महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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तुलसीदास सबको शांत करते हुए बोले- “सज्जनो, मैं आठों पहर आपकी दृष्टि में रहता हूँ। यहाँ के बाद मेरा अधिक समय जन्मभूमि के पास बैठे ही बीतता है। जिसको शंका हो, वह कहीं भी किसी भी समय परीक्षा ले सकता है।”
बड़ी चेचामेची मचीं। गेंदिया ने बड़ा नाटक साधा, पर उसका जादू चल न सका। एक जवान व्यक्ति ने उठकर जब उसका झोंटा पकड़कर खींचा और धरती पर धक्का देने लगा तो तुलसीदास घबरा कर अपने आसन से खड़े हो गए और कहा- “ना भैया ना, नारी पर हाथ उठाने से सीता महरानी दुखी होंगी। वे आप इसे दण्ड देगी।छोड़ो, इसे छोड़ो।” कहते हुए वे उस व्यक्ति के पास आ गए और गेंदा को मारने के लिए उसका उठा हुआ हाथ पकड़ लिया।
गर्भावस्था में इस धक्का मुक्की से गेदा जोर से कराहकर मूछित हो गई। तुलसी दास आँखें मूँदकर हाथ जोड़ते हुए प्रार्थनारत हो गए, “हे जगदम्बे, यदि स्वप्न में भी अयोध्या की किसी नारी के लिए मेरे मन में विकार आया हो तो मुझे अवश्य दण्ड देना।”
इस घटता के बाद से अयोध्या में तुलसी भगत की महिमा अनायास ही बहुत बढ़ गई। लोगो में यह बात भी फैल गई कि रामलोचनशरण और वैदेही वल्लभ चरण कमलरज धूलिदास आदि ने पड्यंत्र करके तुलसीदास को अपमानित कराना चाहा था। यही नहीं, यह खबर भी फैली कि गेंदिया के पति ने उसे अपने घर से निकाल दिया है।
पूजे जानेवाले व्यक्तियों के चरित्र पर अयोध्या में दबी-ढकी बातें तो गली गली में हुआ ही करतीं थीं किन्तु इस घटना के बाद अयोध्या के जवान मुखर हो उठे थे।तुलसीदास का व्यक्तित्व, सदाचार के प्रति आस्था का प्रतीक बन गया। उनके प्रवचन में अधिक भीड़ होने लगी। होली के तीन दिन पहले जब ‘जानकी मंगल' पूरा हुआ तब अन्तिम दिन आरती में इतना अन्न-धन चढ़ा, जितना पहले कभी किसी कथावाचक की आरती में नहीं चढ़ा था।
एक प्रौढ़ श्रोता ने कहा- “भगत जी अब तो रामनौमी तक कथा वार्ताएं सब बन्द रहेगीं, पर रामनौमी के बाद आप फिर बराबर कथा सुनाइए। जैसा भाव आपकी कथा सुनकर हमारे मन में आता है वैसा और किसी की कथा में नहीं आता।”
कई लोगो ने प्रायः एक साथ ही इस प्रस्ताव का साग्रह समर्थन किया।तुलसी दास सुनकर आन्नदाभिभूत हो गए, बोले -“अच्छा, रामनवमी के दिन अवश्य सुनाएँगे।
“उस दिन तो महाराज यहाँ कथा कहने की मनाही है।”
तुलसीदास के मन में यह बात चुभ गई। बूढ़े पण्डित जी से बोले- “पिताजी, राम जी के विवाह के उपलक्ष्य में अयोध्या वासियों की ज्योनार होनी चाहिए। जगदम्बा अन्नपूर्णा ने भण्डार भर दिया है।”
बूढ़े पण्डित जी ने उल्लसित होकर कहा- “हाँ बेटा, हो जाय। अयोध्या में मंगल तो मनाना ही चाहिए।”
एक विरक्त प्रौढ़ वय के ब्राह्मण वहाँ बैठे हुए थे, बोले- “भगत जी एक अरदास मैं भी करूँगा। आज्ञा है।”
“कहिए, कहिए, महाराज।” तुलसी ने मीठी वाणी में उनका उत्साह बढ़ाते हुए कहा।
“कहना यह है भगत जी, कि हमारे चारों राजकुमारों का ब्याह तो भया, पर अब बहुओं को अयोध्या भी तो लाइए, तभी ज्यौनार होय।”
एक वृद्ध वणिक सुनकर गदगद हो गए, बोले- “वाह बाबा जी, धन्य हो, हमारे मन में भी उठ तो रही थी यह बात, पर हम कह नही पा रहे थे।भगत जी की कबिताई सुनकर चोला मगन हो जाता है। हमीं नहीं, सब लोग यही कहते हैं।”
बूढ़े पण्डित जी भी उल्लसित स्वर में बोले-“बड़ी शुभ बात है। सुनकर बड़ा हर्ष हो रहा है, तुलसी बेटा।
“हाँ, पिताजी।”
“देखा पुत्र, हम अयोध्या वासियों की यह इच्छा है। समझ लो कि साक्षात राम जी की ही इच्छा है। राम जी के घर की बोली मे रामायण की रचना होनी ही चाहिए। हमने सुना है कि बंगभाषा में और द्राविड़ी भाषा में भी रामायणे लिखी गई है।”
“हाँ पिताजी, यह सत्य है। काशी में पढ़ते समय मुझे महात्मा कंबन और कृत्तिवास जी की रामायणों के कुछ अंश सुनने को मिले थे।”
“बस तो महाराज, आप हमारी भी इच्छा पूरी कीजिए। अरे जब और गाँव के लोग अपनी अपनी बोली में गाते हैं तो हमें भी ऐसा अवसर जरूर मिलना चाहिए महाराज।” लाला जी ने गदगद भाव से कहा।
विरक्त जी भी बोल उठे- “हमारे भगत जी को राम जी ने भगती भी दी है और काव्यकला भी। सोने मे सुहागा है। आपको रामायण रचना करनी ही चाहिए महराज। उससे बड़ा लोक मंगल होयगा।”
“स्वयं मेरा भी मंगल होगा महाराज। पिताजी ने सच ही कहा कि यह राम जी की आज्ञा है। सीतामढ़ी में स्वयं जगज्जननी ने मुझे यह आदेश दिया, बजरंग वीर और वाल्मीकि जी भी मुझे यही आदेश दे चुके हैं।”- कहते हुए तुलसीदास की आँखें मुँद गईं। चेहरे पर मधुर भाव कम्प आ गया। हाथ जोड़कर बैठे ही बैठे सबके सामने भूमि पर मस्तक नवाया, फिर ज्ञान आनन्दमय मुद्रा में कहा- “रामायण रचकर मेरी मुक्ति होगी। आठों पहर राम के घ्यान में रमे रहने का बहाना मिल जायगा। मेरी भक्ति का रूप भी सवँरेगा।”
स्वयं तुलसी के मन में कई दिनों से बड़ा ऊहापोह मचता रहा था, लेकिन सबेरे जब उनके प्रवचन सुनने वाला भक्त समाज जुटता तो वे सव कुछ भूल जाते और तन्मय रामभक्ति रसमग्न होकर काव्य और प्रवचन सुनाते हुए स्वयं भी आत्म विभोर हो जाते थे। अपने मुख्य श्रोता के रूप मे उन्होंने बूढ़े पण्डित जी को बैठाया था। आरम्भ में वे केवल उन्हीं को सुनाते थे। पण्डित जी में उन्होंने अपनी भावना विशुद्ध ज्ञान स्वरूप कपीश्वर के रूप में परिलक्षित की थी। पंडित जी सचमुच सच्चे श्रोता थे।उनकी तन्मयता तुलसी को प्रेरित करती थी। फिर जनता भी उनके ध्यान में सुखद प्रेरणा बनकर समाने लगी। कथा सुनाने से अधिक आत्मलीनता का दिव्य सुख पाया। खाली समय में अपने बौद्धिक मन से लड़ते झगड़ते, हारते जीतते हुए वे मन के उस घरातल पर पहुँच गए जहाँ कहनेवाला और सुननेवाला एक ही हो गया था। तुलसी कहते और तुलसी ही सुनते थे। यह स्थिति उन्हें दिनों दिन अधिकाधिक तन्मय बनाने लगी थी।
एक दिन राम जन्म भूमि स्थल पर बनी हुई बाबरी मस्जिद की ओर चले गए। एक सूफी संत सिपाहियों और जन साधारण की भीड़ को मलिक मुहम्मद जायसी का “पद्मावत' काव्य सुना रहे थे।
क्रमशः
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