Friday, 21 July 2023

134

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
134-

तुम कवि हो, बेलाग बात कहना तुम्हारी प्रकृति में है किन्तु तुम्हें यह भी देखना चाहिए कि आलोच्य व्यक्ति अपनी सामर्थ्य भर सत्य को अपने जीवन में निभा रहा है या नहीं। यदि निभा रहा है तो उसके सत्य को देखो, उसकी सामर्थ्य को नहीं और यदि सामर्थ्य कीआलोचना करना ही चाहते हो तो रचनात्मक दृष्टि से देखो।”
“खरी आलोचना करने में कबीरदास जी मेरे आदर्श हैं। जहाँ झूठ को देखा वहीं खींच के ऐसा झापड़ मारते थे कि थोथे अहंकार की चमड़ी उतर जाती थी।”
“मैं महात्मा कबीरदास जी को उच्चतम आत्माओं में से एक मानता हूँ उन्होंने पराई बुराइयों की तीव्र आलोचना करके अपने को सवाँरा परन्तु मैं अपनी ओर समाज की खरी आलोचना करके दोनों को एक निष्ठा से बाँधकर उठाना चाहता हूँ। टूटी झोपड़ियों के बीच में अकेले महल की कोई शोभा नहीं होती है। वह अपनी सारी भव्यता और कलात्मकता में क्षुद्र और गँवार लगता है। फिर भी सच्चे सन्‍तों की बातों को हमें औसत स्तर पर लाकर नहीं सोचना चाहिए।”
“क्यों? न्‍याय की तुला पर सभी बराबर होते हैं।”
“तुम्हें देशकाल का भी ध्यान रखना होगा कैलासनाथ। कबीरदास जी ने जिस समय निर्गुण निराकार की वंदना की थी उस समय नगर नगर गाँव गाँव में हमारे मन्दिर तोडे़ जा रहे थे, लोक समाज की शुभ आस्था तोड़ी जा रही थी। कबीर से रामरूपी आस्था को निर्गुण बखानकर लोक मानस को पक्का बनाए रखा। यह क्‍या छोटी बात है। मैं कबीरदास जी का बडा आदर करता हूँ।”
“लेकिन उनके चेलों के पीछे तो लठ्ठ लेकर डोलते हो।” कैलास ने मुस्करा कर कहा।
“हाँ, आज के वातावरण में उनके गाल बजाऊ समर्थकों के पाखण्ड पर मैं करारे प्रहार करूँगा। यह लोग टूटे हुए समाज की पीड़ा को नहीं पहचानते। पेड़ से गिरे दम तोड़ते हुए प्राणी को यह दो लातें और मारते हैं।”
“तब मेघा भगत पर यदि मैं वही आक्षेप करता हूँ तो तुम चिढ़तें क्यो हो ? ”
“बुरा इसलिए लगता है कि तुम मेघा भाई का गलत मूल्यांकन करते हो। उनकी सामर्थ्य की सीमा कुछ छोटी भले ही हो पर वे पूर्ण भावनिष्ठ हैं। खैर छोड़ो यह प्रसँग , बोलो लीला किस समय होगी?”
उत्तर जैराम साहू ने दिया-“ब्यालू जीमने के बाद होगी महराज जी।मेरे ही बगीचे में आयोजन है। राजा गोवर्धन घारी और उनके गुरु पूज्यपाद नारायण भट्ट जी भी आपके इस दास के घर पर जूठन गिराने की कृपा करेंगें। हम लोग आपको लेने के लिए जल्दी चले आएगें।भैया कैलास जी आपको लिवाने इसी समय चले आँएगें। कहीं चले न जाइएगा। आपको अपनी बगीची मे देखने के बाद फिर चाहे हाकिमों, साहुकारों की दुनियादारी में रहें तो भी मेरे मन में सब हरा भरा रहेगा।”
जैराम साहू की बात ने तुलसीदास के मन को कहीं गहरे में स्पर्श किया, बोले-“जै राम जी, अपने प्रति आपके इस प्रेम भाव से में बड़ा ही आानंदित हुआ हूँ।राम आपका भला करें।”
जैराम साहू हाथ जोड़कर बोले-“महराज जी, सच्चा भाव आप ही में देखने को मिलता है। मैं पण्डित कैलासनाथ जी की इस बात से सहमत हूँ आपके बिना अब मुझे चैन नहीं आता।”
सुनकर तुलसीदास सचेत हो गए, मन कहने लगा कि सुन रे तुलमी, जब तक तेरे हृदय की बगिया में राम जी ऐसे ही नही रमेंगें तब तक तुझे अपनी काव्य और कथा आदि बाहरी क्रिया कलापों में खरी निश्चिन्तता नहीं प्राप्त होगी।
उन्होंने उठकर खड़े होते हुए जैराम साहू के कंधे पर हाथ रखा और बोले- “जै राम जी, आप और कैलास इस समय मेरे लिए गुरुवत सिद्ध हुए हैं, मैं आप दोनों के हृदयों में विराजमान ज्योति स्वरूप सियाराम को प्रणाम करता हूँ।”

उसी दिन झुटपुट समय में तुलसीदास अपनी कुटिया के आगे चबूतरे पर आठ दस आदमियों के बीच में घिरे बैठे बातें कर रहे थे। इतने में तनिक दूर पर एक आवाज सुनाई दी- “है कोई राम का प्यारा, जो इस विरमहतिया के पातकी को भोजन कराय दे? मैं तीन दिन से भूखा हूँ। है कोई राम का प्यारा? ”
किसी की बात सुनते न सुनते लपककर तुलसीदास उठे और तेजी से उस आवाज की ओर चल पड़े।
“है कोई राम का प्यारा जो इस विरमहत्तिया के पातकी को…….”
“आओ, भइया मैं तुम्हे भोजन कराऊँगा।”
थके लड़खडाते पैर, सूखा पिटा निराश चेहरा और बुझी हुई आँखें, फिर से अपने भीतर उमड़ती हुई विश्वास गंगा का बोझ सहसा न उठा पाईं। चाहा हुआ जीवन जब मिल रहा है तब काया से उसका भार उठाने की मानों शक्ति ही नहीं बची थी।तुलसीदास की बात सुनकर, उन्हे देखकर वह इतना आन्नदित हुआ कि गिरने गिरने को हुआ। तुलसीदास ने उसे दोनों हाथों से सँभाल लिया और कहा-“आओ,आओ। झोपड़ी के द्वार तक तुलसी के सहारे चलते हुए वह व्यक्ति रुदन भरे धीमे स्वर में यही दो वाक्य दोहराता चला गया-
“राम तुम बड़े दयालु हो,मैं बड़ा नीच हूँ। राम तुम बड़े दयालु हो।”
चबूतरे पर बैठे लोग बाग अचरज से यह तमाशा देख रहे थे। तुलसीदास ने उसे अपनी झोपड़ी के द्वार पर बैठाया और कहा- “यहाँ बैठों में पानी ले आऊ, हाथ मुँह घो लो तो रोटी दूँ।”
तुलसी भगत भीतर से लोटा भरकर जल लाए, उसके हाथ-पैर घुलाएँ।अपने काँपते हाथों से, चूंकि वह लोटा पकड़ नहीं सकता था इसलिए तुलसी ने स्वयं उसके हाथ धोए पैर घोए,  कुल्ला कराया, जैसे माँ छोटे बच्चे की सेवा करती है, फिर लाकर बिठलाया।भीतर गए। रोटी और दूध लाकर उसे दिया। आप ही उसे मींजकर उसके सामने रखी। वह खाता रहा और यह सामने बैठकर उसे देखते रहे। चबूतरे पर बैठे प्रायः सभी लोग इधर ही आकर खड़े हो गए थे। तुलसी भगत के इस काम पर कानों-कान कुछ आपसी बातें भी होने लगीं थीं। एक व्यक्ति के मन की उबलन बाहर निकलने को आतुर हो गई। वह तुलसी भगत के पास आकर वोला- “ये कौन जात है महाराज?” 
तुलसीदास मुस्कराए,कहा- “अभी तो यह केवल रामजन है, जब खा लेगा तब जात और पाप का कारण पूछूँगा।”  
पेट मे कुछ पड़ चुका था। मन में संतोष छाने लगा था। अपराधी के हाथ भी अब कांप नहीं रहे थे, वे सध गए थे।
क्रमशः

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