महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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न तुम मुझे छोड़ सकती हो और न मैं तुम्हे।”
रत्ना फूट-फूटकर रोने लगी।आश्चर्य और अपराध जनित भावना से तुलसी दास का चेहरा प्रश्नचिन्ह बन गया। रत्ना के मुँह पर रखा हुआ उनका हाथ उसके गालों के आँसू पोंछने लगा और कहा- “अरे मैं तो हँसी कर रहा था रत्नू।पर ऐसी कोई बात तो कही नहीं जो तुम्हें यों चुभ जाए।” रत्ना की ठोड़ी उठाकर उसे अपनी ओर देखने के लिए बाध्य किया। पति की आँखों से आँखें मिलते ही रत्ना ने अपना मुँह उनकी छाती में छिपा लिया और सुबकते हुए कहा-“पुरुष होती तो अपने पिता को बुढ़ापे में यो अनाथ छोड़कर तो न आना पड़ता।”
सुनकर तुलसीदास के हाथों के बन्धन ढीले पड़ने लगे। वे उदास और गम्भीर हो गए, बोले- “किन्तु यह मेरा दोष तो नही, फिर मुझे क्यो लांछित करती हो?”
छिटककर अलग खडी होती हुई रत्नावली ने पल्ले से अपने आंसू पोंछकर रुँधें स्वर में कहा-“दोषी मेरा भाग्य है। तुम्हें पाकर एक जगह मैं अपने आपको इतनी धन्य अनुभव करती हूँ कि अपने दुर्भाग्य पर बीच बीच में बावली सी खीझ उठ पड़ती है। मैं अपने-आपसे विवश हूँ स्वामिन।” कहकर वह फिर पति की छाती में मुँह गड़ाकर फूट-फूटकर रोने लगी। नर की छाती पर नारी का रखा हुआ मुख नर का पौरुष बन गया।तुलसीदास शरणागत प्रतिपादक समर्थ स्वामी की तरह बड़े भाव से उस सौन्दर्य पर अपती जान छिड़कने लगे। उसे कसकर कलेजे से चिपका लिया और उसके गाल पर हाथ फेरते फेरते स्वयं उनकी आँखें भी प्रिया की न थमने वाली हिंचकियों से उमड़ पड़ी। वनक्रीड़ा का सहज उल्लास दोनों के लिए समाप्त हो चुका था।
सहसा एक गाय विकल रंभाती और दौड़ती हुई उधर आई । रत्ना रोना भूलकर डर के मारे अपने पति की छाती में और भी सिमट गई।गाय ने अपनी गहरी काली प्रश्न भरी आँखों से उन्हें देखा और फिर वन में आगे दौड़ गई। तुलसी बोले- “कितनी विकल दृष्टि थी इसकी।”
“इसका बछड़ा खो गया है।” कहते हुए रत्ना पति से अलग होकर खड़ी हो गई । उसके चेहरे पर विकलता थी।
तुलसीदास उँगलियों पर गणना करने लगे, फिर कुछ विचार कर बोले- “अरे, वह यहीं कहीं किलोलें कर रहा है, अभी अपनी माँ को मिल जाएगा। चिन्ता न करो।”
रत्ना मुस्कराई। चेहरे पर नटखटपन झलका, फिर लाज भरी आँखें नीचे झुकाकर धीमे स्वर में कहा-“बच्चे माँ को बड़ा कष्ट देते हैं।”
तुलसी बोले “किन्तु तुम्हें उससे क्या? ” फिर सहसा एक नये सोच से आँखें चमक उठीं। रत्ना का हाथ पकडकर पूछा- “क्या तुम माँ बनने वाली हो रत्ना? ”
रत्ना ने अपना लाज भरा सुख फिर पति की छाती में छिपा लिया और नटखट स्वर में कहा- “आप प्रश्न विचार लीजिए न।”
तुलसीदास ने कसकर अपनी प्रिया को बाँध लिया। वह रम्य वन, सारा वातावरण उन्हें अपने मन के भीतर वाले समृद्ध सौन्दर्य के आगे फीका लग रहा था।प्रिया के सिर पर अपना सिर टेकते हुए उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं। भीतर सोने के सहसदल कमल सा सौन्दर्य अपनी भावगंध से उन्हें लुब्ध कर रहा था।
सुबह का समय था। रत्नावली पूजा समाप्त करके ठाकुर जी के सामने दंडवत कर रही थी। पास ही दालान में हिंडोले पर दस महीने का नन्हा तारापति सो रहा था। एक दासी कन्या हिंडोले में लगी डोरी को एक हाथ से बीच बीच में हिलाती हुई दूसरे हाथ से पंचगुट्ठे खेल रही थी। इससे थोड़ी ही दूरी पर गणपति बैठा हुआ पट्टी पर लिखा छान्दोग्य उपनिषद् का उपदेश जोर जोर से रट रहा था।उसका स्वर मानों नट के बन्दर-सा था जो सोंटे के भय से अपने करतब दिखलाने को बाध्य था। उसकी आँखें आकाश से लेकर ठाकुरद्वारे में पूजा के आसन पर बैठी गुरुआइन और पंचग्रुट्टे खेलती हुई दासी पुत्री तक दौड़-दौड़ कर तमाशा देखने मे व्यस्त थीं। उसके दोनों हाथ मक्खियां उड़ाने और शरीर भर मे जगह जगह उठ आने वाली खुजली को मिटाने में चाकर की तरह व्यस्त थे।
गणपति पढ़ रहा था-“बल वाव विज्ञानाद् भय…विज्ञान से आत्मबल श्रेष्ठ है। अपि हि शत विज्ञान-वताम् एको वलवान् आकम्पयते, क्योंकि एक बलवान विद्वानों को डराता है। स यदा बली भवति, श्रथोत्याता भवति, उत्तिष्ठन परि चरिता भवति परिचरन् उपसत्ता भवति- वलवान होने पर मनुष्य उठ खड़ा होता है।वह जाता है गुरु के घर….”
ठाकुर जी के आगे दण्डवत् प्रणाम करके उठते हुए रत्नावली ने घुड़ककर गणपति से कहा- “फिर वही ! तोड़ तोड़ कर क्यों पढ़ता है”
गुरुआइन जी की घुड़की सुनते ही गणपति का ध्यान सजग हो गया। शरीर भर में मचती हुई खुजली न जाने कहाँ गायब हो गई। स्वर पहरेदार सा सजग हो गया।मंत्र की तोतारटंत शैली जो कुछ देर पहले मरियल बुड्ढे सी रेंग- रेंगकर चल रही थी अब घावक सी दौड़ने लगी। रत्नावली पूजा वाले दालान से अपने मुन्ने के हिडोलनें के पास आई। अपने सोते हुए लाल तारापति को नयन भरके निहारा। दासी पुत्री मालकिन के आने से तनिक भी न चौंकी। उसके दोनों हाथ वैसे ही अपने दोनों कामों मे दत्तचित्त थे। रत्नावली ने कहा- “चमेली, जाकर पूजा के बर्तन माजँ डालो।” फिर हिंडोले से सोते हुए तारापति को गोद मे उठाते हुए वह धीमें स्वर में अपने पति का रचा हुआ गीत गाने लगी- “जागिये रघुनाथ कुवँर, भोर भयो प्यारे।”
बच्चा अँगड़ाई ले रहा था कि तभी घर में रत्ना के चचेरे भाई गंगेश्वर ने प्रवेश किया । रत्ना ने हरखकर कहा- “आओ आओ भइया, आज सबेरे सबेरे इधर कैसे भूल पड़े? (स्वर ऊंचा करके) चमेली, पैर घुलाने के लिए पानी ला।”
आँगन के किनारे पैर धोने के लिए रखी हुई चौकी की ओर बढ़ते हुए गंगेश्वर बोले- “भूल क्या पड़े, हम जानत रहे कि शास्त्री जी महाराज अभी लौटे न होगें, इसीलिए चले आए। घड़ी आध घड़ी में उनके आने पर तो तुमसे बात करने का अवसर भी न मिल पाएगा।”
चमेली तब तक पानी का लोटा लाकर गंगेश्वर के पैर धुलाने के लिए तैयार खड़ी थी। रत्ना की आँखें भाई की बात सुनकर लज्जानत हुईं। गोद मे आकर भी तारापति अभी चेता न था।उसे जगाना भूलकर रत्नावली ने दु:खी स्वर में कहा- “उनसे तुम्हें यों डरने की आवश्यकता नही भैया, वे तो भोलानाथ हैं।”
क्रमशः
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