महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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दो उत्तेजित व्यक्तियों के बीच में तुलसी दास अपने आपको संयत रखने के लिए अपने मन में गूँजता राम शब्द सुनते रहे। जब कैलास अपने जी का उबाल निकाल कर थमें तब उन्होंने दोनों को सम्बोधित करते हुए कहा- “आप दोनों ही मेरे मित्र और शुभचिन्तक हैं।आप दोनों ही कृपा करके ध्यान से सुने। बेचारे वटेशवर स्वयं ही अपने अंत के निकट आ गए हैं। आप उसके विरुद्ध कार्य करके व्यर्थ में अपने आपको कलंकित न करे। आप दोनों ही मित्र मेरे हाथ पर हाथ रखकर यह वचन दें कि इस संबध में शांत रहेगें। कुछ न करेगें।” तुलसी ने अपने दाहिने हाथ का पंजा आगे बढ़ाया। टोडर को अपना मन अनुशासित करते देर न लगी, किन्तु कैलासनाथ के चेहरे पर अभी ताप चढ़ ही रहा था। तुलसी की स्नेह दुष्टि से आँखें मिलते ही उन्होंने आँखें झुका लीं और भुनभुनाते हुए कहा- “तुम्हारी यह भद्गता मुझे अच्छी नहीं लग रही है। पापी और दम्भी को दण्ड मिलना ही चाहिए।”
तुलसी बोले- “कल तुम जिस मानव-मर्म को सहज भाव से मेरे भीतर पहचान कर सराह सके थे उसी को आज बुरा बतला रहे हो ? कवि बड़ा लहरी होता है। अपनी ही समर्थित तंरग को काटते हुए भी उसे देर नही लगती।” कहकर तुलसीदास सिलखिलाकर हँस पड़े। उनकी बच्चों जैसी मुक्त हँसी ने गंभीर और क्षुब्ध वातावरण पर वैसा ही प्रभाव डाला जैसे जेठ की धूप से तपी हुई धरती पर आषाढ़ की बौछारों का पड़ता है।
टोडर सहज ही हँस पड़े। कैलास के क्रोध ने आँखों में एक बार फिर पलटा
लेना चाहा, पर तुलसी की स्नेह और विनोद भरी मुद्रा ने उन्हें हल्का कर दिया
था।स्वयं भी व्यंग्य विनोद साधकर बोले- “तुम भी तो कवि हो। तुम क्या कुछ कम लहरी हो ”
“हाँ, किन्तु मेरी लहरें अब सभी समीरण से अधिक संचालित होती है, यद्यपि अब भी वे पूरी तरह से मेरे वश में नहीं आईं। अच्छा छोड़ो यह प्रसँग। यह बताओ कि मेरे इस पाप से मेरा रामलीला देखने का पुण्य तो क्षीण नही हो गया? ”
कैलास थोड़ा अकड़कर बोले- "मेरा मेघा भगत और चाहे जो हो पर इस संबंध मे बड़ा शेर निकला। मैं कल तक जितना खिन्न था उतना ही आज उनसे संतुष्ट हूँ।”
सुखी मन से तुलसी वोले- “मैं तुम्हारी आज की इस मन मुद्रा से बडा संतुष्ट हुआ किन्तु यह बतलाओं कि नारायण भट्ट और राजा गोवर्धनधारी जैसे बड़े बडे़ लोग आ रहे है या…..।”
“वह भी बतला रहा हूँ। आज जैसे ही उनके पास यह सूचना आई, वैसे ही उन्होंने मुझसे कहा, कैलास, नारायण भट्ट जी से तुम स्वयं जाकर पूछो। तुम स्वानुभव से उन्हें यह बतला सकोगे कि तुलसी कैसा व्यक्ति है,फिर आगे उनकी जो हां-ना हो सो मुझे बतलाना।”
टोडर ने उत्सुकतापूर्वक पूछा- “भट्ट जी महाराज क्या बोले?”
“उन्होने कहा कि संतो-विरक्तों पर कोई सामाजिक प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।संन्यासी शिखा और सूत्र का त्याग करके भी शुद्र नहीं कहलाता।तुलसीदास आनंद से हमारे साथ ही साथ रामलीला देखें। हमें कोई आपत्ति नहीं है।”
सुनकर तुलसीदास के मुख पर आनंद और संतोष की आभा आ गईं। कैलासनाथ अपने उत्साह के शिखर पर चढ़ने लगे, बोले- “तभी तो मैं सीघा उस वैशाख नन्दन के घर सुनाने जा पहुँचा।“
तुलसी ने तुरन्त ही अपने मित्र के उत्साह की यह दिशा काटी, कहा-“अब बटेश्वर के पीछे पड़ गए हो। घूम फिरकर तुम्हारी झक वहीं की वहीं पहुँच रही है।”
कैलास हँसकर बोले- “मैंने आज उसे खूब-खूब तपाया। मैंने कहा, तू अपने आपको बटेश्वर समझता है।अरे तू तो इमली के चिये बराबर भी नहीं है। वह उठकर मुझे गालियाँ देने लगा। (हंसी) पर वाह रे मेरे मेघा भगत, जब हमने उनसे प्रश्न किया कि मान लीजिए नारायण भट्ट ने आना अस्वीकार किया तो क्या आप रामलीला नही दिखाएंगे? वे बोले- “मैं और मेरा रामबोला देखेगा। तुम लोग तो साथ रहोगे ही।रामलीला के प्रेमियों की कमी नही रहेगी।”
तुलसी बोले- “कैलास, नारायण भट्ट जी का संदेश तुमने अभी तक मेघा भाई को पहुँचाया है अथवा कोरमकोर वरगदनाथ को इमली का चिया बना करके ही चले आए हो? ”
“अब जाऊँगा वहाँ, तुम्हारे यहाँ भी आए बिना मुझे चैन थोड़े ही पड़ सकता था।चलो साथ ही साथ चलें। जैराम साहू के रथ की बाट देखना बेकार है। बाहर हमारे टोडर जी का रथ तो खड़ा ही हुआ है।”
टोडर बोले- “हाँ, हाँ, हम महात्मा जी तथा आपको भदेनी छोड़ आएँगें।”
सब लोग उठ पड़े। कुटिया से बाहर निकलकर कैलास ने उत्साह से टोडर की बाँह पकड़कर प्रेम से दबाई और कहा- "देखो राम जी की लीला, जो देश के सम्राट है उनका दीवान भी टोडर है और जो हृदय के सम्राट है उनके दीवान का नाम भी टोडर ही है।” और खिलखिला कर हँस पड़े। कुटी का ट्ट्टर बन्द करते हुए तुलसीदास भी हँसी के इस वातावरण मे घुले बिना रह न पाए।
दोपहर ढलते ही भदैनी स्थित जैराम साहू की बगीची के सामने रथों और पालकियों का आगमन आरभ हो गया।नगर के चुने हुए चालीस पचास सेठ महाजन, हाकिम अमले और सुकवि पण्डित समाज के लोग वहाँ पर आमंत्रित थे। नौकरों चाकरों की सेना आमंत्रित अतिथियों की सँख्या से लगभग ढाई गुनी अधिक थी। द्वार पर केले के खम्भों से बनाए गए कलात्मक तोरण और भीतर की सजावट आदि देखते ही बनती थी। चुनार के पत्थर की बनी हुई कलात्मक बारहदरी में मखमली तोशक तकिये गलीचे बिछे थे। सजावट और धूपगंध से महकते हुए इस स्थान में मेघा भगत का आसन सबसे अलग लगा था। तुलसी को उन्होंने अपने पास ही बिठला रखा था।नगर के सभ्रांत नागरिक आते,मेघा भगत को प्रणाम करते और फिर अपनी जगह पर बैठ जाते। कइयों ने मेघा भगत के साथ तुलसी भगत को भी प्रणाम किया,कई उन्हें बिना पहचाने ही निकल गए। अपनी अपनी जगहों पर बैठकर उनमें तुलसी के संबध की ताजा चर्चा ही स्वाभाविक रूप से चल पड़ी। कुछ लोग आपस में कुछ बात पका कर भेधा भगत के पास आए और बड़ी विनय से कहा-“भगत जी, हमारा यही भाग्य है कि आप दो दो महात्माओं के दर्शन एक साथ पा रहें हैं। हम तुलसीदास जी से कुछ बातें करना चाहते हैं।
क्रमशः
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