Tuesday, 18 July 2023

131

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
131-

तुलसीदास ने घड़े का पानी डालकर उसे बुझाया।अपनी झोली उठाई, बाहर निकल कर चौकन्‍नी दृष्टि से इधर उधर देखने लगे फिर प्रार्थना की- “हनुमान जी, मैं आपकी ही आज्ञा से यह काव्य रचना कर रहा हूँ। मु्झे सुचित्त होकर लिखनें दें।”
कहकर वे अधेंरी गलियों में चल पड़े। रात अभी पहर भर ही चढ़ी थी। नगर की सब गलियों में अभी पूरी तरह से सन्नाटा नहीं हुआ था। जिस समय वे गोपाल मन्दिर की गली से गुजर रहे थे, उस समय मन्दिर में आरती के घंटे घड़ियाल बज रहे थे। तुलसीदास मंदिर में चले गए।आरती समाप्त हुई। पट बंद हुए। भक्‍त जन अपने अपने घरों को चले। 
तुलसीदास ने तब वहाँ के एक कर्मचारी से कहा- “अयोध्या जी से आया हूँ। यहाँ हनुमान फाटक पर ठहरा था। कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने धर्म के नाम पर वहाँ मुझे तंग करना आरम्भ किया और आज तो कोठरी के किवाड़ों में आग तक लगा दी। क्या मुझ निराश्रित को यहाँ रात भर टिकने के लिए स्थान मिल सकेगा।” एक क्षण तक तो पुजारी उन्हें देखता रहा, फिर कहा- “आओ हम तुम्हें सोने की जगह बतला दें।”
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“गोपाल मंदिर मे अधिक दिनों तक टिक न सका।” 
“क्या उन लोगों ने आपका विरोध किया गुरू जी”
“हाँ, परन्तु मैं किसी को दोष नहीं देता। बात यह कि मेरी कथा के प्रशंसक शीघ्र ही मुझे खोजते हुए वहाँ पहुच गए। उनमे टोडर सबसे पहले पहुँचे।” 
“हाँ गुरू जी मैं उन्हीं के बारे में सोच रहा था। वे बेचारे तो बहुत दु:खी हुए होगें?”
“पूछो मत, बहुत दु:खी थे। अस्तु यह भीड़ भाड़ और एक अपरिचित शरणार्थी
का यह महत्व स्वाभाविक रूप से मेरे प्रति ईर्ष्या का कारण बना। मैं उस समय अरण्यकाण्ड के लेखन में इतना तन्मय था कि तुमसे क्या कहूँ। मेरे सामने राम कथा के बिंबो को छोड़कर एक और भी चित्र आता था और वह था, कथा सुनने वाले भक्त नर-नारियों का। काल से पिटे, शासन से दुरदुराए, अपने भीतर से टूटे हुए निरीह नर-नारियों का समाज जब मेरी आँखों के सामने आता था तो ऐसा अनुभव करता था कि जब अपने साथ ही साथ इन मनुष्यों में रामभद्र के अवतार की कामना करूँगा, तभी मुझे श्री युगल कमल चरणो में खरी भक्ति मिलेगी।”
“आप ऐसा क्‍यों अनुभव करते थे गुरू जी?”
बाबा हँसे, बोले-  “जिसके पैरों में बिवाइयाँ फटती है न, वही दूसरों के दर्द को समझ सकता है।जीवन तत्त्व और है ही क्या? उदारता और स्वाधीनता मिल कर ही जीवन तत्त्व हैं। इन दोनों के मेल से प्रेम तत्त्व आप ही आप उमगता और निखरता है।”
“क्या फिर गोपाल मंदिर वाली कोठरी भी आपको छोड़नी पड़ी?”
“हाँ, टोडर बड़े ही प्रेमी जीव थे। यों तो केवल चार गाँवों के ही ठाकुर थे, पर उनका कलेजा किसी बड़े से बड़े साम्राज्य के विस्तार से कम न था।उन्होंने असी घाट पर तुरन्त ही यह जमीन खरीद ली। मेरे लिए पहले तो एक मडैया छवा दी। फिर धीरे धीरे मंदिर इमारत इत्यादि भी उन दिनों में बनवाईं।”
“जब हम अगली रामनवमी पर कुछ महीनों के लिए अयोध्या चले गए थे, परंतु…..”
“वह आगे की बात है। कथा प्रेमी भीड़ वहाँ भी, अर्थात असी घाट पर भी पहुँच गई। नगर में किसी तरह से ये किंवदंती फैल गई कि मेरे शत्रुओं द्वारा सताए जाने पर हनुमान जी अपना विराट रूप धारण करके प्रकट हो गए थे, जिससे दुष्टों की भीड़ भाग गई। मेरे संबंध में इतनी चमत्कारिक कथाएँ नगर में फैल गईं कि वहाँ पहुँचने के चौथे पाँचवे दिन एक विशाल समुदाय मेरे सामने था। इससे मैं भूल गया पंडितो के ईर्ष्या, द्वेष की बात, भूल गया आने वाले संकटो की बात।उस समय मैं अरण्यकाण्ड रचना में ही डूब रहा था। उसे ही तन्मय होकर सुनाने लगा।” 
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तुलसीदास अरण्यकाण्ड सुना रहें हैं। जनता मंत्रमुग्ध होकर सुन रही है। उनके स्वर में ऐसा आकर्षण और वर्णन में ऐसी चित्रमयता है कि लोगों को लगता है कि मानों सारे दृश्य उनकी आँखों के आगे घट रहे हैं। महर्षि अत्री के आश्रम में सीता राम लक्ष्मण का स्वागत होता है। अनुसूईया सीता को उपदेश देतीं हैं। वन में रहने वाले ऋषि पुनि और तापस उनका अलौकिक रूप और बल देखकर उनमें परमब्रह्म के दर्शन पातें हैं। तुलसी दास ने राम का ऐसा मार्मिक रूप आँका कि सुनने वालों के मत में उस सुन्दरता को देखने की ललक उनके प्राणों की सारी शक्ति समेटकर उन्हें भाव रूप राम का दर्शन कराने लगी।टोडर तो ध्यानलीन हो गए थे। कथा में फल फूल अनाज पैसे चढ़ने लगे।
तुलसीदास भीड़ के जाने के बाद टोडर से बोले- “आज और कल सबेरे के लिए इतने दाल चावल रखे लेता हूँ। बाकी सब ग़रीबों को बँटवाने की व्यवस्था आप कर दें और इन रुपये टकों का उपयोग कुछ नि:सहाय विधवाओं और दीन दुःखियों में बाँट कर करें।”
टोडर बोले- “महात्मा जी, आप तो बस लिखिए और सुनाइए। बाकी सारी चिन्ताएँ मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। हमने एक और प्रबंध भी कर दिया है कुछ पहलवान यहाँ रहेंगे।उनके लिए अखाड़ा भी बनवा दूँगा । फिर कोई टिर्र पिर्र करेगा तो….।”
“तुम मेरी सुरक्षा की चिन्ता छोड़ो। मेरे बल राम हैं और सहायक बजरंगबली। बाकी अखाड़ा बन जाने से हमें सचमुच बड़ी प्रेरणा मिलेगी। हम तो सोचते हैं कि नगर में जगह जगह अखाड़े बन जाएँ, अखाड़ों में हनमान जी की मूर्तियाँ स्थापित हो जाएँ और चारों वर्णों के तरुण सबल बनें। एक बार राम जी की वानरसेना तैयार हो जाए तो फिर उन्हें प्रगट होते देर नहीं लगेगी। (बच्चों की तरह मचलकर) टोडर, अखाड़ा तुम जल्दी से जल्दी बनवा दो मित्र। पहले एक अखाड़ा मेरे यहाँ बन जाए, हमारे जवान तगड़े बनने लगे तो फिर मैं इस शंकर जी के शहर में चारों ओर हनुमान अखाड़ों की गुहार लगाऊँगा। राम जी की सच्ची पूजा न्याय पक्ष की पूजा है। जब हमारे जवान हनुमान बली का आदर्श लेकर बली बनेंगे तभी न्याय की प्रतिष्ठा और रक्षा भी हो सकेगी।” तुलसीदास के मन में बड़ा उल्लास था। कुछ देर वे अपने ही में मगन रहे फिर एकाएक पूछा, “अरे भाई, हमारे गंगा राम की कुछ खैर खबर मिली?
क्रमशः

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