महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
141-
इन चकल्लसियों को पहुँचते देर न लगेगी, फिर तो जैसा अस्सी घाट वैसी ही कपिलधारा।”
“हम कहते हैं कि तुम मेघा भाई के साथ क्यों नही रहतें ? भदैनी में जयराम साहू की बगीची में रहो और निश्चिन्त होकर अपना महाकाव्य रचो। वहाँ तुम्हें कोई सता नहीं सकेगा।”
कुछ देर तक विचार करने के बाद तुलसी ने कहा- “तुम्हारे इस प्रस्ताव में दम हैं। मेरा लेखन कार्य वहाँ शांतिपूर्वक हो सकेगा। तब फिर तुम एक बार भदैनी चले जाओ कैलास, मेघा भाई से सही स्थिति बतलाना और कहना कि कल ब्रह्मबेला में मैं भदैनी पहुँच जाऊँगा। कोई यह जान भी न पाएगा कि तुलसी कहाँ गया।”
तुलसी के भदैनी आ जाने से मेघा भगत बड़े ही प्रसन्न हुए।ऐसा लगता था कि उनके आगमन की प्रतीक्षा में वे रात भर नींद भी नही सो पाए थे। देखते ही बड़े उन्मत्त उल्लास से भगत जी ने उन्हें आालिंगनबद्ध कर लिया, फिर एकाएक फूट फूटकर रो पड़े। उस रूदन में तुलसी को भगत जी के अन्तर्मन की शांति और आनन्द का अनुभव ही अधिक हुआ। उन्हें लगा जैसे लूँ भरे मैदान में कोसों चलकर वे ऐसी घनी अमराई में आ गए हों जहाँ आम के बौरों की गंध से लदी शीतल बयार डोल रही है। आलिंगन में बँधे बँधे ही वे बोले- “राम जी ने इस बार कठिन परीक्षा ली मेघा भाई, परन्तु उन्हीं की कृपा से उबर भी गया।”
घीरे धीरे आलिंगन मुक्त हो कर अपने आपको संयत करते करते मेघा भाई फिर रो पड़े, कहा - “अरे अभी तेरी परीक्षाओं का अंत कहाँ आया है भैया, यही सोच सोचकर तो दु.खी हो रहा हूँ।”
तुलसी हँसे, बोले- “आपके इस दु.ख में भी सुख ही झलक रहा है भाई।”
सुनकर रोते रोते ही मेघा हँस पडें, कहा- “एक जगह पर अब मुझे दुःख सुख में अंतर ही नही दिखलाई पड़ता। वासना, बिंब ध्वनि और उसका बहिर्प्रसार बहिर्चेतना है, जितना गहन उतना ही विस्तृत और उतना ही उच्च। कहाँ भेद, करूँ। पहले तीनों अलग अलग समझ पड़ते हैं।अब सब एकाकार हैं।”
तुलसी गंभीर हो गए, कुछ क्षणों तक चुप रह कर कहा- “एक राम, एक कवि, एक रामबोला, तुलसीदास, परन्तु राम तुलसी तक आते आते अनेक रूपरूपाय हो जाते हैं। मेरे जप तप सारे साधन अभी तक आपके समान एकाकार नहीं हो सके। क्या करूँ?” तुलसी के स्वर में उदासी छा गई।
“माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय।” कहकर मेघा भगत भीतर की ओर बढ़ चले।चौखट पर रुककर तुलसी के कंधे पर हाथ रखकर कहा- “घास के फूल जल्दी विकसित हो जाते हैं, चंपक देर से खिलता है। इतिहास मेघा को कहाँ देख पाएगा रे? मेरा तुलसी तो राम बनकर घट घट में रमेगा।ना ना, संकोच न करो भैया।अपने यथार्थ को पहचानो। तुम्हारे अहँकार की बहिर्चेतना और तुम्हारा अंत: कवि दोनों ही राममय बनने की उत्कंठ लालसा में एक सिरे पर तप रहे हैं और दूसरे सिरे पर तुम्हें अपनाने के हेतु स्वयं राम हैं। तुम्हारे महाकाव्य की रचना के लिए यही अंतर्द्धन्द्व कदाचित आवश्यक है।तपे जाओ मेरे भैया, यही तो दु.ख में सुख है।”
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एक राम, एक कवि और एक रामबोला। वेनीमाधव जी अपने भीतर इस गुरू वाक्य को घुनते रहे। असल में उनके राम और काम में ही इन्द्र है। उनका कवि और वेनीमाधब दोनों ही चाहते राम को हैँ, वही तो महिमा की वस्तु है लेकिन कामेच्छा राह में रोड़े डाल देती है। क्यों? तृप्ति पाई तो है फिर अतृप्ति क्यों? गुरू जी को भी ब्रह्मचर्य धारण करने के बाद वर्षो तक काम से संघर्ष करना पड़ा है। तब मैं क्यो डरता हूँ? गुरू जी ने अपने भक्त और कवि के अन्तर्द्वद्व का भी सुन्दर निरूपण उस दिन मेरे सामने किया था। अयोध्याकाण्ड की रचना करते समय वे अपनी काव्यात्मक निपुणता के प्रति जितने निष्ठावान रहे उतने राम भक्ति में लीन न रहे। उन्होंने अयोध्या में अपनी रचना के पाए जाने वाले प्रसँग से यों यथार्थ बोध ग्रहण किया था। अपने काशी के अनुभवों में भी उनके लिए नियति से तीखी टकराहटें ही मिलीं। फिर भी वे अपने महाकाव्य की रचना में लगन के साथ लगे रहे। वह निष्ठा जो इनके मन को व्यर्थ संघर्ष रत बनाकर रचनात्मक कार्य में जुटाए रखती है, मुझे क्यों नहीं मिलती? कैसे पाऊँ? वेनीमाधव का सरल बाल सम मन चंद्रखिलौना पाने के लिए मचल रहा था। गुरुजी की बात पूरी हो जाने के बाद वे अपने ही गुंताड़े में लीन गए।
बाबा बोले- “अच्छा जाओ, बाहर देख आओ, स्नानादि का समय हुआ कि नहीं। कल फिर तुम्हें आगे की कथा सुनाऊँगा। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।”
दूसरे दिन फिर वें अपनी कथा सुनाने लगे- “मैंने एक को ले लिया और उस एक के पीछे ही दीवाना बन गया।धन वैभव सत्ता आदि लोक में लुभाने वाला सब कुछ मेरे राम के पास था और इतना था जितना कि मनुष्य की कल्पना में आने वाले कोटि कोटि ब्रह्माण्डों में किसी भी जीव के पास नहीं था।मैं उसे ठेठ भाषा में कहूँ वेनीमाधव कि अपने आदर्श की ऊंचाई के आगे मुझे ये बादशाह, सिपहसालार, राजे-महाराजे, सेठ-साहुकार मिट्टी के खिलौनों के समान लगते थे।मेरे सृजनशील अहं को जो शक्तियाँ हीनता का बोध करा सकतीं थीं वे तुच्छ बन गईं। ऐसे ही कामादि वृत्ति रूपी असुर भी मेरे सृजन शील अहं को तुच्छ नहीं बना सकता था। मेरे कवि का साहब परम न्यायी और करुणानिधान है,फिर मैं भला लोक की रावणी व्यवस्था से क्यों घबराता? मुझे परस्पर विरोधों के बीच से चलकर अपना राममार्ग प्रशस्त बनाना था।इसके बिना मैं अपनी सृजनशीलता को जिस धरातल पर ढालना चाहता था वह ढल न पाती। मेरा कवि अपने साहब के प्रति निष्ठावान था और मेरा साहब घट-घट में रमा हुआ है इसलिए मैं मानव मन के दर्शन करने का योग ही जीवन भर साधता रहा।”
बेनीमाधव बोले - “आपने क्या राम के प्रत्यक्ष दर्शन पाए गुरू जी?”
बाबा हँसे, कहा- “जानते हो, रामचरित मानस लिखते समय मुझे बराबर यही विश्वास होता था कि जिस महाकाव्य को स्वप्न में जगदम्वा जानकी, कपीश्वर और कवीश्वर की आज्ञा पाकर रच रहा हूँ उसके पूरा होते ही राम जी मुझे अवश्य ही प्रत्यक्ष दर्शन देगें।
क्रमशः
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