महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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पुजारी की बातों की करुणा से प्रभावित होकर तुलसीदास की आँखें भर आईं, चेहरा गभीर हो गया। उन्होने कहा-“बुभुक्षितं कि न करोति पापम्। अस्तु, यह सारा प्रसँग उठाने का तुम्हारा आशय मैं समझ चुका हूँ। गणपति मेरे साथ चल।मैं आज ही तुझे तेरे गुरु को सौंप दूँगा और सुमहुर्त में तेरा विद्यारम्भ हो जाएगा।”
पुजारी जी की आँखें आनन्दाश्रुओं से छलछला उठीं।सारा शरीर गदगद हो गया था। वे तुलसीदास के पैरो में गिर पड़े, कहा-“तुलसी भैया, हमारे बाबा की आत्मा आपको जरूर असीसेगी।”
अपने दोनों हाथ उनके कंधों पर रखकर उठाते हुए तुलसीदास बोले- “उठो-उठो, यह तो मेरा धर्म है। इसे दो गुरु मिलेंगे , मैं और तुम्हारी भौजी।”
संकटमोचन ने मानों गणपति के रूप मे रूठे पति को अपनी रूठी पत्नी के पास लौटने का एक बहाना दे दिया था।घर लौटें। रसोई के आगे वाले दालान में रत्नावली उदास बैठी श्यामो की बुआ की बातें सुन रही थी। दहलीज में घुसते ही श्यामों की बुआ की बातें उनके कानों में पड़ने लगीं।वह कह रही थी-“आज जानें कहाँ भटक गए हमारे भइया।अपनी भले न रहे, पर तुम्हारी भुख प्यास भी बिसर गई।हाय, भूख के मारे कैसा कुम्हिलाय गया है तुमरा चेहरा।”
इस बात ने तुलसीदास के पैरों में बिजली भर दी।मन अपराधी अनुभव करने लगा। दहलीज के सामने वाले दालान का हिस्सा पार करके आगे मुड़ते
ही रसोई घर के आगे दीवार के सहारे हथेली पर गाल टिकाए बैठी हुई रत्नावली के मुख पर चिन्ता और उदासी के गहरे बादल छाए हुए दिखे,मगर अब कहाँ रही उदासी? चार आँखें मिलींऔर दो चेहरे खिल उठे। गणपति का हाथ पकड़ कर उसे आगे बढ़ाते हुए कहा-“लो, तुम्हारे लिए एक शिष्य लाया हूँ।”
श्यामो की बुआ उलहना देती हुई बोली- “कहाँ चले गए थे भइया? सारा दिन निकल गया, भौजी बिचारी भूख के मारे कुम्हिलाय गईं।”
तब तक रत्नावली उठकर बाहर से आए हुए पति के पैर धुलाने के लिए ताँबे की कलसिया लेकर आँगन के कोने में खड़े पति के पास पहुँच चुकी थी।तुलसीदास स्वयं अपने पैर धोने के लिए झुके किन्तु उसके पहले ही रत्नावली के हाथ कलसिया से पानी डालने और पैरों की धूल धोने मे लग चुके थे। एक बार झुके हुए पति की आँखों में आँखें डालकर सुहागिन ने मान और करुणा के अनोखे संगम वाली दृष्टि से पति को निहारा। तुलसीदास ने देखा तो लजाकर दृष्टि फेर ली। बात का पक्ष बदलते हुए उन्होंने फिर बात उठाई,कहा-“पण्डितों के कुल का लड़का है।दुर्भाग्यवश दो पीढ़ियों तक इसके पुरखे विद्या वंचित रहे। इसे समर्थ बनाकर तुम यश पाओगी।” श्यामो की बुआ, केवल अपने पद से ही नही, काया से भी भारी भरकम थी। पन्द्रह-सोलह वर्ष की छोटी सी आयु में भी वह अपनी मोटी काया के कारण आायु से पाँच छ: वर्ष अधिक बड़ी लगती थी। सालिगराम की बटिया जैसी गोल-गोल श्यामों की बुआ रसोई घर के दालान में आते हुए अपने भइया से आँखें नचाकर बोली - “सात जनम में भी हमारी भौजी जैसी घरवाली किसी को नही मिलती भइया, बताये देती हूँ”
तुलसीदास मुस्करा कर बोले-“अरे सात क्या सत्तरह जन्मों में नहीं मिलेगी न इनसी भौजी, न तुमसी ननदी।”
मुँह मटका कर, आँखें नचाकर श्यामो की बुआ बोली- “ऊं , हम तो तुमरी बात कह रहे है। हमारी भौजी जैसी सुन्दर कोई बड़ी से बड़ी रानी महरानी भी नही होयगी।”
दासी तब तक दालान में पीढ़ा और चौकी बिछा चुकी थी। तुलसीदास ने उस पर बैठते हुए बालक के लिए भी पास ही में पीढ़ा चौकी लगाने की आज्ञा दी, फिर मुस्कराकर कहा- “भाई, हमारी जिजमानिनों में अनेक स्त्रियाँ तुम्हारी भौजी से अधिक सुन्दर है । हम तो उन्हें देख-देखकर लट्टू हो जाते हैं।“ , “ऊं कहीं न, हमें भरमाने चले हैं। अरे हमी नहीं सारी दुनिया जानती है कि सास्त्री महाराज हमारी भौजी के नचाए नचाते हैं। तुमरे आगे राजा इन्नर की अपछरा भी आ जाय तो तुम उसे भी भौजी के आगे छी कर दोगे।”
रसोई घर के भीतर चूल्हा फिर से दहक उठा था। तवा चढ़ चुका था।चकला- बेलन आगे सरका कर फुरती से आटे की लोई बनाती हुई रत्नावली के चेहरे पर, बाहर दालान में चलने वाली बातों को सुनकर, सुहागिन का अभिमान और अपने पति के प्रति उल्लास भरी आस्था दमक उठी थी। उस समय उसके चेहरे पर ऐसा रुआव आ गया था कि बड़ी-बड़ी रानी बेगमें भी उसके आगे झेंप जातीं। उसके हाथ फुर्तीले सेवक से भी अधिक चुस्तीले चले रहे थे। बाहर दालान से बैठे तुलसीदास भीतर बैठी अपनी प्रिया को संतोष मग्न , होकर निहार रहे हैं। भीतर के अँधेरे में रत्नावली की मुखमुद्रा कुछ अधिक उभरकर नही आ रही, फिर भी जो झलक मिल रही है वह मानों प्राणों को भी प्रणणान्वित करने की शक्ति रखती है और उसी शक्ति से उल्लसित होकर तुलसीदास अपनी मुहँ बोली बहन से विनोद करते हुए बोले- “अच्छा, यह बात है तो मैं भी तुम्हारे लिए दस-पाँच बड़ी सुन्दर सुन्दर भौजियाँ बकरी भेड़ों की तरह बटोर के ले आऊँगा । फिर तुम यह तो नहीं कहोगी कि एक ही भौजी हमें नचाती है।”
“अरे भडया, दस पाँच क्या, तुम पूरा रनिवास बसाय लेव तो भी तुम रहोगे हमारी भौजी के ही बस में। ऐसी पढ़ी लिखी बुद्धिमान तुम्हें लाखों में तो क्या करोड़ों में भी ढ़ूढे़ नहीं मिलेगी।”
तुलसीदास गम्भीर होने लगे। श्यामो की बुआ के द्वारा कही गई रत्ना के पढ़े-लिखे होने की बात उन्हें सही लगी, पर रत्ना के बुद्धिमान होने की बात सुन कर उनका विवेक सहसा ठिठक गया। सबेरे पत्नी के निर्वुद्ध की भाँति बर्ताव करने की बात मन के चलते हुए आनन्द रूपी बुलबुलों मे कुछ कुछ खिंचाँव भरने लगी। रत्नावली उस समय भीतर थालियाँ परोस रही थी। तवे पर चढ़ी रोटी सेकनें, नई बेलने और थाली परोसने के विविध कामों मे उसके हाथ ऐसे सधाव और फुर्ती से चल रहे थे कि उसे निहारते हुए तुलसी को लगा कि ऐसी कर्म-कुशल और व्यवस्था-निपुण स्त्री भला अकस्मात् निर्वुद्ध क्योकर हो जाती है? इसका क्या कारण है?
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बाबा के सिरहाने बैठी हुई रत्नावली बोली- “मेरा अहंकार ही मुझे निर्वुद्ध बनाता था।
क्रमशः
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