Friday, 7 July 2023

121

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
121-

तुम्हारी उल्टी मति है पण्डित जी, तभी दु:ख भोगते हो।”
लाला और उसके साथी चले गए।पण्डित जी अपने आप ही तेहे में बड़बड़ाने लगे- “रुपये का मोह दिखाय रहा है। अरे कभी मेरे स्वर में भी शक्ति थी । ऐसी कथा बाँचता था कि पैसों और अनाज का ढेर लगा रहता था मेरे आगे। हमें पैसों का मोह दिखाय रहा है। भूखा मर जाऊँगा पर तेरे ऐसे दुष्टों का पैसा नहीं खाऊँगा, जो असुरों से दूसरों की लूटी गई जमीनों का सौदा करता है।” दुबले-पतले पण्डित जी ने क्रोध में अपने मसूढ़े भींचे। उनके मन पर फिर दूसरा ताव चढ़ा तो फूलों के ऊपर रखा हुआ लाला का टका क्रोध भरे काँपते हाथ से उठाकर बालू पर फेंक दिया-“नहीं रखूँगा इसका पैसा, चाहे आज मुझे भूखा ही रहना पड़े।

तुलसी भगत जी पास ही में बैठे हुए यह तमाशा देख रहे थे। एकाएक सहानुभूति से भरकर खिसक आए और कहा-“पण्डित जी, आप पिता मैं पुत्र, इस भाव से एक प्रस्ताव करूँ, सुनिएगा?”
पण्डित जी उन्हें ध्यान से देखने लगे, बोले- “तुम्हें हम देखते तो नित्य हैं कितु पहचानते नहीं।” 
“मैं भी अब राम शरण में आ गया हूँ महाराज, यहीं अहिरौने में सरजू ग्वाले के चबूतरे पर रोटी बनाता हूँ और मस्जिद में सोता हूँ। आप मुझे अपने स्थान पर प्रवचन करने दें, जो चढ़त चढे़ सो आपकी। ब्राह्मण हैं, आपके लिए खिचड़ी बना दूगाँ, मेरा भी पेट भर जाएगा।”
पण्डित जी कुछ अकड़ भरे स्वर में बोले-“भक्ती कर लेना और बात है किन्तु कथा बाचँना और प्रवचन करना हर एक के बस की बात नही होती। यह भी एक कला है।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “आपको मेरा प्रस्ताव यदि बुरा लगा हो तो जाने दें। मैंने तो आपके सात्विक तपोभाव का सम्मान करने के कारण ही यह प्रस्ताव किया था।”
पण्डित जी तुलसी भगत की मीठीं बातों से प्रभावित हुए, बोले- “कभी कथा बाँचीं है?”
“हाँ महाराज, गृहस्थाश्रम में इसी कर्म से मेरी जीविका चलती थी।”
“अच्छा तो आओ, हमारे आसन पर बैठो और अपना हुनर हमें दिखलाओ”-  कहकर पण्डित जी काँपते हुए अपने आसन से उठने लगे। तुलसी भगत ने चट से आगे बढ़कर उन्हें सहारा दिया और कंधे से अपना अंगौछा उतार उनके बैठने के लिए बिछा दिया, फिर कहा-“आपको हृदय में राम और श्रोता मानकर मैं अपना हुनर दिखलाऊँगा।आज्ञा है?”
“हाँ, हाँ, बैठो बैठो।जै सिद्धिदाता गणेंश। जै कौशलपति रामचन्द्र ” कह कर पण्डित जी अपने होंठों ही होठों में कुछ बुदबुदाने लगे। तुलसी भगत ने उनके पैर छुए और पण्डित जी के टूटे कुशासन के टुकड़े पर पाल्थी मारकर बैठ गए। दस पाँच पल अपने दष्टदेव का ध्यान किया और फिर अपने मधुर सुरीले कण्ठ से कवित्त पढ़ना आरम्भ किया-

“खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,
बलि, बनिक को बनिज, चाकर को चाकरी। 
जीविका विहीन लोग सीध मान सोच बस, 
कहूँ एक एकन सो कहा जाई का करी। वेदहूँ पुरान कही लोकहें विलोकियत,
साँकरे सर्व पै, राम रावरे कृपा करी। दारिद दसानन दवाई दुनी दीनबंधु
दुरिन दिनन देखि तुलसी हाहा करी।”

स्वर के जादू ने भीड़ को बाँध लिया।इस कवित्त में काल का ऐसा यथार्थ और करुण चित्रण था कि लोग वाह वाह कर उठे। तुलसी ने श्लोक भी तन्मय होकर पूरे दरवारी ढंग से अनादि अनंत परम ब्रह्म राजाराम की वन्दना करते हुए गाया।बूढ़े पंडित ने उन्हें उम्रदराज होने का आशीर्वाद दिया। 
प्रवचन आरम्भ हुआ- इतना दु:ख दैन्य अत्याचार पृथ्वी पर है, यह माना, किन्तु राम करुणा के सागर हैं। राम सर्व समर्थ हैं। दशरथनन्दन राम अपने जन की विपदा हरने के लिए इस धरती पर फिर आएगें। वे दीनों का दु:ख हरण करेगें। पापियों को डण्ड देंगे और पुण्य आत्माओं का सब प्रकार से मंगल करेंगे। यह अयोध्या बड़ी पावन नगरी है। यहाँ स्वयं भगवान ने नर देह धारण करके ससार भर के पापियों का संहार किया था। इसी अयोध्या में महाराज दथरथ के महलों में अवध के जन जन का प्राण मोहने वाले चार राजकुमार आँगन में खेल रहे हैं। 
तुलसी भगत वर्तमान के दुःखों से भरी अयोध्या से भूतकाल की वैभवशालिनी अयोध्या में अपने श्रोंताओं का मन खींच ले गए। थोड़ी ही देर में उनके आगे खासी भीड जुड़कर श्रोता रूप में बैठ गई।
दूसरे कथावाचको, विशेष रूप से उस बेसुरे किन्तु मस्त बैरागी को जलन हुई कि यह नया कथावाचक कौन आ गया। तुलसीदास पुराणों की कथाएँ और राम जी के बखान सुनाते हुए अपने दोहे-कविता सुनाते, बीच बीच में वाल्मीकीय रामायण के श्लोक भी गाते चलते थे। उनका प्रवचन ऐसा जमा कि जो नहाकर लौटता वही उनकी श्रोतामण्डली में जुड़ जाता था। जब प्रवचन समाप्त हुआ तो बूढ़े पण्डित जी के छोटे से अगौछें पर इतना अनाज और पैसे पड़ चुके थे कि वे उनके फटे अगौछें की छोटी सी सीमा लाँघकर बालू तक पर फैल गए थे।भक्त मण्डली बहुत प्रसन्‍न थी। कइयों ने कहा कि महाराज कल फिर कथा सुनाइएगा।

दोपहर के समय पैसे और अनाज बटोरते हुए बूढ़े पण्डित जी के हाथों में जवानी आ गई थी। गदगद भाव से बोले- “बेटा तुम तो बड़े मँजे हुए, बड़े ही सिद्ध कथावाचक हो ! वाह, वाह, आनंद आ गया। कैसी मधुर वाणी है कि वाह ! सुन्दर शुद्ध उच्चारण और भाव तो ऐसे हैं कि बस क्या कहैं। ये भाषा के कवित्त क्‍या तुम्हारे रचे हुए हैं या किसी और के?”
बालू मे बिखरे अन्त के दानों को बटोरते हुए तुलसीदास ने विनीत किन्तु उल्लसित स्वर में कहा- “हमारे हैं और किसके हो सकते हैं।”
“धन्य हो, धन्य हो, तुम भैया नित्य हमारे आसन पर बैठ के कथा सुनाओ।”
“नहीं महाराज, फिर तो वही दैनिक जीविका का प्रपँच गले मढ़ जाएगा
जो छोड़ के आया हूँ।” 
पैसे बटोरते बटोरते पण्डित जी के हाथ रुक गए। कुछ तीखेपन से झिड़कते हुए कहा- “अरे पेट तो चाहे साधु वैरागी का हो या घर-गृहस्थी वाला, सभी को भरना पड़ता है। पेट की माया से भला कौन मुक्त भया है।आखिर माँग के ही खाते हो न।”
गंभीर होकर तुलसी बोले- “हाँ महाराज, सरयू‌ ग्वाला हमें नित्य साँयकाल को आधा सेर दूध पिला देता है। राम उसका भला करें।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“तुलसी, लोग मुझे रामबोला कहकर भी पुकारते हैं।”
क्रमशः

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