महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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गंगाराम बोले- “अरे भाई, तुम इन्हें अभी से चंग पर न चढ़ाओ टोडर जी, अभी कुछ दिनों तो मैं इन्हे अपने ही पास रखूँगा।”
दो क्षण मौन रहा, फिर बात को नये सिरे से उठाते हुए गंगाराम टोडर से बोले- “तो भाई, हमारा प्रश्न विचार तो यही ठहरता है कि तुम्हारा और मंगल भगत का समझौता हो जाएगा। टोडर, मार पीट, खून खराबे की नौबत नहीं आएगी।”
“यही बात मेरी समझ में नहीं आती है महाराज, यो तो मंगल भी भला है और मैं भी भला हूँ पर हठ में न वह कम है और न मैं। वही किस्सा है कि नाले के आर-पार जाते हुए दो बकरे बीच में रखे छोटे से पटरे पर खड़े हैं और जब तक एक बकरा दूसरे को टक्कर देकर नाले में गिरा न दे तब तक वह आगे नहीं बढ़ सकता।”
तुलसी बोले- “बात पूरी न जानने के कारण मैं ठीक तरह से तो नहीं कह सकता, पर मुझे भाई गंगाराम की बात उचित ही जान पड़ती है। बकरे तो पशु थे किन्तु आप मानव हैं, राम चेतना युक्त हैं। आप दोनों को बकरों जैसी टकराने की स्थिति से बचना ही चाहिए।” गंगाराम बोले- “उचित बात कही।पर बात भी कुछ नहीं, मंगल अहिर भृगु आश्रम के पास रहता है। वहाँ उसकी दो-चार एकड़ भूमि है। इनके यहा बंधक पड़ी है। वह इनका रुपया चुका नही पाया। मियाद निकल चुकी है। अब मन में मोह है कि अपना यश बढाने के लिए यह उस स्थान पर एक धर्मशाला बनवा दें और फलों का बगीचा भी लगवा दें। इधर मंगल इनसे और मियाद चाहता है। वह स्वय भी उस भूमि पर अपने यश के लिए कोई काम करता चाहता है।”' टोडर बोले- “मैं जानता हूं महाराज कि उसे चाहे जितनी मियाद दे दी जाए, वह अव मेरा ऋण चुकाने लायक नही रहा। पिछले साल पशुओं की बीमारी में उसकी आधी से अधिक गायें मर चुकीं हैं, परन्तु वह अपनी हेकड़ी नहीं छोड़ता।”- तुलसी ने टोडर से कहा- “टोडर जी,मेरा विचार यह कहता है कि आपको किसी महात्मा की कृपा से अक्षय यश मिलेगा मेरे कहने से आप यह तकरार छोड़ दें।” टोडर थोडा असमंजस में पड़े, फिर बोले- “आपकी जैसी आज्ञा हो महाराज पर…….।”
“अब पर वर न निकालो टोडर। तुलसी की इस बात का समर्थन तुम्हारी जन्मकुण्डली से भी होता है। मेरा ध्यान अब इस वात पर गया। मंगलू से लड़ना ठीक नहीं होगा। वह हठी जरूर है पर बड़ा ही भला और परोपकारी व्यक्ति है।”
“जब दो पण्डित एक ही मत के हों तो मुझे मानना ही चाहिए।”
पण्डित गंगाराम जी उत्साह भरे स्वर में बोले- “अरे ये कोरे पण्डित ज्योतिषी या कवि ही नही, बड़े राम भक्त भी हैं। हो सकता है कि हमारें ये तुलसी ही आगे चलकर महात्मा सिद्ध हों और तुम्हें इनकी कृपा से यश मिले”
तुलसी खिलखिलाकर हँस पड़े। पण्डित गंगाराम के हाथ पर हाथ मारकर कहा-“तुम्हारी विनोद वृत्ति अभी वैसी ही बनी हुई है। मुझे याद है टोडर जी कि गंगा राम हम लोगों के साथ पढ़ने वाले एक भोजनभट्ट छात्र, घोड़ू फाटक को भी मेरे संबंध में ऐसे ही बहकाया करते थे।”
गंगाराम भी हँसे परन्तु फिर गम्भीर होकर बोले-“तुलसी, जब मनुष्य चाहता है तब कुछ नहीं होता है। जब ईश्वर चाहता है तब सब कुछ सिद्ध हो जाता है और जब मनुष्य और ईश्वर दोनों मिलकर चाहते हैं तब कुछ भी असम्भव नहीं होता। तुम्हारे संबध में मेरी भविष्यवाणी गलत नही होगी। अरे, इसी प्रसँग में याद आया, टोडर हम अपने मित्र के सम्मान में यहाँ के प्रसिद्ध पण्डितों और कवियों की एक गोष्ठी करना चाहते हैं।”
“मैं सारा प्रबंध कर दूँगा महाराज और जहाँ तक हो सके मंगल को यहाँ बुलवा कर आप ही समझौता करवा दीजिए।”
“तब तो भाई तुम्हें और दस दिन ठहरना पड़ेगा। मैं कल सबेरे चुनार जा रहा हूँ।”
तुलसी एकाएक बोल उठे- “जब वह भी भला है और आप भी भले हैं तब बीच में बात चलाने के लिए आवश्यकता केवल एक तीसरे भले आदमी की ही है, चाहे उसकी जान पहचान हो या न हो । मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ टोडर जी। अनेक वर्षों से भृगु आश्रम की ओर गया भी नहीं हूँ। फिर यह निश्चित है कि रामकृपा से मेरी बात खाली नहीं जाएगी क्योंकि आप अपना दावा छोड़ रहे हैं।टोडर कुछ सोचकर बोले- “अच्छा, तो फिर मैं कल पहर भर दिन चढ़े तक
यहाँ आकर आपको साथ ले चलूँगा। पण्डित जी तो उस समय यहाँ होगें नहीं।”
“हाँ, इसी कारण से आप मेरे लिए, हनुमान फाटक वाले उस स्थान का प्रबंध भी आज ही कर लीजिएगा।”
आश्वासन मिलने पर तुलसीदास को लगा कि अब वे एक अत्यंत अनुकूल वातावरण में पहुँच गए हैं। उनका काव्य निश्चय ही अब सुख से आगे बढ़
सकेगा। उन्हें संस्कृत भाषा के कवि समाज में अपनी संस्कृत काव्य रचनाए
सुनाने का अवसर मिलेगा। यह सब कल्पनाएँ उनके अहम को बड़ी तुष्टि दे रहीं थीं।
वेनीमाधव को अपनी पूर्व कथा सुनाते सुनाते तुलसीदास मौन हो गए फिर कहा- “देखो, नियति कैसा खेल खेलती है।हम चाहते थे कि काशी में अपनी कथा आरभ करने से पहले वहाँ के पण्डित समाज में एक बार अपना सिक्का जमा लें तो उसका परिणाम शुभ होगा। अयोध्या में पहले पण्डित समाज में हेल मेल नहीं बढ़ाया इसीलिए, उस समाज के कुटिल पुरुषों को हमारे विरुद्ध पैर जमाने का अवसर मिल गया। काशी में यह न करेंगें। परंतु प्रभु की वैसी इच्छा न थी। हम टोडर के साथ जो भृगु आश्रम गए तो वहा मंगल अहिर से बड़ा प्रेम हो गया। वह सचमुच भक्त आदमी था। फैसला तो खैर तुरंत ही हो गया, कोई बात न थी? फिर उसने हम दोनों को रोक लिया। उसने हमसे कहा कि आपकी बातें बड़ी सुन्दर हैं। हम गाँव जवार के लोगों को बुलाए लेते हैं। कल सबेरे प्रवचन कीजिए तब जाइएगा और मेरा वह राम कथा प्रवचन ही काशी और उसके आस पास के क्षेत्रों में मेरे यश का कारण बन गया।बहुतों ने पूछा कि आप कहाँ कथा बाँचेगें। हम आया करेंगे। टोडर चट से बोल दिए कि हनुमान फाटक पर महात्मा जी रहेंगे।
क्रमशः
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