Thursday, 13 July 2023

126

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
126-

“जबते राम ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाये।”
काव्य तेजी से गतिमान था। अयोध्या में ऋद्धि-सिद्धि भरे सुखद दिन बीतने लगे।राजा दशरथ के दरबार की रौनक चौगुनी हो गई। भरत जी और शत्रुघ्न जी अपने मामा के साथ अपनी ननिहाल कैकय देश की सैर को चले गए। तभी एक दिन राजा दशरथ ने अपने कान के पास पके हुए केश को देखा। तुरन्त ही उन्होने राम को युवराज पद देने का निश्चय कर लिया। प्रजा में यह समाचार सुनकर आनन्द छा गया। रनिवास में रामचन्द्र की तीनों माताएँ हर्ष और उछाह‌ में भर कंचन थाल भर भर मोती मानिक लुटानें लगीं। गुरु वशिष्ठ ने तिलक की लगन शोधी।
काव्यगंगा मन्थर गति से बह रही थी।
तुलसीदास इन दिनों सबेरे से ही लिखने बैठ जाते और मध्याह्न तक उसी तरंग में डूबते उतरते रमते रहते थे। बूढ़े पण्डित जी कोठरी के बाहर अपने चबूतरे पर बैठते और तुलसीदास के नये भक्तों को कोठरी के पास जाकर उनके दर्शन करने से रोकते थे। बस्ती में यह बात बड़ी तेजी से फैली थी कि 'जानकी मंगल’ कथा के अन्तिम दिन जब भगत जी को यह बात मालूम हुईं कि अयोध्या में रामनवमी पर प्रतिबन्ध लगा है तो वे तड़प उठे और उन्होंने ध्यान लगाकर कहा कि घबराओ मत, सब मंगल ही मंगल होगा। सच्चे भगत के वरदान स्वरूप ही दिल्‍ली से रामनवमी मनाने का शाही हुकुम आ गया। तुलसी सच्चे भगत हैं। अब वे रामायण लिख रहे हैं जिसके पूरे होते ही राम जी फिर से अवतार लेंगे। तुलसी भगत की सच्ची झूठी महिमा भी उनके काव्य के साथ ही साथ क्रमशः आगे बढ़ रही थी।

रामनवमी के तीन चार दिनों के बाद ही दुष्टों की सभा फिर जुड़ी। इस बार सब लोग महंत वैदेहीवहलभ चरणकमल रजघूलिदास जी महाराज के ऊपर
वाले चौबारे में एकत्र हुए। महात्मा वैदहीवल्लभ बोले- “महंत जी, यह तुलसी भगत हम सबकी मान मर्यादाओं को फलाँगता भया और क्या नाम करके,अयोध्या वासियों के सिर पर चढ़ायेमान होता भया चला जा रहा है। ये वास्तव में बड़ी चिन्ता का विषय है।” 
कथावाचस्पति पण्डित शिवदीन बोले-“और तो सब ठीक ही है, पर वह जो अब रामायण लिख रहा है सो समझ लो कि हमारे विरुद्ध एक भीषणतम षड़यंत्र रच रहा है। उस दम्भी का दुस्साहस तो देखिए। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि,जी के परमपुनीत काव्य के रहते, नये भाषा में काव्य रचना क्या उचित बात है? मतलब यह कि वह तो कथा बाँचने की सारी परिपाटी ही बदल डालेगा।” वैदेहीवल्लभचरणकमलरजघूलिदास जी ने कहा- “अभी से इतना अधिक भयभीत होने की आवश्यकता नही है शिवदीन जी। क्या नाम करके, देखना चाहिए कि वह काव्य सफल भी होता है या नही।”
पण्डित रासदत्त बोले- “कवि वह नि:संदेह उच्च श्रेणी का है। इसमें दो मत कदापि नहीं हो सकते।अरे, अपनी कवित्त शक्ति ही से तो उसने अयोध्या वासियों को आकर्षित किया है।”
वैदेहीबल्लभ जी ने मुँह बिचका कर कहा- “हाँ, सत्य मैं वह गाता मधुर ढंग से हैं।सारा जादू उसके गले में है।”
शिवदीन बोले -“अरे, तो फिर किसी तिकड़म से उसको सिन्दूर खिलाय देव, गला आप ही बैठ जाएगा।”
सुदर्शन पण्डित बोले- “यह असंभव है, हमने सुना है कि वह आजकल केवल फलाहार करता है। दूध पीता है।”
रामदत्त बोले - "देखिए, आप लोग तो घर बैठे बातें कर रहे हैं। मैंने उसे स्वयं सुना है। एक दिन बातें कर चुका हूँ। वह कवि श्रेष्ठ तो है ही किन्तु प्रकाण्ड पडित भी है। अरे आचार्य शेष सनातन जी का शिष्य है, भाई।”
शिवदीन बोते-“तुम तो उसके बड़े प्रंशसक बन गए हो जी। एक जरा से भुनगे को हाथी बनाकर हमारे सामने खड़ा कर रहे हो।यदि वह शास्त्रार्थ से ही उखाड़ा जा सके तो में उसका सामना करने को सहर्ष तैयार हूँ। मेरी तर्क शक्ति के आगे वह मच्छर भला कहाँ तक भिनभिना पाएगा।”
“आपके तकों का श्राधार क्या होगा?” महंत जी ने पूछा।
“राम के सगुण और निर्गुण रूप। मैं कबीर वाली चाल पकडूँगा- “दशरथ सुत तिहु लोक बयाना। राम नाम का मरम है आना”
रामदत्त हाथ बढ़ाकर बोले-”कथा वाचस्पति जी महाराज, अयोध्या में बैठके यह तर्क दोगे? तुम्हारी खोपड़ी में जितने बाल बचे हैं वे सभी एक ही दिन में झड़ जाएँगे।”
“तुमने हमें क्या पागल समझ रखा है जी? अरे, मैं इस अयोध्या को एकदम आध्यात्मिक रूप दे दूँगा। राजा दसरथ दस इन्द्रियो के प्रतीक बन जाएँगे और उनकी तीनों रानियाँ सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के रूप मे बखानी जाएँगी । तुम समझते क्या हो?”
प्रायः उसी समय तुलसी भगत कुब्जा मंथरा की कुटिलाई का वर्णन कर रहे थे-
“देखि मंथरा नगर बनावा। मंजुल मंगल बाज वधावा।
पछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम-तिलक युनि भा उर दाहू ॥
करे विचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाज कवनि विधि रातो।
देखि लागि मधु कुटिल किराती | जिमि गंव तकहि लेउ केहि भाती।”

राम-जन्मभूमि वाली मस्जिद में जब से "राम जी का चबूतरा बन गया था और लोगों को वहाँ जानें दिया जाता था, तब से अयोध्यावासियों को थोड़ा बहुत संतोष तो अवश्य ही हो गया था। मस्जिद के सिपाहियों का व्यवहार भी अब पहले से अधिक सुधर गया था। हिन्दू-मुसलमानों में कटुता कम हो गई थी। यद्यपि कुछ कट्टरपथी मुसलमान अकबर की इस नीति के घोर विरोधी थे, पर उनकी चल नही पाती थी। तुलसी दास अब नियम से लिखने के पहले, मस्जिद के भीतर चबूतरे पर विराजमान रघुनाथ जी के दर्शत करने जाया करते थे। एक दिन एक नागरिक ने उनसे कहा- “भगत जी, बहुत दिनों से आपने कथा नही बाँचीं। हमने रामघाट पर आपकी कथा जब से सुनी है तब से ही आपका गुणगान किया करता हूँ।”
तुलसी मुस्कराकर बोले- “मैं तो राम के ही गुणगान करता हूँ, भाई।आपको जो अच्छा लगत है वह राम का नाम ही है।” 
“अरे राम-राम तो सभी करते है, भगत जी, पर जैसा भाव आप में है वैसा और किसी में नहीं है।” 
पास में खड़े हुए कुछ अन्य व्यक्ति भी जोश के साथ इस बात का समर्थन करने लगे। बातों ही बातों में लोगों का यह आग्रह बढ़ा कि एक दिन फिर कथा सुनाइए।
क्रमशः

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