Monday, 3 July 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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सुनकर तुलसीदास का आनंद भरा चेहरा कुम्हला गया। विचार में पड़ते हुए बोले- "हाँ ….पर…..”
“पर वर कुछ नहीं। इतनी भक्ति और वैराग्य की बातें करते हो और थोड़े दिनों के लिए मेरे बिना संयम से नही रह सकते? तुम्हारे जैसे व्यक्ति को यह शोभा नही देता।” 
रत्नावली की बात सुनकर तुलसीदास को झटका लगा। लज्जा का बोध भी हुआ। वे बोले- “दूसरो को उपदेश देना सरल होता है पर स्वयं आचरण करता अति कठिन। फिर भी आत्मसंयम करना आवश्यक है। ठीक है, मैं काशी जाऊंगा”
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आत्मालोचन का एक चक्र पूरा हुआ। बाबा स्थिर और परम शांतिमग्न बठे थे। मानस रत्नावली उनके चरणों पर झुकी।उसकी यौवन उल्‍लास भरी चपल चंदन सी काया सहसा अपना वृद्धम्य पा गई। अब रत्नावली वैसी ही थी जैसी कि बाबा ने अंतिम क्षणों में उसे देखा था। बूढ़ी माई ने बूढ़े बाबा से हँसकर कहा- “अब तो कुल से मेरे आत्मालोचन के दिन आ गए। तुम उबरे, मुझे अभी डूब कर उवरना शेष है। अच्छा, अब कल रात फिर आऊँगी?”
शांत और सुस्थिर गति से अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर बाबा ने मैया को अपने वामांग से समेट लिया। उनकी आँखें मुँद गईं। बाबा और मैया के स्थान पर राम और जानकी दृश्यमान हुए। तुलसी की काया गद्गद हो उठी।
बाबा की चामत्कारिक नीरोगता और उससे भी अधिक उनकी कृपा से उनके प्रबल शत्रु रविदत्त तान्त्रिक का मृत्यु के मुख मे जाकर भी सकुशल बाहर निकल आने की बात दूसरे ही दिन काशी के बच्चे-बच्चे की जबान पर चामत्कारिक अतिशयोक्तियों के नगीनों से जड़ कर फैल चुकी थी। बाबा के दर्शनों के लिए भक्तों का ताँता सा लग गया।

उन्हीं दिनों काशी और जौनपुर नगरों पर शाही उमरा आगानूर के रूप मे एक बहुत बड़ी विपत्ति आई हुई थी। आगानूर ने काशी और जौनपुर के बडे बड़े जौहरियों सर्रफों और कोठी वालों को एक दिन अपने यहाँ बुलाया। काशी के लोग पहले पकड़ बुलाए गए। बिना कारण बतलाए हुए ही आगानूर ने उन्हें बंदीगृह मे बन्द कर देने की आाज्ञा दी। पहले दिन उन्हें अन्न पानी तक के लिए तरसाया गया। दूसरे दिन भोजन और जल भेजा गया, किन्तु चांडालों के हाथ। धर्म के कारण किसी ने भी उसे छुआ तक नहीं। शाम को जब पानी बिना दो-चार सेठों के बेहोश होने की खबर आगानूर तक पहुची तो एक ब्राह्मण गर्म पानी लेकर सेठों के सूखे गले सींचने के लिए भेजा गया। तीन दिनों तक कैदखाने में बन्द सेठ साहुकार, सर्राफ दलाल आदि पीड़ा सहते रहे।बाहर उनके परिवार के लोग चिन्ता के मारे पीले पड़ गए। बंद किए जाने का कारण न मालूम होने से सबके मन चिन्ता से घनीभूत थे।तीसरे दिन जौनपुर के सेठ साहुकार और दलाल भी पकड़ कर आ गए। वे लोग भी बहुत घबड़ाए हुए थे। बदीगृह में बन्द सेठों ने वहाँ के कर्मचारियों की मार्फत रिश्वत का प्रलोभन देकर अपने पकड़े जाने का कारण जानना चाहा। बाहर उनके सगे-सम्बन्धी भी यही कर रहे थे। सरकारी चाकरों की जेबों में रिश्वत के पैसे पहुँच कर भी न तो बन्दियों को और न उनके घरवालों को ही पकड़े जाने का कारण ज्ञात हो सका।इन गिरफ़्तारियों से नगर में बड़ा आतंक छाया हुआ था। लोग मुँह खोलकर आलोचना करने से भी डरते थे।प० गंगाराम यही चिन्ता लेकर बाबा के पास आए।
“कहो गंगाराम, चिन्तित क्यों दिखलाई पड़ रहे हो?”
क्या कहें रामबोला, इस देश की ग्रह दशा अभी बड़ी खराब है। नगर की घटना तो तुमने सुनी ही होगी।”
बाबा बोले- “हाँ, परन्तु क्या किया जाए। अकबर शाह के राज में फिर भी सुनवाई हो जाती थी, परन्तु जब से यह जहांगीर राज आया है, फिर असुरगण मदमत्त हो उठे हैं।”
“अरे चुप-चुप, दीवालों के भी कान होते हैं।तुलसी, यदि यह असुर तुम्हें भी पकड़ ले गए तो सच मानों नगर में बड़ी आफत आ जाएगी।” 
“राम करे सो होय। लगता है तुम्हारे कुछ यजमान भी बन्दी हैं।”
“छ: सात। यहाँ के भी और जौनपुर के भी।” 
“तुम्हारी गणना क्‍या कहती है?” 
“इस समय मुझे अपने ऊपर विश्वास नही रहा तुलसी। इसी से घबराकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ।”
“फिर भी तुमने कुछ विचार तो किया ही होगा।”
“मेरे हिसाब से तो आज इस संकट को टल जाना चाहिए।”
बाबा विचारमग्न हो गए, बोले- “राम कृपा से तुम्हारा वचन निष्फल नहीं जाएगा, गंगा। मैं भी समझता हु कि यह संकट आज टल जाएगा।बल्कि समझो, टल ही गया। थोड़ी ही देर में तुम्हें यह शुभ संवाद अवश्य मिलेगा।”
गंगाराम के चेहरे पर चमक आ गई। बाबा के पास ही बैठे हुए बेनीमाघव और राजा भगत की ओर देखकर वे कहने लगे- “तुलसी जैसा मित्र भी बड़े भाग्य से मिलता है भाई। एक बार जवानी में 'रामाज्ञा प्रश्न रखकर इन्होंने ' मेरी जान बचाई थी और आज भी इनके कथन पर मुझे भरपूर विश्वास है। अब मैं स्वयं समझता हूँ कि पंडित के लिए केवल शास्त्र ही नही वरन‌ रामरूप आत्म विश्वास भी आवश्यक होता है।”
 “हूँ हूँ”- कथा का नया सूत्र मिलने की सम्भावना देखी तो बेनीमाधव ललचा उठे, दीनतापूर्वक पण्डित जी से कहा-“वह कौन सी घटना थी महाराज?”
“अरे, एक राजकुमार आखेट खेलने गए थे।वे अपने साथियों से भटक गए।उनके खोने की सूचना जब राजा-रानी तक पहुँची तो वे पुत्र-शोक से दहल उठे। काशी के ज्योतिषियों को उन्होंने अपने यहाँ बुलवाया। घोषित किया कि जो भी राजकुमार के सकुशल लौट आने की सही सूचना देगा उसे वे एक लाख मुद्राएँ भेंट करेगें। एक ओर एक लाख का आकर्षण और दूसरी ओर पंडितों की भविष्यवाणियों में विरोधाभास के कारण बड़ी घबराहट हो रही थी। हम अपने घर में बड़ी चिन्ता में बैठे थे। तभी घर का कुंडा खड़का।”
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काशी के प्रह्लाद घाट की एक गली में युवा पंडित गंगाराम अपने बैठके के द्वार बन्द किए, दीवार का सहारा लगाए, गुमसुम, बड़ी चिन्ता में खोए हुए बैठे हैं। उनके सामने कई पोथी-पंचाग खुले रखे हैं। बाहर का कुंडा खड़क रहा है। गंगा राम इस समय अपने आप में दु:खी हैं। किसी से मिलने या बात करने की इच्छा नही होती है। जब कुछ देर कुंडी बराबर खड़कती रहती है तो खीझ भरे स्वर में पूछते है -“कौन है ?” 
क्रमशः

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