महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
128-
दरबान की बात काटकर यथासाध्य शान्त स्वर से कहा- “ठीक है, परन्तु तुम उनसे जाकर इतना अवश्य कह दो कि तुलसीदास आए हैं।”
दरबान विनय दिखाकर तुरन्त चला गया और उसकी विनय ने तुलसीदास को धक्का दिया। मन बोला, 'रे मूढ़ तुलसी, अभी तेरा अहंकार नही गया।बेचारे दरबान पर रोब दिखाता है।”
अपने अपराध के प्रायश्चित स्वरूप तुलसीदास वहीं चबूतरे पर बैठकर राम-राम जपने लगे। राम नाम उनकी मति को सही राह पर हाँकने वाला डण्डा था। कभी आन्नदमय बनकर वह उन्हें अपने भीतर किलोलें भी कराता था। वही उनका मोह भी बन चला था। जपानुज्ञासित होते ही तुलसी का मन शान्त हुआ।
तभी भीतर से गंगाराम तेजी से डग भरते आते दिखाई दिए तुलसीदास का चेहरा खिल उठा। वे अपने मित्र के सम्मानार्थ उठकर खड़े हो गए और दो डग आगे बढ़ आए।
“अरे, तुलसी”- दोनों मित्र एक दूसरे से आलिंगनबद्ध हो गए, फिर विस्मय झलकाते हुए गंगाराम ने पूछा- “यह क्या वेश बना रखा है? ”
तुलसी की दोनों बाँहे गंगाराम की पीठ पर थी, दाहिनी हट गई। बाईँ के दबाब से उन्हें आगे बढ़ने का संकेत देकर स्वयं एक डग बढ़ाते हुए वे मुस्करा कर बोले- “भीतर चलो। सब बतलाऊँगा।”
दालान में नौकर खड़ा था। गंगाराम ने उसे उँगली और आँखों से तुलसीदास के पैर धुलाने का आदेश दिया और भीतर बैठके की ओर मुँह करके बोले- “अभी आया टोडर जी।” भीतर से आवाज आई- “हाँ, हाँ, महाराज, हमें जल्दी नहीं है। तुलसी बोले-“तुम भीतर चलो, मै आया।” आँगन में दालान के खम्भे से लगी संगमरमर की चौकी पर बैठकर तुलसीदास स्वयं अपने पाँव धोने के लिए उद्यत हुए किन्तु नौकर ने उन्हें ऐसा न करने दिया। हाथ मुँह धोकर ताजे हुए फिर अपनी झोली उठाने लगे। नौकर स्वयं उसे उठाने लपका किन्तु तुलसी ने बरज दिया- “मैं स्वयं ले जाऊँगा।” भीतर प्रवेश किया तो गंगाराम अपनी गद्दी पर बैठे बैठे ही हिले और टोडर जी उनके सम्मान में हाथ जोड़कर खड़े हो गए। तुलसीदास की आँखें टोडर से मिलीं। दोनों ओर नेह की कनी पुतलियों में चमकी। टोडर देखने मे सुदर्शन थे। बड़ी-बड़ी भव्य मूंछे, गले मे सोने का कण्ठा और मोती माला पड़ी थी। उँगलियाँ अँगूठियों से जड़ी थी-दुपट्टा प्रगरखा भी कीमती था। पण्डित गंगाराम ने हाथ बढाकर तुलसी को अपने पास ही बुला लिया। एक ही गावतकिये का टेका लेकर दोनों मित्र बैठ गये। गंगाराम ते कहा- “ये हमारे टोडर जी यहाँ के एक बड़े सम्पन्न और धर्मनिष्ठ व्यक्ति हैं।इनसे मेरा परिचय अब पुराना हो चुका है।”
फिर टोडर से तुलसी का परिचय कराते हुये कहा- “टोडर जी, ये हमारे बचपन के साथी मेरे सहपाठी सुकवि पण्डित तुलसीदास जी शास्त्री कथा वाचस्पति हैं और ज्योतिष विद्या में तो मैं इन्हें अपने से श्रेष्ठ विद्वान मानता हूँ।
“राम, राम टोंडर जी, हमारे मित्र की अतिशयोक्तियों पर ध्यान न दें। मैं यदि गंगा हूँ तो यह गंगासागर हैं।”
गंगाराम हँस पड़े और बोले- “तब तो मैं भी तुम्हारी तरह से कहूँगा कि मैं यदि तुलसीदास हूँ तो तुम साक्षात तुलसी का विरवा हो।” हंसी-विनोद के क्षण बीतने के बाद टोडर ने पूछा- “महाराज, कहाँ से पधारे हैं?
“अयोध्या से आ रहा हूँ।अब यहीं रहने का विचार है।” फिर गंगाराम को ओर देखकर कहा- “आजकल सरस्वती देवी की मुझ पर असीम कृपा है। मुझे राम महिमामय बनाने के लिए वे मेरे सुमिरन करते ही दौड़ी चली आती है।”
“कोई बड़ा काव्य लिख रहे हो तुलसी”
“हाँ, जब से तुम्हारे यहां बैठकर रामाज्ञा प्रश्न रचा था तभी से सरस्वती मैया मुझ पर दयालु बनी हुई हैं। कई फुटकर छन्द लिखे, “जानकी मंगल' नाम से एक प्रबन्ध काव्य की रचना भी कर डाली और इन दिनों सम्पूर्ण राम कथा लिखने की प्रेरणा मुझे बाँधे हुए हैं।“
टोडर प्रसन्न होकर, बोले- “अरे वाह महाराज, यह तो हमारे लिए बड़े ही आनन्द की बात है। कहाँ तक लिख डाली? ”
“अभी एक सोपान चढ़ा हूँ । विवाह के बाद राम जानकी अयोध्या आए तब से लेकर उनके वनवास लेने और राजा दशरथ की मृत्यु के बाद चित्रकूट में भरत भेंट होने तक का प्रसँग पूरा कर लिया।
“तो फिर यह प्रथम सोपान कैसे हुआ?” - गंगाराम ने पूछा और फिर कहा- “अरे भाई, राम-जन्म से लेकर राम-विवाह तक की कथा कायदे से प्रथम सोपान कही जानी चाहिए।”
“हाँ, तुम्हारी बात ठीक है। असल में जानकी-मंगल की कथा सुनाते सुनाते “राम भक्तों के आग्रह से मैं आगे की कथा लिखने बैठ गया। अब स्वयं भी सोचने लगा हूँ कि इस महाकाव्य को 'जानकी मंगल’ से अलग कर दूँ और इसका एक बालकाण्ड भी रच डालूँ।अयोध्या में इस समय मुझे अनुकूल वातावरण न मिला। दुर्देववश इस समय वहाँ कोई श्रेष्ठ विद्वान अथवा कवि न होने से मुझे हीन प्रकार की ईर्ष्या द्वेष दम्भादि वृत्तियों से लड़ना पड़ता था। काव्यरचना के आनन्द में विध्न पड़ता था। इसलिए यहाँ चला आया।”
पण्डित गंगाराम बोले- “बस तो अब तुम मौज से अपने उसी चौबारे में बैठकर काव्यरस सिद्ध करो, जिसमें तुम्हे रामाज्ञा मिली थी।”
टोडर तुरन्त आग्रह दिखलाते हुए बोल उठे- “पण्डित जी आपके तो मित्र हैं, जब जी चाहे इन्हें अपने पास रख सकते है, पर इस समय तो मेरी इच्छा है कि मुझे इनकी सेवा करने का मौका मिले। आपको मैं परम शांत ओर सुरम्य स्थान दूँगा महाराज।”
तुलसी बोले- “आपके प्रस्ताव के लिए कृतज्ञ हूँ टोडर जी। यों गंगाराम का घर मेरा अपना ही घर है, पर इस समय मैं गृहस्थी के वातावरण में नहीं रहना चाहता। मुझे एक ऐसी स्वतंत्र कोठरी दिला दीजिए जिसमे मैं अपना काव्य-साधन भी करूँ और वैराग साधन भी।”
गंगाराम गम्भीर हो गए, बोले- “तुलसी, तुम्हारा यह नया रूप मेरे लिए अभी रहस्यमय है। तुम अभी से वैराग्य क्यों धारण कर रहे हो? ”
तुलसी ने मुस्कराकर कहा- “जब तक, राम-कृपा नहीं होती, वैराग्य नही आता।मैं अभी पूर्ण विरक्त नहीं बन सका। काव्य के सहारे अपने को वैसा बना अवश्य रहा हूँ। मुझे आप कोई स्वतंत्र एकांत कोठरी दिला दें टोडर जी।”
“ऐसा स्थान मेरी नजर में है महाराज। हनुमान फाटक पर में चौकस प्रबन्ध
कर दूँगा।चाहे तो आज ही कर दूँ। वह स्थान मेरे एक नातेदार का है, मेरा ही समझिए।"
क्रमशः
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