महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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पड़ती हुई पानी की धार में अपने पैर रगड़ते हुए गंगेश्वर ने व्यंग भरे स्वर में कहा- “हाँ, साक्षात भोलानाथ हैं। इधर कहा जिजमान तुम्हारा है और फिर उधर भूलकर उसे अपना बना लाए। तेरा पति ठगशास्त्र में भी पूरा पारंगत है।”
रत्ना को भाई की बात अच्छी न लगी, स्वर सतेज हुआ, कहा- आप बड़े हैं भइया, किसी को व्यर्थ ही दोष देना आपको शोभा नही देता। मिर्जा जी को आप प्रभावित न कर सके तो फिर वही इन्हे घेरने के लिए आए। इसमे भला इनका क्या दोष है?”
गंगेश्वर को उत्तर न सूझा तो जोर-जोर से गला गड़गडाकर कुल्ला करने लगे। रत्ना कहे जा रही थी- “बप्पा ने आपको विद्या देने में कोई कसर नही रक्खी। पहले मुझसे जलते थे, अब इनसे जलते हैं।”
अगौछें से हाथ मुँह और पैर पोंछते हुए गंगेश्वर ने सहसा स्वर को विनम्र बनाकर कहा- “मैं न तुमसे ईर्ष्या करता हूँ और न शास्त्री जी से। पर पापी पेट तो मेरे साथ भी है न। छः बच्चे, फिर दो हम लोग और उसके ऊपर काका का भरण पोषण भी।”
रत्ना फिर भड़की -“बप्पा खाते ही क्या हैं अपनी दो समय की खिचड़ी के लिए उनके पास राम जी की कृपा से अब भी बहुत कुछ है। मैं आज ही उन्हें कहला दूगीं कि तुम्हारे यहाँ से कुछ भी न मंगाया करें। मेरे बप्पा जैसा मनुष्य आज के समय में ढूँढे़ से भी नही दिखाई देता है और तुम….”
“मैं कुछ भी नहीं कहता। तुम मेरी बातों का गलत अर्थ न निकालो रत्नू। मिर्जा जी और खां साहब दोनों ही मुझ पर अकारण ही बिगड़ पड़े। कहने लगे, आपको कुछ आता जाता नही हैं। हम आपसे काम नही कराएँगे। हमारे दाम हमको फेर दीजिए। हम उस पार शास्त्री जी के पास ही जाएँगे।”
“पर तुमने उन्हें दाम फेरे कहाँ? रोने तो लगे थे उनके सामने | पण्डित होकर मूर्खो के समान पैसों के लिए रोना भला शोभा देता है।तुम्हारे स्वभाव में स्थिरता नही है भइया, बुरा न मानना। विवेक बुद्धि से काम लेना तो तुम जानते ही नहीं हो। तुम स्वयं ही अपना दुर्भाग्य हो। उस दिन जब यहाँ मिर्जा जी उन्हे बाँदा ले जाने के लिए आए तो मैंने उनकी सारी बातें यहाँ आड़ से सुनी थीं।यह जा थोड़े ही रहे थे, मैंने ही बुलाकर कहा कि चले जाइए, इतना आग्रह करके आती हुई लक्ष्मी को छोड़ना उचित नहीं ।तब ये गए हैं बाँदा।”
गंगेश्वर चौकी पर बैठकर कान दबाए चुपचाप सुनते रहे। रत्ना ने बात पूरी करके बाँहों में लेटे अपने पुत्र को देखा। वह चकित दृष्टि से माँ को निहार रहा था। बेटे से आँखें मिलाकर माँ का मन हरखा। गंगेश्वर उदास स्वर में कहने लगे- “हाँ ठीक है। पर मैं क्या करूँ? अभागे का कहीं भी निभाव नहीं। हमारे लिए तो अब यही एक मार्ग रह गया है कि एक दिन आटे में माहुर घोल के उसकी रोटियाँ सब बाल बच्चों को खिला दें और हम पति-पत्नी भिखारी बनकर निकल जाएँ। तब शास्त्री जी महाराज हमारे यजमानों को ही नहीं बल्कि अपनी ससुराल की हवेली को भी हथिया के तुम्हारे साथ बैठकर मुछों पर ताव दिया करेगें।”
तुलसीदास दबे पाँव आकर दालान में प्रवेश करते है। गंगेश्वर को देखकर कहते है- “मुझे ससुराल की हवेली का मोह नहीं गंगेश्वर। ससुर की दी हुई वहाँ की एक रत्नावली ही मेरे लिए यथेष्ट है। मैनें तुम्हारी सारी बातें दहलीज में खड़े होकर सुन लीं हैं। इससे अधिक अच्छा होगा कि मैं रत्नावली और तारापति को लेकर इस क्षेत्र से कहीं और चला जाऊँ।”
पति के कथन को रत्नावली ने किसी हद तक समर्थन की दृष्टि से देखा।गंगेश्वर पहले तो चूहे की तरह से दुबके पर दूसरे ही क्षण सिंह की तरह दहाड़कर बोले-“यह जो सारे ग्रंथ आप हमारे यहाँ से उठा लाए हैं वह हमारे हवाले कर दीजिए। मैं चला जाऊँगा।”
“ग्रन्थ बप्पा ने मुझे दिए हैं। मैं नहीं लाया।”
“पर वे हमारी पैतृक सम्पत्ति हैं। मेरे पिता छोटी आयु में मर गए थे। पुस्तकों का बँटवारा नही हुआ था।”
बात काटकर रत्नावली तेजी से बोली-“इनके आगे बोलो तो बोलो पर मेरे आगे भी झूठ बोल गये भैया? मेरे बप्पा को बेईमान बताते हो? क्या यह तुम्हारी पैतृक सम्पत्ति हैं?
“तारीगाँव के वासुदेव काका के हैं। पर उससे क्या होता है। (तुलसीदास
की ओर देखकर) न्यायरत्न वासुदेव त्रिपाठी निःसन्तान थे इसलिए अपने ग्रन्थ हमारे यहाँ रखवा गए। इनका बँटवारा होना चाहिए कि नही?”
“कैसा बँटवारा?”- रत्नावली बच्चे को सीधा करके गोद में लेती हुई तेज
पड़ी। दो डग आगे बढ़कर फिर कहा-“किसे दे गए थे त्रिपाठी जी?”
“हमारे कक्का को जिनका उत्तराधिकारी मैं हूँ?”
“झूठे कहीं के, मुझे दे गए थे। बप्पा को जो यों मिथ्या दोष लगाओगे तो बताए देती हूँ मुझसे बुरा और कोई न होगा। (पति की ओर देखकर ) बप्पा इतने सतर्क रहे है कि पैतृक सम्पत्ति का एक लोटा तक मुझे नहीं दिया। पैतृक सम्पत्ति का अपना भाग भी उन्होनें इन्हें ही दे दिया।”
“और काकी के गहने, जो तुम्हे मिले?”
सुनकर तुलसी पंडित की त्यौरियाँ भी चढ़ गईं, वे बोले- “गंगेश्वर, अब तुम मेरे हाथों पिटकर ही मानोगे। अपनी माता के आभूषण यह न पाती तो कौन पाता?”
“अरे यह निर्लज्ज हैं। अपने झूठ का झंडा ऊँचा किए रखना इनकी जन्म की आदत है। बचपन में इतनी-इतनी मार खाकर भी न सुधरे तो अब क्या सुघरेंगे, और मुझसे तो इन्हें ऐसा बैर है कि पाएँ तो कच्चा ही चबा जाएँ।अब तक तुमने ही कहा था अब मैं भी कहती हूँ कि भविष्य में गंगे भैया मेरे घर की देहरी फिर कभी न चढ़ें। पक गई हुँ इनके कुबोलों से। यह निर्लज्ज, मूढ़ और कुल कलंकी है।”
“जाने दो रत्ना तुम्हारे बड़े…..”
“बड़े है तो अपना वड़प्पन दिखाएँ। मैं अब इन्हें सहन नही करूँगी।” कह कर रत्नावली अपने बच्चे के साथ तेजी से ऊपर चली गई।
गंगेशवर ने फिर नया पलटा लिया,दु.खी स्वर और दार्शनिक मुद्रा धारण करके कहने लगे- “हाँ, अभागे को भला कौन सौभाग्यवती या सौभाग्यवान सहन करेगा। पण्डिता रत्नावली जी घर बैठकर यजमानों के लिए जन्म पत्रिकाएँ बनाएँगी, पण्डित तुलसीदास जी दरबारों, साहूकारों में कथा बाचेगें, जन्म-पत्रिकाएँ विचारेगें।
क्रमशः
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