Wednesday, 19 July 2023

133

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
133-

कैलासनाथ बड़ी आत्मीयता भरी दृष्टि से अपने बाल्य बन्धु को देखते हुए
बोले- “जै, श्री शिवराम” 
“जै सियाराम, जै शंकर।” दोनों मित्र मुस्कराने लगे। बैठने पर तुलसीदास ने पूछा--“भाई जी के लिए तुम अभी क्या कह रहे थे कैलास?”  
“मैं झूठ नही कहता तुलसी, मैं इधर कई महीनों से भगत जी के स्वभाव में अन्तर पा रहा हूँ।”
“अभी कुछ ही दिन पहले मैं उनसे मिल आया हूँ,वे मुझे स्वस्थ दिखे।मन से भी चंगे लगे। उनकी बातों में रस था, प्राण थे।”
“हाँ, यह सब है, पर मैं अनुभव से कहता हूँ। मैं कवि हूँ। मैं जब चाहूँ किसी भी छन्द में रस और भावी को समान शक्ति  से बखान दूँगा परन्तु वह शक्ति मेरी पहले की कमाई हुई सिद्धि है, आज की नहीं। यदि मैं अपने काव्य के भीतर कोई नई बात नहीं कहता, अपनी थकी हुई शब्द योजना को ताजापन नही दे पाता तो सब कुछ बेकार है। मेघा भगत भी अब वैसे ही भगत हो गए हैं।”
तुलसी का चेहरा झुक गया। मन कह रहा था कि तेरा भी यही हाल होने वाला है। तुलसीदास, पहले उछाह के भरने मे भक्ति रुपिणी विद्युत संचार करने वाली जिस जलधार से तू नहाया था वह अब तुझसे दूर हो चुकी है।नही, नही, नही !तुलसी के चेहरे पर कम्प आ गया। जैराम साहु कैलास जी से कह रहे थे -“भाई मुझे तो उनकी भक्ति अब ऊँची बढ़ गई मालूम होती है । भक्ति न होती तो भला वे रामलीला की सोच सकते थे?”
“कैसी रामलीला, साहू जी ?” तुलसी ने उत्सुक होकर पूछा ।
कैलास बोले- “अरे उसी का तो निमंत्रण देने आए है हम। वाल्मीकीय रामायण के आधार पर उन्होंने नटों से रामलीला का प्रसँग प्रस्तुत कराया है। कहते है प्राचीन काल मे लीलाएँ होती थीं।उनका अब फिर से प्रचलन होना चाहिए। कल राम-जन्म होगा।”
सुनकर तुलसी की सच्ची ललक सहसा जागी। उत्सुकता भरे आत्मलीन स्वर में पूछा- “राम जन्म होगा?” 
“अरे आगरे वाले राजा टोडरमल है न, उनके बेटे राजा गोवर्धनवारी आज कल नगर में आए हुए है, सो उनको दिखलाने के लिए यह स्वाँग हो रहा है।”
कलास जी की इस बात से जैराम साहु के मुख पर खिन्‍नत चढ़ी, बोले- “कवि जी, आप तो जिसके विरुद्ध हो जातें हैं उसमे फिर किसी अच्छाई को देख ही नहीं पाते। (तुलसी की ओर देखकर) महाराज जी, गुण दोषों पर, हमारी नजर जब तक‌ काँटा तोल न सधे तब तक क्‍या हम सच को परख सकते हैं? ”
“वाह, वाह, यह खरी वैश्य बुद्धि की बात है। काँटा तोल बात आप ही कर सकते थे। मै स्वयं अपने भीतर इस समदृष्टि को पाने के लिए तड़प रहा हूँ। कल किस समय होगा राम-जन्म?”
स्नेह से अपने मित्र की ओर देखकर हँस कर कैलासनाथ ने कहा- “तुम्हारे अन्तर में तो प्रतिक्षण हो ही रहा है। उस दिव्य छवि की झाँकी मैं तुम्हारे नेत्रों में पा रहा हूँ किन्तु मेघा भगत……..।”
“अरे अब क्रोध छोड़ कर बात कर भाई।” तुलसी ने प्यार से भिड़कते हुए कहा- “जैराम जी ठीक कहतें हैं। तुम अब झक्की हो गए हो कैलास।”
कैलासनाथ ने मौन होकर सिर झुका लिया, पल दो पल के बाद ठण्डे स्वर में कहा- “अब की क्या, अब मैं अपनी पराई, सारी लोक लीला से ऊब उठा हूँ बंधु जो तुमको अपने बीच में न पाता तो सच कहता हूँ कि मैं अब तक गंगा में कूदकर अपने प्राण दे चुका होता। एक बडे़ मनसबदार आ रहें हैं तो मेघा भाई लीला दिखला रहें हैं। बाहरी भक्ति ढोंग की रजाई ओढ़…..।”
तुलसी हल्के हल्के चिढ़ गए, कहा-“बस बहुत बक लिए भाई, अब तुम्हारी यह बक बक मुझे चिढ़ाती है।”
कैलास कवि अपने स्वर को यथासाध्य शांत बनाकर बोले- "देखो तुलसी, तुम हमारे वहुत पुराने साथी हो। यही मेघा भगत जी हमारे तुम्हारे साथ का कारण बने। उनके प्रति मेरी श्रद्धा तुमसे छिपी नहीं है। पिछले बीस बाईस वर्षों में मैंने तुम्हें भी देखा है और उन्हें भी। कहो, हाँ।”
तुलसीदास ने हाँ तो न कहा किन्तु गम्भीर भाव से हाँ सूचक सिर हिलाया। कैलास जी बोले- “भगत जी की भक्ति-भावना तुमसे पहले चमकी। तुम्हारी चमक के बढ़ते चरण मैंने आरंभ के दिनों में भी देखे और अब यह विकसित रूप भी देख रहा हूँ, कहो हाँ।”
तुलसीदास गम्भीर रहे किन्तु मुस्कराहट की एक रेखा उनके होठों पर खिंच ही गई। आखो में विनोद की चमक भी आई, कहा- “हाँ ”
“इत्ते वर्षों में हमारे परमपूज्य मेघा भगत जी कोल्हू के बैल की तरह राजे रजवाड़े, सेठ, साहुकार उन्हीं के घेरे मे नाच रहे हैं और तुम गली गली बावले की तरह डोल डोलकर सबके अन्दर नैतिकता की आँधीं उठा रहे हो, उठा रहे हो कि नही?”
“नहीं, हवा”
“क्यों ”
“मैं व्यक्ति की भीतर वाली सगुण निर्गुण खण्डित आस्था को दशरथनन्दन राम की भक्ति से जोड़कर फिर खड़ा कर देना चाहता हूँ। मैं अकेले नहीं, पर समाज के साथ राममय होना चाहता हूँ। मेघा भाई का भी उद्देश्य यही है, पर मार्ग दूसरा है।” 
जैराम साहु और कैलास दोनों ही तन्मय होकर तुलसीदास की बातें सुन रहे थे, उनके स्वर के उतार चढ़ाव उनकी शांत गम्भीर उत्तेजना के बहाव को देख रहे थे। बात समाप्त होने पर कैलास तुलसी के पैर छूने के लिए आगे बढ़े।
“हैं हैं, ये क्या करते हो जी?” के उत्तर में तुलसी के हाथों से अपना हाथ छुड़ाकर पर छूने का हठ ठानते हुए श्रद्धा विगलित स्वर में कहा- “तुम हमारे मित्र भले हो पर तुम सचमुच महान आत्मा हो।तुम्हारी कथनी और करनी में द्व नहीं है। यह सबसे बड़ी बात है। भगत जी बैठे बैठे तो जीवमात्र को अपने कलेजे का बूँद बूँद भाव अर्पित कर देगें, पर कहो कि उठकर जाएँ तो नही।तुम्हारी तरह गली गली डोलना उन्हें एक अप्रतिष्ठित कार्य लगता है।” अपनी बात कहते कहते उत्तेजनावश कैलास जी तुलसी के पर छूने का स्वयं अपना ही आग्रह बिसार कर सीधे खड़े हो गए। उनकी बाँहे छोड़ कर तुलसी ने मुस्करा कर कहा- “देखो, कैलास मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही आगे बढ़ता है। फिर हर एक की प्रकृति में थोड़ा बहुत अन्तर भी होता ही है।
क्रमशः

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