महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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खाते खाते रुककर उस ब्रह्महत्यारे ने कहा-“मैं रैदास जी की बिरादरी का हूँ साहबों।”
“हैं… और ब्रह्महत्या करके फिर ब्राह्मणों से ही सेवा लेता है?”
तुलसी ने दोनों हाथ उठाकर कहने वाले को शांत किया, कहा- “भूख और निराशा की ऐसी स्थिति में तुम जरा अपनी कल्पना करके देखो, सुखदीन। जाति पाँति , वर्ण-वर्ग आदि सब कुछ अपनी जगह पर ठीक है, पर एक जगह मनुष्य केवल मनुष्य होता है। घट-घट में एक ही राम रमते हैं।अभी तो सब जने चुप रहो। चबूतरे पर चलकर बैठो। यह पहले संतोष से खा पी ले तो इसके पाप का कारण पूछेंगे।“
सब चुप तो हो गए किन्तु हर एक को यह बात थोड़ी या बहुत अखरी अवश्य थी। तुलसी भगत ने एक ब्रह्महत्यारे चमार को अपने कटोरे मे भोजन परोसा, उसके पैर धुलाएँ, यह धर्म और समाज के विरुद्ध काम किया। इसके बाद लोग सम्भवतः चले भी जाते किन्तु अपने मन की घृणा के बावजूद हर एक व्यवित अपराधी के अपराध की कथा सुनने को भी उत्सुक था, इसलिए सब लोग चबूतरे पर बैठ गए।आपस मे धीरे घीरे बतियाने लगे- “यह अच्छी बात नहीं हुई। भूखा भले ही हो पर है तो अखिर ब्रह्महत्यारा ही है ,और फिर ब्राह्मण ही पैर धोवे और ब्राह्मणों में भी इनके जैसा भगत-महात्मा। साला हौसला पा जाएगा तो दो चार ब्राह्मणों की हत्या और कर आवेगा।”
“ठीक कहते हो, अरे हमारे ऋषि-मुनि जो धरम नियम बनाय गए वह कोई गलत थोड़े ही हैं। बिरमहत्या का पातकी जब तक ऐसे डोल डोलकर न मरे तब तलक उसका प्रायश्चित पूरा नही हुई सकत है।”
आगे आगे तुलसी भगत और पीछे पीछे वह ब्रह्महत्यारा चबूतरे की तरफ आते दिखलाई दिए। सब लोग चुप हो गए। चबूतरे पर चढ़कर तुलसीदास ने उसे नीचे ही खड़े रहने का आदेश दिया और कहा- “अब तुम हम सबको अपने अपराध का कारण बताओ।” कहकर तुलसी बैठ गए। हत्यारा हाथ जोड़कर कुछ कहने से पहले रो पड़ा, बोला-“क्या कहे पंचौ, आप रामको पता है कि दबत है तौ चिउटी भी काट लेत है।हमाने गाँव में दातादीन रहते रहे थे महाराज रहे। व्याज-बट्टा भी करते रहे।तौ महाराज, हम विपता में उनके अपने ऋणी भए। ई हमारी जवानी की बात है। तो उन्हें जैसे हमारी घर वाली पर हक ही मिल गया। हम चुपाए रहे पंचौ, सबल से निर्बल कैसे बोल? फिर हमरी बिटिया बड़ी भई।उसकौ पर हक जमावे का जतन किहिन, तब क्या कहें।फिर हमको करोध आय गया। करोध में हमरी उंगलिया तनिक सकत पड़ गईं। उनका गला दब गया। हम बड़े दुखी है महाराज।” कहकर बह फिर रोने लगा । तुलसीदास बोले- “वह जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी कर्म से अधम था। तुम्हारी जगह और भी कोई व्यक्ति होता तो वह भी आवेश में ऐसा काम कर सकता था। खैर, अब तुम जाओ, कहीं दूर देश निकल जाओ।समझ लो कि तुम नया जन्म पा रहे हो। राम-राम जपो, मेहनत-मजूरी करो और जीवन में जो खोया है उसे फिर से पाओ।”
उसके जाने के बाद एक व्यक्ति ने कहा- “उस बरामण का पाप तो बहुत बड़ा था, भगत जी, पर बरमहत्या तो उससे भी बडा पाप है।”
“मर्यादा पुरुषोत्तम रामभद्ग ने भी ब्राह्मण रावण को मारा था। असुरघर्मी अपना वर्ण खो देता है। पापी सदा दण्ड के योग्य है।”
सबेरे घाट पर यह चर्चा फैलते फैलते दिन चढ़े तक प्राय: नगर भर में फैल गई। क्या छोटे क्या बड़े सभी इसी की चर्चा कर रहे थे। काशी की जनता में तुलसीदास के इस काम के आलोचक अधिक निकले, प्रशंसक कम। उड़ते उड़ते दोपहर तक तुलसीदास को भी यह समाचार मिल गया कि काशी के महान तांत्रिक बटेश्वर मिश्र तुलसीदास को दण्ड देने के लिए कोई योजना बना रहे है। टोडर ने भी यह सूचना पाई और सब काम छोड़कर तुलसीदास के पास आए। उन्होने कहा- “महात्मा जी, में और मेरी सारी बिरादरी आपकी सेवा में हाजिर है। हमारे रहते काशी मे कोई आपका बाल भी बाँका नही कर सक्ता। तुलसीदास मुस्कराए, कहा- “अरे भाई तांत्रिक तो मंत्र मारेगा।तुम लोग मुझे उससे कैसे बचाओगे?
“अरे मैं उसी का सफाया कर डालूगा। ऐसे नीच को मारने से मुझे ब्रह्महत्या का पाप भी नही लगेगा।”
तुलसीदास खिलखिला कर हँस पड़े, कहा- “कौन ब्राह्मण तुम्हारे पक्ष में व्यवस्था देगा?”
“कोई न दे। राम जी की दृष्ष्टि में मै निष्पाप रहूँगा,यह जानता हूँ।मैं आज ही बटेसुर महराज के यँहा कहला दूगा कि…..।”
“नही, बटेश्वर मेरे गुरु भाई हैं। खैर, छोडो इस प्रसँग को। गंगाराम कब आ रहे है?''
“जोतशी जी आज ही कल में आने वाले थे, यहाँ से लौटते समय मैं उनके घर जाकर पता लगा लूँगा।”
कवि कैलास ने उसी समय आंधी के झोंके की तरह प्रवेश किया और बड़े आवेश मे कहने लगे- “वह वैशाखनन्दन वटेश्वर तुम्हारे विरुद्ध जन मत को संगठित कर रहा है। वह तुम्हें यहाँ से निकलवाने के सपने देख रहा है। मैं अभी अभी उसके घर जाकर चलती गली में सबके सामने उसे चुनौती दे आया हूँ।मूर्ख कहीं का दम्भी।”-उत्तेजनावश कैलास जी काँपने लगे।
तुलसीदास ने उनका हाथ पकड़कर बैठाया। शांत होने को कहा बोले- “तुम तो जानते ही हो कैलास कि वटेश्वर मेरे अग्रज गुरु भाई हैं। मेरे प्रति उनका रोष पुराना है।”
“यह भी तुम जानते ही हो कि मैं सब जानता हूँ और वह भी जानेगा कि किसी कड़े से पाला पड़ा है।आज सबेरे जब भगत जी के यहाँ बटेश्वर की यह खबर आई तभी से मैं क्रोध में उबल रहा हूँ।”
टोडर बोले -"पण्डित् जी, मेरी भी सचमुच यही दशा है। यदि उन्होंनें पण्डितों की पंचायत करके नगर की कुछ बिरादरियों के जोर पर महात्मा जी को यहाँ से निकलवाया तो नगर में हत्याकांड मच जाएगा। बहुत सी छोटी बड़ी जातियों के चौबेरी मेरे भी साथ होंगे।”
कैलास फिर उत्तेजित हो गए, बोले-“मैं उसके मुँह पर कह आया हूँ , टोडरजी, कि तू अपने बाप दादे के सात पीढ़ियों के पोथी-पत्रे निकालकर हमे और हमारे तुलसीदास को मारने का उपाय सोच ले।हे वैशाखनन्दन, कवि की भविष्यवाणी भी याद रखना कि तू जो करेगा वह तेरे ही ऊपर उलटकर पड़ेगा।”
क्रमशः
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