महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिले किन्तु जन जन के रूप में। यो रामचरितमानस रचकर मेरे घट घट व्यापी राम मुझे निश्चय ही मिल गए। मैंने उन्हें निराकार साकार रूप में बहुत सीमा तक पहचान लिया। उनका पूर्ण रूप देखने की लालसा यों मुझमें अब भी शेष है। कदाचित अंतिम साँस के साथ ही पूरी हो कि न हो।नहीं नहीं, राम कृपा से होगी। इस कलिकाल में तुलसी जैसी लगन से प्रीति निभाने वाले अधिक नहीं हैं। मेरे साहब अब मुझे नवाजेंगे।”
बाबा का अडिग अगाध आत्मविश्वास भरा गौर मुख वेनीमाधव के मन में उत्साह का संचार करने लगा। कैसा साहसी है यह रणबाँकुरा। भाव से भावपूर्ण होकर प्रश्न कर बैठे-“अरण्य काण्ड तो आपने अस्सीघाट पर ही रच डाला था न गुरू जी?”
बावा की स्मृति झनझना उठी,संघर्ष भरे, रचना की लीला भरे, वे पुराने दिन वेनीमाधव को दिखाने के लिए उनकी वाणी पर शब्द चित्र बनकर सँवरने लगे।
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अरण्यकाण्ड अति संघर्ष के क्षणों में रचा गया। हनुमान फाटक और अस्सी
घाट पर विशेष रूप से ब्रह्महत्यारे को भोजन कराने के बाद उन्हें अत्यधिक त्रस्त होना पड़ा। तुलसी आठों पहर सतर्क रहकर अपनी वीतरागता को सिद्ध करते रहते थे और इसके लिए अरण्यवासी तापस श्रीराम का ध्यान उन्हें बल देता था। बल ही नहीं वे आंनद और एक अवर्णनीय तरावट सी पाते थे। उनके मान सरोवर में, बिम्ब शब्दों के कमल बनकर खिलने लगते थे ओर फ़िर वे लिखे बिना रह नही पाते थे किन्तु कितने विध्नों के झटके उन्हें लगते थे। लिखने का तार बार बार टूटता था। यहाँ भी तुलसी को अब तक अयोध्या से कुछ कम संघर्ष नहीं झेलना पड़ा था। अहंता पर चोटें सी पड़ी। यह सचमुच रामकृपा ही थी कि अपने आध्यात्मिक जीवन के प्रथम संघर्ष काल में उन्हें महाकाव्य रचने की प्रेरणा मिली। अयोध्याकाण्ड फिर भी निर्बाध गति से लिखा, यद्यपि भक्ति से अधिक वे काव्यनिष्ठा से बँधे। काशी में काव्य और भक्ति दोनों के प्रति वे अपनी निष्ठा को वैराग्य से संतुलित रखने में सतत जागरूक रहे, यह महाकाव्य तुलसी का होकर भी उसका नहीं था, स्वयं हनुमान जी उससे लिखा रहे हैं। वह जितने सुघड़ ढंग से काम करेगा, जितनी सच्ची लगन से करेगा उतने ही उसके मालिक संतुष्ट होगें। जाति प्रपत्र, निन्दात्मक प्रचार आदि विरोधी पक्ष के तीखे से तीखे प्रहार तुलसी ऊपर से तो सफलतापूर्वक झेल जाते थे पर भीतर कहीं कचोट लगती थी। सद्चिन्ता विहीन शुद्ध दम्भयुक्त सत्ता या धन से मंडित दुश्चरित्र लोग मुझे नीचा कहें और मुझे सुनना पड़े।पीतल सोने को मुंह चिढ़ाए और सोना चुप रह जाय।यह विडम्बना न्याययुक्त मानकर कैसे सही जाय? पर सहनी ही पड़ेगी। रामबोला, राम तेरी परीक्षा ले रहे हैं। इधर से वीतराग वन। महाकाव्य पूरा करते ही राम तुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। अपने को अभागा न समझ। ऊपरी मान अपमान के चोंचले छोड़कर रामकथा रस में डूब -गहरे से गहरा डूब।
भदैनी मे घायल गृद्धराज जटायु से राम की भेंट होने का प्रसँग उठाया। गृद्धराज के बहाने राम वन्दना की और फिर बह चले। किष्किन्धाकाण्ड में, रामकथा में हनुमान के प्रवेश करते ही तुलसी का कार्यभार मानों मन से हल्का हो गया। काव्य रचना में उनकी तन्मयता और गति स्फूर्तिवत् हो उठी। सारा सुन्दरकाण्ड एकरस होकर लिखा।हनुमान जी इस काण्ड के नायक थे। काण्ड रचते समय जब स्वयं राम-सीता अथवा राम के भाइयों के प्रसंग आ जाते हैं, तब तो उन्हें समुद्री तैराक की तरह अधिक सचेत रहना पड़ता है परन्तु हनुमान तो निरे बचपन से ही उनके लिए गंगा के समान हैं। वे उनके बड़े भाई है, सखा हैं, आड़े समय के सहारे हैं इसलिए उनका शौर्य, और उनकी द्रुत कर्म कुशलता का बखान करते हुए उनका काव्य चातुर्य लगन भरे चाकर की तरह उनकी हनुमद्भकिर्ति की सेवा में ऐसा लीन रहा कि जैसा पहले कभी इतनें दिनों तक नही हुआ था। यों घड़ी दो घड़ी, अधिक से अधिक एकाघ दिन तक ऐसी तल्लीन तरंगो के बहाव में तो प्रायः ही बहते रहे थे। सुन्दर काण्ड की रचना करते हुए उन्हें अपने प्रति नया विश्वास सिद्ध हुआ। यों भी मेघा भगत से वे अपने लिए हनुमतवत् संकेत पाया ही करते थे। मेधा भगत ने उन्हें स्वच्छंद जीवन बिताने के लिए व्यवस्था भी बहुत अच्छी कर रखी थी।केवल साँयकाल को छोड़कर कोई उनसे मिलता न था।टोडर और कैलाश नित्य, गंगाराम कभी कभी और जयरामसाहू तीसरे चौथे दिन चक्कर लगा जाया करते थे।सबेरे स्नान पूजा से छुट्टी पाकर तुलसी दास एक बार मेघा भगत से मिलने अवश्य जाते थे।
अशोक बाटिका में हनुमान और जगदम्बा की भेंट का चित्रण करते हुये उन्हें एक गुपचुप आनन्द यह रहा कि वे हनुमानजी की कृपा से जानकी मैया को देख रहें हैं।उनके मुख से राम जी की बातें सुन रहे हैं।जैसे जैसे इस कथा प्रसँग का शब्द चित्र उभरता जाता था, वैसे वैसे उनका आत्म विश्वास अपनी सरल भोली निष्ठा में प्रबल और प्रौढ़ होता जा रहा था।भक्ति के क्षेत्र में उन्होंने पहली बार अपने आपको वयस्क अनुभव किया।पहली बार रत्नावली के प्रति अपनी अनन्य चाह वे राम जी के बहाने सीताजी को अर्पित करके अपने भीतर की अतिरंजित झिझक तोड़ कर मन के नातों में सहज हुये।
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वेनीमाधव ने पूछा- “किसी जीवन चरित्र को रचते समय प्रत्येक पात्र या पात्री की कल्पना आप कैसे करते थे गुरू जी? मैं पहले अपना उदाहरण दूँ, मैं जिस जीवन चरित की रचना कर रहा हूँ, उसमें केवल आप ही नायक के रूप में मेरे जाने पहचानें हैं, किंतु रामकथा रचते समय तो आपके पास एक भी ऐसा पात्र नहीं था जिसे आपने मेरे समान प्रत्यक्ष देखा और भोगा हो,फिर उनके भाव चित्रों की….।”
“क्या बचपने का प्रश्न करते हो वेनी माधव, मैनें अपने राम को तुम्हारे तुलसी दास से अधिक प्रत्यक्ष देखा है।मानस रचते समय मैं जिस ललक के साथ अपने जीवन मूल्यों के पूर्ण समुच्चय स्वरूप श्रीराम कल्पना के साथ आठों पहर तल्लीन रहता था, तुम अपने तुलसी दास में क्या रह पाते हो।सभी पात्रों में जीवन के देखे हुये अनेक चरित्र अपनी व्यक्तिगत छाप मेरे आग्रह से अवश्य ही छोड़ते थे।
क्रमशः
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