Tuesday, 4 July 2023

89

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
89

देखो, मैंने अपनी पत्नी का कहा माना तो मुझे राम मिल गए।”
रात हुई।स्वप्न में फिर रत्नावली आई। बाबा मुस्कराए, कहा- “बोलो मेरी मानसग्रंथि, आज तुम फिर क्यों आईं?”
“अभी तुम्हारे भीतर मेरे जीने के क्षण चुके नही हैं इसलिए आ गई किन्तु चाहती हूँ कि शीघ्र से शीघ्र वे चुक जाएँ जिससे कि तुम्हारे अंतिम क्षणो में तुम्हारे और राम-जानकी के बीच में और कोई भी बिम्ब शेष न रहे।”
बाबा गम्भीर हो गए, बोले- “खरी उपकारिणी हो। मुझे लगता है रत्ना, कि भक्ति और माया में कोई अन्तर नही है। भक्ति प्रेम है और माया प्रेम की परीक्षा। मैं तुम्हारी हर परीक्षा के लिए तैयार हूँ प्रिये।”
“तब हे मेरे सचेत अर्द्धाग, आप अपने बीते क्षणों की छटाँई बिनाई करे, आत्मालोचन रूपिणी अलकनंदा जब चेतना भागीरथी से मिलेगी तो आप ही आप राम रूप गंगा बन जाएँगी।” रत्नावली उनकी बाईं बाँह से सटकर ऐसे बैठ गई जैसे लता वृक्ष का झंगार-भरा आधार ले लेती है।बाबा का चेहरा शांत, किंतु अधिक कांतियुक्त हो गया था। वे गम्भीर भाव से मुस्कराए, कहा- “अच्छा, तो फिर, जब ते राम ब्याहि घर आए…”
“हाँ,जिस दिन मुझे विदा कर लाए थे और सुहागकक्ष में जब हम तुम पहली बार अकेले मे मिले थे। याद करो, प्रिय, वह रात श्रृंगारमूर्ति बन गई थी।”
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सुहागकक्ष मे नवयुवक तुलसी नई ब्याहुली का घूघँट उठाकर देख रहा है। रत्नावली के दिव्य सौन्दर्य ने उसकी दृष्टि स्तभित कर दी है। आँखें मूँदे, लज्जा में डूबी हुई रत्नावली अपने घूघँट को पति की चुटकी से खीचकर ढँकने के लिए उतावली हो उठी। तुलसी ने यह हाथ भी हाथ से दबोच लिया।रत्ना हाथों में फँसी चिड़ियाँ की तरह आखें मींचे, निस्पंद मुद्रा धारण किए बैठी थी। सजीवता उसकी लज्जा में थी, वरना यों लगता था कि किसी कुशल मूर्तिकार ने लाजवन्ती की मूर्ति गढ़कर बैठा दी हो। मुग्ध आँखों से एकटक उसे देखते हुए तुलसी अपना आपा बिसार बैठे थे।सामने की सौन्दर्य राशि फूलों से लदी बगिया की तरह मोहक थी। गोंटा-सितारे टंकी गुलाबी चूनर में रत्ना का मुख उन्हें आाकाश गंगा और तारों के बीच चन्द्रमा सा झलकता दिख रहा था। उन्हें लग रहा था जैसे उसके निश्चल चेहरे पर लाज सुमधुर स्वरों वाले पक्षियों के कलरव की तरह गूजँ रही हो।भावमग्न होकर वह कह उठे-“लाखों रतियो को लजाने वाली यह रूप रत्न राशि पाकर जब बड़े वैभवशाली भी क्षण भर में अपना आपा लुटाकर भिखारी हो सकते हैं तो मैं तो जनम का भिखारी हूँ। मेरे प्राण भी इतने मूल्यवान नहीं कि उन्हें इस छवि पर निछावर करके अपने-आपको संतोष दे पाऊँ।”
तुलसीदास की बात रत्ना के लज्जा भरे भावों को सचेत कर गई। पलके उठीं, पुतलियाँ चमकीं, मानों म्यान से तलवारें निकल पड़ीं हों, स्वर भी लाज से बेलाग था, वह बोली- “आपके प्राण मेरी सौभाग्य निधि हैं। उन्हें अब आप निर्मूल्य न कहें।” बात पूरी होते न होते आँखें कटोरियों-सी भर उठीं। इन आँसुओं ने मानों फिर से लाज जगा दी। पलकें रुकीं, आँखों की सीपियों से गालों पर मोती लुढ़क पड़े। वह लाज भरा सौन्दर्य तुलसीदास के लिए पहले से भी अधिक मोहक हो गया। 
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रत्नावली बाबा के पास बैठी उलाहना दे रही थी- “मुझे अपनी बातों से इतना-इतना रिझाया, फिर छोड़कर चले गये।”
रत्ना के मुख को देखकर बाबा मुस्कराए और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए स्निग्ध स्वर में कहा- “तुम्हे छोड़ा कहाँ प्रिये, रत्ना के प्रति मेरी रीझ ही तो राम-भक्ति बनी। वह चिरतरुणी और अनन्त सौन्दर्यमयी है, मैं अपनी राम रिझवार के लिए आज तक तुम्हारा ऋणी हूँ। किसी पत्नी ने पति को ऐसा सौभाग्यवान नहीं बनाया होगा।”
चंचल चपल नयनों से बाबा को निहार कर रत्ना बोली- “राजकुमारी विद्योत्तमा ने मूर्ख कालिदास को कवि कुल गुरू बना दिया, किन्तु तुम जो कुछ भी हो वह स्वेच्छा से बने हो। मैं बेचारी अपनी मूढ़ अंहता के आघातों के सिवा और तुम्हें क्या दे सकी? ”
“तुम्हारा वह अहंकार मेरी चेतना-जड़ता को तोड़ने वाला हथौड़ा था। याद करो प्रिये, तुम्हीं ने मुझे मूल रूप से राम काव्य लिखने की प्रेरणा भी दी थी।”
रत्ना मुस्कराई, कहा- “याद हे प्रिय, किन्तु मैं तो मात्र काव्य रचना की प्रेरणा ही दे सकती थी। यह रामचरितमानस तुम्हारी अन्तःप्रेरणा का फल है।”
“वह भी तो तुम्हीं हो रत्ना। सच कहता हूँ कि जब गृहस्थ था तब तुम रत्नावली थीं और जब विरक्त हुआ तब तुम्हीं मेरी राम रत्नावली बन गईं।”
“यह तुम्हारी महानता है, जो ऐसा कहते हो। मैं अपने दोष जानती हूँ, मुझे याद है जब मुसलमान धर्मियों के मेहंदी अवतार की बहस छिड़ने वाले दिन मैंने तुम्हें गंगेश्वर भैया का पक्ष लेकर पहली बार मानसिक आघात पहुचाया था।”
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तुलसीदास अपनी बैठक में विराजमान हैं। घुंघराले बालों और दाढ़ी मूँछों भरा उनका गौर मुख ऐसा फबता है कि मानों कोई राजा बैठा हो। माथे पर वैष्णवी तिलक, गले में सोने की जंजीर और तुलसी की माला सुशोभित हैं। दोनों हाथों की उँगलियाँ नगे-जड़ी अँगूठियों से चमक रही हैं। वे रेशमी धोती, रेशमी बगलबन्दी और रेशमी चादर ओढ़े अपनी गद्दी पर विराजमान हैं। उनके पास दाहिनी ओर तख्ती और मिट्टी की बत्ती रखी हुई है। एक पतली सी बही में हाथ से लिखा हुआ पंचाग भी पास ही में रखा हुआ है। कमरे में चारों ओर दीवालों पर बनी टाँडों पर ग्रन्थों के रंग बिंरगे बस्ते ही बस्ते दिखलाई देते हैं। कमरे में बिछी चादँनी पर चार लोग पण्डित तुलसीदास के सामने विराजमान हैं। उनमें दो व्यक्ति अपनी पोशाक से मुसलमान नजर आतें हैं। उनके अतिरिक्त राजा भगत और रत्नावली के चचेरे भाई गंगेश्वर बैठे हुए हैं। एक मुसलमान सज्जन तुलसीदास से कह रहे हैं- “हमारे नवाब साहब ने पुछवाया है कि हमारे मजहब में इन दिनों जो मेहदी की आमद-आामद का शोर है वह क्या सच साबित होगा? देखिए, ऐसा प्रश्न निकालिएगा पण्डित जी जिसमें कोई शक न हो।”
तुलसीदास ने अपनी लिखने की तख्ती और बत्ती उठाते हुए कहा- “किसी एक फूल का नाम लीजिए।”
“गेंदा”
पट्टी पर कुछ अंक लिखते हुए तुलसी दास बोले -“आपको भी बेफसल फूल ही याद आया? खैर।”
क्रमशः

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