महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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कहने लगी- “बस बस, बप्पा के समान महान संयमी और तपस्वी व्यक्ति के लिए ऐसी अनर्गल बात मुख से निकालने वाले को मैं कभी क्षमा न कर पाऊँगी। कब्भी नहीं।” आवेश की तेजी में उसकी आँखें छलछला उठीं।प्रेम से पत्नी की बाँह दबाते हुए तुलसी ने शान्त स्वर में कहा- “पागल की बात का विचार करना व्यर्थ है प्रिये ! सारी दुनिया बप्पा को भी जानती है और गंगेश्वर को भी।”
“पर वष्पा यदि यह सुन लें तो उनकी आत्मा को कितना कष्ट पहुँचेगा।बेचारों के अपना पुत्र नहीं था इसलिए बड़ी लगन से उन्होंने इन्हे पढाया लिखाया। मैं तो तुमसे सच कहती हूँ कि बिलकुल घेलुए में पढ़ गईं। बप्पा इन्हें पढ़ाते थे तो मैं भी बैठ जाती थी। यह न पढ़े और मैं पढ़ गई। तुम सच्ची मानना, अच्छी शिष्या होने के नाते ही उन्होंने बाद में मेरी शिक्षा के संबंध मे विशेष रुचि लेना आरंभ किया था। गंगे भैया यदि तनिक भी उत्साह दिखलाते तो वे उन्हें ही अधिक रुचि से सिखलाते। मैं जानती हूँ, उन्हें अपनी चौदह पीढ़ियों की गद्दी सँभालने की कितनी चिन्ता थी।”
तुलसी बोले- “मैं समझता हूँ । विवाह का प्रस्ताव करते हुए उन्होंने मुझसे भी यही कहा था। वे चाहते थे कि मैं उन्हीं के घर पर ही रहूँ।”
“वे गंगे भइया से मन ही मन में ऊब चुके थे। हमारे कक्का ने अपनी दुष्चरित्रता के कारण हमारे घर का बहुत पैसा वर्बाद किया। यह नई कमाई तो सब मेरे बप्पा की ही है। फिर भी वे कहा करते थे कि मैं यहीं गाँव में नया घर बनवा लूग़ाँ और शेष पैतृक, सम्पत्ति गंगे को सौंपकर उसे अपने से अलग कर दूगाँ। कहते थे कि मैं अपने जीते जी अपने होने वाले जामाता को अपनी गद्दी पर बिठला जाऊँगा।”
“स्वाभिमानवश मैं भले ही उस ग्राम में न रहा, तो भी यह मानता हूँ कि इस क्षेत्र के बड़े धनी लोगों में मेरी पहुँच का कारण, मेरी कथा वाचकता के आधार वप्पा भी हैं। वे अब भी सबसे यही कहते हैं कि तुलसी दास के पास ही जायें।”
रत्नावली सहसा तुलसीदास का अपने कंधे पर धरा हाथ झटककर उठ खड़ी हुई, रूखे दु:ख भरे स्वर में कहा- "मैं अभागी यदि पुत्र होती, तो उन्हें कभी अपनी गद्दी की चिन्ता न होती। अब कुछ भी कहा जाय, ज्योतिष विद्या मातेण्ड पाठकों की गद्दी उजड़ गई।” कहकर रत्नावली तेजी से कमरे के बाहर निकल कर नीचे की सीढ़ियाँ उतरने लगी।
तुलसीदास हक्का बक्का रह गए।पिछले दो वर्षों के अपने वैवाहिक जीवन में उन्होंने रत्नावली को कई बार इस हीन भावना से ग्रस्त होते हुए देखा है। जब यह हीनता उसे सताती है तो कभी-कभी वह मन ही मन में उग्र भी हो उठते हैं। अपनी पत्नी के रूप और गुणों पर प्राण प्रण से मुग्ध होकर भी तुलसीदास रत्ना के स्वभाव की इस तिक्तता से कहीं पर बहुत खिन्न भी हैं। इस हीनभाव के जागने पर रत्नावली कभी कभी उनके प्रति ईर्प्यालु भी हो जाती है। तुलसीदास के अन्त: सौन्दर्य बोघ को इससे घक्का लगता है।उस धवके से अपने-आपको बचाने के लिए उनकी चेतना भीतर ही भीतर विकल हो उठती है। यथार्थ बाहर और भीतर दो स्तरो पर अपने आपको समझने के लिए मचल उठता है। एक मन कहता है कि भगवान के प्रति रखा जानेवाला अनुराग ही टिकाऊ होता है किन्तु दूसरी ओर वे रत्ना और अब तारापति के प्रति अपना आकर्षण प्रतिपल बढ़ाने से नहीं चूकते। रत्ना का यह दर्प भी उन्हे पूर्ण चन्द्र के कलंक-सा ही सुन्दर लगता है।
रात में उन्होने अपनी पत्नी से कहा-“सुनो, मैंने यह निश्चय किया है कि अब काशी को अपनी कमाई का केन्द्र बनाऊँगा।”
“परन्तु मैं अपने वप्पा को अकेला छोड़कर कही नहीं जाऊँगी।”
“मैं जानता हूँ। बप्पा को ध्यान में रखते हुए तुम्हारी यह इच्छा मुझे अनुचित भी नहीं लगती। तुम कुछ दिनों अपने मैके में रह लोगी। बप्पा के संन्यासी मन को तारापति ब्रह्मानन्दवत फिराएगा। एक यह लाभ भी होगा कि यजमानों के लिए जो जन्म पत्रिकाएँ तुम इस समय तैयार कर रही हो उनकी दक्षिणा की राशि गंगेश्वर को मिल जाएगी। वह मूर्ख ईर्ष्यालु भी अपने बढ़ते पागलपन से बच जाएगा।”
“तुम मुझे इतने दिनों छोड़कर रह सकोगे?”
तुलसी का स्वर तुरंत उदास हो गया, बोले- “बड़ी देर से मन को इसी ठाँव पक्का कर रहा हूँ। पाँच सात दिनों के लिए बाहर जाता हूँ तो तुम्हारे लिए मेरे प्राण बावले हो उठते हैं। काशी का यह फेरा कम से कम दो तीन मास तो ले ही लेगा।”
“मैं समझती हूँ कि तुम्हे अपने मन को पक्का करना ही चाहिए। काशी की कमाई को यहाँ वाले जाँच न पाएँगे। हम लोग दूसरों की ईर्ष्या से बचेंगे। बप्पा के जीवन में भी रस आ जाएगा। मैं उनसे ज्योतिष चर्चा करूँगी, तारा उनके आस पास रहेगा। बेचारे कितने प्रसन्न हो जाएँगें।”
रत्नावली पिता के पास अपने, मैके के घर में रहने के विचार मात्र ही से उल्लसित हो उठी थी किन्तु तुलसीदास का मन अभी कुछ भी निश्चय नहीं कर पा रहा था। एक ओर काशी की याद आती है, पुराने साथियों से मिलने को जी चाहता है।घुमक्कड़ी की पुरानी आदत भी पैरों में खुजली मचा रही है किन्तु दूसरी ओर रत्ना के बिना अब उन्हें काशी क्या बैकुण्ठ में रहता भी सुहा नही सकता। रत्ना के बिना घर से बाहर रहने पर उन्हें रातों नींद नहीं आती। उसका मुखचन्द्र, उसकी बातें तुलसी का अहर्निश अपने आप मे रमाए रहतीं हैं।रत्ना का बेटा ऐसा सम्मोहक जादू है कि वे चाहे तो भी उससे छूट नही सकते।दूसरे दिन सबेरे कलेऊ करने के उपरांत तुलसीदास दालान में घुटनों दौड़ते अपने बेटे को 'पकड़ो-पकड़ो' करते हुए हँसा रहे थे। बच्चा अपने बाप को छकाने के लिए किलकारियाँ मारकर और भी तेज भागता था।उसके पैरों में पड़ी चाँदी की पैंजनियों के घुँघरू, पायलों के घुँघरू रूनझुन स्वर उठाकर पिता का आनन्द बढा रहे थे। तभी रत्ना ने बैठक के कमरे से भीतर आते हुए कहा- “सुनते हो, मैंने प्रश्न कुण्डली बनाकर देख लिया। यह यात्रा तुम्हारे लिए बड़े महत्त्व की सिद्ध होगी। राम का नाम लेकर और अपना जी कड़ा करके तुम काशी चले जाओ।”
क्रमशः
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