महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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संयोग से अधिक समय न बीत पाया था और जयराम साहु तथा काशी के दो चार बड़े बड़े धनी धोरियों के साथ महान् पण्डित नारायण भट्ट और उनके महामहिम शिष्य राजा गोवर्धनधारी दास टण्डन बारहदरी में पधारे। सभा में बड़ी रौनक भर गई।
भोजनोपरान्त सभा फिर जुड़ी | कुछ कवियों ने अपनी संस्कृत भाषा की कविताएँ सुनाईं। मेघा भगत ने किसी दूसरे कवि का नाम लिए जाने से पूर्व ही नारायण भट्ट जी को सम्बोधित करते हुए कहा- “आचार्य प्रवर, हमारे अनुज सम प्रिय रामभक्त तुलसीदास की कविता अब सुनने की कृपा करें। आज हमारी रामलीला का प्रथम प्रदर्शन भी श्रीराम जन्म प्रसँग को लेकर ही आरम्भ हो रहा है। तुलसीदास कृपा करके सभा को अपनी कोई रम्य रचता सुनाएँ ।”
नारायण भट्ट जैसे उद्भट और परम प्रतिष्ठित विद्वान के लिए काशी के कवि समाज में एक नया चेहरा कोई विशेष आकर्पण नहीं रखता था किन्तु तुलसी के स्वर और काव्य प्रतिभा ने उन्हे क्रमशः अपनी ओर खींच लिया। तुलसी दास सभा में तन्मय होकर गा रहे थे-
“श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्॥”
भजन के समाप्त होने पर सभा कुछ क्षणों तक तुलसी के जादू से बँधी हुईं
मौन बैठी रह गई। सामने मंच से उसी समय जवनिका हटा दी गई श्रीर राम- लीला का प्रदर्शन आरंभ हो गया। लीला प्रदर्शन के बाद लौटते समय दुष्ट युवक मण्डली में से एक बोला- “भई, कुछ भी कहो, सब मिलाकर यह तुलसीदास नाम का प्राणी है चमत्कारी और दमदार भी है।इसीलिए इसे इसी समय उखाड़ फेंकना चाहिए।”
“उसकी एक चाभी तो आज हम लोगों को मिल ही गई है, जातँ पातँ पूछने से चिढ़ता है। घर चलो, बैठकर इसके
मुण्डन संस्कार पर विचार किया जाएगा।”
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गुरु कथा धीरे घीरे बेनीमाधव जी के लिए एक ऐसी प्रेरणा भरी चुनौती बनती जा रही थी, जिसका सामना करने में उनका दिल दहलता था। उन्हें अपने लौकिक जीवन में अपने गुरु के समान विकट संघर्ष कभी नहीं झेलना पड़ा था। वे अभी तक काम को ही राम नही बना पाए और गुरू जी काम क्रोध लोभ मोहादि की शक्तियों को खींचकर कितने मनोयोग से अपनी रामनिष्ठा को प्रबल बना चके हैं और अधिकाधिक बनाते रहे हैं। यह उनके लिए आश्चर्यं जनक तो था ही, साथ ही उनका रहा सहा हौसला भी दिनों दिन पस्त होता चला जा रहा था।वेनीमाधव अपने भीतर बरावर लघुता अनुभव करते जा रहे थे।जब पहले जब वे इसी काशी में गुरु आश्रम के अंतेवासी थे तब भी गुरू जी के व्यक्तित्व के आगे उन्हें अपनी हीनता ने बेहद सताया था। तब गुरू जी ने ही उन्हें सूकर खेत जाकर अपना मुक्त विकास करने की सलाह दी थी। इन दिनों भी उनका एक मन फिर से भाग जाने को होता था। परन्तु दूसरे मन से वे अपनी इस इच्छा को बरजकर पीछे हटते थे। एक दिन जेठ की लूँ भरी दोपहरी में अपनी कोठरी मे बेनीमाधव जी उदास बैठे थे। आकाश उनके मन के आकाश के समान ही दूर-दूर तक सूना था । कोठरी उनके अंतर की तरह ही तप रही थी। माला जपने में मन नहीं लग रहा था, वे अपने आप से उबरना चाहते थे। गर्म हवा के तेज थपेड़ों से कोठरी का पुराना पर्दा फट गया था, हवा आ आकर आग की लपटों सी काया को छू जाती थी। पर्दे के निचले बाँस का दाहिना कोना सुतली टूट जाने से दीवाल मे जड़े कुण्डे से मुक्त होकर बार बार उड़कर दीवार से फदाफट लगता था। वह ध्वनि सीधे उनके मस्तिष्क की शिराओं पर ही वार करती थी। बेनी माधव बाहर भीतर से झुझँलाकर उठे, अपनी छोटी सी कोठरी मे दो चार बार तेज चहलकदमी की और फिर लूँ के झोंके की तरह ही कोठरी से बाहर निकल आए। बगलवाली कोठरी से पर्दे की झिरी से झाँककर देखा, राजा भगत सीधे तने बैठे गोमुखी में हाथ डाले माला जप रहे थे।उनकी आँखें मुँदी हुई थीं। किसी साधक को यह तल्लीनता इस समय वेनीमाधव के लिए शांति दायक न होकर लघुता, चिढ़ और झुँझलाहट उपजाने वाली थी। वे वहाँ से हट आए। नीचे उतरे, कुएँ वाले दालान में रामू दो विद्यार्थियों को पढ़ा रहा था। रामू से वे अब ईर्ष्या नहीं करना चाहते, किन्तु क्या करें, हो ही जाती है। राजा भगत तो खैर गुरू जी के सखा है, ऊँचे साधक हैं, किन्तु रामू आयु में उनके पुत्र समान होते हुए भी आत्मसंयम की दृष्टि से उनसे कहीं अधिक कसा हुआ है। वह छोटी सी आयु में ही ऐसा सध गया है और वे अब भी मानसिक झकोलों से नही उबरे। हीनतावश एक ठण्डी साँस उनके कलेजे से फूटकर निकल गई। भवन के बाहर निकल आए। एक बार जी चाहा कि घाट की ओर निकल जायें और किसी सीढ़ी पर गंगा में गले गले डूबकर बैठ जायें, फिर गुरू जी की कोठरी की ओर देखा। टोडर ने कोठरी के आगे छप्पर छवा दिया था, जो चारों और से एक प्रवेश द्वार को छोड़कर बन्द था, इसलिए लू की तपन बाबा की कोठरी में सीधे नहीं पहुँच पाती थी।बेनीमाघव उसी ओर चले गए।छप्पर में प्रवेश करने पर देखा कि कोठरी के दोनों द्वार खुले हुए थे और अँधेरे में उनके गुरू जी चौकी पर बैठे अपने घुटने पर थाप देते हुए आँखें मींचें कुछ गुनगुनाते हुए झूम रहे थे। वह सुदर्शन गौरवर्ण की तेजस्वी काया कोठरी के अँधेरे को प्रकाशवान कर रही थी। वेनीमाधव बाहर ही खड़े खड़े अपने गुरू जी को देखते रहे। उनके मन के नाचते बवण्डर बाबा को देखते हुए मानों थम गए थे। मरुस्थल में चलते चलते मानों वे हरियाली के सामने आ गए थे।
बाबा ने सहसा आँखें खोली, वेनीमाधव को देखा, बोले- “आओ वत्स, बड़े समय से आए।अभी कुछ देर पहले मुझे तुम्हारी याद भी आई थी।तुम आज अपने से बहुत उखड़े हुए हो, है न?”
वेनीमाधव जी के मन में एक क्षण के लिए भी झिझक न आई, वे वोले- “हाँ गुरू जी, लगता हैं कि एक यथार्थ को झुठलाया नही जा सकता।”- कहकर बेनीमाधव रुके। उन्होंने सोचा कि शायद गुरु जी प्रश्न करें, किन्तु वे मौन बैठे रहें।वेनीमाधव ने आप ही आप फिर बात को आगे बढ़ाया।
क्रमशः
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