Wednesday, 26 July 2023

138

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
138-

तुलसीदास बोले -“देश काल के अनुरूप ही धर्म बोध ढलता है। कबीर साहब ने जिस समय निर्गुण राम का प्रचार किया उस समय कैसा घोर अत्याचार हो रहा था। सारी मूर्तियाँ और मन्दिर ध्वस्त कर दिए गए थे। भद्र समाज कायर बनकर विजेताओं के तलवे चाटने लगा था और निर्धन दीन दुर्बल जन समाज बेचारा हाहाकार कर उठा था। अनास्था के ऐसे गहन अंधकार भरे भारत रूपी महल के खण्डहर में कबीरदास यदि निर्गुनिया राम का दिया न जलाते तो आज उसमें भूत ही भूत समा चुके होते।”
“तब आप गली गली में उनका तीव्र विरोध और सगुण का अन्ध प्रचार क्यों करते हैं।”- एक बुद्धिवन्त और सौम्य लगने वाले युवक ने पूरी शिष्टता में अपना तीखापन मिलाकर पूछा।
“मैं निर्गुण का विरोध कभी नहीं करता। सगुण निर्गुण दोनों एक ही ब्रह्म के स्वरूप हैं। वे श्रकथ, अगाघ, अनादि और अनूप हैं। मैं तो केवल उन लोगों का विरोध करता हूँ जो कबीर साहब के बचनों की आड़ लेकर समाज की धार्मिक आास्थाओं के निकम्मे आलोचक हैं। कबीर साहब को राम नाम लाभ हुए सौ डेढ़ सौ वर्ष बीत गए किन्तु तब से लेकर अब तक वे और उनके पथगामी तीखे प्रहार करके भी जन जन के हृदयमन्दिर से रावण हंता रामभद्र की मूर्ति भंजित नहीं कर पाए। चुस्त जन मानस के अडिग आधार सी उस सगुण भक्ति पर निकम्मे प्रहार करके बेचारी जनता को सताते हैं, मरे हुओं को मारते हैं। ऐसे निकम्मे आलोचक लोक देश समाज के शत्रु होते हैं। में इसका विरोध करता हूँ।”
“आप कृष्ण जी के भी तो विरोधी हैं?”
“मैंने कृष्ण प्रेम में गीत गाए हैं। राम श्याम में भेद नही है। पर इस समय मुझे इनका मुरलीधर गोपीरमण रूप नहीं लुभाता। मैं उन्हे धर्नुधारी, असुर संहारक और रामराज्य प्रतिष्ठापक के रूप मे निहारना चाहता हूँ।”
एक युवक ने बात का रंग बदलते हुए पूछा- “हमने सुना है महाराज कि विद्यार्थी काल में पण्डित बटेश्वर जी मिश्र से आपका कोई झगड़ा हुआ था?”
“हमसे उनका कोई झगड़ा कभी नहीं हुआ। हमारे हनुमान जी से उनके भूत अवश्य डरकर भाग खड़े हुए थे।” तुलसीदास के कहने के विनोदी ढंग से कुछ और लोग भी हँस पड़े।
युवक ने फिर कहा- “वह आपके ऊपर कोई मारण प्रयोग कर सकते हैं। महान तांत्रिक है।”
“मारने और जिलाने वाले तो राम है,फिर यह सब बाते निरर्थक हैं।”
फिर उसी युवक ने प्रशन किया-“अच्छा इसे छोड़िए, हमने सुना है कि इन्हीं मेघा भगत के दरबार में आपकी और यहाँ की किसी वेश्या की गायन कला में होड़ लगी थी? ”
तुलसीदास का चेहरा लज्जा और क्रोध से लाल हो गया, परन्तु अपने को संयत रखकर वे मुस्कराते हुए बोले- “हाँ, मेरे भीतर कला प्रदर्शन की होड़ जागी थी।”
हुलासराय ने तुरन्त टोका- “आप लोगों को एक महात्मा से ऐसे भद्दे सवाल नहीं करने चाहिए।”
एक युवक बोला- “इसमें भद्दा कुछ नहीं है। हमारी सहज जिज्ञासा है। महात्मा जी, क्या बतला सकते है कि वह मोहिनी बाई अब कहाँ रहती है? “ तुलसी के मन में  वह छवि अब अपमान की आशंकाएँ उभारने वाली बन गई थी। फिर भी तुलसीदास ने अपने मन को संयत रखा। क्रोध को दबाकर स्थिर स्वर में कहा-“नही ” 
“मिलेंगे उससे? मैं मिला सकता हूँ।” इस प्रश्न के साथ हर युवक के चेहरे पर हिंसात्मक आनन्द की चमक भर गई। तुलसीदास ने चतुर कनखियों से हर चेहरा भाष लिया। चट से मुस्कराकर प्रश्न का उत्तर बड़ी दीनतापूर्वक दिया-“मिला सके तो मुझे राम से मिला दें।” “राम से तो वह राम का प्यारा ब्रह्म पातकी चमार ही मिला सकता है। सुना है आपने उस ब्रह्महत्यारे के पैर भी धुलाए थे?”
“हाँ, दीन दुर्बल और रोगी की सेवा करना मैं राम की सेवा करना ही मानता हूँ।” 
“सुना है, आप जाति पाँति नही मानते?” “मानता हूँ और नहीं भी मानता।” 
“वह कैसे?”
“वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ परन्तु प्रेम धर्म को वर्णाश्रम से भी ऊपर मानता हूँ।” 
युवक मण्डली तुलसी की हाजिर जवाबी से अब चिढ़ उठी थी।उनमें से एक तीखा पड़ा, बोला- “आाप क्‍या अवधूत हैं?”
दूसरा बोला- “अजी अवधूत-वौघूत कुछ भी नहीं। विशुद्ध पाखण्डी हैं ये। जो एक नीच हत्यारे के पैर घोए, उसे भोजन कराए, वह ब्राह्मण भी कदापि नही हो सकता।” 
“तो इनको ब्राह्मण कहता ही कौन है। यह किसी ब्राह्मणी कुलटा के गर्भ से उत्पन्न राजपूत हैं।”
तुलसी भीतर ही भीतर उबलने लगे किन्तु चुप रहे। राम शब्द उनका सहारा था। दूसरे युवक ने तीसरे युवक की ओर कुटिलता से देख कर कहा -“भई, यह राजपूत वाजपूत की तो हम नहीं जानते, पर सुना है कि ये कबीरदास की कौम के हैं।” 
तुलसीदास उठ खड़े हुए।मन हाथ से छूट चला।उनका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा, वे बोले- “धूत, अवधूत, रजपूत, जुलाहा जो जिसके मन में आए जी भरके कहें। मुझे न किसी की बेटी से अपना बेटा ब्याहना है और न किसी की जात ही बिगाड़नी है। तुलसी अपने राम का सरनाम गुलाम है, बाकी और जो जिसके मन में आए कहता फिरे। फकीर आदमी, माँग के खाना मस्जिद में सोना। न लेना एक न देना दो। फिर आप लोगों के फेर मे क्‍यों पड़ू?” कहकर वे उठ खड़े हुए।
एक युवक तुरंत उठा और उनकी राह रोक हाथ जोड़कर बोला- “हममें से कुछ लोगों ने नि: संदेह आपको अपमानित करने के लिए ही यहाँ बुलाया था, मैं जानता हूँ। आपके मत से मेरा विरोध भले ही हो पर मैं आपका सम्मान करता हूँ। हमारी मूर्खतापूर्ण और विद्रूप भरी बातों का बुरा न मानें।”
तुलसी शान्त स्वर में बोले- भैया, बुरा मानकर मेरा कुछ लाभ तो होने से रहा जो मानूँ।आप लोगों ने मेरे बहाने अपना थोड़ा सा मनोरंजन कर लिया, इसलिए अपने आपको धन्य मानता हूँ।” 

तुलसीदास तेजी से चले आए और भगत जी के पास आकर शांतिपूर्वक बैठ गए। सभ्रांतों की भीड़ अब पहले से अधिक जुड़ चुकी थी। तुलसीदास के उत्तेजित हो जाने से सभा में एक प्रकार का सन्नाटा सा छा गया था और संभ्रात समाज को बहुत रुचिकर नहीं लग रहा था। दोषी युवकों को ही बतलाया गया। 
क्रमशः

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