महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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साधु बोले- “आप लिखना पढ़ना जानते हैं?”
“हाँ, महाराज। राम कृपा से काशी में शिक्षा पाई है।”
“तो आइए, मैं आपको रामानुजी सम्प्रदाय के मठ में ले चलता हूँ।उनका हिसाब-किताब रखनेवाला कोठारी बीमार है,मरणासन्न है। वहाँ के महन्त जी अभी दो दिनो पहले ही हमारे आगे हिसाब किताब के सम्बन्ध में दुःखी हो रहे थे।”
तुलसीदास फिर संकोच में पड़ गए, कहा- “महाराज, यह रुपिया टका और साज सामानों की चिन्ता में पड़ गया तो……..।”
“अरे यह मठ का हिसाब किताब है, कोई महाजन की कोठी का तो नहीं। व्यर्थ मे भावुक न बनो। दुनिया साधे बिना दीन नही सधता। राम सरकार भी जब दुनिया में आते हैं तो उसके समान ही व्यवहार करते हैं।”
“आपकी इस बात ने मुझे प्रभावित किया, ठीक है, मैं कोठारी का काम सँभाल लूँगा।”
बाबा सन्त जी को सुना रहे थे-“रामानु जी सम्प्रदाय के मठ में मैं कोठारी बन गया। महन्त जी यों तो भले थे। कुशल, लोक व्यवहारी थे। हाकिम हुक्कामों, बड़े आदमियों से प्रायः मिलते जुलते रहते थे परंतु चापलूसी बहुत पसंद करते थे। जो व्यक्ति हर समय उनके दरबार में बैठा रहे, उनकी हाँ में हाँ मिलाता रहे, उनकी रक्षिता-प्रिया को सराहे और मान दे, वही उनका स्नेहभाजन बन सकता था। वे मेरे काम से तो संतुष्ट थे परन्तु दरबारदारी न कर पाने के कारण वे असंतुप्ट भी रहते थे। मैं जब हिसाब किताब लिखता तो मन में ऐसा अनुभव करता था कि राम जी की कचहरी में ही काम कर रहा हूँ और बाकी समय अयोध्या के विभिन्न स्थलों पर डोला करता था। पंडे तीर्थयात्रियों को बतलाते- यहाँ सीताराम का महल था, यहाँ सीता जी रसोई बनाती थी, यहाँ राम जी का दरबार लगता था, इस कुण्ड पर दतुन-कुल्ला करने आते थे। यहाँ गुरु से पढ़ते थे। यहाँ भरत जी ने राम बनवास के दिनो में निवास किया था।
अयोध्या के विभिन्न स्थलों के दृश्य पर दृश्य आते चले जाते। उजड़े टीलो में अथवा खण्डहर मन्दिरों के आस पास राम जी की अयोध्या की कल्पना करते हुए तुलसीदास गदगद हो जाते थे।अयोध्या की भूमि से चलता फिरता हर चेहरा उनकी दृष्टि में अपना वर्तमान रूप खोकर रामकालीन बन जाता था। वे अपने काम के समय को छोड़कर प्रायः हर समय अपनी कल्पना की अयोध्या में ही रहा करते थे। राजा दशरथ, उनकी तीनो रानियाँ, भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न, वशिष्ठ, विश्वामित्र सभी प्राचीन पुरुष उन्हें किसी न किसी चेहरे मे झलक उठते, पर राम जी का बिम्ब एक बार भी उनके सामने न आया। थे एकान्त मे बैठकर बार-बार रूप का ध्यान करते थे किन्तु राम न प्रकट हुए। उनकी जगह हनुमान जी का आकार उनके मनोलोक में मुस्कराता हुआ झलक उठता था। हनुमान जी की कल्पना उन्हें इतनी सिद्ध हो गई थी कि कभी कभी तो उन्हे लगता कि वे उनके सामने माँसल रूप में दृश्यमान हैं। राम को ध्यान में लाने का आग्रह दिनों दिन बढ़ता ही गया।
“राम बाम दिशि जानकी लखन दाहिनी ओर”
यह छवि वह अपने ध्यान में आँकते। मन का आग्रह बढ़ने पर उन्हें गोरे लखनलाल और गोरी सीता जी तो बहुत हद तक झलक जातीं थीं परन्तु उनके बीच में राम का श्यामल बिम्ब उभरते उभरते ही अदृश्य हो जाता था। राम के रूप के बजाय कभी कोई दीन हीन दाढ़ी वाले कंगले की छवि, कभी कोई राक्षसाकार चेहरा, कभी सूर्य, कभी नृत्य-मुद्रा में नारी, इसी तरह के अनचाहे बिम्व झलकते पर मनचाहे राम का ध्यान नहीं सधता था। तुलसीदास अपने मन में बहुत ही खिन्न रहने लगे- “हे प्रभु, आप ध्यान में भी अपने इस दास पर कृपा नही करते।तब क्या उसकी प्रत्यक्ष दर्शन की कामना अधूरी ही रह जाएगी जाएगी। यह दास कुछ नहीं चाहता,केवल आपके निकट रहने की भीख माँगता है।”
अपनी असफलता पर तुलसीदास एकान्त में आँसू बहाते थे। जल से विलग मछली के समान छटपटाते थे। बजरंगबली से लड़ते थे- “केसरीकिशोर, बड़े बड़े दरबारों के ऊँचे ओहदेदार मुँह लगे सेवक अपने स्वामियों से हम जैसे दीन दुखियों का भला कराने की कला दिखलाने में सफल हो जातें हैं।आप कहें और रघुकुल मुकुट मणि रामभद्र न मानें यह बात हर प्रकार से अविश्वसनीय है। आप मेरे लिए राम जी से क्यों नहीं कहते? आप मेरे ध्यान में आतें हैं, मुस्कराते हैं, अभयमुद्रा मे आश्वस्त भी करतें हैं पर राम जी से मेरे लिए कहते क्यों नहीं? हनुमान हठीले, इस अकिंचन ने अपने बचपन से आप ही की बाँह गही है फिर भी आप उसकी नहीं सुनते हैं।”
अपनी असफलता से तुलसीदास में एक जगह खिसियान और हीन भावना भी आने लगी, “मैं इतने संयम नियम से रहता हूँ किन्तु तब भी भगवान मुझसे प्रसन्न नहीं होते और काले हृदय वाले भक्त, विरक्त होने का ढोंग करने वाले मानवीय दृष्टि से हीनतम लोग इस समाज में श्रेष्ठ भक्त माने जाकर पूजा पाते हैं। उनमें से अनेक के विषय में यहाँ तक बखाना जाता है कि आप उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देते है। यह क्या इस दीन सेवक के प्रति आपका अन्याय नही है प्रभु? नहीं हैं। राम सो भलो कौन,मो सो कौन खोटो। मैं दु्र्मति अपने ही परम करुणामय स्वामी के लिए ऐसे कुटिल विचार रखता हूँ। जिन्होंने अहल्या के साथ न्याय किया, शबरी के अज्ञान को न देखकर उसके प्रेम को सराहा, लोक-कल्याण के लिए रावण और राक्षस कुल का वध किया, उस परम न्यायी और अनन्त करुणामय साहब को मैं अपने मोहवश अन्यायी कह रहा हूँ, यह क्या मेरा छोटा अपराध है? मुझे धिक्कार है, घिक्कार है, रामभद्र, मुझे क्षमा करो। जगदम्बा, राम वल्लभा,बच्चे की खोट को माँ क्षमा कर दिया करती है। मालिक के मन से तुम्हीं मेरे प्रति रोष को हटा सकती हो। मैया, जो सीघे साहब से कहने में आपको संकोच हो तो लखन जी से कह दीजिए। वह तो मुँह फट हैं, राम उन्हे चाहते भी अधिक हैं, वह कह देंगे तो मेरा भला हो जाएगा। कह दो माँ, कह दो।
भोली भावुकता मे बहते बहते तुलसी दास ऐसे आत्मविभोर हो जाते थे कि उनके लौकिक कृत्यों पर कभी कभी आँच आ जाया करती थी। उन्हें महन्त जी की डांट सुनने को मिलती।
क्रमशः
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