महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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वहीं इनकी कथा होगी। लौटते समय हमने टोडर से कहा- “टोडर जी आपने कथा का न्योता देकर मुझे बड़े असमंजस में डाल दिया है।”
“क्यों महात्मा जी?”
“कृपा करके आप मुझे महात्मा न कहें । मैं साधारण मनुष्य हूँ। थोड़ा बहुत राम जी का नाम जप लेता हूँ बस इससे अधिक और मेरी कुछ पहुँच नहीं है।”
टोडर हाथ जोड़कर बोले- “यदि मैंने आज आपका प्रवचन न सुना होता तो मैं मुख से यह शब्द आपके लिए एकाएक कभी न निकालता। महाराज मैं ठहरा दुनियादार लोक-व्यवहार में दिन-रात लगा रहता हूँ। भले बुरे सभी मिलते हैं। मैं सँभलकर मुँह से शब्द निकाला करता हूँ पर कथा के लिए स्थान बतलाकर मैंने क्या कुछ गलती की महात्मा जी?”
“नही, वैसे तो कथा बाँचना ही मेरी जीविका है और उसे छोड़ना भी नहीं चाहता। विरक्त के हेतु भी आज के समय मे स्वाभिमान से जीने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी जीविका अवश्य कमाएँ। कबीर साहब अपने चरखे करघे के घन्धे से बँधे थे इसलिए उनकी वाणी मुक्त थी। मैंने भी अयोध्या में यही सबक सीखा। पर अभी कुछ दिनों यह करना नहीं चाहता था। उसी उद्देश्य से अयोध्या से कुछ धन भी ले आया हूँ।”
“अब अपनी दो रोटियों की चिंता का भार दया करके अपने इस दास पर ही छोड़ दें।आप आनन्द से अपनी रामायण लिखें और आपसे मेरी अरदास तो यही है कि कथा अवश्य सुनाएँ। हम जैसे प्राणियों का भी उद्धार होना चाहिए महात्मा जी।”
“मैं भला टोडर से यह कैसे कहता वेनीमाधव कि मेरा अहंकार, सिद्ध कथावाचक और भाषा के कवि के रूप में विख्यात होने से पहले काशी के पण्डित समाज में प्रतिष्ठित होने के लिए तड़प रहा है। देखी यह विडंबना कि एक ओर राम भक्ति पाने के लिए मन तड़पता है और दुसरी ओर पण्डितो से संस्कृत के कवि के रूप में वाह वाही पाने की छटपटाहट भी है। एक ओर दुनिया से वैराग भी है और दूसरी ओर यह वाह वाही का लोभ भी। इसी द्वंद्व से मेरी सच्ची चाहना को निकालने के हेतु नियति ने मानों मेरे लिए काशी में भी संघर्ष का एक वातावरण प्रस्तुत कर दिया।”
“कैसा संघर्ष हुआ गुरू जी?”
“टोडर ने अपने भद्र समाज में मेरी बड़ी प्रशंसा की। उघर मंगलू भगत और उनकी तरफ के लोग दूसरे दिन ही मेरे हनुमान फाटक वाले नये स्थान पर पहुँच गए। स्वाभाविक रूप से प्रवचन का आयोजन हुआ। बस, फिर तो तुलसी भगत तुलसी भगत की धूम मचने लगी।”
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हनुमान फाटक पर तुलसी के निवास स्थान पर बड़ी भीड़ जमा है। तुलसीदास अभी कहीं पास ही में गए हुए है। जनता उनकी प्रतीक्षा में है। लोगों में बातें चल रहीं हैं।
“भाई, बहुत देखे, पर इनके ऐसा कोई नहीं देखा।”
“कैसा सरूप है और कसा मधुर कण्ठ पाया है। अरे प्रेम देखो उसका, सुनाते सुनाते कैसा अपने से रम जातें हैं। इनको राम जी जरूर दर्शन देते होगें भइया।”
“हाँ भाई, जिसकी जैसी करनी उसको वैसा ही फल मिलता है। हम तो इसी मोहल्ले में रहतें हैं।आठों पहर देखते हैं या तो बैठें-बैठे लिखा करतें हैं या फिर धर्म उपदेश दिया करतें हैं। कोई ऐब नहीं। औरतों की ओर तो आँखें उठाकर भी नही देखते। काशी में ऐसे-महात्मा हैं तो जरूर, पर बहुत कम दिखाई देते हैं।”
थोड़ी ही देर में तुलसीदास टोडर को साथ लिए आ गए। मजमा उनके सम्मान में उठ खड़ा हुआ। जै-जे सियाराम और हर-हर महादेव के जयकारे गूँजे। जैसे ही जयकारे गूँजे वैसे ही न जाने कहाँ से ढेले आने लगे। तड़ातड-तड़ातड़ ढेलों की बौछार होने लगी। भीड़ में कई लोग घायल हुए। कइयों ने उत्तेजनावश चीखना पुकारना आरभ कर दिया। थोड़ी ही देर में भीड़ ढेलों की बौछार से त्रस्त होकर भागी। ढेले आस पास की छतों से आ रहे थे। तुलसीदास शांत खड़े देखते रहे। उनके बाँयें कंधे पर एक लखौरी ईंट चोट करती हुई निकल गई थी। खून बह रहा था। टोडर अपने रूमाल से उसे पोंछते हुए बोले- “यहां कुछ लोगों ने अपना धर्म परिवर्तत कर लिया है। यह दुष्टता उन्होंने ही दिखलाई है।” तुलसीदास मौन रहे।
दूसरे दिन सबेरे ही सवेरे तुलसीदास जब गंगा स्नान से लौटकर आए तो उन्हें
अपनी कोठरी की चौखट के आगे एक मरा हुआ कुत्ता, कुछ हड्डी के टुकड़े आदि पड़े दिखाई दिए। तुलसीदास के पैर ठिठक कर थम गए। मुँह से राम-राम शब्द निकला। तीसरे दिन जब भी कोई तुलसीदास के द्वार पर आता तभी, उसके ऊपर ढेले बरसने लगते। चौथे दिन तुलसीदास टोडर से बोले- “भाई मैं यहाँ नहीं रहूँगा।हनुमान जी मुझे यहाँ रहने की आज्ञा नही देते।”
टोडर अकड़कर बोले- “अरे महात्मा जी, चार दिन इन्होंने उत्पात मचा लिया, अब देखिए मैं भी इन्हें अपना तमाशा दिखाऊँगा। अकबर बादशाह का राज है, सबको अपने धरम करम की छूट है।ये लोग कोई सचमुच मुसलमान थोड़े ही हुए थे। बिरादरी में फूट पड़ गई, बस इन लोगो ने धर्म बदल दिया। बदला लेने के लिए हमें सताते हैं। मैं कल ही यहाँ के हाकिमों से मिलकर सारा प्रबध कर लूँगा। आप यहीं पर रहें।”
तुलसीदास रात में अपनी कोठरी बंद करके, दिये के सामने बैठे लिख रहे हैं। अत्रि ऋषि के आश्रम में सीता सहित राम लखन, दोनों भाई, विराजमान हैं। तुलसीदास दोहा लिख रहे हैं-
प्रभु आसन आसीन, भरि लोचन शोभा निरखि।
मुनिवर वचन प्रवीन, जोरि पानि अस्तुति करत।
तुलसीदास तन्मय होकर लिख रहें हैं। अचानक देखते है कि बंद किवाड़ों के भीतर धुआँ और आग घुसी चली आ रही है। तुलसीदास घबराकर उठ खड़े होते, हैं। हे राम, यह कैसी परीक्षा। मेरी सारी काव्य रचनाएँ नष्ट हो जाएँगी। तुलसी दास क्षण भर तो मूढ़वत खड़े रहे, फिर झटपट अपनी झोली उतारी, अपने आगे फैले हुए कागज-पत्र जल्दी जल्दी समेट कर उसमे रखे, उस पर अपना धोती अंगौछा रखा और लोटे में दवात कलम डालकर झोली तैयार करके रखी।चौखट के एक कोने से लपटें भी निकलने लगीं और बंद कोठरी में धुँआ तो दम घोटने वाला हो गया था। कोने में पानी का घड़ा रखा था।उससे लपटों वाले स्थान पर पानी डालने लगे। लपट शांत हुई, कुण्डी खोली।पूरी चौखट धीरे धीरे आग पकड़ रही थी।
क्रमशः
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