महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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कई महीनों के बाद गुरुमुख से अपने प्रति सराहना का यह वाक्य सुनकर बेनीमाधव के हृदय को अपार हर्ष हुआ।उनके चरणों में मस्तक नवा कर वे बोले- “मैं अब, राम श्याम शंकर बजरंग गुरु पिता माता सब कुछ आपको ही मानता हूँ। आपके जीवन-चरित्र को ही निरन्तर अपने ध्यान में रखता हूँ।आपका ध्यान ही मुझे सद्गति प्रदान करता है और करेगा।”
“हाँ, अब तो मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है। वत्स, आत्मकथा सुनाकर मैं तुम्हारी सेवा करूँगा। कल से नियमित रूप से दिन में तुम्हें मैं अपने जीवन-प्रसँग सुनाऊँगा। मेरा आात्मालोचन होगा और तुम्हें आत्मालोचन के लिए स्फूर्ति प्राप्त होगी।”
दूसरे दिन लगभग पचास वर्ष पूर्व के अपने अनुभव सुनाते हुए बाबा बोले- “मिथिला से हम सचमुच खूब भरे पूरे होकर लौटे थे। काशी और प्रयाग के बीच में एक स्थान सीतामढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ वाल्मीकि जी का आश्रम बताया जाता है। राम जी की आज्ञा से लखनलाल जगदम्बा को वहीं छोड़ गए थे। लव-कुश कुमारों ने वहीं जन्म पाया। वहाँ एक सीतावट है,वेनीमाधव। तपस्विनी जानकी प्राय: उसी वट वृक्ष के नीचे बैठकर राम जी का ध्यान किया करतीं थीं।”
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गंगा के समीप वृक्षराज सीतावट के नीचे जगदम्बा के चरण कमलों का ध्यान करके तुलसीदास आनंदविभोर हो गए। प्रणाम करने के बाद कुछ देर तक टकटकी बाँधकर तुलसीदास उस वृक्ष के तने की ओर देखते रहे। कल्पना सजीव हो उठी। वट के नीचे तापस वेश धारिणी जगज्जननी रामवल्लभा हथेली पर ठोड़ी टेके हुए बालक लव कुश का धनुप चलाना देख रहीं हैं। महर्षि वाल्मीकि उन्हें लक्ष्य बतला रहें हैं।
कल्पना का दृश्य ओझल हो जाता है। वृक्ष की परिक्रमा और प्रणाम करके तुलसीदास गंगा तट की ओर चलते हुए एकाएक पलटकर फिर वटवृक्ष को देखने लगे। लटकती हुई वरगद की जटाओं ने उनकी कल्पना को फिर स्फूर्त किया। वटवक्ष जटाजूट धारी शिव जी के रूप मे दिखाई दिया। तुलसीदास मुग्ध होकर काव्यतरंग में चढ़ गए-
“मरकत वबरन परन, फल मानिक से,
ले जटाजूट जनु रूख वेश हरु है।
सुषमा को ढेर कंघौ, सुकृत-सुमेरु कंधों,
संपदा सकल मुद मगल को घर है।
देत अभिमत जो समेत प्रीति सेइये,
प्रतीति मानि तुलसी, विचारि काको थरु है।
सुरसरि निकट सुटावनी अवनि सोहै
रामरमनी को बटु कलि कामतरु है।”
रात में तुलसीदास गंगातट पर एक तख्त पर सो रहे थे। उन्हें स्वप्न में बटवृक्ष के नीचे जानकी मैया विराजमान दिखाई दीं।स्वप्न में तुलसी उनके चरणों में झुके हुए कह रहे हैं- “मेरा मार्ग मुझे दिखाओ अब। अब मैं भी तुम्हारे ही समान राम-दर्शन की, चाह लिए बैठा हूँ। स्वप्न में सीता जी तुलसीदास से कहतीं हैं- “अयोध्या जाओ, तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी।” कहकर वे अदृश्य हो गईं।
फिर उन्हें गंगातट के पास खड़े हनुमान जी दिखलाई दिए। आकाश से लेकर धरती तक उनका विराट रूप स्वप्न में देखकर सोते हुए तुलसी सहसा चौंक गए। चरणों में प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर आनंद मुद्रा में अपने परम सहायक और आराध्य बजरंगबली को निहारने लगे। मूर्ति क्रमशः छोटी होती जाती है। हनुमान जी मनुष्य के आकार में आ जातें हैं, वाल्मीकि बन जाते हैं। तुलसीदास कपीश्वर के स्थान पर कवीश्वर को देखकर गदगद हो उठते हैं। हाथ जोड़कर कहतें हैं- "हे कविता-शाखा पर विराजमान मधुर-मधुर अक्षंरो में राम-राम की कुहुक भरने वाले कोकिल, तुम्हें प्रणाम हैं।”
वाल्मीकि कहतें हैं- "इस कलिकाल के निराश अंधकार में मेरा काम, क्या तू कर सकेगा, तुलसी?”
“आज्ञा करें आदिकवि।”
“सरल भाषा में रामायण की रचना कर। इससे तेरा और लोक का कल्याण होगा।” कवीश्वर फिर कपीश्वर के रूप मे दिखलाई देतें हैं। गगन में स्वर गूँजता है- “अयोध्या जा, रामायण की रचना कर।”
स्वर आलोप हो जाता है। तुलसीदास की आँखें खुल जातीं हैं। ब्रह्मबेला आ चुकी थी। विचारमग्न होकर दूर घुंधले में फलाँगते हुए सीतावट और वाल्मीकि आश्रम को प्रणाम करके तुलसीदास बोले- “जगदम्बे, क्या यह सचमुच ही तुम्हारी आज्ञा थी या मेरे भावुक मन का छलावा भर है? मैं क्या सचमुच वह काम कर सकता हूँ जो महर्षि वाल्मीकि कर गए?”
प्रश्न उठकर रह गया किन्तु उत्तर न मिला। तुलसीदास गम्भीर सोच और असमंजस में पड़ गए।अपने ब्राह्मकर्मों से मुक्त होने पर तुलसीदास एक बार फिर सीतावट के पास गए। वहाँ उन्हें एक हट्टे-कट्टे पहलवान जैसे बलशाली और तेजस्वी साधु मिले। जगदम्बा के चरण चिह्नों के सामने बैठे तुलसीदास की आत्मनिवेदन छवि देखकर वे खड़े हो गए और एकटक होकर उन्हें देखने लगे। आत्मनिवेदन करके थोड़ी देर में तुलसीदास जब उठे तो उन्होंने आगे बढ़कर पूछा- “महात्मन्, आप किस सम्प्रदाय के है?”
तुलसीदास ने झुककर साधु को प्रणाम किया और कहा - “मैं किसी संप्रदाय में दीक्षित नही हुआ, स्वामी जी। राम जी का चेरा हूँ, उन्हीं का नाम जानता हूँ। नाम भी रामबोला ही है।”
साधु जी उनका कंधा थपथपाते हुए बोले- “यों तो विरक्तों का कोई सगा संबंधी नहीं होता पर तुम तो मेरे किसी जन्म के भाई समान लगते हो। मैं अयोध्या जा रहा हूँ। क्या तुम मेरे साथ चलोगे? ”
तुलसीदास स्तब्ध और आाश्चर्य चकित होकर उस साधु को देखने लगे। मन में प्रश्न उठा, क्या यह संयोगमात्र है अथवा जगदम्बा का आदेश?
तुलसी को मौन देखकर साधु ने मीठे स्वर में कहा- “यदि इच्छा न हो तो मेरा कोई विशेष आग्रह नही है।तुम्हारी भावुक भक्ति से प्रभावित होकर मैंने सहज भाव से यह प्रस्ताव कर दिया, और कोई बात न थी।”
“आपकी यह सहज बात मेरे लिए साक्षात् हनुमान जी का आदेश बन गई है।यह प्रस्ताव करने के लिए मैं आपका बड़ा कृतज्ञ हूँ।”
प्रयाग तक तो हमारा उनका साथ रहा और फिर एक दिन हम जो सबेरे उठे तो साधु जी का कहीं पता ही नहीं था।अस्तु, हम तो निश्चय कर ही चुके थे। अयोध्या की ओर प्रयाण किया, जिस मार्ग से तापस वेशधारी श्रीराम, जानकी और लखनलाल सुमन्त के साथ अयोध्या से प्रयाग आए थे उसी पर चले। सारा मार्ग मेरी कल्पना के लिए हरा-भरा रहा और जब मैंने अयोध्या में प्रवेश किया तब तक तो मैं राम-विह्नल हो चुका था।”
कहते-कहते बाबा का चेहरा एक अलौकिक तेज से दमकने लगा था। वेनीमाधव चकित होकर उन्हें देखने लगे।
क्रमशः
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