महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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लक्ष्मी चार हाथों से इनका ही घर भरेंगीं। हम जैसे टुटपुँजिये की गुजर बसर भला फिर क्योंकर हो सकती है। मेरे जैसे कुलीन स्वाभिमानी अभागे के लिए सपरिवार माहुर खाकर मर जाने के सिवा और कोई उपाय ही नही रहा। (नि:श्वास, फिर सहसा स्वर ऊँचा करके) अच्छा रत्नू, तो फिर यह निर्लज्ज कुलांगार अब तुमसे विदा लेता है। भविष्य में तुम इसका मुख अब कभी नही देख पाओगी। आशीर्वाद?”- कहते हुए गंगेश्वर चले गए।
भोजनोपरान्त विश्राम कक्ष में पति-पत्नी पान चबाते हुए आमने सामने बैठे थे।तारापति पिता के पास ही सो रहा था। तकिये के सहारे अधलेटे पिता का दाहिना हाथ पोले पोले बड़े स्नेह से अपने बेटे के हाथ पर फिर रहा था और आँखें उसकी माँ के मुखचन्द्र की चकोरी हो रही थीं।
रत्नावली ने मुस्कराकर कहा-“ऐसे घूर कर क्यों देख रहे हो मुझे? इन पाँच दिनों में क्या कोई विशेष परिवर्तंन आ गया है मुझमें?”
“हाँ तुम, मुझे पहले से अधिक सुन्दर और प्रिय लग रही हो।”
“सुन्दरता मेरे रूप में है या तुम्हारे लोभ में?”
“पहले तुम बताओ, चन्द्रमा और चादँनी में कौन सुन्दर है?”'
सौभाग्यवत्ती रत्नावली ने किचित इतराते हुए कहा- “तुम्हीं जानो, मेरे लिए यह प्रश्न अविचारणीय है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरा चन्द्र और चादँनी अविभाज्य है। (बेटे की ओर देखकर) चादँनी को देखती हूँ तो चन्द्र को बरबस ही देखने का लोभ होता है। इसी तरह चन्द्र को देखकर चादँनी का।”
“तब रूप और लोभ में अन्तर ही क्या रह गया प्रिये? सुन्दरता दोनों छोरों तक एक सी व्याप्त है। तुम्हे मनन की बात बतलाऊँ, कई वर्ष पहले एक बार मन में यह प्रश्न जागा कि राम जी अधिक सुन्दर है या उनके प्रति मेरी भक्ति।”
“फिर क्या निर्णय किया?”
“वही जो अभी तुमनें कहा। यह दोनों ही अभिन्न-अविभाज्य हैं। रूप प्रेम है और लोभ उसे पाने का मार्ग। मार्ग न हो तो मनुष्य मंजिल तक कैसे पहुचे? ”
“माने लो, कल को मेरा यह रूप शव बनकर……..”
तुलसी झपटकर आगे झुके और अपनी बाईं हथेली रत्ना के मुख पर रख दी, कहा- “फिर कभी ऐसी बात मुँह से न निकालना रतन। मेरा कलेजा धसँकने लगता है।”
सुनकर रत्ना की आखों से प्रेस की चमक और फिर इतराहट आई। पति का हाथ अपने मुँह से हटाकर मुस्कराती हुई वह बोली-“मै अभी मरी नहीं जा रही हूँ कविराज, केवल एक यथार्थ,सता का निरूपण भर किया था मैंने। मनुष्य का रूप, प्रकृति की शोभा सब नश्वर है। फिर ऐसे आधार पर ठेका देने से लाभ ही क्या जो विश्वास का ठोसपन न लिए हुए हो? ”
तुलसीदास गंभीर हो गए, सीधे तनकर बैठ गए। क्षण भर मौन रहकर फिर कहा - “सच हैं, टिकने वाला तो सियाराम रूप ही हैं। सच हैं वह नर नारी के व्यक्त-प्रव्यक्त रूप का अनन्त प्रतीक है। उसी का लोभ अनन्त और अजर है।”
"तो उन्हीं के प्रति अपना लोभ बढ़ाओ। मुझे घूर घूर कर क्यों सताते हो? ”
पत्नी ने अपने मानाभिनय से गम्भीरता को जो रस भरा मोड़ दिया वह तुलसी दास के भोले मन को छलने में सहज सफल हुआ। प्रसन्नता उनके चेहरे की कान्ति बन गई, बोले- “तुम बडी नटखट हो। सूत्रधार की भाँति मुझ कठपुतली को अपनी अँगुलियों पर मनमाने ढंग से नचाती हो।” कहकर उन्होंने रत्ना का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लिया।
“यह क्या करते हो, हटो छोड़ो ” रत्ना के दबे स्वर वाले वाक्य पर अपनी बात आरोपित करते हुए तुलसीदास कहने लगे- “पहले अपती बात का उत्तर सुनो। तुम्हारा आकर्षण ही मेरा राम मार्ग है। तुम्हें और इस आँखों के तारे को श्री सीताराम ने ही अपने प्रति मेरी अनुरक्ति बढ़ाने के लिए कृपा करके मुझे दिया है तुम दोनों मिलकर ऐसा दर्पण बन जाते हो जिसमे मुझे रामरूप की प्रति छवि दिखलाई देती है।”
बाँयें हाथ से पत्नी की बाँह दबाते और दाहिना हाथ तारापति के सिर पर फेरते हुए तुलसीदास भावमग्न हो गए।एक क्षण रुककर फिर कहने लगे- “एक बार बचपन में राजा जी की बगिया से ढेर सारे सुन्दर फूल बटोरकर मैंने उनके सहारे राम जी की सुन्दरता देखना चाहा था। अब वही भाव सौन्दर्य अधिक मुखर होकर मुझे अपनी इस सोने-सी गृहस्थी में देखने को मिल रहा है। तुमसे सच कहता हूँ रत्नू, अब तो बाहर भीतर कहीं जाता हूँ तो तुम्हारे बिना मेरा मन उचट-उचट जाता है। तुम दोनों को छोड़कर मैं अब जीवित नही रह सकता।”
“ऐसा न कहो। तुम्हारा जीवन मुझसे श्रेष्ठ है। तारा हमारी आँखों का तारा है। प्राणों का प्राण है। विवाह से पहले सोचती थी कि पति डाकू होता है जो कन्या को उसके माँ बाप से छीनकर पराये घर की बन्दिनी बना देता है और अब लगता है कि एक नारी की सर्वश्रेष्ठ आकांक्षा यही होती है।तुम दोनों बने रहो। बस, मुझे और कुछ न चाहिए।”
तुलसी ने भी मुस्कराकर यही कहा- “तुम दोनों बने रहो, बस मुझे भी कुछ न चाहिए।”
चार आँखें आपस में अटककर मुस्करा उठी। दो चेहरे खिल गए, फिर एकाएक रत्ना के चेहरे पर कठोरता आई, कहने लगी- “गंगे भैया मेरा यह सुख फूटी आँखों नहीं देख पाते। मुझसे तो वह ऐसा जलते हैं कि पूछो मत।”
“वह महामूर्ख और ईर्प्यालु है, पर क्या करे बेचारा, पेट पालने की समस्या सभी जीवधारियों के आगे होती है। मेरे यहाँ आ जाने से एक बेचारे गंगेश्वर ही क्या कई गाँवों के ज्योतिषी मन्द पड़ गए हैं। उनकी ईर्ष्या स्वाभाविक है किन्तु मैं भी क्या करूँ? तुम्हीं बताओ, मेरी भी तो गृहस्थी है।”
“ऊंह, ऐसों की चिन्ता छोड़ो। गंगे भइया की कुण्डली में पागल होना लिखा है। एक बार मैंने बप्पा को बतलाया तो वह बोले कि उसके आगे कभी न कहना।”
“पागल तो वह हो चला है। महत्ता न पाने के कारण उसमे इतनी हीनता आ गई है कि अब तो इतना अल्ल-बल्ल बकने लगा है…।”
“क्या कोई बात तुमने सुनी है?”
“वह पगला अब तो यह कहता डोलता है कि मैं ज्योतिषाचार्य पण्डित दीनबन्धु पाठक का पुत्र हूँ। उन्होंने मेरी माता से अनैतिक संबंध स्थापित किया था।”
रत्ना ने थर्थराकर अपने कान बन्द कर लिए। मुख क्रोध और लाज से लाल हो गया।
क्रमशः
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