महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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पाठक जी सुनकर प्रसन्न हुए, बोले-“रत्ना इन्हें अपने प्राणों से भी अधिक सहेज कर रखती है।” फिर दबी जवान से बात को आगे बढ़ाते हुए कहा-“घर की संपत्ति का बहुत कुछ अंश तो मुझे अपने भतीजे को ही देना है। पर अपना यह ग्रंथ भण्डार उसे मैं देना नहीं चाहता। उसे अध्ययन में रुचि नहीं है। वह केवल कामचलाऊ पण्डित ही है। कभी-कभी अपने ग्रंथागार का भविष्य विचार कर रो पड़ता हूँ।”
तुलसी अपने सहज भोलेपन में बोल उठे- “इन्हे किसी सत्पात्र को सौंप दीजिए।”
“सुपात्र तो मिल गया है बेटा, बस अब यही मनाता हूँ कि उसे अपना सब-कुछ सौंपकर निश्चिन्त होने का क्षण भी पा जाऊँ।”
तुलसी सचेत हो गए। वे भांप गए कि पाठक जी के सुपात्र और कोई नहीं वे स्वयं ही हैं। उनका मन फिर हलचल से भर गया किन्तु यह हलचल पानी जैसी रंगहीन थी, न पक्ष न विपक्ष। शब्दहीन भावों की तरगें तेजी से चल रही थीं। तुलसी अपने-आप को समझ नही पा रहे थे । वे केवल सकपकाए हुए थे। उन्हें अपने भावी जीवन के सम्बन्ध में चिन्ता भरी घबराहट थी। अगला दिन कथा का अन्तिम दिन था। तुलसीदास आज सवेरे ही से प्रायः गुमसुम थे। यद्यपि उनकी ऊपरी चेतना मे प्रायः सन्नाटा ही छाया हुआ था तथापि अपनी भीतरी तहों में चलनेवाली हलचल उनके लिए एकदम अनबूझी न थी। ब्रह्ममुहुर्त में जब उन्होंने नित्य नियमानुसार ध्यान में लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान-सेवित श्रीसीताराम का बिम्ब साधा तो आकार विशेष स्पष्ट नही हुए। अपनी इस सफलता से तुलसीदास को लगा कि मानों वे एक अति उन्नत शिखर पर चढते-चढ़ते अचानक कोसों नीचे खड्ड में गिर गए हो। उन्हे अपने ऊपर बहुत खिसियानपन छूटा। मोहिनी प्रसँग के बाद तुलसीदास ने हठपूर्वक अपने इष्ट बिम्ब को साथा था। ध्यान अब न तो बिखरता था और न घूमिल ही होता था।इच्छित विम्ब की सजीवता ही तुलसी की सफलता और उत्फुल्लता का कारण बनती थी। आज तुलसी को ध्यान में न तो सफलता ही मिली और न उत्फुल्लता।सच तो यह था कि वे कुंठित और हतप्रभ से हो गए थे।स्नान ध्यान आदि नित्यकर्मों से निबटकर तुलसीदास जी जब पाठक जी के घर लौटे तो पता चला कि वे अपने साले के साथ किसी काम से पास के गाँव में गए हुए हैं। तुलसीदास अपने चौवारे मे अकेले ही बैठ गए। उन्हें कुछ समझ नहीं पड़ रहा था। पछतावा, खिसियानपन, झुझलाहट, नामस्मरण, प्रार्थना और संन्यास को साधने का हठ उनके मन को तरह-तरह से रमा रहा था किन्तु वे रम नही पा रहे थे।दासी आई, कोठरी के एक कोने में गोबराये हुए फर्श पर पानी छिड़का, फिर पीढ़ा लाई, पीढ़े पर रेशमी गद्दी बिछाई चौकी सामने रखी। एक दासी चांदी के लोटे-गिलास में पानी रख गई। फिर रत्नावली कलेवे के लिए थाली सजाकर लाईं। अति संयत और गम्भीर भाव से तुलसी की ओर बिना देखे ही रत्नावली खाने की चौकी की ओर बढ़ गई। थाली रखी और सिर भुकाए हुए, कहा-“बप्पा और मामा एक आवश्यक काम से गए हैं। मेरी मामी ज्वरग्रस्त है इसलिए मुझे ही सब-कुछ तैयार करना पड़ा है हो सकता है आपकी रुचि के अनुकूल न बना हो।”
रत्नावली को देखते ही तुलसीदास का गुमसुम पना हवा हो गया था। वे किसी हद तक रत्नावली के रौब में आ गए। रत्ना का स्वर तुलसीदास के कानों में बड़ी मिठास घोल रहा था। पीढ़े पर बैठते ही रत्ना लोटा उठाकर उनके हाथ घुलाने के लिए उद्यत हो गई। तुलसीदास बोले-“आपकी मामी तो नित्य परोसते समय हम लोगों को यही बतलातीं थीं कि अमुक वस्तु आपने बनाई है और वह वस्तु निश्चय ही स्वादिष्ट सिद्ध होती थी। मुझे विश्वास है कि आज भी मेरी रसना को निराश न होना पड़ेगा।”
रत्नावली चुप रही।तुलसीदास ने खानाआरम्भ किया। रत्नावली दीवाल से लगी नीची नजर किए खड़ी रही। तुलसीदास को रत्नावली की उपस्थिति मन ही मन सुहा रही थी, यद्यपि उन्होंने फिर सिर उठाकर उसे देखने तक का प्रयत्व न किया।
एक दासी कोठरी के द्वार पर खडी हुई थी। रत्नावली और कुछ लाने के लिए पूछा, तुलसीदास बोले-“साधु यदि पेटू हो जाय तो फिर उसका निभाव भला क्योंकर हो सकता है।”
रत्नावली तुरन्त ही बोल उठी-“कुण्डली के अनुसार तो साधु बनने से पहले आप लक्ष्मीवान बनेंगे।”
यह सुनकर तुलसीदास की आँखें रत्ना वली के मुख को देखे बिना रह न सकीं। कंचन-सा वर्ण, चेहरे पर आत्मतेज और वाणी में आत्मविश्वास की ऐसी दीप्ति थी कि तुलसीदास की आँखें शिष्टाचार भूलकर कुछ क्षणों के लिए रत्नावली के मुख को एकटक निहारने लगीं। रत्नावली की आँखें भी एक बार घोखे से ऊपर उठ गईं। आँखों से आँखें मिलीं, दोनों ओर पुतलियों से आज्ञा नन्द के ज्योति फूल चमके। दोनों के होंठों पर बरबस मुस्कान की रेखाएँ भी खिंच गईं और फिर दोनों को तुरन्त ही होश भी आ गया । रत्ना की आँखें फिर रूक गईं। चेहरे पर गम्भीरता लाने का प्रयत्न विफल हुआ। आप नन्द जड़ होकर उसके चेहरे पर चिपक गया था। तुलसी दास के मन की सारी हलचलें भी रत्नावली के उस आनन्द में ही थिर हो गई थीं।उन्होंने मृदु स्वर में कहा-“देखता हूँ , मेरी जन्मपत्रिका पर आपने गहरा विचार किया है।”
रत्ना चुप रही। तुलसीदास ने फिर कहा-“साधु होने के लिए केवल वेश ही तो आवश्यक नही होता।” कहने को तो यह कहा पर उन्हे स्पष्ट रूप से यह भासित हो चला था कि वे रत्नावली के प्रभावपाश में आबद्ध हैं।तुलसीदास के अन्तिम दिन के कथावाचन में सहज रस कम और नाटकीयता अधिक थी। आज वे स्त्रियों की मण्डली में बैठी हुई रत्नावली को ही अधिक सुना रहे थे और इस सुनाने का कार्य रत्ना के मन में राम-बोध से अधिक तुलसी बोध कराना ही था।आरती में अच्छा धन चढ़ा। सोने की कुछ मोहरें, चांदी के बहुत से रुपये और तांवे के ढेरों टके भी चढ़े, गेहूँ और चावल भी इतना चढ़ा कि चलते समय उनके साथ अनाज के पाँच बोरे हो गए थे। एक दुशाला और रेशम के दो थान भी अर्पित किए गए थे। तुलसीदास पाठक जी से बोले-“यह सब वस्तुएँ ले जाकर मै क्या करूँगा।
क्रमशः
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