Saturday, 15 July 2023

127

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
127-

आप जो नया काव्य लिख रहें हैं, हम उसी को सुनना चाहते है।”
“अच्छा गंगा दशहरे के दिन रामघाट पर सुनाऊँगा।”
“गंगा दशहरे के दिन वाली कथा ने एक ओर जहाँ मुझे अपार प्रोत्साहन दिया वहीं दूसरी ओर वह मेरे लिए नये संकटों का कारण भी बन गई।”
“वह कैसे गुरू जी?” सन्त वेनीमाधव ने पूछा।
बाबा बोले- “उसकी कुछ चौपाइयाँ और दोहे अयोध्या में जगह जगह गाए गुनगुनाएँ जाने लगे। मेरे विरोधियों को इससे कष्ट होना स्वाभाविक ही था। इसमें किसी का दोष न मानों वेनीमाघव, यह मनुष्य की प्रकृति ही है। आगे बढ़ने वाली शक्ति को ईष्यालु लोग पीछे ढकेलने का प्रयत्न करते ही हैं। राम घाट पर जहाँ मैं रहता था वहाँ कुछ बन्दर भी रहते थे। उनसे मेरा बड़ा नेह नाता था। जब मैं चबूतरे पर बैठता था तो बन्दरों के बच्चे मेरे आस पास ही ऊधम मचाया करते थे। एक दिन रात को मैं और मेरे   धर्मपिता कोठरी के बाहर सो रहे थे।

आधी रात का समय है, तुलसी और बूढ़े पण्डित धरती पर चटाई बिछाए सो रहे हैं। कोठरी के पीछे वाले भाग में एकाएक मनुष्यों की चीत्कारों और बन्दरों के चिचियानें खोखियानें के स्वर एक साथ उठे। तुलसी और बूढ़े पण्डित जी की नीद खुल गई। वे उसी क्षण भागे, देखा कि कोठरी की दीवार के पीछे एक व्यक्ति बेहोश पड़ा है। बन्दरों का सरदार दीवाल से सटकर बैठा हुआ गुर्रा रहा है और कुछ बन्दर चीं-ची करते हुए दूर भागे जा रहे हैं। उनके साथ ही भागते हुए मनुष्यों के पैरों की आहट भी आ रही है।मनुष्यों और बन्दरो की चीख पुकार ने घाट पर सोने वाले कुछ और लोगों को भी जगा दिया।बंदरों का सरदार बंदर बेहोश व्यक्ति के पास ही बैठा गुर्रा रहा था। तुलसीदास ने उसके सिर पर दो बार हाथ फेरा- “शांन्त हो जाओ भूरे शान्त हो।” कहकर तुलसीदास ने अपना बायाँ हाथ, जो पड़े हुए व्यक्ति की बाँह पर रखा तो वह खून से चिपचिपा उठा। तब तक दो तीन लोग वहाँ और आ गए थे। भूरा वहाँ से हटकर अलग बैठ गया। एक बोला- "चोर है, ससुरा सेंध काटिस है।” तुलसी बोले- “तभी तो भूरे ने इस पर आक्रमण किया। इसकी कलाई में बड़ी जोर से काटा है, उससे बड़ा लहू बह रहा है। मूर्च्छित भी हो गया है। दिया लाओ गुरूबचन।“
दिया आया, सेंध के अन्दर घुसी हुई चोर की गर्दन बाहर निकाली गई। कोई सेंध की काट देखने लगा, किसी ने पास ही पड़ी कुदाल भी खोज निकाली। कोई इसी मसले पर विचार करता रहा कि इस कोठरी में सेंध लगाने का भला अर्थ ही क्या है। चढ़त में चढ़ी हुई धनराशि तो उसी समय कंगलों को बांट दी गई जबकि गंगा दशहरे के दिन दो सम्पन्न भक्तों ने बूढे पण्डित जी की इच्छानुसार वहाँ एक छोटा सा कथामण्डप और हाता बनवा देने का भार अपने ऊपर ले लिया था। तुलसी उस समय चोर का उपचार कर रहे थे। उसके मुँह पर पानी के छींटे मार रहे थे। चोर होश में आया, पीड़ा से कराहा। तुलसी शांत स्वर में उससे बोले- “डरो मत, अब तुमसे कोई मार पीट नहीं करेगा। भूरे ने तुम्हें काफी दण्ड दे दिया है लेकिन यहाँ क्या चुराने आए थे भाई? फकीरों के घर में भला क्या धरा है?” 
चोर रोने लगा- “हमसे बड़ा पाप भया महाराज, वैदेहीबल्लभ महाराज ने हमें आपकी पोथी चुराने भेजा था, सो ये बन्दर जाने कहाँ से कूद पड़े। मेरा एक साथी लगता है भाग गया और मेरी ये दुर्गत भई।मुझे छिमा कीजिए महाराज मैंने बड़ा पाप किया।”
गुरवचन घाटवाला यह सुनकर चिढ़ भरे स्वर में बोला- “ये बैदेहीवल्लभ महा लंपट और कुचाली है।गेंदिया से भी उसी ने नाटक कराया था।अयोध्या जी में कुछ लोग तो बड़े ही दुष्ट हैं। चार बुरों के कारण और सब साधुओं को कलंक लगता है।” 
“भला बताओ, पोथी चुराने की क्या तुक है? ” 
बूढ़े पण्डित जी बोले- "ये पोथी रच जाएगी तो इन जैसों को कानी कौड़ी को भी कोई न पूछेगा। अरे कलयुग की माया बड़ी विचित्र है भइया।” 
तुलसी गम्भीर विचारमग्न मुद्रा में बैठे थे। उनका मन एक नये निश्चय पर पहुँच रहा था। वे बोले- “जब मधुकरी माँग कर खाता और पड़ा रहता था तब कोई बात न थी पर जबसे यह प्रतिष्ठा पापिनी बढ़ चली है तभी से रार भी बढ़ चली है।मैं अब यहाँ रहूँगा नहीं। काशी चला जाऊँगा।” 
“क्यों भैया, क्यों? अरे हम सबके रहते ये दुष्ट तुम्हारा एक बाल तक बांका नही कर सकते।” गुरुवचन बोला। 
“पर चिंता अपनी नहीं गुरुवचन, इस रचे जानेवाले महाकाव्य की है। सरस्वती ने मेरे जीवन में ऐसा अमृतवर्षण पहले कभी नही किया, अब तो इसी मोह में फँसा रहना चाहता हूँ भाई। रामायण रचते समय मैं पूर्ण शान्ति चाहता हूँ। यह झगड़ा संकट चोरी चकारी का भय मुझसे सहन नहीं होगा। आज हनुमान जी ने भूरे के रूप में इसकी रक्षा कर ली किन्तु कभी धोखा भी हो सकता है। मेरी विपत्ति पिताजी को भी घेर सकती है।”
बूढ़े पण्डित जी बोलें- “तुम तनिक भी चिन्ता मत करो बेटा, मैं किसी से मिल-जुल कर सुरक्षा का चौकस प्रबन्ध कर लूगाँ।
“नही पिताजी, मेरा मन कहता है कि कुछ दिनों के लिए मुझे यहाँ से टल जाना चाहिए। राम जी के घर में ईर्ष्या हमले आदि की आँधियाँ उठाना उचित नहीं।शंकर जी विषपायी हैं। वहाँ कवियों और पण्डितों का समाज बड़ा होने के कारण कदाचित मुझे ऐसी निम्नकोटि के ईर्ष्या द्वेष का सामना न करना पड़े। मैं कल भोरहरे ही काशी चला जाऊँगा।” 

जिस समय तुलसी भगत प्रह्लाद घाट पर अपने मित्र पण्डित गंगाराम के यहाँ पहुँचे उस समय डेढ़ पहर दिन चढ़ चुका था। गंगाराम जी का घर रंगा- पुता, पहले से कुछ बदला हुआ, अधिक भव्य लग रहा था। द्वार पर एक दरबान भी खड़ा था। कन्धें पर अपनी रचनाओं का झोला लटकाए थके मांदे तुलसीदास को देखकर दरबान ने हाथ जोड़कर कहा- “दानसाला बाँई ओर है बाबा, चले जाइए।”
“मुझे पण्डित गंगाराम जी से मिलना है, दान लेने नहीं आया हूँ।”
“वो तो महराज जी, इस समे काम कर रहे है। कोई बड़े जमीदार आए हैं, उनका।“
तुलसी की अहंता फूली।
क्रमशः

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