Tuesday, 4 July 2023

87

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
87

सहसा रत्ना ने हँसकर कहा -“आजकल तो आप राजा लाला जी से चेलों को अपनी रामकहानी सुनवा रहें हैं।”
“बेनीमाधव तुलसी-रत्नावली के जीवनवृत्त को जानने के लिए दीवाना है। फिर क्या करता? उसे राजा को सौंप दिया। वही तो तुम्हारे विवाह का प्रस्ताव लेकर आया था मेरे पास।” 
“बुरा किया”
“नही ! राम की प्रेमरूपी अटारी तक पहुँचने के लिए मुझे तुम्हारी प्रीति की सीढ़ियों पर चढ़ना ही था।”
“अच्छा, यदि मेरे बजाय मोहिनी से ही तुम्हारा विवाह हुआ होता तो? ”
“सीताराम का चाकर परकीया प्रेम का पुजारी कदापि नहीं हो सकता था।वह
स्‍त्री अपनी घुरी पर घूमती हुई मेरे जीवन-चक्र से आ टकराई थी।मेरे अंधे भोलेपन को अनुभव की पकी दृष्टि मिल गई। बस इतना ही मेरा उसका नाता हो सकता था।”
“और मेरा तुम्हारा नाता?”
तुलसी हँस पड़े, कहा- “मेरे तुम्हारे नाते को जग जानता है। हम तो चाखा प्रेमरस पत्नी के उपदेस।”
रत्नावली मान भरा हुआ मुँह सिकोड़कर बोली- “मुझे त्यागने के बाद तुम्हारा यह बखान खोखला है।”
तुलसी चकित मुद्रा में बोले- “सियाराम का पुजारी अपने मानस की नारी-शक्ति को भला कभी त्याग सकता है? तुम्हारे कारण मेरी लड़खड़ाती हुई राम भक्ति अगंद का पैर बन गई।”
रत्ना ने फिर मान से फूले स्वर में कहा-“मेरे सहज हठ को तोड़कर तुमने अपना हठ बढ़ाया ।”
“रत्ना, हम दोनों चक्‍की के दो पाटी की तरह हैं। इनके द्वन्द्व के बिना हम दोनों की लौकिक चेतना का गेहूं पिसकर भला भक्तिरूपी मैदा बन सकता था? तुम्हारे हठ के आगे मैं टूट जाता था। जब टूटता था तभी पछतावा होता था कि तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य भर गुणों के आगे इतना विवश क्यों हो जाता हूँ। तुम्हारी सुन्दरता ने मुझे इस जीवन में जैसा नाच नचाया वैता अपने बालपने के उस कठोर-चक्र में भी नहीं नाचा था।” 
रत्ना आत्मलीन दृष्टि से तुलसीदास को देख रही थी। तुलसीदास भी टकटकी बाँध कर उसे ही देख रहे थे। बोले-“तुम्हारी इस रस-डूबी दृष्टि ने तुम्हें छोड़ने के बाद भी मुझे वर्षों तक सताया है। जब राम में घ्यान लगाता था तो ये आँखें ही मुझे अपनी आकर्षण कील से डुबो देतीं थीं। कई बार जी चाहा कि घर लौट चलूँ और तुम्हारी इन आँखों की छाया तले अपना जीवन शेष कर दूँ।” “फिर चले क्यों नही आए?”
“मेरा द्वंद्व आरम्भ ही से काम वासना से था। मेरी अन्तर-बाह्य चेतना अपने भीतर वाले काम हठ से अपने राम हठ को श्रेष्ठ मानती थी। मैंने उसे ही जीतना चाहा था पर तुमनें मुझे ऐसा रिझाया भरमाया कि क्‍या कहूँ।”
“तुम्हारे रूप-गुण और पौरुष-पाडित्य पर में भी कुछ कम नहीं रीझी थी। यदि तुम आरम्भ में मेरे आगे इतने दीन न बने होते तो मैं ही तुम्हारे प्रति दीन बन जाती। मेरा हठ तो तुम्हारी दीनता ने जगाया।”
“सच है। मेरे जीवन की परिस्थितियों ने मुझे वह दीनता प्रदान की थी और तुम्हारे भीतर अभिजात्य दर्प था।जाननी हो रत्ना, तुम्हारे उस सहज दर्पयुक्त सौन्दर्य को अपनाने के लिए ही मैं अपने वैराग्य से विरक्त हुआ था। जो मुझमें नहीं था वह तुममें था।”
रत्नावली की आँखें लाज और प्रेम भार से झुक गईं। चेहरे सुहाग की ललाई दौड़ गई। हाथ से पैर के अँगूठे को मींजते हुए संकोच भरे स्वर में बोली- “घर में बातें होती थीं, कानों में पड़ता था कि तुम ब्याह करने को राजी नहीं होते हो। सुन-सुनकर मेरा हठ बढ़ता जाता था कि तुम्हें पाकर ही रहूँगी। तुम जानते हो, मैं नित्य हर-गौरी पूजन करने गाँव के मन्दिर में जाने लगी थी।” 
बाबा मुस्कराए, बोले-“और तुम जानती हो कि मैंने तुम्हें अपनी सखियों के साथ मन्दिर की ओर जाते हुए देखा था। तुम्हारी उस छवि पर ऐसा मुग्घ हुआ था कि राम-जानकी का पुष्प बाटिका में प्रथम मिलन वर्णन करते समय मैं वह मन्दिर और उसके पास वाले सरोवर तक को न भूल सका। तुम्हारी तो बात ही न्यारी थी।”
हल्के-हल्के गाने लगे-
संग सखी सब सुभग सयानी।
गावंहि गीत मनोहर सर समीप गिरिजा गृह सोहा। 
वरनि न जाइ देखि मनन मज्जन करि सर सखिन्ह समेता। 
गई मुदित मन मोद सलोना।”

रीझ भरी आँखों से पति को निहार कर रत्ना बोली-“अपना कलुष बिसार कर रीझना मैंने तुम्हीं से सीखा है। यदि नि:सर्ग से मुझे यह गुण मिला होता तो भला तुम्हें इस जीवन में छोड़ती।तुम्हारा बखाना मेरा दर्प ही मेरा शत्रु बना।”-कहते हुए रत्ना उदास हो गई।
तुलसीदास स्नेह से उसकी बाँह पर अपनी दाहिनी बाँह सहज भाव से रख- कर बोले- “जिस दर्प ने मुझे रामदास बनने का गौरव और तुम्हें भक्ति  का प्रसाद दिया, उसे अब बुरा न कहो रत्ना।पीड़ा के बिना शक्ति का जन्म नही होता। भूलो, भुलो वह काँटों भरी, धूल भरी राह। अब तो हम ठिकाने पर पहुँच चुकें हैं। आओ मेरी भक्ति, मेरी प्राण, हम तुम मिलकर अपने विवाह की मोद मंगलमयी छवि निहारें।” 
“अपने, कि सियाराम जी के ब्याह की?”
“अब अपना क्या है पगली, मैंने अपने सारे लौकिक अनुभव और अन्दर की रणानुभूतियाँ राम-जानकी को सौंपकर ही तुम्हें और अपने को पाया है।फेंक दो अपनी यह प्रश्नमाला। मेरा मन लहरा रहा हैं। देख, यह तेरा दिया हुआ उल्लास मेरी काया को पीड़ामुक्त कर रहा है। मेरा यह हाथ आज कितने दिनों के बाद सहज भाव से उठ रहा है। अरे, मैं ब्याह का बन्ना बन गया हूँ और तू बरनी बनी अपनी संग-सहेलियों से घिरी लाज की परतों में हर्ष-उल्लास का श्रृंगार चमकाए बैठी है।”

पटल पर बीते दृश्य मांसल होकर उभरने लगे। रत्नावली का रूपाकार क्रमशः क्षीण होते हुए ज्योतिबिन्दु बन गया और वह बिन्दु नादयुक्त था। बाबा अपनी पूरी काया में चैतन्य-स्फूर्ति अनुभव करने लगे। उठकर बैठ गए तभी बाहर मुर्ग ने बाँग दी। बाबा की वृद्ध काया में इस समय चैतन्य खेल रहा था। धीमे-धीमे ताली बजाते हुए वह मग मन से “रामलला नहछू” गाने लगे। उन्हें लगा कि उनके स्वर में एक नहीं दो स्वर लहरा रहें हैं, अपना और रत्ना का और वह दो मिलकर एक में लय हो गए है। राम विवाह के दृश्य आँखों के सामने चले जा रहें हैं। बाबा आत्मलीन हो गए हैं।
क्रमशः

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