महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
124-
दोहे-चौपाइयों में रची हुई वह दिव्य प्रेम कथा सूफी महात्मा के सुमधुर कण्ठ से सुनाई जाकर ऐसी मनोहर बन गई थी कि स्वयं तुलसी भी उस रस में बह गए और बड़ी देर तक सुनते रहे। वहाँ से लौटते हुए उनके मन मे पहला विचार यही आया कि यदि रामायण रचूँगा तो दोहे-चौपाइयों में ही। जन मन को बाँधने की शक्ति उनमें बहुत है।छंद से मन बँध जाने पर रामकथा आठों पहर तुलसी के मन में घुमड़ने लगी। मिथिला और सीतामढ़ी में उमगे हुए भावदृश्य और भी अधिक उमंग के साथ उभरकर तुलसी के मन को बाँघने लगे। चूँकि 'जानकी मंगल' रच चुके थे इसलिए स्वयंवर मंडप से ही रामकथा के दृश्य उनके मन में उभर रहे थे। राम लक्ष्यण जब स्वयंवर सभा में आतें हैं तो उसका वर्णन किस प्रकार हो? श्रीमद्- भागवत में कृष्ण जी जब, कंस के अखाड़े में उतरते हैं तब का वर्णन बड़े ही आलंकारिक ढंग से किया गया है। बड़ा सुन्दर लगता है। मुझे भी ऐसा वर्णन करना चाहिए। मुझे कथातत्व मूलरूप से वाल्मीकि रचित रामायण से ही ग्रहण करना चाहिए और अध्यात्म रामायण का प्रतीक तत्त्व भी उसमे जोड़ना चाहिए।
आठों पहर तुलसी को आँखों के आगे रामचरित्र के विभिन्न दृश्य ही दिखलाई पड़ते थे। इस प्रक्रिया में उन्हें यह अनुभव होने लगा कि राम का विम्ब भी अब कभी कभी उनके मन में स्पष्ट होकर झलकता है। कितने सुन्दर है राम।सौंदर्य उनकी काया में, बल में, गुणों में है। हाय, जो कहीं यह रूप साकार होकर पृथ्वी पर उतर आए तो पृथ्वी पर कैसा आनन्द छा जाय। हे राम जी पधारो, एक बार दीन दुखियों को दर्शन देकर कृतार्थ करो। आओ राम, आओ। बस अब आ ही जाओ।
रामनवमी की तिथि निकट थी। अयोध्या में उसे लेकर हलचल भी आरम्भ हो गई थी। जब से जन्मभूमि के मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है, तब से भावुक भक्त अपने आराध्य की जन्म भूमि में प्रवेश करने से रोक दिए गए हैं। प्रतिवर्ष यों तो सारे भारत में रामनवमी का पावन दिन आनन्द से आता है पर अयोध्या में वह तिथि मानों तलवार की धार पर चलकर ही आती है। भावुक भक्तों की विह्वलता और शूरवीरों का रणवाँकुरापन प्रति वर्ष होली बीतते ही बढ़ने लगता है। गाँव दर गाँव के लड़वैये न्योते जातें हैं, उनकी बड़ी बड़ी गुप्त योजनाएँ बनतीं हैं, आक्रमण होते हैं।राम-जन्मभूमि का क्षेत्र शहीदों के लहू से हर साल सींचा जाता है। ऐसी मान्यता है कि विजेताओं के हाथों से अपने परमब्रह्म की पावन अवतार भूमि को मुक्त कराने में जो अपने प्राण निछावर करतें हैं, उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जातें हैं। इसलिए शासकों के द्वारा नवरात्रि आरभ होते ही किसी भी सार्वजनिक स्थान पर राम कथा सुनाने पर पाबंदी लगा दी जाती है। राम जी का जन्मदिन भक्तों के घरों मे गुपचुप मनाया जाता है। पहले तो वर्ष में किसी भी समय शहर में खुलेआम कोई धार्मिक कृत्य करना एकदम मना था,पर शेरशाह के पुत्र के समय जब हेमचन्द्र बक्काल उनके प्रमुख सहायक थे तब से अयोध्या वासियों को थोड़ी सी छूट मिल गई थी। तुलसी के मन में यह बातें चुभीं, खौलन बन गईं। राम की जन्मभूमि में रामकथा न कही जाए यह अन्याय उन्हें सहन नहीं होता था। तुलसीदास के कानों में आगामी रामनवमी के दिन होने वाले संघर्ष की बातें पड़ने लगीं। उस दिन अयोध्या में बड़ा बखेड़ा होगा।ऐसा लगता था कि अबकी या तो राम जी की अयोध्या में उनकी भक्त जनता ही रहेगी या फिर बाबर की मस्जिद ही। लोगबाग अक्सर निडर और मुखर होकर यह कहते हुए सुनाई पड़ते थे कि उन्हें इस बार कोई भी शक्ति राम-जन्मभूमि में जाकर पूजा करने से रोक नही सकेगी। बस्ती मे फैली हुई यह दबी दबी अफवाहें तुलसीदास को एक विचित्र स्फूर्ति देतीं थीं। वे प्रतिदिन ठीक मध्यकाल के समय बाबरी मस्जिद की ओर अवश्य जाया करते थे। मस्जिद के पीछे कुछ दूर पर उजड़ा हुआ एक प्राचीन टीला और था। तुलसी भगत उस पर एक ऐसी जगह बैठा करते थे जहाँ से जन्मभूमि वाली मस्जिद उन्हें स्पष्ट दिखलाई दिया करती थी।वे बड़ी देर तक वहाँ बैठे रहा करते थे। यों मस्जिद के सामने बैठने वाले मुसलमान फकीरों से भी उनका मेलजोल था। टीले से लौटते समय वे एक बार उनसे मिलने के लिए आते थे। इन दिनों मस्जिद के आसपास, उनके बैठने के स्थान, उस टीले तक मुगल फौज की छावनियाँ लगीं हुईं थीं।तुलसी दास एक सिपाही के द्वारा घुड़के जाकर अपने नित्य के ध्यान स्थान से हटा दिए गए। मस्जिद के सामने जाने का तो प्रश्न ही नही उठता था।भावुक तुलसी दास को यह बहुत अखरा। इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध उनका मन खौलने लगा- “रामभद्र, आप साक्षी है, मैंने इस मस्जिद से अपने मन में कभी कोई दुर्भाव नही रखा। पूजा भूमि इस रूप में भी पूज्य है। अब भी वहाँ निर्गुण निराकार परब्रह्म के प्रति ही माथा झुकाया जाता है। रामानुजीय मठ से हठने पर मैं यही सोने आता था। यहाँ के लोगों से घुल मिल कर रहता था, तब मैं फकीर था।अब हिन्दू हो गया ! हे राम जी, इस अन्याय को मिटाने के लिए एक बार आप फिर अवतार लीजिए।”
प्रार्थना करते करते ही लोभ लगा, “मेरे जीवनकाल में ही पधारिये नाथ,एक बार मैं अपनी आँखों से आपको देख लूँ। आपके द्वारा छोड़े गए ताजे पदचिह्नों से अपने मस्तक का स्पर्श करने का अवसर पा जाऊँ।”
मन ऐसा तड़प उठा कि फिर चैन ही नही आता था। “राम जी आ जायें…. एक बार आ जायें। प्रत्यक्ष न आएँ त्तो काव्य रूप में ही मेरे मन में प्रकट हो जायें। भाषा में रामकाव्य का लोकमंगलमय रूप प्रकट हो।”
इस प्रार्थना ही से यह विचार उमगा कि मैं रामनवमी के दिन ही अपनी काव्य रचना आरम्भ करूँगा। अयोध्या में बुधवार के दिन रामनवमी मनाई जाने वाली थी। तुलसीदास एक पण्डित जी के यहाँ पंचाग देखने गए। उन्होंने देखा कि नवमी मंगल के दिन मध्याह्न बेला में ही आ जाती है। उन्होंने ज्योतिषी से कहा- “राम जी का जम्म मध्याह्ल में हुआ था। तिथि जब उस समय आ जाती है तो फिर आप लोग मंगल को ही रामनवमी क्यों नही मनाते? ”
क्रमशः
No comments:
Post a Comment