महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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मेरी समझ में नही आ रहा है।”
पाठक जी के साले यह सुनकर हँस पड़े , बोले-“उसकी चिन्ता आप क्यों करते है। मेरी भाँजी आपके यहाँ पहुँचकर स्वयं ही उसका प्रबन्ध कर लेगी।”
अपने साले की यह बात सुनकर पाठक जी हँस पड़े। तुलसीदास का मन प्रतिवाद न कर सका, मौन रहा। तुलसीदास जी को नाव पर बैठाने के लिए गाँव से बहुत-से लोग आए थे । पाठक जी के भतीजे गंगेश्वर तुलसी दास को उनके गाँव तक छोड़ने के लिए नाव पर सवार हो चुके थे। सबसे मिल-भेंट कर तुलसीदास पाठक जी के चरण छूने के लिए झुके। उन्होंने तुरन्त ही उन्हें अपनी बाँहों में भरकर कलेजे से चिपका लिया और धीरे से कान में कहा-“मंगलवार को गंगेश्वर फलदान लेकर पहुँच रहा है। राजा से कहिएगा कि वे कल मुझसे झाकर मिल जाये।”
“जो आज्ञा।” तुलसीदास ने आँखें झुकाकर दबे स्वर में उत्तर दिया। सुन- कर पाठक जी गदुगद हो गए। उन्होंने तुलसीदास जी को फिर कलेजे से लगाया।
पहले से सूचना पाने के कारण राजा भगत नौका-घाट पर ही मिल गए। उन्होंने तुलसीदास का घर बनवाना आरम्भ कर दिया था। इसलिए वे उन्हें अपने घर लिवा ले गए।मार्ग मे रत्नावली के चचेरे भाई ने उन्हें मंगल को फलदान लेकर आने की सूचना दी। राजा तुलसी को देखकर मुस्कराए और कहा- “तुम अनोखे कथा वाचक हो भैया, कथा की चढ़त मे इनकी बहन को भी ले आए।”
तुलसी की आँखों में पहले झेंप और फिर विनोद लहराया, बोले-“दलालों की माया तो राम जी ही समझ सकते है, बाकी हमे क्या, भिक्षुक ब्राह्मण ठहरे
जो दक्षिणा में मिला वही स्वीकार कर लिया।”
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राजा भगत से बाबा की कही यह पुरानी बात सुनकर बेनीमाधव ही नही, प्राय: गम्भीर रहनेवाला रामू भी हँस पड़ा। गदग़द स्वर में बोला- “हमारे प्रभु जी की हँसी भी अनोखी होती है। अरे वह जानकीजी से भी विनोद करने में न चूके-
“कोटि मनोज लजावनि हारे।सुमुखि कहहु को श्राहि तुम्हारे।
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुं मुसुकानी।”
सुनकर सभी आनन्दित हुए।
बाबा की गिल्टियाँ कुछ और बढ़ गईं थीं। अन्दर से टीसे मारती थीं। पीड़ा के कारण नीद उचट-उचट जाती थी। इधर दो दिनों से बाबा को कुछ ऐसी तरंग आ रही है कि रात के समय वे रामू को भी अपनी कोठरी में नहीं सोने देते। अपनी बढ़ी हुई वेदना को उन्होंने अब तक बाहरी तौर से व्यक्त नही होनें दिया। केवल उनके चेहरे का कसाव अधिक बढ़ गया है और वे कम बोलते है। रामू ने जब कारण पूछा तो वे बोले-“तेरा कोई दोष नही है रे। दिन में एकांत मिल नहीं पाता इसलिए रात में अपने भीतर वाले हंस को अकेला ही अनुभव कराना चाहता हूँ।”
बाबा के चेहरे पर हठ की दृढ़ता देखकर रामू सकुच गया। वह अब कोठरी के बाहर सोता है। कोठरी की देहली ही उसका तकिया है और उसके कान सदा भीतर की ओर ही लगे रहते हैं।बाबा को नींद कम आती है, आती भी है तो बीच-बीच में किसी गिल्टी से ऐसी टीस उठती है कि उचट जाती है। तब पीड़ा को भुलाने के लिए प्रायः लेटे ही लेटे जपमग्न हो जाते हैं। आज रात भी ऐसा ही हुआ बाँईं कलाई पर नई गिल्टी निकल रही है। हड्डी के ऊपर की गाँठ बड़ी दुखदाई है। पूरी बाँह में तनाव है। उस तनाव के कारण बगल में एक और गिल्टी उभर आई। नींद में करवट ले ली तो वह दब जाने से खुर्राटे भरते-भरते सहसा 'हे राम ' कहके कराह उठे। बड़ी देर तक दाहिने हाथ के पंजे से अपनी बाँईं बाँह दाबे हुए सीधे पड़े रहे। उनका चेहरा बड़े कठिन संयम से अपनी पीड़ा को दबा पा रहा था। मन की माला राम-राम जप रही थी।
थोड़ी देर के बाद बाबा ने अपनी आँखें खोली। दीवट पर रखे दीप के उजाले में दीवार पर रंगे देवचित्र की ओर ध्यान गया। हल्के उजाले मे महावीर जी अपने मध्यम उभार के साथ ऐसे चमक रहे थे जैसे लोभी की लालसा चमकती है। बजरंगबली के चित्र पर दृष्टि जाते ही तुलसीदास के मन में एक ताजगी आ गई। पीड़ा को पराजित करने के लिए भी आत्मबल जागा। मुस्कराकर चित्र से कहने लगे-"हे पवनतनय, तुम भले ही पीड़ा से मुक्ति न दो परन्तु यह तो बता दो कि किस पाप-शाप के कारण यह दु:ख पा रहा हूँ? हे राम, अब तो निर्विघ्न अपनी राम-रट में मुझे इतना रमा दो कि तन की पीड़ा को भूल जाऊँ।”
कानों में राम गूँज है पर गिल्टियों की टीसों के कारण बीच-बीच में राम-रट छूट जाती है। मन कराह-कराह उठता है। एक वार वे वेदना न सह पाने के कारण उठकर बैठ जाते है और कराहते हुए हनुमान जी के चित्र की ओर कातर दृष्टि से देखतें हैं। वेदना और प्रार्थना-भरे मन के ताने-बाने से काव्य-स्फूति जागती है-
नर जानत जहान हनुमान को निवज्यों जन,
मन अनुमानि, वलि बोल न बिसारिये। सेवा जोग तुलसी कवहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये। अपराधी जान कीज सासति सहस भांति,
मोदक मरे जो ताहि माहुर न मारिये। साहसी समीर के दुलारे रघुवीरजू के, वाह पीर महावीर बेगि ही निवारिये।
वे देर तक अपनी बाँई बाँह सहलाते रहे, फिर आँखें मूँद लीं और सोने का जतन करने लगे। फिर मन में कुछ ऐसा समा बँधा कि लगा मानों कोई उनकी पीड़ित बाँह को सहला रहा है। कल्पना की आँखें देखने लगी कि जैसे रत्नावली उनके वामाँग से प्रकट होकर उनकी कलाई सहला रही है। उन्हें लगा कि पीड़ा नहीं रही। उन्हें अब अच्छा लग रहा है। उन्हें लगा कि रत्ना नेह-पगी दृष्टि से उन्हें देख रही है। आप भी मुस्करा उठे, कहा-“मुझे अब भी नही छोड़ती? अन्त काल में तो अपनी ओर यों न खींचो।”
“मैं कब खींचती हूँ? आप स्वयं ही मेरी ओर खिंचे चले आते हैं।”
तुलसीदास कुछ न बोले। उन्हें लगा कि रत्ना अपनी गोद में उनकी बाहँ रखे सहला रही है और उन्हें यह अच्छा भी लग रहा है।
क्रमशः
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