महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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रामू ने द्वार खोला, दबे पाँव भीतर आया किन्तु बाबा को कुछ पता न था। वे गा रहे थे। जब उनकी भाव समाधि पूरी हुई तो रामू ने झुककर प्रणाम किया। अपने दोनों हाथ उत्साह से उसकी पीठ पर रखकर बाबा उल्लसित स्वर में बोले-“जियो बचवा, राम सदा तुम्हारे साथ रहें।” कहकर उन्होंने फिर उसकी पीठ को दोनों हाथों से थपथपाया।
“आज तो लगता है प्रभु जी कि आपके हाथों में पीड़ा नही है।”
रामू के कंधे का सहारा लेकर उठते हुए बोले- “आज मैं बिलकुल स्वस्थ हूँ रे। तेरी गुरूआइन सपने में आकर मुझे चंगा कर गई है।”
सबेरे अपने नियमों से निवृत्त होकर बाबा आज कई दिनों के बाद अपने अखाड़े के चबूतरे पर बठे थे। बाबा को स्वस्थ देख कर सभी लोग आनदमग्न थे। मंगलू बाबा की बाँह और पीठ को हाथ से छूकर बारीकी से देखते हुए बोला-“अरे बाबा, कल तो इत्ती गरिल्टियाँ भरी थीं और आज एक्कौ नही कमाल हुई गया साला?”
चट से जीभ मुँह से निकल आई और मंगलू के दोनों हाथ अपने कानों को पकड़ उठे। आस-पास सभी लोग हँसने लगे। झेंपकर अलग खड़े होते हुए मंगलू ने कहा-"क्या करें बाबा, गाली स्सा….”
बाबा चटपट हाथ बढ़ाकर विनोद मुद्रा में बोले - “निकली-निकली, रोक।”दुबारा हँसी का ठहाका मचा।
मंगलू ताव खा गया, बोला-“अच्छा, अब मैं भी जोग साधुँगा। पर बाबा सच्ची बताओ, कोई टोना टोटका किया था तुमने?”
बाबा गम्भीर हो गए, बोले- “हाँ भाई, किया तो था। हमने अपने मन की उस गाँठ को खोला जिसके कारण वैद्य जी की औषधि का प्रभाव पूरी तरह से नही होता था।तुम भी ध्यान करो मंगलू कि तुम्हारी यह गाली की आदत शुरू कहाँ से हुई। बात को अच्छी तरह से सोच लो। जब उसके मूल में पहुँच जाओगे तो उसे निर्मल करने की युक्ति और शक्ति भी तुम्हें मिल जाएगी।”
बात सुनकर राजा भगत ने अपने पास बैठे हुए संत वेनीमाधव से धीरे से कहा-“भैया की इसी बात में इनकी जीत का भेद छिपा है।”
एक व्यक्ति ने बड़े उत्साह से रविदत्त प्रसँग उठा दिया। वह कहने लगा-“बाबा, तुमने सुना, कल एक गवाँर ने रबीदत्त महाराज को बहुत मारा। ”
“राम-राम, बात क्या थी?”
मंगलू तैश में हाथ बढ़ाकर बोला- “अरे बात वही रही जो हमरे मन में रही। इस समय बनारस में ऐसा कौन है जो आपका भक्त न हो। सुना हमने भी रहा कि सा …..। इसके दुइ दाँत टूट गए। सुना, हाथ-पैरों में भी बड़ी चोट आई है।”
“राम-राम ” बाबा उदास हो गए। एक क्षण चुप रहकर फिर रामू से कहा-“चल बेटा, रविदत्त को देख आवें।”
बाबा ज्योंही चबूतरे से उठने का उपक्रम करने लगे त्योंही राजा ने आँखें तरेरी और तर्जनी उठाकर बोले- “चुपाय के बैठो भइया, अभी तुम इतने तगड़े नहीं हुए कि कही आ जा सको।हम तुम्हें नहीं जाने देंगे।”
तुलसी बोले- “उसे इस समय मेरी सहानुभूति की आवश्यकता है। नहीं तो उसका काशी में रहना दूभर कर दिया जाएगा।”
राजा ने फिर भी अपनी टेक न छोड़ी, कहा- "देखो भैया, जब तक तुम हमें पहुँचाय नही देओगे तब तक हम तुम्हें मरने नही देंगे।”
बाबा हँसते हुए चबूतरे से नीचे उतर आए, कहा- “भाई, जीना-मरना तो राम के हाथ है, पर इस समय मैं रविदत्त के यहाँ जाने से रुक नही सकता।बैर भाव यही सही, पर बेचारा मुझे हरदम याद तो किया ही करता है।” यह सुनकर राजा चुप हो गए।
आठ दस चेले चांटियों और भक्तों की भीड़ से घिरे हुए महात्मा तुलसीदास जी महाराज एक गली के बाजार में प्रवेश कर रहे है। लोग बाग चबूतरों और दूकानों से उतर उतरकर उनके चरण छूते हैं। बाबा सबको आशीर्वाद देते और राम- राम उच्चारते, परिचितों के हाल-चाल लेते हुए भीड़ के घेराव के कारण धीमे- धीमे ही बढ़ पा रहे थे। रविदत्त की गली में प्रवेश करते समय उनके पीछे एक छोटी-सी भीड़ इकट्ठी होकर चलने लगी थी। रविदत्त के द्वार पर पहुँच कर बाबा ने स्वयं ही आगे बढकर द्वार की कुण्डी खटखटाई। द्वार एक शोक मूर्ति युवती ने खोला। बाबा और भीड़ को देखते ही उसने चट से घूघँट डाला और दहलीज में चली गई। चौखट के भीतर बाबा के प्रवेश करते ही वह उनके चरणों में गिर गई।बाबा ने उसके मस्तक पर हाथ रखकर कहा- “अखण्ड सौभाग्यवती भव” उसी समय घर के भीतर एक बुढ़िया का चीत्कार भरा क्रंदन सुनाई दिया- “हय रोवबू । तू आामा के छांडिये कोशाय गेलो रे, अमार खोखा आमा शोनार बाछा।”
अखण्ड सौभाग्यवती का आशीर्वाद पाने वाली युवती ने एक बार सीधे होकर बाबा की ओर देखा और फिर पछाड़ खाकर गिर पड़ी।
“रामू, इस बेटी को सँभाल। भगत, कोई भीतर न आने पाए।” -कहकर बाबा ने घर मे प्रवेश किया।
सामने वाले दालान में रविदत्त धरती पर लेटा हुआ था। दो बूढ़े और एक बूढ़ी सिरहाने पर बैठे हुए थे। बाबा को देखकर बुढिया का क्रन्दन और बढ़ गया। बाबा रविदत्त के पास बैठकर उसकी मुँदी हुई एक आँख खोलकर देखने लगे, फिर दूसरी भी खोलकर देखी। फिर एक वृद्ध से कहा- “कौन कहता है कि जीव इस काया से निकल चुका है।रोना धोना बन्द करके राम- नाम कीर्त॑न करो । सब ठीक होगा, सब ठीक होगा।”
कहते हुए वे फिर दहलीज की ओर आए और ऊँचे स्वर में कहा- “राजा, लोगों को भीतर बुला लो, जितना नाँद गूँजेगा उतनी ही शीघ्र इसकी महामूर्च्छा भंग होगी।”
प० रविदत्त के फिर से जी उठने की घटना ने काशी में शोर मचा दिया। गली गली में बाबा की जय-जयकार होने लगी।एक दिन रविदत्त सपत्नीक दर्शन करने आया। दोनों ने साष्टांग प्रणाम किया। रविदत्त बोला-“आप हमें, क्षोमा कोर दीजिए बाबा। हाम जोगदोम्बा त्रिपुरशुन्दरी के आदेश का ओवमानना किया, उशका दोण्ड भोगा।हामारा आर्धागिनी भी हामको माना कोरता रहा, परन्तु हामको जोन्मजात क्रोध बहुत बेशी रहा महाराज। शाब लोग हामको आपका विरुद्ध भोड़का दिया। हामशे बेडो-वेड़ो आपराध हुआ महाराज।”
“क्रोध का कारण अपने में खोजो वत्स।तुम्हारे पिता तुम पर अकारण ही क्रुद्ध हुआ करते थे इसीलिए तुम्हारे भीतर विद्रोहवश तमस् भड़का। अब तुम्हारी यह अद्धांगिनी जैसा कहे वैसा करो।
क्रमशः
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