महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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ईर्ष्यालु साधुओं की खोटी निन्दा और झिड़कियाँ भी मिलतीं। वे इससे दुःखी होकर और भी अधिक क्रोध में राम-रट लगाते।परन्तु इसका प्रभाव भी अच्छा न हुआ।जिस दिन बहुत आग्रह बढ़ता उस दिन उनके ध्यान में रत्नावली बार बार झलक उठती थी।गली सड़क में स्त्रियों को देखना उनके लिए भारी पड़ जाता था।तुलसी एकान्त में भूमि पर मत्था रगड़ रगड़ कर गुहारतें हैं- “हे राम, मेरी यह परीक्षा न लो प्रभु, मुझे इस धुँधले प्रकाश से तीव्र आलोक के लोक मे ले चलो। अब कामांध कार के पाताल में न ढकेलो नाथ, दया करो।”
काम और राम के बीच में चुनाव के क्षण आने पर निश्चय ही मेरी चेतना उठकर मुझे काम प्रलोंभनों से बचा लेती थी। दर्शन साहित्य और कला के संस्कारों से जिस सौंदर्य की चाह राम रूप लेकर मेरे मन में जागी थी, उससे लुभावने से लुभावना नारी सौंदर्य भी मेरे मन की कसौटी पर चढ़ कर फीका पड़ जाता था।कुछ भक्तिनों ने मुझे अपने प्रलोभन में फांसना चाहा किन्तु राम ने बचा लिया। मेरी भक्ति-निष्ठा दूसरे साधुओं के मन में ईर्ष्या जगाने लगी।
मठ के महंत जी की चहेती छबीली मालिन एक दिन फूलों की डलिया लिए मठ मे प्रवेश करती है।मठ के लोगों को महंत जी से जो काम करवाना होता है, छबीली मालिन की सिफारिश से ही होता है क्योंकि महंत जी न तो उसकी बात गिराते हैं और न ही किसी के द्वारा किया गया उसका अपमान सहन कर सकतें हैं। आँगन में बाबा मुकतानन्द छवीली को देखते ही खिल गये उठे, बोले - “जे सियाराम छबीलो।”
मुक्तानन्द उसके पीछे-पीछे दौड़े। पास पहुँच कर कहा-"छवीलो महारानी, महन्त जी से आज हमें दस टके दिलवाय देव। तुम्हारा बड़ा उपकार होगा। उसमे से दो तुम ले लेना।”
बड़ी अदा से अपनी मुट्ठी बँधा बाँया हाथ कमर पर देककर खड़ी होते हुए छबीली
बोली- “आओ हम कोठारी जी से तुम्हें पैसे दिलवा दें। तुम्हे ताँबे के टके ही तो चाहिए न?”
“मुझे सोने, चाँदी, जवाहरात का मोह नही है छबीलो भक्तिन।”
भीतर के छोटे आँगन मे प्रवेश करते हुए छवीली ने धीमे स्वर मे मुक्तानद से पूछा- “बाबा, ये कोठारी जी का भेद अभी तक नही खुला। इसके पास कौन है? ”
मुक्तानंद वोले- “अरे छवीलो, वो खरा भगत है।”
“हटों भी, कलयुग मे कोई खरा भगत नहीं होता । ये दिन में कहीं जाता-आता
तो जरूर है। बाबा-बैरागियों में कोठारी तुलसी जी जैसा सुन्दर कोई नहीं है।”
“रामजाने छबीलो, बाकी हमने तो जिस तिस से यही सुना है कि जनमभूमि वाली महजिद के पास एकांत में बैठा-बैठा माला जपा करता है। इसका जोग किसी तरह से भ्रष्ट हो तो हमारे मन को चैंन पड़े। हम सब पुराने-पुराने पहुँचे हुए सिद्धा बैरागी लोग और महंत जी जैसे महात्मा बिना दर्शन के रह जाएँ और यह ससुरा माला जप-जप के राम जी के दर्शन पा जाए, ई तो बडा अन्याय होगा छबीली।देखो साला बही-खाता छोड़ के आँखें मूदें माला जप रहा है।”
सामने कोठरी में तुलसीदास ध्यानमग्न होकर गोमुखी मे हाथ डाले माला जप रहे थे। उनके समाने बही, कलम-दावात और कुछ छुट्टे लिखे हुए कागज रखे थे।कोठरी में आर पार दो द्वार थे | महंत जी के कक्ष मे जाने का रास्ती भी उधर ही से था छबीली ने इठलाते हुए कोठारी जी कोठरी में प्रवेश किया और कहा-“जे सियाराम कोठारी जी।”
जपते जपते तुलसीदास ने अपनी आँखें खोली, आँखों ही आँखों में उसके सियराम का प्रति उत्तर दिया।
“कोठारी जी, इन्हें तांवे के दस टके दे देव। इन्हें जरूरी काम है।”
अपनी ओर देखती छवीली की प्यासी आँखों और कामुक मुद्राओं से दृष्टि हटाकर मुक्तानंददास की ओर देखते हुए तुलसीदास ने कहा- “महंत्त जी की आज्ञा के बिता मैं आपको धन नहीं दे सकगा।”
तुलसी के द्वारा अपने को नजरंदाज किए जाने से छबीलो चिढ़ गई, बोली- “हम कह रहे हैं। इन्हें दस टके देव।”
छवीलो की ओर बिना देखे ही तुलसी दास ने कहा- ”बिना महंत जी की आज्ञा के मैं ऐसा नही करूँगा | क्षमा चाहता हूँ।”
छबीलो का मिजाज घमण्ड की अटारी पर चढ़ गया, बोली- “मेरी बात काटते हो? अपने को बड़ा सुन्दर, बड़ा भगत मानते हो? मैं बड़े-बड़े राजे महराजों की अकड़ भी नही सह सकती, तुम कौन चीज हो! ”
तुलसी ने शान्त स्वर में आँखें नीची करके कहा- “महंत जी की आाज्ञा के बिना मैं मठ का एक तिनका भी किसी को नहीं दे सकता। मुझे क्षमा करो।”
छबीलो गुस्से में भरी धमधम पैर पटकती हुई भीतर चली गई। मुक्तानन्द वहीं खड़े रहे, कहा-“कोठारी जी, ये बड़ी दृष्टा है, अभी जाके महंत जी के उल्टे-सीधे कान भरेगी।”
तुलसी बोले- “मुझे सच की परवाह है झूठ की नही। आपको पैसों की आवश्यकता क्यों पड़ी?”
मुक्तानद जी झेंप गए, कहा--“आप सन्त है, आपसे भूठ बोलने को जी नहीं चाहता, पर कहने मे भी संकोच लगता है।”
“तो महंत जी से कह देते।धन के लिए एक कुलटा स्त्री का सहारा लेना आप जैसों को शोभा नही देता।”
तभी भीतर से एक गर्जन-भरी पुकार आई- “तुलसीदास ! ”
“आया महाराज” तुलसीदास गोमुखी वहीं रखकर झटपट भीतर गए। छोटा-सा दालान पार करके उन्होने महंत जी के कमरे में प्रवेश किया।सजा बजा गुलाबी कक्ष था। चादर-तकिया, यहाँ तक कि कमरे की दीवारें भी, बसंती रंग से पुती हुई थीं। उन्होंने द्वार के पास ही खड़े होकर महंत जी से पुछा-“आज्ञा महाराज! ”
“तुमने हमारी छबीलो भक्तिन का अपमान क्यों किया? ”
“मैं जाने अनजाने किसी का अपमान नहीं करता महाराज।”
“तुमने उसकी बात क्यों नही मानी?”
“किस अधिकार से मानता?”
“जब इस भक्तिन की बात मैं मानता हूँ , तो तू कानी कौड़ी का मनई भला कैसे नहीं मानेगा?” महंत जी कड़क कर बोले।
“देवार्पित सम्पत्ति की एक कानी-कौड़ी भी व्यर्थ खर्च करने का अधिकार न्यायत: स्वयं आपको भी नहीं है, पर आपकी फिर भी सुन लेता हूँ। इसकी आज्ञा नहीं मानूँगा।”
“मेरे सामने कहते हो कि नहीं मानोगे? कृष्ण भगवान रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियों का अपमान सह सकते थे जो है सो परन्तु अपनी प्रिया राधा का अपमान उन्हे एक क्षण के लिए भी सहन नहीं हो सकता था जो है।
क्रमशः
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