महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
120-
प्रेम का आदर्श बहुत ऊँचा है। तुम्हारे जैसे माला फिराऊ व्यक्ति प्रेम की महिमा का पार नही पा सकते,समझे?”
तुलसीदास सिर झुकाकाए चुप खड़े रहे।महंत जी ने कहा- “यह न समझना कि अपनी भक्ती से तुम लोक दृष्टि में भी हम लोगों से ऊँचे उठ गए हो।”
“मैं इस प्रकार की बातें स्वप्न में भी नहीं सोचता महाराज और न परकीया प्रेम के महात्म्य पर ही विचार करता हूँ। मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम सरकार तो एक पत्नी व्रती हैं। यदि यह आपकी पत्नी होती तो कदाचित् उनकी आज्ञा मैं शिरोधार्य कर लेता।”
लगाया हुआ पान का बीड़ा उठकर महंत जी को देते समय छवीलो ने आँखें तरेरकर तुलसीदास को देखा और तीखे स्वर में कहा- “मुझें नीचा दिखाय के कोई इस मठ में रह नहीं सकेगा। बड़े महाराज, इससे कह देव।”
महंत जी भी साथ ही साथ गरजे-“हाँ, मैं यह सहन नहीं करूँगा जो है सो।”
तुलसीदास ने हाथ जोड़कर कहा- “तब महाराज तालियों का गुच्छा लाकर मैं सौंपे देता हूँ। आप एक बार भण्डार घर सँभालने की कृपा करें। मुझसे आपकी सेवा न हो सकेगी।”
सुनकर महंत जी की आँखें लाल हो गईं, बोले-“मैं तुम्हारा अयोध्या जी में टिकना असंभव कर दूँगा जो है सो।”
“वह आपके हाथ में नही है महाराज, जब तक अयोध्यापति की दृष्टि मुझ अकिंचन पर सीधी रहेगी तब तक कोई लम्पट, कुचाली, व्यभिचारी, चाहे वह कितना ही बड़ा सत्तावान हो, तुलसीदास को यहाँ से नहीं निकाल सकता। जै सियाराम।”
शांत भाव से बात उठाकर भी तुलसी दास अपना सात्विक आक्रोश रोक न पाए। पुण्यात्मा का स्वाभिमान पापियों के दम्भ के आगे झुक न पाया। वह तेजी से द्वार के बाहर निकल गए, फिर पलटकर कहा- “ताली, कूंजी सँभाल लो, मैं अब यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरूँगा।”
हमारे मन मे उस समय बड़ा क्रोध उपजा। एक बात और कहूँ , व्यभिचारिणी स्त्रियों के लिए मेरे मन मे ऐसी घृणा बैठ गईं कि पूछो मत। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि मैं प्रतिक्रियावश स्त्री जाति से ही घृणा करने लगा हूँ , पर वस्तुतः ऐसा नही था। रत्नावली अब भी मेरे मन पर अनेक प्रकार के सुन्दर संस्कारों का प्रतिबिम्ब बनकर छाई हुई थी। उसके गुणों के प्रति अनुराग रख कर भी मन से अलिप्त रहूँ इसलिए जगज्जननी का ध्यान करता था।”
“मठ को छोड़कर फिर आप कहाँ गए गुरू जी?”
“अयोध्या में ही रहा और कहाँ जाता। माँग के खाना और रात में मस्जिद के बाहर फ़क़ीरों के बीच में सोना, यही मेरा क्रम बन गया।” कहते हुए बाबा की आँखें भीनी होकर किसी अलक्ष्य केन्द्रबिन्दु पर ठिक गईं।
कुछ रुककर फिर कहने लगे-“उन दिनो अयोध्या से लेकर काशी तक भीषण अकाल फैला हुआ था।प्रायः हर समय बस्ती में भूखे ग्रामीणों के झुण्ड के झुण्ड आते हुए दिखलाई दिया करते थे।”
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वहाँ के फटे हाल, काल की कठोर मार से पिटे हुए चेहरों वालों की सैकड़ों करुण आँखें इधर उधर हर गली-कूचें में हर द्वार पर आशा की एक बुझी सी चमक लिए हुए हर समय दिखलाई पड़ा करती हैं।
“देओ अम्मा महाराज ! देई माई बाप ! दया हुई जाये, बहुत भूखे हैं।”
बड़ी-बड़ी हवेलियों के दरवान भीड़ को डण्डों से धमकाकर पीछे हटाते हुए नजर आ रहे हैं। भूखे जन रोटी के बजाय मार और गालियाँ खा रहे हैं। कहीं कहीं अन्न भी बँट रहा है। दो मुट्ठी लैया, चना या मोटा नाज पाने के लिए भूखी भीड़ इस उतावली से आगे बढ़ती है कि आपस में धक्का मुक्की हो जाती है। जगह जगह गाली गलौज, मार पीट। बच्चें कुचल जाते हैं। कमजोर बूढे़ बूढ़िया उतावले जवानों के धक्कों से चुटीले हो जाते हैं। कभी कभी पीछे रह जानेवाले जवान स्त्री पुरुष गिरे हुए बूढ़ों के ऊपर से फलाँगते हुए ऐसे अन्धाधुन्ध भागते है कि उनकी ठोकरों से गिरे हुए दुर्बलों की चीत्कारें वातावरण को और भी करुण बना देतीं हैं।
तुलसीदास दर्द से छलकती आँखों से यत्र तत्र यह सारे दृश्य देख रहें हैं।
एक जनेऊधारी फटेहाल ब्राह्मण ने अपनी रोटी खा लेने के बाद अपने सामने की पगंत में बैठे हुए एक डोम की अधखाई रोटी को लालच भरी दृष्टि से ताका और सयाने कौवे की तरह घात लगाकर वह उसकी रोटी उसके हाथ से छीनकर ले भागा।एक देहाती खाते खाते गरजा- “ए दूबे, अरे ई का करये? अरे नीच कौम की जूठी ले भागा?”
उतावली से जूठी रोटी का टुकड़ा अपने मुँह की ओर बढ़ाते हुए वह बोला- “पेट की जात एक है।” और रोटी का टुकड़ा जल्दी से अपने मुँह में ठूस लिया।वह व्यक्ति, जिसकी रोटी छीनी गई थी खूनी आँखे लिए बावला बनकर झपटता हुआ आया। उसने खाते हुए ब्राह्मण को धक्का मारकर गिरा दिया और उसकी छाती पर पर रखकर उसका गला दबाने लगा। ब्राह्मण के मुँह से कौर छूट गया। डोम ने उसे उठाने के लिए ब्राह्मण का गला छोड़कर हाथ बढ़ाया ही था कि तीसरा भूखा उस उगले कौर को उठा ले भागा।तुलसीदास 'हे राम ” कहकर रो पड़े।
दो तगड़े लठैत मुच्छाडिये जवान दस-पंद्रह फटेहाल, जर्जर किन्तु सलोने नाक-नक्शोवाली जवान लड़कियों को लिए हुए पीपल के तले बैठे हैं। एक सफेदपोश अधेड़ उन लड़कियों का निरीक्षण कर रहा है। वह एक लठैत से कहता है- “झब्बूलाल, माल बहुत उम्दा नहीं लाए। ये सबकी सब बस चौका बासन और झाड़ू बुहारू करने लायक ही हैं। इन्हें कोई नहीं खरीदेगा।आठ रुपये में हम सौदा करेंगे। देस में इतने अकाल पड़ रहें हैं, ससुरी चीटियों की तरह गली-गली में औरतें रेंगती दिखलाई पड़ रहीं हैं।”
तुलसीदास देख रहे हैं। उनका मुख गंभीर, विचारमग्न हैं।रामघाट पर कगंलों की भीड़ रात मे सो रही है। कुत्ते भौंक रहे हैं। तुलसी दास को नींद नही आ रही, टहलते हुए वहाँ से चले आए हैं। एक घाटवाले के सूने तखत पर बैठ जाते हैं। वे दुःखाभिभूत हैं। तखत से कुछ दूर पर ही गुड़मुड़ी मारकर लेटे हुए एक कगंले ने सिर उठाकर तुलसीदास की ओर देखा, पूछा- “क्यों आये?”
सांत्वना भरे स्वर में आगे बढ़कर उससे कहा- “घबराओ मत रामभगत, तुम लोगो को कोई हानि पहुँचाने के लिए नहीं आया हूँ। राम जी की लीला देख रहा हूँ।”
क्रमशः
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