महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
122-
“तुमने हमें पिता कहकर सम्बोधित किया रह।अब हमारी आज्ञा है कि यहीं बैठो और हमारी कोठरी में ही रहा भी करो। वह मूर्ख हमारी पैतृक कोठरी खरीदना चाहता है।अरे, जो इतने पैसे नित्य आवेंगे तो छः महीने के भीतर मैं अपनी इस सारी जमीन पर हाता घेरवाय लूँगा। मरते समय मुझे यह संतोष तो होगा कि मेरे स्थान पर एक राम भक्त ब्राह्मण राम कथा सुनाता है।”
तुलसी चुप रहे। अपने अंगौछे को फाड़कर शेष अनाज उसमें बाँधते रहे। पण्डित जी फिर बोले- “जो इतना अन्न हमारी चढ़त में नित्य चढ़ेगा तो हम तुम भी खाएँगे तथा दो चार और भूखों का पेट भी भर जाया करेगा। हमारी बात मान लो रामबोला।”
तुलसीदास बोले- “आपका यह आदेश मेरे लिए सब प्रकार से मंगलकारी है। आज के प्रवचन का जनता के ऊपर भी सुप्रभाव पड़ा है। अच्छा तो आज से जब तक अयोध्या जी में रहूँगा मैं आपके साथ ही रहूँगा।”
दूसरे तीसरे चौथे दिन और इसी प्रकार हर दिन रामघाट पर तुलसीदास की राम कथा आरंभ हो गई। वे अपने रचे हुए राम संबंधी काव्य सुनाकर अयोध्या वासियों का मन मोहने लगे। अयोध्या में एक नया स्वर आया था जो पण्डितों में, अपढ़ गंवारो के लिए समान रूप से आकर्षक था। उसके शब्दों से अमृत बरसता था। तुलसी भगत की कथा वाचन शैली ने घाट पर बैठने वाले भिक्षुक, कथावाचकों की ही नहीं बल्कि अयोध्या के जाने माने रामायण पारायणों की साख भी गिरा दी। लोग बाग कहते कि ऐसी कथा और कोई नहीं बांचता। होली तक तुलसीदास की ऐसी धूम मच चुकी थी कि अयोध्या का बच्चा बच्चा उन्हें पहचान गया था।पंडितों में चर्चा छिड़ी। एक ने कहा- “कौन है ये तुलसी भगत? कहाँ से आ गया यह दुष्ट?”
“अरे रामानुजियों के अखाड़े में कोठारी था, वहाँ कुछ माल वाल मारा, सो निकाला गया।”
इस पर एक तीसरे पण्डित जी बीच में बोल उठे, कहा- “वैदेहीवल्लभ, यह बात सवा सोलह टके मिथ्या है। मैंने उस मठ के लोगों से सुना था कि छबीलो मालिन के आदेशों की अवहेलना करने पर ही महंत जी इससे बिगड़ गए, सो छोड़कर चला आया। आदमी चरित्रवान है।”
वैदेहीवल्लभचरणकमलरजधूलिदास जी त्योरियाँ चढ़ाकर बोले- “तो यहाँ ही कौन दुश्चरित्र बैठा है।अरे भैया, बात हमारी तुम्हारी नहीं, तुलसी की है। यदि उसकी ख्याति ऐसे ही बढ़ती चली तो एक दिन निश्चय ही वह सभी विलासिनी पैसेवालियों को अपनी चेली बनाकर मूड़ लेगा। हम सब टापते ही रह जाएगें।”
सुदर्शन बोले- “सबको अपने ही समान न समझो। मैंने तुलसी को अपनी आँखों से देखा है। उसके मुख पर तेज बरसता है तेज, उसे जानने वाले सभी लोग कहते हैं कि वह खरा राम-भक्त है।”
रामदत्त यह सुनकर चिढ़ गए, कहा- “जब तुम भी ऐसे बढ़ बढ़कर उसकी प्रशँसा करोगे फिर तो छुट्टी हो गई हमारी। अरे कोई ऐसा पड़यंत्र रचो कि जिससे उसका मुख काला हो, यहाँ से जाय, नही तो किसी दिन यह अवश्य ही हमारी निन्दा का कारण बनेगा।”
वैदेहीवललभचरणकमलरजघूलिदास जी पड्यंत्रकारी के से दबे स्वर में बोले-“राम जी की किरपा से हमारे उर, अन्त:करण में अभी अभी एक विचार प्रगटाय मान भया है महाराज।”
“क्या है?”
“महंत रामलोचनशरणदास जी बिचारे उस बदनाम गेंदिया दाई के पँजे में फँस गए हैं। वह उनसे गर्भवती हो गई है और अब कहती है कि जाहिर जहान में हमे अपनी रखैल बनाकर रखो। बेचारे आजकल बड़े दु:खी हैं।”
“तो इससे हम तुलसी का क्या बिगाड़ सकते हैं?” सुदर्शन ने पूछा ।
“हम महंत जी से कहेगें कि गेंदा को कुछ पैसे देकर यह पट्टी पढावें कि तुलसी जब कथा कहता हो तभी वह जाकर कहे कि हमे गर्भवती बनाकर अब आप राम भक्ति का ढोंग रचा रहे हो।"- रामदत्त की आँखें चमक उठीं, बोले- "तुम्हारी योजना बड़ी अच्छी है। सुना है कि आजकल वह 'जानकी मगंल' नामक अपना भाषा में लिखा काव्य सुनाता है।इसी बीच में गेंदा यदि यह नाटक रचावे और उसे कंलकित कर दे तो हमारा सबका ही मंगल हो।”
सुदर्शन बोले-“ठीक है, रामलोचनशरण जी उसे जो द्रव्य देंगे वह तो उसका होगा ही, मैं भी उसके हाथ थोड़े बहुत पूज दूँगा। यह बैदेहीवल्लभ भी बड़े आसामी हैं, कुछ न कुछ यह भी उसकी नजर भेंट कर देंगे।”
“तो सुदर्शन, तुम आज ही गेंदिया को पटा लो।”
सुदर्शन पण्डित बोले- “जिस दिन आप लोगों के समान मुझे स्त्रियों के पटाने का ज्ञान सिद्ध हो जाएगा, उस दिन मैं भी आप लोगों के समान ही सम्पन्न बन जाऊँगा।”
वैदेहीवल्लभचरणकमलरजघूलिदास जी का मुँह फूल गया। झुझँलाकर बोले- “तुम बार बार हमारे चरित्रों पर उँगली क्यों उठाते हो जी? अरे यह तो हमारी जीविका कमाने की नीति है। इसका वास्तव में दुष्चरित्रता से तनिक
भी संबंध नही है।”
सुदर्शन ने कहा- “स्त्रियों से बात करते मुझे बड़ी लज्जा आती है। मैं तो अपनी घरवाली से भी खुलकर बात नहीं कर पाता।”
रामदत्त वोले- "अच्छा तो यह काम हमीं करवा देंगे। हो सका तो कल, नहीं तो परसो गेंदिया उसकी कथा में अपनी कथा जोड़ने को पहुँच जाएगी।”
पण्डितों की यह बातें होने के तीसरे ही दिन गेंदा तुलसीदास की प्रवचन सभा में पहुँच गई। राम-जानकी के विवाह का वर्णन सुनते हुए सभा तन्मय हो रही थी। एकाएक गेंदिया आगे की पंक्ति में घुसकर हाथ बढ़ाकर बोली- “अरे वाह रे मुरदुए, हमे (अपने बढ़े हुए पेट की ओर संकेत करके) इस झमेले में डालकर यहाँ बैठे भगतबाजी कर रहे हो? वाह रे ढोंगी, वाह।”
कथा मे विध्न पड़ने से कुछ व्यक्ति नाराज हो गए, बोले- “निकालो इस दुष्टा को। ये कौन आ गई यहाँ? ”
पीछे से कोई बोला- “अरे यह तो गेंदिया है, गेंदिया।अयोध्याजी के मंहतों के हाथों मे सचमुच गेंद की तरह उछलती है। इस दुष्टा को जरूर ही किसी ने हमारे भगत जी को कलंकित करने के लिए भेजा है।”
गेंदा आँखें मटकाकर और हाथ बढ़ाकर बोली- “मुझे कोई क्यों भेजने लगा।अरे आप ही मेरे पास घुस घुसकर यह आता था, झूठ-मूठ कहा कि रोटी देंगे, कपड़ा देगें और अब यहाँ दूसरी चेलियों को फँसाने के लिए ढोंग की दुकान लगाए बैठा है, नीच कहीं का।”
कथा में विध्न पड़ गया। तुलसीदास शांत स्वर से सबको चुप कराया।
क्रमशः
No comments:
Post a Comment