Wednesday, 26 July 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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वेनीमाधव कहने लगे- “भोजन और कामसुख यह दो अनुभव ऐसे है कि जिन्हें मनुष्य क्या प्राणिमात्र बार बार अनुभव करके भी जनम भर नहीं अघाता।जब वह इतना व्यापक सत्य है तब इसे नकारना क्‍या उचित है?” अपने बेझिझकपन से वेनीमाधव स्वयं ही कुछ कुछ भय स्तंभित होकर भी बड़ा हल्कापन अनुभव कर रहे थे। जो बात गुरू जी के सामने उनके मुख से कभी निकल ही न पाती थी वह आज अकस्मात्‌ फूट पड़ी।
बाबा बोले- “मेरा यथार्थ तुम्हारे यथार्थ से भिन्‍न है। तुम गली में खड़े होकर जहाँ तक देख पा रहे हो, मैं छत पर खड़े होकर उससे कहीं अधिक दूर तक देख रहा हूँ। यह कहो कि तुम या तो कायर हो अथवा आलसी।”
बेनीमाधव, का माथा फिर झुक गया, बोले- “मैं दोनों हूँ । मैने एक मिथ्या सम्मान की चादर में अपना मुँह लपेटकर अपने आपको को अंधा भी बना लिया हैं।गुरू जी, मैं महामूर्ख हूँ।”
बाबा ने स्नेहपूर्वंक कहा- “यदि यह चेतना तुम्हारे भीतर व्यापक रूप से प्रकट हुई है तो तुमनें कुछ नही गँवाया। मैं जानता हूँ कि तुम आजकल अपने से हार रहे हो, पर मैं नही चाहता कि तुम हारो। अपने को उठाओ,  तनिक अपने विराट स्वरूप को देखों तो सही।वह अपने आप में ही एक ऐसा अनुभव है जिसे पाकर मनुप्य को और कुछ पाने की चाह नही रह जाती।” कुछ क्षण चुप रहकर वे फिर कहने लगे- “मैं जिन दिनों मानस रचना कर रहा था उन दिनों बराबर इसी उत्साह में रहा करता था कि यदि मैं निष्ठापूर्वक इस महाकाव्य को लिख गया तो राम जी मुझे निश्चय ही प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। काशी में जब मेरी जाँति पाँति को लेकर मिथ्या प्रचार बड़े जोर से चला तो मुझे यह लगता था कि अपने आपको सत्ता, कुल अथवा धन के मद में नशा किए हुए जो लोग आज मेरी निन्दा मे व्यस्त है वे यहीं के यहीं रह जाएँगें और मैं राम सानिध्य पा जाऊँगा। इस विचार ने मुझे कभी भी हीन बोध का अनुभव नहीं होने दिया। हीन दीन जो कुछ था वह केवल अपने राम के सम्मुख था और किसी के आगे नहीं।”
गुरु जी की बातों से वेनीमाधव फिर अपनी पकड़ में आ गए।भोला मन अब फिर से सधने लगा था। बोले- “उस ब्रह्म हत्यारे को भोजन कराने के कारण आपको बहुत निन्‍दा सहनी पड़ी। पहले जब मैं यहाँ रहता था तब कइयों से सुना था कि आप यह अस्सी घाट का स्थान छोड़ कर कहीं गुप्तवास करने लगे थे?” तुलसी बोले- “यहाँ से उठकर भदैनी चला गया था।”
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तुलसी के लिए अस्सी घाट पर रहना दूभर हो गया था। उनके विरोधियों के द्वारा भेजे जानेवाले भाड़े के निंदक दिन रात उनकी कोठरी के आसपास मडँराया ही करते थे। निंदक ऐसे मँजे हुए लोग थे कि टोडर के पहलवान और हनुमान अखाड़े के नौजवान ऐसा मौका खोजते ही रहे गए जब वे लोग कोई उत्पात या गालीगलौज करें और यह लोग उनकी ठुकम्मस कर पाएँ किन्तु निंदा बडे़ भक्ति भाव के आडम्बर के साथ की जाती थी। ब्रह्महत्यारे के चरण पखार कर उसे भोजन कराने की बात ने इतना तूल पकड़ लिया था कि बहुत से भक्त भी तुलसीदास के ब्राह्मण होने मे थोड़ा बहुत सन्देह करने लगे थे।
तुलसीदास ने बडे़ धैर्य और संयम से काम लिया, पर वे कहाँ तक एक ही बात को चलाते रहते। उनकी मानस रचना के काम में व्याघात पड़ता था। अरण्यकाण्ड की रचना लगभग पूरी हो चुकी थी। सीताहरण की योजना में रावण कपट मृग का जाल फैला चुका था, किन्तु यहीं आकर तुलसीदास की लेखनी स्तम्भित हो गई थी। न लिखने का अवकाश मिलता है, न सोचने का। एक दिन वे दु:खी हो गए। बड़ी शांति बरतते हुए भी मन की खीझ आखिर उभर ही पड़ी। उन्होंने अपने छद्म निन्दकों और प्रशंसकों की भीड़ से कहा- “भाई, अब इस प्रश्न को समाप्त कीजिए।समझ लीजिए कि न तो कोई मेरी जाँति पाँति है और न मैं किसी की जाँति पाँति से कोई प्रयोजन ही रखना चाहता हूँ। न मैं किसी के काम का हूँ और न कोई मेरे काम का है। मेरा लोक-परलोक सब कुछ रघुनाथ जी के हाथ है।उन्हीं के नाम का भारी भरोसा है।”
बात चल ही रही थी कि एक शहद लिपटी हुई छुरी सा प्रश्न फिर उनके कलेजे के आर पार हुआ। एक व्यक्ति ने हाथ जोड़कर सविनय कहा- “अरे महाराज, आपकी अटल राम भक्ति पर भला कौन सन्देह कर सकता है और मैं समझता हूँ कि यहाँ बैठे हुए किसी भी जन के मन में आपके ब्राह्मण होने में भी सन्देह नही है। ब्राह्मण आप अवश्य हैं, बाकी रहा कुल गोत्र वगैरा सो…….”

निन्दा की नई चाल के इस जहर को तुलसी नीलकंठ की तरह पचाने का प्रयत्न करते करते भी बिफर ही पड़े, बोले- “अरे आप बड़े नासमझ हैं। इत्ती सी बात भी नही जानते कि गुलाम का गोत्र भी वही होता है जो उसके साहब का गोत्र होता है। पर अब दया करके मेरी भी एक विनय सुन लें, मैं साधु होऊँ या असाधु, भला आदमी होऊँ या बुरा आदमी, आपको इसकी चिंता क्यों सताती है? क्‍या मैं किसीके द्वार पर जाके पड़ा हूँ, जो यह आप लोग बे बात की बात फैलाते ही चले जाते है। अरे मैं जैसा भी हूँ अपने राम का हूँ।“ 
उसी दिन शाम को संयोग से कैलासनाथ आ गए। टोडर भी बैठे हुए थे। तुलसी बोले- “कैलासनाथ, अब हम यहाँ से चले जाएँगें।”
“कहाँ”
“दो ही जगह मन में आ रहीं हैं, या तो अयोध्या जाऊँगा या फिर चित्रकूट। समझ में नहीं आता कहाँ जाऊँ।”
“परन्तु तुम यहाँ से जाना ही क्यों चाहते हो?  क्या नगर के कुत्तों की भौं भौं से डर गए?”
“डरा तो नहीं पर दु:खी अवश्य हो गया हूँ। इन निदंकों और प्रश्न कर्ताओं की की चकल्लस में मेरा जप तप ध्यान लेखन कार्य, सब कुछ चौपट हो रहा है। मन को चैन ही नही मिलता तो स्फूर्ति कैसे आए?”
“महात्मा जी, आप कहें तो कपिलधारा पर आपके रहने का प्रबन्ध करा दूँ।” टोडर ने कहा।
“वहाँ जाने में भी मुझे कोई लाभ न होगा। आसपास के गाँवों की भीड़ आ जाएगी।
क्रमशः

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