महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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पण्डित गंगाराम की सवारी घर पहुँच चुकी थी, किन्तु गलियाँ उनकी कीर्ति से अब भी गूँज रहीं थीं।गंगाराम जी की बैठक में दोनो मित्र झपटकर एक-दूसरे के प्रगाढ़ आलिंगन में बंध गए। गंगाराम ने कहा- "तुलसी तुम मेरे सच्चे मित्र और भाई सिद्ध हुए।”
तुलसीदास का चेहरा शांति तेज से चमक उठा। आलिंगन से बँधे ही बँधे उनकी आँखें मुँद गईं। भाव भरी वाणी में उद्गार फूटे- “सब राम की कृपा है।हनुमान जी का प्रताप है।”
आलिंगन-मुक्त होकर अपने मित्र का हाथ पकड़कर बैठाने का उपक्रम करते हुए वे फिर बोले- “हाँ, अब सुचित्त होकर सारा विवरण मुझे सुनाओ।”
“भीतर चलो, यहाँ कोई न कोई आता जाता रहेगा। उससे हमारी बातों में व्यवधान पड़ सकता है।” दोनों मित्र घर के भीतर वाले आँगन की ओर बढ़ चले। चलते हुए तुलसीदास के कंधे पर गंगा राम बड़े प्रेम से अपना हाथ रखकर बोले- “आज मान लिया मित्र कि श्रद्धा और विश्वास के बिना कोई विद्या, कोई कर्म अथवा वचन सफल सिद्ध नहीं हो सकता। अब तक तुम मेरे गुरू भाई ही थे किन्तु अब तो गुरु बन गए।”
“क्या बकते हो गंगा ! मैं तुम्हारे लिए वही का वही रामबोला हूँ। बचपन में तुमने भी तो मुझे कितना सहारा दिया था।”
घर के भीतर वाले दालान में वे चौकी पर रखे काठ के एक संदूक के पास पहुँच गए। तुलसी को आग्रहपूर्वक बैठाकर स्वयं भी बैठते हुए गंगाराम ने कहा- “मुझसे वचन लेकर तुमने सबेरे से अब तक मुझे इतना घुटाया है कि क्या कहूँ।” जनेऊ में बधी हुई ताली बढ़ाकर संदूक का ताला खोलते खोलते एकाएक रुककर गंगाराम ने फिर कहा-“लोग मेरी प्रशँसा करते थे और मेरा मन घिक्कारता था कि तू मित्र के यश का लुटेरा है।”
तुलसीदास ने दोबारा झिड़का, कहा-“अपने इन शब्दों से मुझे दु:खी न करो गंगा। मैंने किया ही क्या है? फिर यह क्यों नही सोचते कि तुम मेरी एक काव्य-रात्रि के लिए बहाना बने।”
ताला तब तक खुल चुका था। संदूक का भारी ढँकना उठ गया। संदूक के भीतर थैलियाँ ही थैलियाँ चुनी हुई थीं।पण्डित गंगाराम ने झुककर दोनों हाथो से एक थैली को उठाकर तख्त पर रखा और फिर थैली का मुँह खोलकर चाँदी के रुपयों की अँजली भरकर उन्हें तुलसी दास के सामने रखते हुए वे बोले- “राजा जी ने लाख घोषित किए थे किन्तु सवा लाख दिए।यह सब धन तुम्हारा है,देखो, देखो तुलसी, अब तुम बोल नहीं सकते।तुम्हारे कहे से यश मैंने ग्रहण कर लिया किन्तु यह धन तो तुम्हें स्वीकार करना ही होगा।”
तुलसीदास ने शांत किन्तु दृढ़ स्वर में कहा- “नही गंगा, यह धन तुम्हारा है। मुझे तो राम जी ने रात में ही पुरस्कृत कर दिया।”
“वह सब ठीक है किन्तु….”
“किन्तु-परन्तु कुछ भी नही, यह धन तुम्हारा है। मैं यदि इसे ग्रहण करूँगा तो मेरी निष्ठा में आचँ आ जाएँगी।”
किन्तु गंगाराम ने अपना हठ न छोड़ा तब तुलसी ने कहा- “अच्छा बढ़ोतरी के पच्चीस हजार मेरे हैं। यह एक लाख तुम रख लो।”
“नहीं, यह न होगा।”
“तब इस पेटी को ज्यों की त्यों बंद करके गंगाजी में प्रवाहित कर दो।”
“मेरी बात मान लो मित्र। तुम भी आखिर गृहस्थ हो।घर जीविका के लिए यहाँ आए हो।”
थोड़ी-बहुत बहस के बाद अंत में यह निश्चय हुआ कि एक लाख पण्डित गंगाराम ग्रहण करेंगे, एक हजार रुपया निर्धनों में बाँटा जाएगा, बारह हजार तुलसीदास ग्रहण करेंगे और शेष बारह हजार किसी साहुकार की कोठी में जमा करवा दिया जाएगा जो तुलसीदास की इच्छानुसार किसी भी अच्छे कार्य में सुविचार करके लगाया जाएगा।
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गंगाराम से यह कथा सुनकर बेनीमाधव जी बोले- “कलिकाल में यह त्याग भावना कम ही देखने को मिलती है।आप दोनों ही मित्र धन्य हैं।”
पण्डित गंगाराम के जाने के बाद बाबा की शान्ति से लहराती मन गंगा मे एक मछली बार-बार उछल कर जल को चंचल बनाने लगी और वह थी रत्नावली। रत्नावली के युवा और वृद्धावस्था के रूप कभी अलग अलग और कभी प्रायः साथ ही साथ मन में उभरने लगे। “मैंने कही न कहीं उसके प्रति अन्याय अवश्य किया है। उसके अंतकाल में भले ही मैंने उसको पूर्ण संतोष देने की चेष्टा की परन्तु क्या वही मेरे कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है? रत्ना की कठिन तपस्या की कसक मिट जाती यदि मैं उसके अंतकाल से कुछ अधिक पहले पहुँच जाता। कुछ समय वह भी हरी-भरी रह लेती तो क्या मेरा कुछ बिगड़ जाता? पिछले माघ के महीने में दो बार रत्नावली को पास बुलाकर रखने की प्रेरणा हुई थी, पर दोनों बार माया प्रबन्ध मानकर मैंने उसे झुठला दिया। मैंने यह क्यों किया? मैं रघुबर के दर्शन करने के लिए कराह रहा हूँ। वह बेचारी भी मेरे लिए वैसे ही सिसक रही थी। उन सिसकियों को मैंने अनसुना क्यों कर दिया? राम को मानव मन के मर्म में वहाँ देखने से चूक क्यों गया?”
स्नान करते, व्यायाम करते, किसी से बातें करते, पूरी सजगता बरतने के कारण केवल साँयकालीन सध्यादि ब्रह्म-कर्मों और ध्यान के समय को छोड़कर , जब तब मन की गंगा मे वह मछली उछलती ही रही और बाबा इन प्रश्नों में से एक न एक से बराबर टकराते ही रहे। इस तरह से वे प्रायः पूरी शाम सहज न रह सके। रात का निरालापन आया। पं० गगाराम ने प्रसँग वश बीती बात सुनाकर आगे की कड़ी जोड़ दी थी।बाबा मन के प्रश्नों से उलझते-उलझते एकाएक स्वयं ही बोल उठे- “आओ रत्ना, आज हम तुम्हारा हिसाब किताब चुकता कर ही डालें। रत्नावली शक्ति जब तक पूर्णरूपेण राम शक्ति न बनेगी तब तक वह मुझे छुटकारा न देगी।”
“छुटकारा कैसा जी? गठजोड़े से हम श्रीराम-जानकी के चरणों में लीन होगें। अब अकेले उस दरबार में तुम्हारी रसाई नहीं हो सकती।जहाँ मुझे छोड़ा था वहाँ से साथ ले चलो।” बाबा के अन्तर में रत्ना मैया अपना त्रिया हठ साधे बोल रही थी। बाबा कुछ क्षणों तक मौन रहे और फिर उनकी आँखों के आगे पुराने दृश्य लहराने लगे।
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राजापुर के नौका घाट पर नाव आकर लगी।आकाश घटाटोप हो रहा था।बीच बीच में बिजली चमक उठती थी।सवारियाँ उतरने लगीं। बहुतों की आँखें बार बार आकाश की ओर उठ जाती थीं।
क्रमशः
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