Tuesday, 4 July 2023

94

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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बचपन मे मैंने अपने बप्पा के क्रोध, प्यार और खीझ भरे क्षणो में अनेक अवसरों पर सुना कि यदि मैं लड़का होती तो इस घर की गद्दी कभी सूनी न होती। उनकी इस बात ने मेरे मन मे लड़कों के लिए, विशेष रूप से उस लड़के के लिए, जो मेरा पति बनकर इस घर से मुझे निकालकर ले जाएगा, एक अनोखी चिढ़ भर दी थी। तुम्हें पाकर मैं रीझी अवश्य, पर जब किसी प्रसंगवश वह चुभन चुभ जाती थी तो मैं सहसा निर्वुद्ध हो उठती थी।” 
“तुम्हारा वह दुर्भाग्य ही हम दोनों का सौभाग्य बन गया रत्ना।” 
“पर हमे तपना कितना पड़ा स्वामी।”  “नर-नारी एक दूसरे के पूरक और भाग्यविधाता हैं, वे परस्पर की रीझ और खींच में अपने-अपने अभावों और उनकी पूर्ति के लिए ही पूर्व कर्मानुसार मिलते हैं।” 
रत्ना उदास हो गई, बोली -“यह माना कि इस जनम में राम जी ने हम दोनों को वह तो अवश्य दिया जो जीवन में हरेक को नहीं मिलता, पर बाहरी रूप से हम दोनों ही आजन्म कितना सहते रहे स्वामिन्‌? “
“हजार हथौड़ों की चोट खाकर ही पत्थर, शंकर बनकर पुजता है। मेरे राम ने नर-तन धारण करके भी मन में कुछ न रखा।फिर भला हमारो हिसाब ही क्‍या है रत्ना हम तो चाकर है चाकर, जैसा मेरा साहब चाहेगा वैसा ही मुझे तपना पड़ेगा।” बाबा ने आँखें बंद लीं। शरीर ऐसा सघाव लेकर बैठा, जैसा कि कई दिनों से न बैठ पाया था। 
“जो भी हो, मेरा सौन्दर्य और मेरे सारे गुण अपनी पूरी शक्ति  के साथ तुम्हें बाँधते थे, पर मेरा एक दोष बार-बार त्रिशूल की तरह तुम्हारे कलेजे में चुभता था। हाय नाथ, मैने तुम्हारे प्रति कितने पाप किए हैं।”
बाबा हंसे, मधुर स्वर में कहा-“ तुम्हारा वह पाप ही तो मेरा पुण्य बना।वही तो मुझे रामरूपी 'कोटि मनोज लजावन हारे’ सौन्दर्य की चाहत से बाँघ सका।सत्य शील और सौन्दर्यों के त्रिगुणात्मक स्तर पर मेरे भोले महाभाव को मोहिनी और रत्ना के सहारे ही बढ़ना था। तुमने मुझे रजोभाव भी दिया और सद्भाव भी। मोहिनी तो मात्र यौवन की अनबूझी हठ भरी तपस्या ही थी किन्तु तुम्हारे बिना उसकी सिद्धि अर्थात्‌ मेरा रामचैतन्य मुझे मिल नही सकता था प्रिया अर्धांगिनी। मुझे याद आ रहा है वह दिन जो हमने चित्रकूट के जंगलों में बिहार किया था। 
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चित्रकूट क्षेत्र में एक झरने के पास बैठे तुलसी और रत्नावली किसी बात पर खिलखिला रहे है। चिड़ियाँ चहक रहीं हैं। रत्नावली के पैर झरने के बहते हुए पानी में लटक रहे है।पैरों से हल्के हल्के पानी को हिलाते हुए रत्ना कह रही है-“तुमने मुझे मीठी क्यों कहा?”
“अच्छा, तो इसीलिए तुम कड़वी बनकर आँखें तरेर रही हो? और ये जो तुम पानी में मगन मन तरंगयें उठा रही हो यह तुम्हारे श्रृगांर प्रेरित आह्वाद का मधुर प्रमाण नहीं हैं तो और क्या हैं?”
रत्ना इतराहट भरे स्वर में बोली-“मैं क्या जानू?”
“तुम इस प्रकृति के श्रृंगार की मधुरिमा का एक दिव्य अब लंकार बन गई हो। तुम वह मधुर स्रोत हो जिससे मेरे मन में रस का सागर उमड़ता है। तुम …..”
“बस-बस पण्डित जी, अपनी यह चाटूकारी भरी बातें आगरे जाकर अकबर बादशाह को सुनाइए, कोई जागीर मिल जाएगी।” 
“मुझे तुम्हारे रूप मे यह रामदत्त अनंत सुन्दर साम्राज्य मिला है, फिर नरदत्त छोटी-मोटी जागीरों की परवाह क्यों करूँ?”
“तो फिर मेरी क्‍यों करते हो?”
“यहाँ ढ़ूढ़ँ का प्रश्न ही नही, मैं तो अपनी ही सुन्दरता पर रीझ रहा हूँ।”

रत्ना ने 'जाओ तुम बड़े वो हो' वाली भंगिमा में आँखें तरेर कर पति को देखा और अपना मुखड़ा पानी में हिलोरें लेते अपने पैरों की ओर मोड़ लिया। उस निर्मल जलघार में अलक्तक रंगे, विछुये पायल मण्डित गोरे पैर पिंडलियों तक चपलतावश डूब उतरा रहे थे।तुलसी दास कोहनी के बल टिके, अधलेटे हुए प्रिया के क्रीड़ारत चरणों को निहारने लगे। कुछ रुककर फिर बोले-“तुम्हारे नूपुरों मे यदि काँटा लगा होता तो ये सारी मछलियाँ अभी उसी में लटकती
दिखलाई देतीं।” 
रत्ना ने आँखें तरेर कर कहा-“मैं कोई मछेरन हूँ जो मछलियाँ फँसाऊँ? ”
“और तुम हो क्या? अपने रूप की वंशी मे गुणों का लासा लगाकर तुमने इस मच्छ को फांस तो रखा है।” 
रत्ना ने फिर आँखें तरेरी-“हूं ऊं, बड़े चतुर बनते हो। बहेलियाँ चिड़ियाँ से कहे कि तुमने मुझे जाल में फँसाया है।” 
विनोद मुद्रा मे तुलसीदास रत्ना को चिढ़ाते हुए बोले- “मैंने कब फँसाया? तुम्हारे बप्पा कथा के बहाने मुझे ले गए और तुम्हारी इन रसीली आँखों का चुग्गा चुगाकर मुझे अपने जाल में फँसा लिया।”
“ये नही कहते कि मेरे वप्पा ने तुम्हारा उपकार किया, नहीं तो जनम भर क्वाँरे ही पड़ें रह जाते।” 
“वह तो मैं चाहता ही था। सोचता था राम-चरणों मे चित्त लगाऊँ।” 
“तो अब कर लो न अपनी चाहत पूरी। मैं कही कुएँ तालाब में डूबकर मर जाऊंगी, तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी।” 
“अरे तब तो और भी आफत आ जाएगी। तुम्हारे साथ-साथ मुझे भी डूबना पडेंगा।” 
“क्यों?”
“ काँटे में फँसे मच्छ की भला दूसरी गति ही क्‍या है ।”
 “हाँ मैं ही तो तुम्हारे मार्ग फा कंटक हूँ। ऐसा करो कि मुझे पीहर भेज दो और छुट्टी पाओ।”
“तुम्हारे पीहर में है कौन? बष्पा तो क्षेत्र-संन्यासी होकर जमुना तट पर रहते हैं।” “उससे तुम्हें क्या? मैं स्वयं किस पुरुष से कम हूँ ? बाप-दादों की गद्दी सँभालूँगी, खाने-पीने को बहुत मिल जाएगा।”
तुलसी खिलखिलाकर हँसे और कहा-“कोई लुटेरा आएगा और पण्डित जी को ही उठाकर ले जाएगा। कहेगा कि चलो हमारे घर पर ही हमारी और अपनी कुण्डली विचारो।” कहकर तुलसीदास फिर अट्टटास कर उठे।
पति का यह अट्टहास रत्ना के अहंकार की कुण्ठा बना, मटके सा मुँह फुलाकर उठ खड़ी हुई और तेजी से चल पड़ी । उसकी आँखों में आग और पानी दोनों ही चमक रहे थे।
तुलसीदास तुरंत ही उठकर उसके पीछे लपके- “अरे तुम तो सचमुच ही रूठ गईं।”
रत्ना की चाल और तेज हो गईं।तुलसी दास ने हल्के से दौड़कर उसे अपनी बाँहों में बाँध लिय। छूटने के प्रयत्न करते हुए वह बोली- “छोड़ो , तुम्हे मेरी …”
तुलसी का एक हाथ झटपट रत्ना के मुख पर चिपक गया, बोले- “झूठी सौगंघ क्यों देती हो?
क्रमशः

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