महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
90
फिर कुछ गणना करके कहा- “मिर्जा जी आपके प्रश्न का उत्तर बडा अटपटा है।ऐसी कोई शक्ति तो आ सकती है जो धर्म- ढोंगियों को दण्ड दें, पर किसी दिव्य अवतारी पुरुष के आने की बात मेरी समझ में नहीं आती।”
मिर्जा जी बोले- “एक बार और बारीकी से विचार कर लीजिए पण्डित जी। तलवार की धार पर चलने जैसा मसला है। हमारे हुजूर नवाब साहब मखदूस उल् मुल्क मुल्ला सुल्तानपुरी के हिमायती बनें या मौलाना शेख अब्दुल्तवी के? ”
तुलसीदास ने फिर गणना पर गौर करके कहा- “इन दोनों में से किसी के चक्कर में पड़ना उचित नहीं। यह दोनों ही डूबती नावें हैं।” मिर्जा जी ने चकित दृष्टि से तुलसीदास को देखकर फिर अपने साथी से भेद भरी दृष्टि मिलाई।मिर्जा जी के साथ वाले व्यक्ति अब्दुस्समद खां ने गम्भीर स्वर में पूछा- “और शेख मुबारक? तनिक इस नाम पर भी गौर कीजिए।”
तुलसीदास ने शेख मुबारक नाम के अक्षर गिनकर कुछ विचार किया और कहा- “यह व्यक्ति तपस्वी है। बड़ा अभागा और साथ ही बड़ा सौभाग्यशाली भी है।” खां साहब चकित दृष्टि से तुलसी दास को देखने लगे, फिर कहा-“आपकी शुरू की दो बातें बिलकुल सच है।शेख साहब बड़े आलिम और तपस्वी है, पर अभागे भी हैं।मगर इनके नसीब के चमकने वाली बात पर मुझे सन्देह है” तुलसीदास ने कुछ गौर करके कहा-“सन्देह की गुंजाइश नहीं। घटा टोप बादलों के बीच छिपा सूर्य भी अन्त में चमक ही उठता है।” सुनकर मिर्जा जी और अब्दुस्ससद खां के चेहरे चमक उठे, मिर्जा जी ने झटपट अपना दाहिना हाथ बढ़ाया। उधर खां साहव के कलेजे में भी वही जोश उमढ़ा, खुशी में एक आँख और होंठ दबाकर हाथ मिलाते हुए कहा - “मैंने क्या कहा था मिर्जा जी?”
मिर्जा जी चटपट तुलसीदास के आगे सोने की एक मोहर रखकर बोले- “पंडज्जी, अब आप हमारी तरफ से कोइ ऐसी पूजा-पाठ कर दीजिए कि जिससे हुजूर नवाब साहब यह बात मान जायें।”
गंगेश्वर ने सामने सोना देखा तो उनकी आँखों में ईर्ष्या की कणियाँ चमक उठी।उनका अधीर लोभ चेहरे पर ही नहीं उनकी काया में भी चमक उठा। बैठे ही बैठे वे आगे बढ़ गए, मानों कई दिनों के भूखे ने भोजन देखा हो। फिर एक नई सूझ से चमक कर कहा- “मिर्जा जी पहले यह तो तय हो जाय कि शास्त्री जी ने आपके प्रश्न का ठीक उत्तर दिया है या नही।” पण्डित तुलसीदास शास्त्री का चेहरा क्रोध से तमक उठा।मिर्जा जी और अव्दुस्समद खां पलटकर गंगेश्वर को देखने लगे। चादँनी पर रखी हुई मोहर लपककर उठाते हुए मिर्जा जी ने गंगेश्वर से पूछा- “आपका क्या ख्याल है?
“मेरा ख्याल है कि प्रश्नलग्न पृष्ठोदय सिंह की है इसलिए आपका काम विफल होगा।”
तुलसीदास ने गम्भीर स्वर से कहा-“गंगेश्वर, सावधानी से विचार करो।लग्न कर्क है और चंद्रमा तथा वृहस्पति इस समय मेष में हैं। मेरा वचन झूठा नही हो सकता।”
“मैं आपकी बात से सहमत नहीं हो सकता शास्त्री जी।”
यह सुनते ही राजा भड़क उठे, झिड़क कर कहा- “पाठक जी पहले अपने विवेक का मीन मेख मिटाओ, फिर भैया की चूक बताना। ये तुमसे ज्यादा पढ़े हैं।”
मिर्जा जी बोले- "हाँ, यही हमने भी सुना है। आजकल चारों तरफ इन्हीं का नाम फैल रहा है। हम दीनबन्धु महाराज के पास जाते थे,पर अब तो वे भक्ति साधते हैं और ये उनके दामाद हैं।
गंगेश्वर ने उनकी बात काटकर तीखे स्वर में कहा- “पर मै उनका सगा भतीजा हूँ। उनका सारा कामकाज भी अब मै ही देखता हूँ। यह भले ही हमारे वंश की इतनी सारी पोथियाँ पा गए हो पर तन्त्र-मन्त्र हमें ही सिद्ध है।”
गंगेश्वर का यह कमीनापन राजा भगत को बहुत खला, वे बोले- “मिर्जा जी, हमारे तुलसी भैया काशी जी में पढ़के आए हैं।”
राजा भगत अभी कुछ और भी कहने के ताव में थे कि बीच ही में तुलसीदास बोल उठे- “मिर्जा जी, आप गंगेश्वर जी से ही काम कराएँ। वे अच्छे तांत्रिक हैं।”
अब्दुस्समद बोले- “यह तो ठीक है महाराज, मगर मैं मुश्किल में फंस गया हूँ। यह तय होना ही चाहिए कि आप दोनों में किसकी बात ठीक है।”
तुलसीदास बोले- “अब ठीक यही है खां साहब, कि गंगेश्वर से काम करवाइए।प्रश्न की जो लग्न यह मानते है यदि वह सही होगी तो आपको इनसे काम कराने का लाभ भी अवश्य मिलेगा।” कहकर तुलसीदास तुरन्त अपने आसन से उठ पड़े और भीतर चले गए। उनके उठते ही राजा भगत भी बाहर चले गए।
गंगेश्वर उनके ग्राहकों को जिस समय तुलसीदास की बैठक में पटा रहे थे, उस समय तुलसीदास रसोई में काम करती हुई रत्नावली के पास आए। दालान के खम्मे पर एक हाथ रखते हुए वे बोले-“सुनती हो, गंगेश्वर से कह देना कि अब वह मेरे यहाँ न आया करे।”
रत्ना ने चौंककर कहा-"क्यों ?”
“वह भले ही तुम्हारा भाई हो, पर मैं अपने घर में बैठकर उस मूर्ख के द्वारा किया जाने वाला अपना अपमान भविष्य में नहीं सहूगाँ।”
“आपका क्या अपमान किया मेरे भइया ने?”
“रत्नो, मैं जा रहा हूँ। गंगेश्वर ने आँगन में प्रवेश करते हुए जोर से कहा- “अरे कहाँ, भइया? रसोई तैयार है। जीम के जाओ।”
“नही, वह ऐसा है कि मेरे हाथ में थोड़ा काम आ गया है। मुझे तुरन्त जाना है। नवाबी नाव में चला जाऊंगा।”
रत्वावली पल्ले से हाथ पोंछती हुई बाहर आई, उसने कहा- “भईया, तुमने इनका क्या अपमान किया?”
गंगेश्वर दोनों से नजरे कतराकर ऊपर की ओर देखते हुए लापरवाही से बोला-“मैने किसी का अपमान नही किया। बात पापी पेट की है। जब से काका अपना काम बन्द कर दिए हैं तब से मेरी समस्या यह है कि मैं अपना पेट कैसे भरूँ।"
“यदि यही बात थी तो मुझसे अलग ले जाकर कह सकते थे। एक झूठा टंटा उठाकर तुमने मेरे ही घर में मेरा अपमान करने का साहस क्यों किया?”
तुलसीदास की इस तेहे भरी बात पर नाक सिकोड़कर लापरवाही से भर कर अपना सर झटकते हुए गंगेश्वर ने कहा- “मेरी समझ में जो आया सो किया, आगे भी जो आएगा करूँगा।”
“अब तुम कभी भी मेरे घर की देहली नहीं चढ़ सकोगे, गंगेश्वर।”
रत्नावली के चेहरे पर तुरन्त ही तमक आ गई।
क्रमशः
No comments:
Post a Comment