महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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तुलसीदास इस निश्चय के साथ फिर अपनी बैठक में चले गए।थोड़ी देर तक कमरे में एक सिरे से दूसरे सिरे तक तेजी से चक्कर काटते रहे। उनके मन की उबलन थम नहीं पा रही थी। “कुछ हो जाय मैं रत्नावली के इस हठ को प्रश्रय नहीं दूगाँ, नहीं दूँगा, कदापि नहीं दूँगा। उन्हें अपने पति का मान रखना ही होगा।”
तुलसीदास ने अपनी बैठक के द्वार बन्द किए और भीतर के दालान में जोर-जोर से खड़ाऊँ खटकाते हुए वे दहलीज की ओर बढ़े।रसोई घर की ओर चोर कनखी से ताका। रत्नावली अब भी रोटियाँ बेल रही थी।उनके मन ने चाहा कि रत्ना एक बार नजर उठाकर देखे और बाहर जाने के सम्बन्ध में कुछ पूछे या कहे, पर ऐसा कुछ भी न हुआ। तुलसीदास के पैरों में नया आवेश भर गया था। वह खट-खट करते दहलीज तक पल भर में पहुँच गए। फिर ठिठके, कान भीतर की ओर लगाए, परन्तु आशा अब भी झूठी साबित हुई। रत्नावली ने उन्हें न पुकारा। वे घर से बाहर निकल आए और धीरे घीरे संकट-मोचन महावीर की ओर बढ़ने लगे। बाजार के दिन थे। गाँव में भीड़-भड़क्का था। तुलसीदास अब तक इस क्षेत्र के नये गौरव बन चुके थे, उन्हें अनेक लोग झुक झुक कर प्रणाम कर रहे थे।सबको आशीर्वाद देते, शिष्टाचार में मुस्कराते हुए ज्यों-ज्यों वे आगे बढ़ते गए त्यों-त्यों उनके मन का उफान धीमा पड़ता गया किन्तु यह ठंडक गर्मी से भी अधिक गर्म थी। मेरी इस प्रतिष्ठा को गंगेश्वर ने आघात पहुँचाया। मैं यदि एक बार उसके आगे झुक गया तो वह मूढ़ दम्भी अपनी बहन का पल्ला पकड़ कर मुझे चौपट ही कर डालेगा।यह मिर्जा जी और खां साहब आदि फिर मेरे यहाँ कभी न आएँगे और भी अनेक यजमान भ्रम में पड़कर आना छोड़ देगें। वह संकटमोचन तक पहुँच गए। भीड़ अच्छी थी। एक उपाध्याय जी को तुलसीदास जी से कहकर राजा भगत ने मन्दिर का पुजारी बनवा दिया था। दर्शनार्थी भीड़ से प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। चढा़वे में आए हुए बतासो और गुड़धानी का कुछ भाग मटकों में डालकर जल्दी जल्दी वे प्रसाद के दोने लौटा रहें थे। उनका छः-सात वर्ष का लड़का भक्तों के कपालों पर सिंदूर के टीके लगा रहा था। चारों ओर जय सीताराम, जय बजरगबली की जै जैकारें उठ रही थीं।एक ज़ंजीर में बँधे चौरासी घंटे एक के बजाने से एक साथ बजकर अविराम गूँज उठा रहे थे। तुलसीदास चबूतरे पर चढ़कर बजरंगबली को प्रणाम करके उपाध्याय जी के पास ही बैठने लगे। उपाध्याय जी ने झटपट अपने लड़के से कहा, “गनपतिया, पहले काका के लिए झटपट आसन बिछा दे।”
“नहीं, क्या करना है ”
“सही भैया, ऐसे न बैठो”- इसी बीच मे सिन्दूर लगाना छोड़कर गणपति ने आसन बिछा दिया। तुलसीदास शांत भाव से बैठकर हनुमान जी की और निहारने लगे। दर्शनार्थी संकटमोचन से अपने सकंटो को मोचने के लिए गोहार लगा रहे थे। रोगी आत्मीय अच्छा हो जाए, परदेश गया हुआ पति जल्दी लौट आए, अपना खेत जबरदस्ती उजाड़ने वालों को बजरंगवलीं दण्ड दें- आदि तरह तरह की मानव दुर्बलताएँ और आकांक्षाएँ प्रार्थना के रूप में हनुमान जी के बहाने उनके सामने आ रही थीं। उनका जी चाहा कि वे भी गुहारकर कहें, - “बजरंग, मेरी रत्नावली को सुमति दो। गंगेश्वर की ईर्ष्या के उत्तर में मेरी प्रतिष्ठा को और बढ़ा दो।” पर अपने मन से शब्दहीन होकर लहरानेवाली इन बातों को तुलसीदास ने शब्दों की काया न दी। वे बड़ी देर तक बैठे दुनिया का तमाशा देखते रहे।
भूख जोर की लग रही थी। चबूतरे पर संकटमोचन के मंदिर की भीड़ अब प्रायः छंट गई थी। पुजारी जी मदिर की धोवाधाई करके रोटी खाने के लिए घर चलने लगे।तुलसीदास से पुछा-“भइया, क्या रोटी-वोटी खा के घर से निकले हो?”
तुलसीदास के मन में इस प्रश्न ने विचारों की लहरें उठा दीं।झूठ बोलू बजरंग बली के स्थान पर बैठकर? नहीं, राम बोला झूठ नहीं बोलेगा। उत्तर दिया- “नहीं अब जाऊँगा।”
“भइया, हमारी एक अरदास है।”
“बोलो”
“बात यह है भइया, कि हम तो, तुम जानो न पढ़े न लिखे। हमारे बप्पा विचरऊ भी कुछ ऐसे ही रहे। बाबा हमारे बड़े भारी पंडित थे।सो एक बार तुर्कों ने गाँव लूटा तो उनसे लड़ते हुए बीरगति को प्राप्त होइ गये। सब पोथी पत्तरे, घर गौयें नष्ट होइ गये। वप्पा हमारे जो रहे सो का कह भइया, बजरंगबली स्वामी के सामने झूठ बोले में हमें बड़ा संकोच हुई रहा है और बात कहते भी नीक नहीं लगती। वह जानत हो का करते रहे ?” कहते-कहते पुजारी जी अपनी पुजापे की गठरी रखकर तुलसी पंडित के सामने बैठ गए और कहने लगे- “वप्पा हमारे सच्चे झूठे मन के किरेया-करम, ब्याह-जनेऊ कराते थे।”
तुलसी मुस्कराने लगे। पुजारी बोले- “हमारे पिता तो फिर भी भले रहे, हम आपको एक ऐसे ही पण्डित जी की आँखों देखी कहानी सुनाते हैं। वह हमरे गाँव के पड़ोस में ही रहता रहा। हम साथ साथ उसने कई बार काम भी किया था। सो वो नशे भाँग, तिलक-उलक ., फटे भूले पोथी-पत्रे बगल से दबाय के नित्त मरघटे में सारी किरिया-करम करवावे और मन्तर जानत हौ कैसे पढ़ता
रहा? (ऊँची आवाज में ) ओमू तमो-तमो गरुड़ो-गरुड़ो गरुड़्धुजा नारायनो केसवो हरीह (धीमे बुदबुदाते हुए) सार नरक जाय कि सरग, हमारे ठेगे से। (फिर तनिक ऊँचे स्वर में)ओमू नमामी नमः झ्म् जमदूताय नमः (फिर घीमे स्वर में ) औ जो यहिका बेटवा हमका अच्छी दच्छिना देय तौ सारे का सरग मिले, नाही तो (ऊँचे स्वर में ) स्वाहा-स्वाहा-स्वाहा।”
पुजारी जी का ऊँचे नीचे स्वर में सुनाने का ढंग और इन मंत्रों के शब्द सुनकर हँसी के मारे तुलसीदास के पेट मे बल पड़ने लगे। पुजारी जी का लडका गणपति भी खिलखिला कर हँस पड़ा। तब पुजारी जी अपने अभिनय की गम्भीर मुद्रा उतारकर स्वय भी हँसते हुए अपने बेटे से कहने लगे- “अरे हँसत का है वचवा, ये तो कही, कि संकटमोचन ने हमारी सुन ली, अपनी सरन में हियाँ बुलाय लिया, नहीं तो बेटा तुझे भी मैं यही सब मंतर रटवाता। पापी पेट जो ठग विद्या न सिखावे और जो न करावे सो थोड़ा है।”
क्रमशः
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