Tuesday, 4 July 2023

91

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
91

आगे बढ़कर भाई से कहा- “जब तक मैं जीवित हूँ तब तक इस घर में तुम बराबर आओगे भइया। इनकी बात का बुरा न मानना।“ 
लेकिन तुलसीदास को अपनी पत्नी की बात से और भी बुरा लगा। कड़क कर बोले-“गंगेश्वर, अब तुम मेरे घर क्‍या इस गाँव में भी आओगे तो बिना पिटे नहीं लौटोगे।” 
गंगेश्वर अलगनी पर टँगा अपना धोती-अंगौछा जल्दी से उठाकर बैठक वाले कमरे में भाग गया। गंगेश्वर के जाने के बाद रत्नावली चकित मुद्रा में अपने पति का मुख देखने लगी। तुलसीदास का चेहरा अब भी आवेश में तमतमा रहा था। रत्नावली के मन पर तुलसीदास के इस क्रोध की प्रतिक्रिया क्रोध में ही हुई। उसकी सुन्दर आँखें दहकते अंगारों सी चमक उठी। उसने कहा- “आपने मेरे पीहर का अपमान किया है, मैं इसे नहीं सह सकती।” कहकर वह भीतर चली गई। 
तुलसीदास अपनी पत्नी को घूरकर देखने लगे। अपनी पत्नी का बड़ा ही रीझ-भरा और सुहावना रूप पहली बार असुन्दर लगा। उन्हें लगा कि जैसे वह चेहरा कालिख से पुत गया हो और उसमें लुभावनी आँखों की सफेदी भयावनी हो गई हो। तुलसीदास का सुन्दरता- प्रेमी कवि मानस स्वयं अपनी ही कल्पना से सिहर उठा। वे अपने मन में अपनी प्रिया का ऐसा विद्रप बिम्ब उभरने के कारण स्वयं अपने से लज्जित भी हुए। उन्होंने अपना सिर उठाकर दुबारा अपनी पत्नी को देखा। चकले पर रोटी बेलते हुए रत्नावली की मेहंदी रची उँगलियों में बेलन मानों जानदार होकर किलोलें कर रहा था।दाहिने गाल पर लटक आई बालों की एक लट हवा में हल्की-हल्की हिल रही थी और इसी हिलने से तुलसीदास के भीतर वाली कालिखपुती रत्नावली उजली, पूर्ववत्‌ सुन्दर और सदा की तरह मनोहारिणी बन गई। यही नहीं, मन के पश्चाताप में उन्हें वह अपनी प्रिया का लुभावनापन अति- रंजित होकर लुभाने लगा लेकिन सौन्‍दर्य बोध की यह सारी प्रक्रिया जब अपनी तह में बैठकर अपनी पूर्णता पाने का प्रयत्न करने लगी तो रोष से फूलता हुआ स्वाभिमान उसके आड़े आया। सारा सद्भाव होते हुए भी उन्हें अपनी पत्नी का अन्याय पक्ष की ओर जाना अच्छा नहीं लगा था। उनका न्याय बोझ उनकी सौन्दर्य रीझ के बावजूद राजी नहीं हो पाता था। वे अपनी रीझ के कारण कुछ कुछ शांत तो हुए किन्तु न्याय से सतेज भी बने रहे।
उन्होंने कहा- “तुम अशिक्षित स्त्री की तरह बिना समझे- बूझे अन्याय का पक्ष लोगी?” 
मेंहदी रची उँगलियों मे फँसा नाचता बेलन एकदम से थम गया। झुका सिर उठा और झटककर बालों की लट सरकाई, फिर सीधे देखकर कहा- “पीहर का पक्ष लेना नारी मन का नैसगिक न्याय है। मैं यदि लड़का होती तो मेरे पितृ की पीढ़ियों से पुजती आ रही गद्दी आज यों सूनी न होती।” बेलन दूनी तेजी से मेहंदी रची उँगलियों में नाचने लगा।
तुलसीदास की आँखों के सामने रत्नावली अब यों झलकी कि सलोना-सुहाना मुखड़ा, मेहंदी रचे, मुँदरी सजे नाजुक हाथ और महावर लगे पाँव सब सुन्दर ये केवल वक्षभाग काला था। वैसा ही कालिख पुता विद्रूप जैसा कि कुछ क्षणों पहले उन्हें रत्ना का मुख झलका था। बार बार अपनी सुन्दरी प्रिया का विकृत बिम्ब झलकता उन्हें रुचिकर न लगा लेकिन रत्ना की बात भी तो रुचिकर नही लग रही थी।वह बोले, स्वर में हृदय और बुद्धि दोनों ही की खिन्नता बात के साथ ही प्रकट होने लगी, कहा- “तुम्हे मेरी उन्नति अच्छी नही लगती?” 
रत्नावली का बेलन तनिक थमा और इसी थमाव के साथ चकले पर रोटी फेरने के लिए उँगलियाँ सकुचते हुए चलीं। हाथों और उँगलियों की यह गति मानों रत्नावली के मन की गति का प्रतिबिम्ब थी। संकोच भरे संयत स्वर में आँखें झुकाए हुए कहा- “आपकी उन्नति न चाहने का प्रश्न ही नहीं उठता, दु:खी तो इस बात से हूँ कि जिस द्वार पर बड़े बड़े राजे रजवाड़ो के हाथी आकर खड़े होते थे, उस द्वार पर अब केवल कुत्ते ही लोटा करते हैं।गंगेरवर भैया अपनी वह साख न बना सके।”
“गंगेश्वर ने मेरे घर मे बैठकर मेरा अपमान किया, इसे मैं कभी क्षमा नहीं करूँगा। वह निश्चय ही अब मेरे घर मे कभी प्रवेश नहीं कर पाएगा।”
रोष से रोष की ज्योति जागी। रत्नावली का चेहरा फिर तमक उठा, बोली- “बप्पा यदि उन्हें किसी काम से यहाँ भेजें, मुझे बुलाने ही भेजें?”
“मैं बप्पा से भी स्पष्ट कह दूँगा। इस व्यक्ति को अब मैं अपने घर मे कदापि नहीं घुसने दूगाँ।”
“पुत्रहीन होने के कारण क्या उन्हें बुढ़ापे में यह अपमान भी सहना पड़ेगा?”-कहते हुए रत्ना की आँखें छलछला उठी, होंठ काँपने लगे।
तुलसीदास का न्याय पक्ष अपनी रीझ के आगे कुछ कुछ अपराधी-सा अनुभव करने लग। यह अनुभूति व्यर्थ की है, किन्तु है, क्या कँरू? रत्ना के आँसू कैसे देखूँ ?” अपने मोह और न्याय में विचित्र सा समझौता करते हुए वे बोले- “तुम स्वयं भी दो तीन बार मुझसे गंगेश्वर की बुराइयाँ बखान चुकी हो। वप्पा भी उससे संतुष्ट नही है, यह भी तुमने ही कहा है।”
“पीहर का कुत्ता भी प्यारा लगता है, यह तो मेरा भाई है।“ - कहकर रत्नावली तेजी से रसोई में चली गई। तुलसीदास किंकर्तव्यविमूढ़ से सिर झुकाए खड़े रहे। उन्हें अपने वैवाहिक जीवन के इन थोड़े से दिनो में रत्नावली से यह पहला आधात लगा था। जिसकी विद्या, सुघड़ता, प्रबन्धपटुता और सर्वोपरि जिसके रूप और सौन्दय के प्रति तुलसीदास इतने अधिक अनुरक्त हो गए थे कि इसमें अब वह किसी भी बुराई को देखने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे, वही रत्नावली तर्क और न्याय से परे हटकर उनका विरोध कर रही है। 'पति से अधिक उसे अपने पीहर का कुत्ता प्यारा लगता है’ कैसी ठेस पहुचाने वाली बात है। नहीं , इस बात पर मैं कदापि समझौता नहीं करूँगा। रत्नावली को यह समझना ही होगा कि विवाह के बाद रत्री के लिए पति ही सर्वोपरि है। उसके कुतर्कों और अन्यायों के प्रति भी उसे सादर-सप्रेम सिर झुकाना चाहिए, फिर मैं तो न्याय की बात कर रहा हूँ। मेरे घर में बैठकर व्यर्थ में मेरा अपमान करके मेरी रोटी छीनने वाला व्यक्ति अब इस घर में कदापि नही आ पाएगा। रत्नावली मुझे भले ही प्राणों से अधिक प्यारी लगती हो, पर उसके इस कुरूप को मैं कदापि प्रश्रय नहीं दूगाँ।
क्रमशः

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...