोहे आपन इज्जत प्यारी होय तो चुप्पे तें निकल जाओ। नाही तो ई जान लेव कि चाहे हमें बराहम हत्या का दोष लगे, चाहे जो हुइ जाय, हम तोहरी ई तंत्र मंत्र भरी खोपडि़या एके ते दुइ बनाइ देव। समझयौ कि नाहीं। ”
लड़ाई झगड़ें की आवाजों से तुलसीदास और उनके साथ चलने वाली भीड़ इधर देखने लगी।
“क्या बात है, क्या बात है?” की गुहार पड़ी। तुलसीदास के साथ वाली भीड़ गली में ज्यों ही एक ओर सिमटी त्यों ही रामायण की पेटी लिए टोडर ने अपने आगे के लठैत अहिर से कहा- “बढ़े चलो हिरदै, हम लोग रुकेंगे नहीं।”लठैतों की अगली पँक्ति बढ़ी तो पिछली स्वाभाविक रूप से अपने साथियों के पीछे चली।तुलसीदास के साथ वाले पण्डित उन्हें रास्ता देने के लिए गली में और सिमट आए। अब तुलसीदास और बटेश्वर आमने सामने थे। बटेश्वर तुलसी दास को देखते ही क्रोध के मारे बौरा गए। लाल आँखें दिखलाते हुए हाथ बढ़ाकर वे गरजने लगे- "रे नीच नराधम, सम्मोहिनी मंत्र से मधुसूदन जी महाराज को तथा इन सारे पण्डितों को बाँधकर तूने अपने दम्भ का जो जाल फैलाया है उसे मैं निश्चय ही तोड़ फोड़ कर नष्ट-भ्रष्ट कर डालूगा।अरे नीच मैं तेरी हत्या कर डालूँगा।”
लठैतों की भीड़ पोथी लेकर आगे बढ़ गई थी। तुलसी हाथ जोड़कर बोले - “मिश्र जी, आप मुझसे बड़े है, गुरुभाई हैं, आपके इन वचनों को मैं प्रसाद के रूप में ग्रहण करता हूँ।”
एक बूढ़े पण्डित बोले- “अरे बटेश्वर, मिथ्या क्रोध और दर्म्भ को बढ़ाकर क्यों अपनी फजीहत करते हो? सूर्य पर थूकोंगे तो वह तुम्हारे ही ऊपर गिरेगा भैया।”
अपने साथ के कुछ लोगों के द्वारा शांत करके आगे बढ़ाए जाने पर बटेश्वर बढ़े तो अवश्य किन्तु तुलसीदास और गंगाराम के पास से गुजरते गुजरते वे एक बार फिर भड़के बिना न रह सके। अपनी तर्जनी हिला हिलाकर वे कहने लगे- “अरे, मैं पन्द्रह दिनों के भीतर ही तुमको, इस नीच गंगाराम को, टोडर को, तुम्हारे सभी पक्षधरों से भरी सारी काशी का सत्यानाश कर डालूंगा।”
उन लोगों के आगे बढ़ जाने के बाद पंडित घनश्याम शुक्ल ने कहा- “गोस्वामी जी, भाषा में काव्य रचने के लिए मैं अनेक वर्षो से अपने मन ही मन में तड़प रहा था किन्तु साथी पण्डित सदा मुझे भाषा में कविता लिखने से निरुत्साहित करते रहे। आपके मानस महाकाव्य से आज मुझे अपार मनोबल और स्फूर्ति मिली है। मैं भी अब भाषा में काव्य रचूँगा।”
क्रमशः
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