Wednesday, 19 July 2023

132

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
132-

आठ दस दिन को कह गये थे।अब लगभग डेढ़ महीना पूरा होने को आया।”
“पण्डित जी चुनार में बीमार पड़ गए थे महात्मा जी। मैंने कल ही उनके घर आदमी भेजकर पुछवाया था। अब स्वस्थ हैं और बस दस पाँच दिनों के भीतर आने ही वाले हैं।”
“हाँ, हमारा विचार है कि एक बार यहाँ के विद्वान‌ समाज से भी हमारा नेह नाता बँध जाय। हमें न जाने क्‍यों भीतर ही भीतर यह आभास होता है कि वह वर्ग हमारे लिए व्यर्थ ही में संकटकारी भी हो सकता हैं।”
“अरे नहीं, महात्मा जी, आप चिंता न कीजिए। एक दिन जहाँ सबको दिव्य ठंडाई बूटी छनवाई, स्वादिष्ट भोजन छकाए, जरा इतर फुलेल, हार गजरे से मस्त किया नहीं कि सब हाँ जी, हाँ जी कहते डोलने लगेंगे।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “बात इतनी सरल नही है टोडर। खैर होगा, राम करे सो होय।”
टोडर के जाने के बाद एकांत मे चूल्हे पर अपनी खिचड़ी पकाते हुए ध्यानमग्न बैठे थे। मन कह रहा था- “यश की चाह,धन की चाह और कामिनी की चाह, यह तीनों एक ही हैं तुलसी। इनमे अंतर मत समझ। केवल स्त्री को ध्यान से हटा देने मात्र ही से तू निष्काम नहीं हुआ। यश की लालसा भी काम ही है। तू कुछ दिनों तक अपना कथा व्यापार बंद कर, नहीं तो तेरा दंभ फूल उठेगा।कथा व्यापार क्यो छोड़ू ? क्‍या इससे मेरी कीर्ति ही बढ़ती है? नहीं टूटे हुए दुखित नर नारियों को आस्था भी मिलती है।उनके जीवन में रस आता है। मैं जो काम केवल अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने की कामना से ही करूँगा वह कदापि सफलीभूत न होगा। मेरी भी ऐसे ही नाक कटेगी जैसे कथा प्रसँग में सूपर्णखा की नाक कटने वाली है।” 

तुलसीदास के चेहरे पर हँसी आ गई। हंडिया का ढक्कन उठाकर खिचड़ी की स्थिति देखी और उसे कलछुल से हिलाते हिलाते सहसा मन फिर बोला-“अच्छा, सूपर्णखा प्रसँग में रामजी जो जरा सी चकल्लस करें तो क्या बेजा होगा? मर्यादा पुरुषोत्तम जगदंबा के सामने स्वयं तो हँसी में भी किसी अन्य स्त्री को प्रोत्साहन न देंगे।”
तुलसी गुनगुनाने लगे-  “सीतहिं चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुमारे मोर लघु भ्राता॥
रे गइ लछिमन रिपु-भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥”

आँखों के सामने दृश्य आने लगे।कुटी के बाहर एक ओर सियाराम जी बैठे हैं। उनसे थोड़ी दूर पर लक्ष्मण जी वीरासन पर बैठे हैं। कामिनी शूपर्णखा रीझ भरी और ललचाई हुई दृष्टि से लक्ष्मण को देख रही है। लक्ष्मण कहतें हैं-
“सुन्दरि सुनु में उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥” 
गुनगुनाहट में पंक्तियों पर पंक्तियाँ बनती गई--सीतहिं समय देखि चतुराई।
राम लक्ष्मण को संकेत करते हैं। लक्ष्मण आगे बढ़कर सूपर्णखा को पकड़ कर गिरा देतें हैं और उसके नाक कान काट लेते हैं।
एकाएक तुलसी का ध्यान दूटता है।झोपड़ी की फूँस से बनी दीवारों का कोना, उसके आगे बना हुआ चूल्हा, उसके ऊपर चढ़ी हुई मिट्टी मढ़ी हंड़िया आँखों के सामने आ जाती है। तुलसी की नाक में अप्रिय गंध आ रही है। खिचड़ी से जलाँध उठने लगी थी। झट से हड़िया उतारी, उसका ढकना खोल- कर देखा। खिचड़ी की स्थिति देखकर हँसे और आप ही आप बोल उठे-“अच्छी सूपर्णखा की नाक की चिंता की, मेरी खिचड़ी ही जल गई। खैर अब इसकी चिंता छोड़ कर इन चौपाइयों को लिख डालूँ  फिर याद से उतर जाएँगी तो कठिनाई होगी।”

वेनीमाधव के बोलने से बाबा का ध्यान भूतकाल से वर्तमान में आ गया। संत जी ने पूछा- “पंडितों की वह सभा जो आप चाहते थे?”
बाबा हँसे और बोले -“वह न हो पाई। पण्डितों ने पण्डित गंगाराम और टोडर दोनों ही को, हमारा पक्ष लेने के कारण निंदित किया। वही अयोध्या जैसी दशा हुई। हमारी लोकप्रियता कवि पण्डित समाज की ईर्ष्या का कारण बन गई ।”
“इस प्रतिकूल वातावरण का प्रभाव आपके काम में निश्चय ही बाधक सिद्ध हुआ होगा गुरू जी।”
“बाधक नहीं साधक सिद्ध हुआ, क्योंकि हम खरे अर्थ में विरक्त होना सीख गए।”
वेनीमाघव बोले- “गुरू जी, इतना त्याग कर चुकने के बाद भी आपने अपने को क्या उस समय तक विरक्‍त नहीं माना था?”
“कैसे मानता वेनीमाधव, मैं अपने राम के प्रति अनुरक्त होते हुए भी अपनी काव्य प्रतिभा से ही अधिक लगाव रखता था। मुझे साधारण जन समाज से मिलने वाला स्नेह उतना नही रिझाता था जितना कि अभिजात वर्ग से प्रतिष्ठा पाने की लालसा। फिर भला बतलाओ कि मैं अपने आपको रामानुरागी वीतरागी क्योंकर मानता? यह तो अरण्यकाण्ड रचते हुए जब सीता जी के विरह में राम जी के विलाप का वर्णन करने लगा तो सहसा मुझे लगा कि-
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रामायण रचते रचते तुलसीदास ने एकाएक अपनी कलम रख दी और गहरी चिंता की मुद्रा में सूनी उदास दृष्टि से अपनी कोठरी के बाहर चमकते प्रकाश को देखने लगे। मन कहता है, “रे तुलसी, प्रतिष्ठा का दशानन तेरी भक्ति को हर ले गया है। तू काव्य में जिस असीम भक्ति की बातें कर रहा है वह क्या सचमुच तेरे पास है?”
“नहीं, हाँ है। मैं सूने मन से भक्ति की बात नही कर रहा हूँ। मैं जन जन में राम के दर्शन करने के लिए सतत‌ प्रयत्नशील रहता हूँ।”
“फिर दम्भी रावण समाज मे प्रतिष्ठा पाने की लालसा तुझे क्यों सताती है?”तुलसीदास की प्रश्न भरी आँखों में लज्जा का बोध धलका, आँखें नीची हो गईं। एक गर्म उसाँस मुँह से निकल गई। वे अनमने होकर एकाएक उठ खड़े हुए और अपनी कोठरी में बावले से चक्कर काटने लगे। मन झिड़क रहा था, “कहाँ है तेरी राम दर्शन की चाह? तू भूठा है, लबार है।”
“मैं काव्य रचते हुए राम जी का ही तो ध्यान धरता हूँ।”
“झूठा है, तू केवल कथा प्रसँगों को जोड़ने की चिन्ता करता है। तेरे मन में राम का वास्तविक स्वरूप अब भी नहीं आया।”
“कैसा है वह रूप? कहाँ देखूँ , कहाँ खोजूँ , कहाँ पाऊँ?”
बाहर से कैलास जी का स्वर सुनाई पड़ने लगा। वह किसी से कह रहे थे- “मैं आपसे सच कहता हूँ कि अब मेघा भगत वह पहले के मेघा भगत नहीं रहे।”
जैराम साहू और कैलास कवि बातें करते हुए भीतर आ चुके थे। जैराम हाथ जोड़ कर जै सियाराम कहते हुए आगे बढ़े और तुलसी के चरण छूने को झुके।
क्रमशः

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