महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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ज्योतिषी पंडित जी बड़ी ठसक के साथ बोले-“जिस दिन सूर्योदय से ही नवमी रहे उसी दिन हमें उसे मनाना चाहिए।” तुलसी ने अपने मन में कहा- “ तुम किसी दिन मनाओ, मैं तो मंगल को ही अपने राम का काव्यावतार होते हुए देखूँगा। बजरंगबली का वार है, उन्हीं के दिन से यह काव्यरचना करूँगा।अत:मेरी रामनवमी मंगल को ही मनेगी। उस दिन अयोध्या में मंगल ही मंगल होगा।”
तुलसीदास ने मंगल के दिन ही रामायण रचना का शुभ संकल्प किया।दुर्गा अष्टमी के दिन तुलसीदास लिखने के लिए कागज, कलम, दवात आदि सामान खरीदने श्रृंगारहाट गए। नगर में सनसनी थी। दुकानें खुली थीं पर ग्राहक बहुत कम थे। हर दुकानदार अपनी दुकान के एक पट ही खोले हुए बैठा था। हरेक के चेहरे पर भय की आशंका और गुमसुम पन की छाप थी।लोगबाग आँखों आँखों में ही अधिक बात करते थे। यह दृश्य तुलसीदास के मन में चलते हुए चित्रों से एकदम विपरीत था। “जानकी मगंल' काव्य का रचयिता रामकथा का अगला प्रकरण जोड़ते हुए अपने मन में देख रहा था कि राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न दशरथ के चारों कुमार अपनी वधुओं के साथ राजघानी में प्रवेश कर रहें हैं । लौटती बरात का स्वागत करने के लिए पूरे नगर में सजावट हो रही है। तोरण सजे हैं। जगह जगह बन्दनवार सजे हैं। घर घर के आगे मंगल कलश लिए नारियाँ खड़ी हैं। जनता में अपार हर्षोल्लास है और उसके विपरीत यह मुर्दनी, यह सन्नाटा, हे राम।पीडा़ भीतर दर भीतर घुटी और उतनी ही गहराई से आशा का एक नया स्वर भी फूटा-“सब मंगल होगा, अवश्य मंगल होगा। तुलसी दास के मन पर अपनी आस्था का एक अजीब नशा सा छा गया। उन्हें उस समय किसी भय अथवा उदासी की छाया तक नही छू सकती थी। एक कागज वाले की दुकान पर गए- “जै सियाराम, साहु जी।”
“आइए, महाराज पघारिए, पधारिए।मेरे बड़े भाग जो आप आए। कहिए क्या आज्ञा है?”
टेंट में बँधी चादी की एक मुहर निकाल कर उसे दुकानदार की ओर बढ़ाते हुए उन्होंने कहा- “हमे कागज, कलम, स्याही और मिट्टी की एक दवात दे दीजिए।इस राशि में जितने का कागज मिल सकें उतना दे दीजिए, कागज घुटा हुआ चिकना दीजिएगा।”
दुकानदार उठकर पेटी से कागज निकालते हुए एकाएक सिर घुमाकर पूछने लगा- “भगत जी, कविताई में कथा लिखेंगे न।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- हाँ, साहुजी, यही विचार है।”
“जरूर लिखिए महाराज, जब आप सियाराम जी के ब्याह की कथा बाँच रहे थे, तो हम पहले के दो दिनों तक सुनने गए थे। फिर भाई को जर आ गया सो दुकान से मेरा उठना न हो सका। आप तो ऐसी कथा बाँचते हैं महाराज कि रस बरस बरस पडता हैं।”
तुलसीदास बोले- “रामकथा का सच्चा भाव तो आप सबके मन में है साहू जी। मुझे उसी को देख देखकर तो सुनाने की स्फूर्ति मिलती है।”
दुकानदार ने कागज के पन्ने और उसकी नाप की दो लकड़ी की पट्टियाँ, लाल खारुवे कर एक बस्ता, पीतल की दवात, स्याही की पुड़िया और सेठे की दो कलम के साथ उनकी चाँदी की मुहर भी लौटा दी।”
“अरे, यह क्या साहू जी।”
दुकानदार हाथ जोड़कर बोला “महाराज, गाहक तो बीसियों आते हैं, पर मेरा खरा लाभ तो आप ही कराएँगे। इन पर आप राम की कथा लिखेंगे। उसे
मैं भी सुनँगा और सैकड़ौ दूसरे लोग भी रस पाएगें। आप मेरी यह छोटी सी भेंट स्वीकारें भगत जी।”
कागज आदि लेकर जब वे अपनी कोठरी में लौटे तो उन्हें लगा कि जैसे सामने सरयूजी से नहाकर राम जी घाट की तरफ बढ़ रहे हैं। उनका बलिष्ठ सुन्दर शरीर, उनका दिव्य तेजवान मुख, जल से भीगी हुई केशराशि, सब कुछ इतना स्पष्ट था कि तुलसीदास को लगता था जैसे राम सचमुच ही सामने खड़े हों। लाख प्रयत्न करने पर भी आज से पहले तुलसीदास राम का बिम्ब अपने मन में इतने स्पष्ट रूप से कभी नहीं देख सके थे वे आत्ममोहित होकर खड़े हो गए, उन्हें अपना भान तक नहीं रह गया था।
उसी समय किसी कारण से बूढ़े पण्डित जी अपनी कोठरी से बाहर निकले।सामने तुलसीदास को खड़े देखा, धीरे-धीरे चलकर वे पास आए, कहा, “अरे तुलसी, यों क्यों खड़ा है, बेटा?”
पोपले मुँह से निकली अस्पष्ट आवाज तुलसी के ध्यान में घक्के सी लगी, आँखों की स्थिर पुतलियाँ एकाएक डगमगा गईं। आंखों के आगे एक बार अंधेरा सा छा गया और जब उनमें फिर से देखने की शक्ति लौटी तो घाट के राम अलोप हो चुके थे।सामने बूढ़े पण्डित जी खड़े थे। उस दिन वे प्राय: गुमसुम ही रहे, अपने में तन्मय। रह रह कर उनके चेहरे पर आनन्द की लहरें सी दौड़ जातीं थीं। वे एक घुन मे रम गए थे। मंगलवार के दिन सबेरे से तुलसी दास ऐसे सचेत भाव से यह मध्याह्ल वेला के आरने की प्रतीक्षा कर रहे थे, जैसे बहुत दिनों बाद अपनी हवेली में लौटने वाले मालिक की अगवानी के लिए चतुर चाकर फुर्तीला और चाक चौबन्द होता है।
कोठरी के पास ही एक छोटा सा चबूतरा था। तुलसीदास ने सवेरे ही से उसे अपने हाथ से लीपा पोता था। वहाँ उन्होंने कागज कलम दवात और कुशासन भी लाकर रख दिया था। काव्यतरंग सबेरे ही से हल्की हल्की लहराने लगी थी, लेकिन कवि संयमी साधक भी था। मध्याह्न से पहले वह अपने शब्दों को उभरने न देगा। राम जी स्वयं शब्द के रूप में अवतरित होगें।
मध्याह्न बेला के लगभग आधी पौन घड़ी पहले ही अयोध्या में जगह जगह डोंढी पिटी- “खल्क खुदा का, मुल्क हिन्दोस्तान का, अमल शाहंशाह जलालुह्दीन अकवर शाह का। दिल्ली से सरकारी आदेश आया था कि बावरी मस्जिद के भीतर मैदान में चबूतरा बनाकर लोग उस पर नवमी के दिन राम जी की पूजा कर सकते है।” अयोध्या की गली गली मे आनन्द छा गया था। भगवान रामचन्द्र की जयकारों के साथ साथ अकबर शाह की जय जय कार भी सुनाई पड़ जा रही थी।तुलसी आनन्द से भर उठे।
सूर्य ठीक सिर पर आ गया था। मौसम गरम हो चुका था। धूप अब कुछ कुछ तपाने लगी थी, किन्तु तुलसीदास के लिए तो वह दिव्य आनन्द से भरी हुई थी। वे चबूतरे पर बैठ गए। शुरू वन्दना का दोहा लिखा और फिर कलम दौड़ने लगी।
क्रमशः
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