महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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मेघा भगत बोले- “आज के बाद भी काशी में तुलसीदास तथा आप लोग रहेगें। जब चाहें तब मिल सकते है।आज भरत को राम के पास ही रहने दीजिए।”
एक तगड़े से पण्डित युवक ने, जिसकी समपन्नता का परिचय उसके गले में पड़ी सोने की सतलड़ी जंजीर, बाँहों का बंद और हाथ की नगीने जड़ी अँगूठियाँ करा रहीं थीं, बोला- "तो इसका तात्पर्य यह भैया कि आप अपने को राम का अवतार मानते हैं? मेघा भगत शांत रहे, मुस्कराकर कहा- “मैंने उपमा दी थी। वैसे राम तो मुझे आप में भी दिखलाई देते हैं।”
वह युवक फिर बोला- “हमे आपके भरत जी से उस ब्रह्महत्यारे की चकल्लस नहीं करनी है। हमे तो ऐसे ही थोड़ा बहुत परिचय बढ़ाना है। सुना है, प्रात: स्मरणीय आचार्यपाद शेष सनातन जी महाराज के शिष्य है और अब महात्मा के रूप में निवास करने के लिए यहाँ आए हैं, तो अलाप सलाप कर के अपना परिचय बढ़ाना चाहते हैं।”
मेघा भगत की ओर देखकर तुलसी ने कुछ कहना चाहा किन्तु भगत जी पहले ही बोल पड़े-"आज के दिन वाद विवाद नही होगा। अभी थोड़ी देर में भट्ट जी राजा टोडरमल के साथ आएंगे।”
“वह टोडरमल नही टोडरमल जी के पुत्र हैं महात्मा जी।”
“पुत्र ही सही, उनके आने पर यहा सरस काव्य सुनिए,सुनाइएगा, फिर रामलीला देखिएगा।”
युवा पंडित मंडली निराश हुई। वे लोग अपनी जगह पर लौट गए, पर मन नहीं मान रहा था। मेघा के पास बैठे तुलसी को वे उसी तरह ललचाई दृष्टि से देख रहे थे जैसे बिल्ली कबूतर को ताकती है। तुलसी को देखकर उनके मन में पिछले बहुत दिनों से काफी रोष और उपेक्षा का भाव भरा था।कुछ ही दिनों में यह अनजाना व्यक्ति आकर काशी की जनता के हिये का हार बन गया है।अच्छे अच्छे संस्कृतज्ञों में भी कई लोग उसे श्रेष्ठ कवि मानतें हैं। सम्पन्न घरों के युवा कवि पंडित इस नये नामवर कवि से दो दो चोचें लड़ाने के लिए मचल रहे थे। एक ने कहा- “अरे अब तो रहा नही जाता। उसको मेघा भगत के पास से हटाकर यहाँ लाना ही चाहिए। कुछ मजा लेना चाहिए।फिर तो बड़े लोग जहाँ आए तहाँ मजा गया सारा।”
एक दुबला पतला चालाक सा युवक बोला- “अच्छा ठहरो। मैं ले के आता हूँ।”
वह युवक फर्ती से उठकर फिर मेघा भगत के पास गया और हाथ जोड़कर बोला- “महात्माजी, हमारी महात्मा तुलसीदास से वार्तालाप करने की तीव्र इच्छा है, यदि आप हमारी इस इच्छा को फलीभूत न होने देंगे दो हम लोग फिर भोजन नहीं करेंगे महाप्रभु।”
मेधा ने तुलसी को देखा, तुलसी मुस्करा कर बोले- “आज्ञा प्रदान करें। ब्राह्मणों को भूखे रखना उचित नहीं।”
“जैसी तुम्हारी इच्छा, शांति रखना।”मेघा भगत से स्वीकृति पाते ही तुलसी दास उठकर वहाँ आ गए जहाँ युवक मण्डली बैठी थी। इन्हें इधर आया देखकर बैठे हुए प्रौढ़ वृद्ध भद्रजन भी आस पास खिसक आए।
एक ने कहा-“महाराज इन दिनों आपका बड़ा यश फैला हुआ है।नाम तो नित्य ही सुनते थे, आज दर्शन का सौभाग्य भी मिल गया।”
तुलसी सविनय बोले- “भाई, यश राम जी का है, मैं तो उनका एक अकिंचन सेवक मात्र हूँ।”
युवकों मे से एक ने चहकाने वाला अंदाज साधकर दबे विनोद और ऊपरी गम्भीरता के स्वर में कहा- “सेवक तो आप अवश्य हैं।हमने सुना है कि आपने किसी अलखनिरंजन वादी साधु को उसकी राम के प्रति अवज्ञा के कारण लट्ठू मारा था।”
तुलसी हँसे, कहा- “मेरे पास राम नाम की लाठी है, उसी से मारा होगा।”
“हाँ हाँ, जब जड़ चेतन सभी में राम हैं तब लट्ठ में भी हैं।”
“आपके इस व्यंग्य में भी राम ही बोल रहे हैं।”
“कैसे ?”
“मूढ़ में जैसे चेतना बोलती है और मूढ़ उसे सुनकर भी नहीं सुन पाता।” तुलसी दास का मीठा व्यंग्य भरा प्रत्युत्तर सुन कर वह युवक चुप हो गया किन्तु एक और व्यक्ति तुरन्त ही बोल पड़ा- “हाँ महाराज, आप की बात खरी है। युग का प्रभाव देखिए, लोग मुर्दों की सड़ी गली हड्डियों को पूजने लगे हैं, पर आपकी दृष्टि से देखा जाए तो वह भी राम ही का एक रूप है।”
“राम तो रावण में भी कहीं उसकी अन्तर्चेतना बनकर विराजमान थे। मूढ़ ने उसे तो न सुना और अपनी हाड़ माँस की काया का रव ही सुनता रहा इसीलिए वैसा अंत पाया।”
एक छोटे मोदे हाकिम, एक प्रौढ़ व्यक्ति आगे बढ़कर त्यौरियों पर बल डालते हुए बोले- “तब तो महाराज इन रूपों के झगड़े से वो अपने कबीरदास जी का सिद्धान्त ही क्या बुरा है? साकार के इतने भेद हैं कि हम लोगों के लिए भूल भुलैया सी बन गई है। किस रूप में राम है किस रूप में नहीं हैं, किस रूप में कहाँ राम छिपे हैं, भला बतलाइए, इन सब बातों को सोचते रहें तो अपनी रोजी रोटी किस समय कमाएँ? ”
एक उदंड ब्राह्मण युवक ठठाकर हँस पड़ा, बोला- “हुलासराय जी, ये इनसें न पूछिए, बेपढ़ी लिखी गँवार भीड़ ही इनके जैसों को अपनी ठगहरी विद्या का चमत्कार दिखलाने के लिए मिलती है। ये कबीरदास को मान लेंगे तो इनका धन्धा कैसे चलेगा, ह ह ह ।” उसके साथ ही साथ सारी युवक मण्डली हँस पड़ी।
तुलसीदास अन्दर से तपे तो अवश्य किन्तु क्षणमात्र में अपने को अनुशासित कर लिया। लोक व्यवहार में इधर इधर खो जाने वाला राम शब्द उनकी छाती में बीचो बीच ऐसे आकर जड़ गया जैसे अँगूठी में नगीना। वे भी युवकों के साथ ही खुल कर हँस पड़े, कहा- “ये आपने धन्धे वाली बात अच्छी कही। आजकल धर्म के पास राज तो है नहीं, इसलिए बेचारा छोटे मोटे धन्धे करके ही जी पा रहा है। आप लोग सभी धर्म के धन्धेदार हैं।मुझसे बढ़ कर रहस्य जानते हैं। हम और कबीरदास जी महाराज तो राम जी की दुकान के चाकर हैं। पहले जमाने में आस्था से नंगी अपनी प्रजा को कपड़े पहनाने के लिए श्रीराम ने कबीरदास जी को भेजा। अब कपड़ो के साथ जेवर गहने पहनने के दिन भी आ गए हैं, तो राम जी की दुकान में हमारे मेघा भगत जैसी विभूतियाँ भी चाकरी बजा रही हैं।”
हाकिम हुलासराय जी बोले-“ये आपकी वस्त्र और गहनें वाली बात हमारे समझ में नहीं आई। महाराज, तनिक फिर से समझाने की कृपा करें।”
क्रमशः
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