Monday, 3 July 2023

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महकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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बाहर से आवाज आई-“हम तुलसी दास, पं० गंगाराम जी घर पर हैं? ” 
पं० गंगाराम के चेहरे पर उल्लास की किरणें फूट पड़ी । सुस्त बेजान सी चिन्ताग्रस्त काया में बिजली दौड़ गई। दौड़े, आकर द्वार खोले। चबूतरे पर तुलसीदास हँसते हुए खड़े थे। गली में इनकी दो गठरियाँ लादे हुए एक मजदूर  खडा था। गंगाराम ने झपटकर तुलसीदास को बाहों में भरते हुए कहा- "वाह वाह, तुम तो मानों शुभ शकुन बनकर इस समय मुझसे भेंटने आए हो।” 
फिर घर के नौकर को आवाज दी-“सुमेरू, सामान भीतर पहुँचाओ। किसी शिष्य से कहो कि एक लोटा पानी लाए और मजदूरे को थोड़ा पैसा लाकर दे दो।” जल्दी-जल्दी सब काम कर, बड़ी देर तक तुलसी दास को अपनी बांहो मे बाँधे रहे फिर तुरन्त ही उनकी ओर देख कर हँसने लगे।उन्हें खींचकर वे चबूतरे पर पड़े तखत पर बैठ गए। 
“कहाँ से ?”
“घर, राजापुर से।”
गयाराम ने उल्लसित स्वर में आँखें नचाते हुए कहा- “तुम्हारे इस घर शब्द में घरवाली की ध्वनि भी मुझे कहीं पर सुनाई पड़ती हैं।”
दोनों मित्र एक साथ ठहाका मारकर हँस पड़े। तभी भीतर से एक ब्राह्मण कुमार हाथ में जल का लोटा और अगोंछा लिए हुए आया।तुलसीदास ने लोटा लेने के लिए हाथ बढ़ाया किन्तु गंगाराम ने तुरन्त ही मना करते हुए कहा- “नही, यह सेवा इसे ही करने दो।इसे भला ऐसा सौभाग्य कहाँ मिलेगा।हाथ पैर धोए पोंछे फिर दोनो मित्र बैठक में आकर बैठ गए। 
तुलसीदास बोले- “बड़े पोथी पत्रे फैलाए बैठे हो। लगता है बहुत व्यस्त हो।”
पं० गंगाराम ने उदासीन भाव से बात को टालते हुए फीकी हँसी हँसकर कहा-“जीविका जीवन से भी अधिक प्यारी होती है न।”
“ठीक कहा, यही समस्या मुझे भी यहाँ घसीट लाई है। सोचा अपनी काशी के भी इसी बहाने से दर्शन कर लूंगा।”
“भले आए। काशी के पंडित तो इस समय माया के फेर में पड़ गए हैं। जीविका प्रतिष्ठा और लक्ष्मी मिलकर हम सभी को तिगनी का नाच नचा रही है।”
तुलसीदास बोले--“सुन चुका हूँ।अभी अभी इस गली में प्रवेश करने के कुछ पूर्व ही मार्ग में दो पंडित तंबोली की दूकान पर बैठे यही चर्चा कर रहे थे। सुनकर लगा कि बुरे शासन की चक्की में पिस पिसकर हमारा ज्ञान कठिन हो चला है। तभी तो यह निस्तेजता छाई हुई है।”
लज्जावश सिर झुकाकर गंगाराम बोले-“ठीक कहते हो। कुँवर कथा यह है कि हम लोग लाख के लोभ में फँसकर भ्रमित बुद्धि हो गए हैं। ग्रह संधि का फल विचारना कठिन कार्य है। हो सके तो हमारी लाज बचाओ भाई।”
“लाज बचाने वाले तो श्री सीताराम ही हैं, गंगा।अच्छा देखो, स्नान- ध्यानादि से निपटकर हम रामाज्ञा लेने का प्रयत्न अवश्य करेंगे।”
रात में चौकी के अगल-बगल दो दीपक जलाए हुए तुलसीदास बैठे लिख रहे हैं। आकाश में आधी रात के बाद चन्द्रमा उदय होता है, अपनी चादँनी से रात को चमकाता है और फिर ढलने लगता है।तुलसीदास बीतते हुए समय की गति से अचेत लिखते ही चले जा रहे हैं। दियों मे तेल कम होता है तो पास ही में रखे हुए पात्र से तेल डाल लेते हैं, कभी-कभी बती सुधारने की भी आवश्यकता पड़ जाती है। बाहरी दुनिया से उनका बस इतना ही नाता बना हुआ है।ब्रह्म  बेला आ लगी। आकाश चिड़ियों की चहचहाहट से गूँज उठा और तुलसीदास का मुखमंडल भी आनन्द तरंगों से लहर उठा। तभी ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ कर अपने चौवारे की ओर आते हुए गंगाराम पर तुलसीदास की दृष्टि गई। वे बड़े उत्साह और आनन्द भरे स्वर में चहके -“रामाज्ञा मिल चुकी गंगा, काशी की विजय होगी।”
गंगाराम के पैरों में फुर्ती आ गई। वे तेजी से डग बढ़ाते हुए कमरे में आए। तुलसीदास भी अपने आसन से खड़े होते हुए एक चैन भरी मस्त अंगडाई लेकर अपने बदन को खोलने लगे।
गंगाराम ने फैले हुए कागजो को देखकर पूछा- "क्या पाया? जान पड़ता है सारी रात जगे हो? ”
तुलसी बोले- “तुम लाख मुद्राओं के दरबार में नाचते रहे और मैं रात-भर राम जी के दरबार में उनकी चाकरी बजाता रहा। गंगा स्नान करके तुम सीधे राजा जी के यहाँ चले जाओ।कुँवर जी को न तो किसी वन्य पशु ने नुकसान पहुँचाया है और न वे किसी प्रकार के शत्रु चक्र ही में फँसे हैं। दरअसल उन पर और काशी के पंडितों पर इन ढाईं दिनों तक माया का प्रभाव रहा।सवा पहर दिन चढ़ने तक राजकुमार सकुशल घर लौट आएँगें।” 
“सत्य कहते हो तुलसी?”
अपने लिखे हुए पन्नों को क्रम से संजोते हुए तुलसीदास ने एक बार मुख उठाकर पैनी दृष्टि से अपने मित्र को देखा और कहा- “हनुमान जी अब तक मेरे लिए कभी झूठे नहीं हुए गंगा। संकट पड़ने पर कपीश्वर को ही गोहराता हूँ। वे संकट मोचन ही मेरें लिए रामाज्ञा लेकर आए हैं।”
गंगाराम गदगद स्वर में बोले- “तुम्हारी वाणी में संजीवनी है। यह श्रद्धा, यह विश्वास काशी के विद्वानों में अब कहीं देखने को भी नही मिलता। यदि तुम्हारी यह वाणी सफल हुई मित्र तो सच कहता हूँ इस नगर में तुम्हें…..।” 
“बस बस, मन के भावों को अभी मन ही में रहने दो।इन सब बातों पर फिर विचार हो जाएगा।एक वचन मैं तुमसे और भी लूँगा गंगा, किसी से यह कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रश्न मैंने हल किया है।”

दोपहर के समय पालकी पर चढ़कर बाजे गाजे और राजा के दंडधरों के साथ पंडित गंगाराम घर लौट रहे थे। गली चलते कई लोग उनकी प्रशंसा में उद्गार भी प्रकट कर देते थे- “जय हो महराज, आपने काशी के पंडितो की लाज रख ली।”
“अरे सबेरे हमसे छुट्ठन गुझ कहे कि महादेव, गंगाराम की मति भ्रमित हो गई है। इस समय तो ढाईं पहर की भद्रा चल रही है और वह कहता है कि सवा पहर में लौट आएगा।मगर वाह रे पंडित जी, आप तो वहीं आसन मार के बैठ गए और कहा कि या तो अपनी भविष्यवाणी के सफल होने पर उजला मुँह‌ लेकर यहाँ से घर जाऊँगा, नहीं तो सीधे जाकर गंगा जी में डूब मरूँगा।”
“अरे यह महान‌ जोतसी हैं। इनकी गणना बड़ी सच्ची है।तभी तो जै- जैकार मच रही है भाई।” 
क्रमशः

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