Wednesday, 31 May 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
84-

यों भी तुलसीदास आज कुछ अधिक उमंग मे थे। अपनी भावुकता में वे यह मानते थे कि पाठक जी को सुनाकर वे मानों अपने पिता को ही रामायण सुना रहे हों। वे अपनी कथावाचन कला का सारा निखार मानों आज ही दर्शा देना चाहते थे। ऐसे तन्‍मय होकर उन्होंने कथा बाँची कि निर्धारित पाठ पूरा होने पर अपनी वाणी के मौन से वे स्वयं ही सन्नाटे में भर गए।
पाठक जी के प्रचार और प्रभाववश दूर दूर के लोग कथा सुनने के लिए आए थे। गाँव में कई तम्बू-खेमे पड़े हुए थे। बहुते से घरों में अतिथि ठहरे थे। स्वयं पाठक जी के घर में भी तीन संबंधियों के परिवार टिके हुए थे। तुलसीदास ने पहले ही दिन सबके हृदय जीत लिए।
इस घर में आने पर उनके लिए एक अचम्भा अचानक आया। भोजन इत्यादि करके पाठक जी अपने छोटे भाई के पुत्र गंगेश्वर और साले के साथ तुलसीदास के सामने ही उनकी प्रशंसा करते हुए मगन मन बैठे थे। तभी अचानक ही उन्होंने कहा- “भैया, है तो मेरी बेटी, पर मैंने उसे बेटे की तरह से ही पढ़ाया-लिखाया है। जो पण्डित मुझे योग्य जँचा उसी से मैंने उसे शिक्षा दिलवाई है। देखो मैं बुलाता हूँ। उसने ही तुम्हारे अभुक्तमूल नक्षत्र की व्याख्या मुझसे की थी- “अरी रत्नू, ओ रत्नू, यहाँ आ बिटिया, वैसे उसे यह मालूम नहीं है कि वह कुण्डली आपकी है।”
तुलसीदास अचानक रत्ना के सामने आने की बात सुनकर घक से रह गए। उनका कलेजा धड़ धड़ कर उठा- राम प्रभु मेरी परीक्षा न लो। राम करे, वह न आए, न आए, वह न आए।तुलसी तो अपने चेहरे पर चढ़ती धुकपुकाहट को सँभालकर उसपर गम्भीरता का मुखौटा चढ़ाने में व्यस्त हो गए, पर उनका मन भीतर ही भीतर सकपका रहा था।
भीतर के उढ़के हुए द्वार खुले। शुभ्र वर्ण की एक तन्वंगी सामने थी। तेज- युक्त ललाट, पतले होंठ, नाक और ठोड़ी नुकीली तथा आँखों में दर्प-भरी चमक थी। उसने एक बार तुलसीदास की ओर देखा। चार आँखें अनायास ही मिलीं।तुलसी के हृदय में मचती हुई हलचल दृष्टि मिलते ही थम गई।एकाएक उनके भीतर-बाहर मानों सन्‍नाटा छा गया। उन्हें लगा कि वे अब अपनी सम्पत्ति नहीं रहे। आँखें नीची हो गईं।

रत्नावली ने तुरंत ही पिता की ओर देख कर पूछा- “क्या है बप्पा?”
स्वर था कि मानों गला हुआ सोना बह रहा हो। उसमे मिठास तो थी ही किन्तु अधिकार का तेज भी था। तुलसीदास उपस्थित मण्डली के सामने अपने आपको कसे हुए बैठे थे। बिछे हुए गलीचे का एक रेशा तोड़कर अपनी चुटकी से मीजते हुए वे ऐसे गम्भीर और दत्तचित्त भाव से बैठे थे जैसे किसी महत्त्व के काम में व्यस्त हों। पाठक जी ने स्निग्ध दृष्टि से अपनी बेटी को देख कर कहा- “आओ बिटिया, आज तुमने हमारे तुलसीदास जी की कथा सुनी थी?”
तुलसीदास के कान खड़े हो गए। रत्ना ने छोटा सा उत्तर दिया-“हूँ”
तुलसीदास को ऐसा लगा कि रत्नावली ने बड़ी अनिच्छा और दबाव से ही यह  उत्तर दिया है।
पाठक जी ने पूछा-“तुम्हे कैसी लगी इनकी कथा?”
“कथा तो राम जी की थी”- रत्ना बोली
तुलसी को लगा कि मानों इस वाक्य के पीछे खिलखिलाहट भरी है। उसी समय रत्ना के मामा हँस पड़े और पाठक जी से कहा -"देखो, हमारी बिटिया कैसी बात पकड़ती है।”
पाठक जी मुस्कराकर बोले- “अरे ये बड़ी नटखट है। मैं इनके कथा कहने के ढंग और व्याख्या-पद्धति के संबंध में तेरा मत पूछ रहा था।”
तुलसीदास के कलेजे में फिर हलचल मची, किन्तु रत्ना चुप रही । मामा बोले- “क्या पूछ रहे हैं जीजा, बताती क्यों नही?” 
रत्नावली के चचेरे बड़े भाई गंगेशवर ने हसँकर कहा- “अरे यह बड़ी बुद्धू है मामा, इसे चंगुद खेलने से ही अवकाश नहीं मिलता, ये क्या बताएगी? ”
रत्ना ने एक बार गंगेश्वर की ओर देखकर आखे तरेरी। वह हँसने लगा। मामा बोले-“हमारी बिटिया बुद्धू, नहीं है। छोटी होने पर भी यह तो अच्छे- अच्छे पण्डितों के कान काटती है।”
पाठक जी बोलें-“बड़े भारी ज्योतिषी हैं हमारे तुलसीदास जी। इससे ताजक ज्योतिष के लटके भी सीख ले।”
तुलसीदास ने एक बार नजर उठाकर रत्नावली को यों देखा कि मानों वे
उसका उत्तर सुनने के लिए उत्सुक हों। रत्नावली ने अपने पिता से कहा- मुझे क्‍या आज ही सीखना है वप्पा?””
'तुलसीदास अचानक ही हड़बड़ा कर बोल उठे- “नहीं-नही, फिर किसी दिन, अभी तो यहाँ पर एक सप्ताह ठहरूँगा।”
“अच्छा रत्नू, इन्हे अभुक्तमूल के संबम्ध में बतला। तुलसीदास जी कहते है कि तेरी व्याख्या गलत है। वह जातक निश्चय ही मूल के पहले-दूसरे चरण की सन्धि में हुआ होगा”।
“केवल माता-पिता की मृत्यु के प्रमाण से ही यह कह देना ठीक नही है वप्पा। प्रश्न यह है कि जातक को नव वर्ष की आयु से समुचित प्रतिष्ठा, विद्या और उन्‍नति के सोपान मिलते जा रहे है या नही?”
पाठक जी ने तुलसीदास की ओर देखकर पूछा- “कहिए, आपका क्या विचार है?”
“पहले इनका विचार सुन लूँ।”
रत्नावली ने भी उचटती नजरों से अपने भावी पति को देखा, फिर पिता से पूछा-“बप्पा, वह टेवा आप ही का था न?”
“यह तूने कैसे कहा?”
पिता के इस प्रश्न से रत्ना झेंप गई। कुछ उत्तर न दिया। मामा जी बोले-“अच्छा मेरा एक प्रश्न विचार। हमारे इन शास्त्री जी का विवाह हो गया है या नहीं।”
तुलसीदास का चेहरा और कस गया। उन्हें पाठक जी के साले का यह प्रश्न करना अच्छा नही लगा। वे भीतर ही भीतर अनख उठे। रत्नावली भी यह प्रश्न सुनकर सहसा लज्जा से लाल हो उठी। उसने कहा-“अच्छा घर में काम है बप्पा मैं जाऊँ?” 
पिता के कुछ कहने से पहले ही वह तेजी से उठकर भीतर चली गई।सात दिन तुलसीदास की ख्याति के सात सोपान बन गए। तुलसी के प्रति पाठक जी का ममत्व प्रतिक्षण गाढ़ा होता ग़या। तीसरे चौथे दिन की बात है दिन में भोजन कर के पाठक जी तुलसीदास के साथ भीतर के कमरे मे बैठे थे। टाँडों पर ग्रथों के बस्ते बँधे हुए रखे थे। ग्रथों का यह विशाल भाण्डार देखकर तुलसी ने कहा-“काशी में गुरू जी का ग्रंथ भंडार इससे कदाचित्‌ ही कुछ अधिक हो। आपके यहाँ बहुत अच्छा संग्रह है।”
क्रमशः

83

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
83-

हमने सोचा कि आप कदाचित्‌ उस समाज में अपने आपको सुखी अनुभव करेगें। यहाँ आसपास के पण्डित समाज से आपका जितना परिचय होता चले उतना ही अच्छा है। आपके पिता का नाम लोग अभी भूले नही हैं।”
तुलसी 'ना’ नही कह सकने थे। यद्यपि उनके मन का ऊहापोह कुछ अधिक बढ़ गया था। वे अपनी ज्योतिष विद्या से भी यह जानते थे कि उनका विवाह होगा किन्तु वे यह चाहते नहीं थे। स्त्री की भूख एक रहस्य बनकर उन्हे लुभा अवश्य रही थी किन्तु राम-भक्त कहलाना और मेघा भगत के समान जनसमाज में श्रद्धा का पात्र बनना ही उन्हें अभीष्ट था। वे अपने भक्ति के उत्साह और काम की भूख के परस्पर-विरोधी वातचक्र में नाच रहे थे और अपने सहज घरातल से उखड़े हुए थे। मानसिक अनिश्चय के कारण तुलसीदास पाठक जी के साथ जाना नहीं चाहते थे किन्तु मना करने का नैतिक साहस भी उनके भीतर न था।
दीनबन्धु पाठक की अवाई का समाचार सुनकर राजा भगत भी आ पहुँचे। बातों के बीच तुलसी उन्हें कनखी से देखते कि मानों सारा षड़यन्त्र उन्हीं का रचा हुआ हो और राजा भगत की यह स्थिति थी कि जब-जब उनकी दृष्टि अपने भैया के मुख पर जाती तब तब वे मुस्कराए बिना नही रह पाते थे। राजा दोनों को घाट तक पहुँचाने आए। नाव पर बैठने से पहले तुलसीदास ने राजा के कान में कहा- “तुमने आखिर मुझे बलिदान का बकरा बना ही दिया न।पर देखना, मैं भी तुम्हारे चक्रव्यूह को भेदकर कैसे बाहर निकलता हूँ।”
राजा भगत मुस्कराए, फिर कहा-“तुम्हारी तुम जानो भैया, बाकी हमने तुम्हारी यह कुटिया वाली जमीन कल बकरीदी भैया से खरीद ली है।” 
तुलसीदास का चेहरा आनन्द से खिल उठा, बोले -“यह तुमने बहुत ही अच्छा किया, राजा। मैं परम प्रसन्न हुआ।”
नाव सवारियों से भर चुकी थी और जाने के लिए तैयार खड़ी थी। पाठक जी तुलसीदास की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब कान की बात समाप्त होकर दोनों जोर- जोर से बतियाने लगे तब पाठक जी के कानों में भी उनकी बाते पड़ने लगी थी। सुनकर बोले-“यह जमीन बकरीदी की रही राजा? ”
“हाँ, महाराज। अब उस हिस्से में हमने कई ब्राह्मण पण्डितों को घर बसाने के लिए राजी कर लिया है। ज़मीनें बिक रहीं थीं तो हमने इनके लिए भी ले ली है। आप अच्छा सा महुर्त निकाल देव तो हम इनके घर की नींव भी लगे हाथों डलवा ही दें।”
पाठक जी तुलसी के कन्धे पर स्नेह से हाथ रखकर राजा से बोले-“कल मध्याह्न में सूर्य नारायण जब ठीक तुम्हारे सिर पर आ जायें तब तुम्हीं अपने हाथों इनके घर की नींव पूजा करना। इन्होंने इस गाँव को जिस पुरुष का नाम दिया है, वही इनके घर की नींव रखेगा। मैने ठीक कहा न भैया?”
भैया इतनी देर से पाठक जी के हाथ का स्नेह स्पर्श अपने कंधे पर अनुभव करते-करते उसके सम्मोहन में बँध चुके थे।कुछ अपनी मन भावती भूमि के स्वामी हो जाने के कारण उपजे हुए उल्लास से भी चुप थे। उन्हें पाठक जी की बात का सहसा कोई उत्तर न सूझा, विनीत होकर कहा-“मैं क्या कहूँ, आप जो उचित समझे करें।”

पाठक जी के घर पहुचकर तुलसीदास मानों राजा हो गए। इतना अपनत्व, इतनी आवभगत और सम्मान तुलसी दास को कहीं प्राप्त नहीं हुआ था। पाठक जी गाँवके धनी-धोरियो मे थे । आासपास के गाँवों मे ही नही बल्कि बाँदा से चित्रकूट तक इस पार-उस पार उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। इसलिए जिसकी अगवानी में स्वयं वे उत्साह के मारे थोड़े-थोड़े हुए जा रहे हो उसके लिए पलक पावड़े बिछाने वालों की भला क्या कमी हो सकती थी। तुलसीदास बहुत मगन थे। पाठक जी विधुर थे। उनकी इकलौती संतान चौदह वर्ष की हो चुकी थी। पण्डित जी ने अपनी पुत्री के प्रबल मोहवश अब तक उसका विवाह टालने का प्रयत्न किया किन्तु अब वे ऐसा कर नहीं सकते थे। उन्होंने रत्नावली को आरम्भ से उसी चाव से पढ़ाया था जिस चाव से कोई पुत्र को पढ़ाता है। वे कई वर्षो से किसी ऐसे सुपात्र की खोज में थे, जिसे वे घरजमाई बनाकर अपने पास रख सकें किन्तु उन्हें अपती लड़की के लायक कोई लड़का जंचता नहीं था। जब से विक्रमपुर की पैंठ में उन्होंने तुलसीदास की कथा सुनी थी और उनके संबंध में राजा से जानकारी पाई थी तभी से वे उन्हें अपना जामाता बनाने के लिए लालायित हो चुके थे। इन बीते महीनों में और भी निकट संपर्क में आने के कारण उन्होने तुलसीदास को अपना दामाद बनाने का एक प्रकार से हठ ही ठान लिया था। स्वाभिमानी तुलसी को वे अपने घर मे तो न रख सकेंगे पर यह दूरी भी केवल नदी के दो तटों की ही है। इतनी पास में ऐसा योग्य जमाई मिले तो समझो घर ही में है। उन्होंने तुलसीदास और रत्नावली की जन्म- पत्रिकायें भी मिला रखीं थीं। संयोगवश रत्नावली के एक सुझाव के अनुसार वे उनके मूल नक्षत्र के सम्बंध में भी गहरा विचार कर चुके थे। रत्नावली उक्त कुण्डली के अभागेपन को नकार चुकी थी। वह नहीं जानती थी कि यह उसके भावी पति की जन्मकुण्डली है। उसके मतानुसार
अभुक्त मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में पैदा होने वाला व्यक्ति अलौकिक रूप से भाग्यवान होता है। बड़े बड़े राजे महाराजे और पण्डितगण इनके चरणों में शीश झुकाएगें। इसके बाद नियति ने ऐसे वानक वना दिए कि पाठक जी जब भी अपनी बेटी को देखते तभी उसके दक्षिण भाग की ओर खड़ी तुलसीदास की मूर्ति उनकी कल्पना में उभर आती थी। पाठक जी तुलसी को अपना बेटा बनाने के लिए दीवाने हो गए थे।

वाल्मीकीय रामायण कथा का श्रीगणेश हुआ। तुलसीदास जी का कथा कहने का ढंग ही निराला था। वे पण्डित समाज को अपनी विद्या और जन साधारण को अपने भक्ति रस के चमत्कार से एक सा बाँधते थे।बीच बीच में अपनी रची हुई भाषा की कविताएँ भी पढ़ने लगते तो सभा में समां-सा बँध जाता था। भाषा में चमत्कार, कण्ठ मधुर और सुरीला तथा इन सबके ऊपर सोने मे सुहागे जैसा उनका सुन्दर रूप और बलिष्ठ काया भी देखने वालों पर अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती थी।
क्रमशः

82

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
82-

तुलसीदास उसे देखकर बोले-“बैठने आई हैं? बैठिए, मैं यहाँ से जाता हूँ।” कहकर तुलसीदास कुटी का पूरा द्वार खोल- कर बाहर निकलने लगे।राजकुँवरी ने गिड़गिड़ाकर पूछा-“आप कहाँ जाते हैं?”
“जहाँ मेरे भक्तिभाव को आपके काम-प्रलोभन न सता सकें। आप धनी हैं, धन से सब कुछ खरीद सकती हैं।आपकी इच्छाओं का पालन करने वाले अनेक पुरुष आपको मिल जाएँगें। कृपाकर मुझे शांतिपूर्वक राम-चरणों मे लीन होने दीजिए।” सारी बातें एक साँस में कहकर तुलसीदास ने फिर अपनी कुटी के द्वार बन्द कर लिए।
राजकुँवरी तुलसीदास के क्रोध से आतंकित हो गई। बन्द कुटी के द्वार को वह कुछ क्षणों तक स्तब्ध खड़ी देखती रही। उसकी दो दासियाँ भी पीछे खड़ी थी। एक ने मुँह बनाकर कहा- अजी कुँवरी जू, छोड़िए न इस साधू का मोह, इसे अपनी सुन्दरताई पर घमण्ड है। बड़ी भक्ति छाँटता है। अरे हम इससे अच्छा सुन्दर साधू आपके लिए खोज कर ले आवेगीं। किसी दिन यह निगोड़ा अगर जोर से आपको डाँट देगा तो किरकिरी हो जायगी।” राजकुँवरी की आँखें कटोरियों जैसी भरी हुईं थीं और तुलसीदास अपनी कुटी में पिंजरबद्ध सिंह की भांति चक्कर लगा रहे थे।
तीसरे पहर राजा भगत आए। कुटी का द्वार खटखटाया। जब उत्तर न मिला तो पुकारा-“भैया”
“हाँ राजा, आए।”-  तन्द्रा में लेटे हुए तुलसीदास ने राजा की आवाज सुन- कर तुरन्त उत्तर दिया और उठकर कुटी का द्वार खोला।
“आज क्या बात है भइया कि दिन में सो गए? तबीयत तो ठीक है?”
“हाँ, तन ठीक पर मन बहुत अस्वस्थ है। आज तुम कहाँ चले गए थे, दिन में एक बार भी नही दिखलाई दिए?” 
“उस पार चला गया था। पाठक महाराज का बुलावा आया तो मैं घाट पर ही खड़ा था। सुनते ही नाव से चला गया। इसी से भेंट न हो पाई। अबके सोमवार से तुम्हारी कथा वहाँ होगी भइया। बड़े महाराज ने बड़ा प्रबन्ध किया है।”
“अब कहीं नहीं जाऊँगा, राजा।”
“क्यों ?”
“नारी के आकर्षण से दूर रहना चाहता हूँ। पाठक जी मुझे गृहस्थी के बन्धन में बाँधना चाहते हैं। मैं नहीं बधूँगा, नहीं बधूँगा।”
राजा भगत शांतभाव से उनका चेहरा देखते रहे। जब वह चुप हो गए और कुछ देर तक वैसे ही टहलते रहे तो राजा ने कहा-“तन की अपनी कुछ चाहें होती है भइया। भूखा अगर परोसी हुई थाली छोड़कर जायगा तो भूख के मारे कहीं न कहीं मुँह मारेगा ही।”
“इसी बात की तो परीक्षा लेना चाहता हूँ।राम कृपा से मैं उस आकर्षण से मुक्त रहूँगा जिससे सारा संसार बधँता है।” तुलसी के स्वर में अहंकार बोल रहा था। यह उत्तर वह केवल सामने खड़े राजा भगत ही को नही वरन‌ अपनी मन बसी दुर्बलता को भी दे रहे थे।राजा भगत कुछ देर चुप रहे, फिर कहा- “तुम्हारे ही दम पर तब मैं यह घर बसाने के काम में कूदा। बड़े महाराज ने लोगों को समझा  बुझाकर यहाँ पूजी लगवाई। उनके बुलावे पर तुम कथा बाँचने भी न जाओगे तो भला बताओ, हम कही मुँह दिखाने जोग रह जायंगे?”
तुलसी पण्डित विचारमग्न हो गए, कहा- “हम कथा सुनाने जाएँगे। वह हमारी जीविका है और फिर वे हमारे पिता समान हैं किन्तु मैं तुम्हें चेताए देता हूँ राजा, विवाह के बन्धन में नही बधूँगा, चाहे वे बुरा मानें या भला।”
मन्द-मन्द मुस्कराते हुए राजा ने कहा-“अच्छा यह बात हमने मान ली।सुन्दर देह, मनोहर रूप और सधुक्कड़ी राह में राम जी की दया से रसीली भगतिनों की कमी भी नही है।ऐसे ही रोज वो तुम्हें सताएगीं और तुम यों ही तपा करोगे। राम जी के लिए तपने का तुम्हारा समय यह ससुरियाँ खाया करेंगी। हमारा क्‍या है।”
तुलसीदास की आँखों की तपन मिटी, उनमे स्निग्धता आई, मुस्कराकर पूछा-“क्या तुम्हें मेरे आज तक के संकटों का पता है?”
“अरे हम ही नहीं, सब जानते हैं।तुम्हारा गुन गाते हैं और तुम्हारी सिधाई पर हँसते भी हैं।”
तुलसी को लगा कि उनका भीत्तर-बाहर सब कुछ शीशे की तरह साफ है, वह अपने समाज में सराहे जातें हैं। पिछली रात और सारा दिन सतत्‌ संघर्ष- रत रहने वाले मन को ठंडक पहुँचीं। जनता साक्षी है, मैं सच्चा हूँ-इस विचार के उदय होने से मन जड़ीभूत अपराध-भावना के तनाव से मुक्त हुआ, पर अपनी इस स्थिति पर जग-हँसाई होने की बात उन्हें न सुहाई।बोले- “इसमें हँसने की क्या बात है?” 
“तुम्हारी सिघाई। बुरा न मानना भैया, हम ऐसी वैसियों को अपने से कोस भर दूर पटककर फेंक चुके हैं, और तुम ठहरे देवता मनईं, जैसे तुम इन्हें समझाते हो, उससे तो यह और उमंग में चढ़ती होंगीं।”
तुलसी चुप। राजा जो कुछ कह रहे थे, सब सच था। तुलसी के आगे एक- एक बात स्पष्ट थी।तुलसी ने जब इन स्त्रियों को अनदेखा किया तो उन्होंने जान बूझ कर अपने को दिखलाने का प्रयत्न किया। ये कतराने लगे तो वे और घेरने लगीं। चम्मो के तरीके फूहड़ थे, उसने दो तीन बार तुलसी से मीठी कड़वी झिड़कियाँ पाईं। राजकुँवरी शालीन है, संयत ढंग से घेराव करती है। उसकी शालीनता ने कहीं पर तुलसी के मन को प्रभावित भी किया है। तुलसी के इस मौन को लखकर राजा ने हँसते हुए कहा- “खैर, अब चिन्ता न करो भैया। कथा बाँचने के लिए तुम जब सात आठ रोज उधर रहोगे न, तब हम तुम्हारे इन तपस्या कंटकों को तुम्हारे रस्ते से हटा देंगें।”
सुनकर तुलसी भी हँसे, कहा-“हां, इधर की खाइयाँ पाट दोगे क्योंकि उधर तुमने हमारे लिए कुआँ खोद रखा है।” तुलसीदास अपने भीतरवाला वैचारिक बवण्डर रोक नही पा रहे थे। राम और रमणी दोनो ही मन पर ऐसे छाए हुए थे कि वे अपनी वास्तविक इच्छा को समझने में असमर्थ थे। उनकी बात के उत्तर मे राजा ने मुस्कराकर कहा-“कुआ नही समुद्र कहो समुद्र। रतन और कहाँ मिलेंगे?”

रविवार के दिन तुलसीदास को अपने साथ लिवा जाने के लिए पाठक जी स्वयं आ गए। तुलसीदास भीतर से चिड़चिड़ा गए, पर बाहरी तौर से अपने को संयत रखकर उन्होंने केवल इतना ही कहा-“कल दोपहर में मैं स्वयं ही आपके यहाँ पहुँच जाता। आपने बेकार ही कष्ट किया।”
“एक तो कल डेढ़ पहर तक मुहूर्त अच्छे नही हैं। दूसरे, आज हमारे यहाँ दो ज्योतिषाचार्य आने वाले हैं।
क्रमशः

Sunday, 28 May 2023

tc81

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
81-

“नही बेटा, भाग्य का चमत्कार केवल लौकिक स्तर पर ही नहीं दिखलाई देता। मेरी धारणा है कि आपके समान परम भाग्यशाली व्यक्ति जगत में कदाचित ही कोई हो। जो सिद्धि किसीको नहीं मिलती वह आपके लिए सहज सुलभ होगी। अभी आपने अपने जीवन में देखा ही क्या है।खैर, इस सम्बन्ध में हम लोग फिर कभी बातें करेंगे। आपके द्वारा मारुति मन्दिर की स्थापना का विचार अत्यन्त सराहनीय है।आप चिन्ता न करें, सब प्रबन्ध हो जाएगा।”
पाठक जी के द्वारा हनुमान जी की प्रतिष्ठापना का भार उठाने पर उत्सव सचमुच ही बड़ी धूमघाम से हुआ। अनेक कंगलों ने भोजन पाया, अनेक ब्राह्मणों को बहुत सी दक्षिणा मिली, ब्रह्मभोज हुआ, तुलसीदास का प्रवचन भी हुआ।उस दिन उनकी प्रवचन कला ने अपने सहज उल्लास में ऐसा चमत्कार प्रकट किया कि चित्रकूट, बाँदा आदि के बड़े बड़े सेठ साहुकार और पण्डित उनकी प्रशंसा करने लगे। पाठक जी बेहद प्रसन्‍न थे। साँयकाल के समय जब वे जाने लगे तो तुलसीदास ने कहा-“आपने तो अभी तक भोजन भी नहीं किया। पहले प्रसाद ग्रहण कर लीजिए तब जाइएगा।”
पाठक जी मुस्कराकर बोले- “मेरे कई यजमानों ने मुझसे यहाँ पर एक हाट बाजार और बस्ती बसाने की बात कही है।बस्ती फिर से बस जाए तो कभी भोजन करने भी आ जाऊँगा। अभी जल्दी क्‍या है।” इस बात की आड़ में छिपी पाठक जी की बात को तुलसीदास समझ न पाए। उन्होने फिर आग्रह किया- “मुझे अपार कष्ट होगा।”
“बेटा, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रसँग को यहीं तक रहने दें। मैं एक और प्रार्थना भी करना चाहता हूँ।”
“आप मेरे पिता समान है, कृपया मुझे लज्जित करनेवाले शब्दों का प्रयोग न करें।”
पाठक जी हँसे, तुलसीदास की पीठ पर हाथ रखकर उन्होंने कहा- "अच्छा मैं तुम्हारी ही बात रखूँगा। तुमसे मुझे यह कहना है कि मेरे गाँव में श्रीमद्‌- वाल्मीकीय रामायण बाँचो।”
“आपकी आज्ञा का निश्चय ही पालन करूँगा। आप जब भी मुझे आज्ञा देंगे, मैं  आ जाऊँगा।” 
संकटमोचन महावीर की स्थापना के उपरांत शीघ्र ही पुराने विक्रमपुर के पास एक नया बाजार बनने लगा। राजा बहुत प्रसन्न थे। अपने उत्साह में वे अपना बहुत सा समय नये बनते हुए बाजार में ही बिताने लगे।विधवा राजकुँवरी ने अब प्रायः नित्य ही दोपहर के बाद तुलसी दास की कुटी में आना आरम्भ कर दिया। वह अपने लिए भी एक मकान बनवा रही थी। वह आकर तुलसीदास के चरणों में अपना मस्तक झुकाती और फिर उनके कक्ष से अलग रसोई घर की आड़ में बैठ जाया करती थी। तुलसीदास के ध्यान में इससे व्याघात पड़ने लगा।सिया-राम का बिम्ब उनके ध्यान पट से मिट मिट जाता था।राजकुँवरी के सुन्दर सलोने श्याम-मुख की छवि उनकी आँखों में बार बार आने लगी। आँखों में राजकुँवरी और कानों में राम राम की गूँज उनके मन में परस्पर विरोधी तरंगे उठाने लगीं।तुलसीदास इससे त्रस्त हो गए। वे किसी स्त्री के ध्यान में अपना जीवन नष्ट नहीं करना चाहते थे। भक्तिरस और यौवन की तृष्णा उनके मन में फिर उथल पुथल मचाने लगी। एक रात स्वप्न में उन्होंने देखा कि वह माला जप रहें हैं और मोहिनीबाई राजकुँ‌वरी का हाथ पकड़े मुस्कराती हुई आती है। माला थम जाती है, मोह आँखों में चंचल गति करता है। मोहिनी कहती है-“इसे तुम्हें सौंपती हूँ।” तुलसी एक बार चाहत भरी नजरों से उन्हें देखते हैं। दोनों सुन्दरियाँ मुस्करा रहीं हैं। वे मूर्तिमान प्रलोभन बनी हुई उन्हें ताक रहीं हैं। तभी न जाने कहा से चम्मो सहुवाइन भी वहाँ पहुँच गई। वह भी भैंगी आँखों में अपनी चाहत का सत निचोड़कर उन्हें देख रही है।रूप-कुरूप से बँधे एक ही लालच को सामने देखकर तुलसी के मन का सौन्दर्य-बोध बिखर जाता है। शरीर हिल उठता है। आँखें खुल जातीं हैं। तुलसी “राम' कहते हुए उठ बैठते है। कुछ पल बैठे रहतें हैं फिर आँखें भर आतीं हैं। करुण स्वर में आप ही आप कह उठते है- “बजरंगबली, मैंने ऐसा क्या पाप किया है जो यह विघ्न-बाधाँए अभी तक मेरा पीछा नहीं छोड़तीं?” 
दिन का तीन चौथाई भाग आत्म-संघर्ष में ही बीत गया। सुबह नित्य नियमों में भी स्त्रियाँ उनके कल्पना लोक में बार बार धसँकर उनके मन को अपराघ भावना से जड़ीभूत कर देतीं थीं। राम का ध्यान न सधा तो तड़पकर बजरगबली से प्रार्थना करने लगे-"हे अंजनीकुमार, मेरी बाधाएँ हरो, मैं कुछ नहीं चाहता, केवल राम-चरणों में मेरी प्रीति को स्थिर कर दो। मैं मोहरूपी शक्ति से घायल और मूच्छित हो गया हूँ, मुझे राम-संजीवनी से जिला दो प्रभु। मेरी लाज रखो।” 
उस दिन घाट पर प्रवचन करने में भी उनका ध्यान एकाग्र न हो पाया। तुलसीदास अपने भक्तों को जब राम के चरणों में अमल प्रीति रखनें का उपदेश दे रहे थे तब तुलसीदास का मन अपनी ही अपराधी वृत्ति से बौखला उठा। फिर उन्होंने व्याख्यान को बढ़ाने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु उनका मन इस समय तक बहुत बिखर चुका था।अपनी अस्वस्थता का बहाना साधकर उन्होंने उस दिन शीध्र ही अपना प्रवचन समाप्त कर दिया। कुछ भक्‍तों ने उनके मुख से अस्वस्थता की बात सुनकर उनके उतरे हुए चेहरे पर विशेष ध्यान दिया। तुलसी दास के प्रवचनों पर मुग्घ जनसमुदाय को आज उनकी कथा में रस नहीं मिला था, वे भी ब्रह्मचारी महाराज के स्वास्थ्य के सम्बन्ध में चिन्ता करने लगे।वैद्य को दिखलाने की बात भी कई लोगों ने तुलसी दास से कही, परन्तु वे यह कहकर अपनी कुटी के भीतर चले गए कि राम स्वयं ही मेरा उपचार करेंगे।

सन्नाटा हो गया। तुलसी बन्द कुटी में आसन पर बैठे ध्यानमग्न होकर माला जप रहे हैं। उनके कानों की राम गूँज में टक-टक की आवाज व्याघात डालती है। ध्यान का सिमटा हुआ बिन्दु टक-टक की ध्वनि के साथ फैलने लगता है। उनके चेहरे पर कसाव आ जाता है। वे अपनी पूरी अंतर्शक्ति के साथ इस व्याघात के विरुद्ध मोर्चा बाँधकर जप में एकाग्र हुए। फिर टक-टक' फिर चिड़- चिड़ाहट- टक-टक टक-टक। क्रोध से आँखें खुल गईं। मूदँकर फिर अपने आपको शांत करके ध्यानमग्न होने का प्रयत्न करते हैं पर -टक-टक टक-टक होती ही गई।
तुलसी आसन छोड़कर उठे, द्वार खोला। सामने ही राजकुँवरी की आँखों का प्यासा सागर लहरा रहा था।
क्रमशः

Saturday, 27 May 2023

tc 80

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
80-

उसे अपने से दूर रखने का जतन भी किया, यो एक बार झिड़क तक दिया पर सहुवाइन का प्रेम उसकी आखँ की तरह ही ऐंचाताना था।तुलसी जितना ही उससे दूर खिंचते थे वह उतनी ही उनके प्रति बावली होकर पास खिंची चली जाती थी। चम्मो सहुवाइन के समान ही एक राजकुँवरी भी तुलसी के प्रति आकृष्ट हो गई थी। वह भी विधवा थी, अपने मैके में ही रहती थी किन्तु अभी तक किसी पर-पुरुष के लगाव से उसका तन-मन अशुद्ध नहीं हुआ था। देखने में भी बुरी न थी। दो एक बार ऐसा संयोग हुआ कि चम्मो सहुवाइन की उपस्थिति में ही राजकुँवरी भी अपनी भावनाओं का कंचन थाल सँजोए हुए आई। चम्मो के प्रेमपाश से सताया हुआ तुलसी का मन ऐसे मौक़ों पर सहज सुख के साथ राजकुँवरी को देखने लगा और एक दिन तुलसी को यह लगा कि उनका सहज आभास राजकुँवरी के लिए कुछ और अर्थ रखता है और वह अर्थ तुलसी के मन में अनर्थ करता है। नहीं अब प्रपंच में कदापि नहीं पड़ेगा। मोहिनी, राजकुँवरी, ऐंचीतानी अकर्षण विकर्षण, ऊहापोह और उससे मुक्ति पाने के लिए ध्यान योग की कठिन साधना में तुलसी के दिन गुजरने लगे। राजा भगत चम्मो और राजकुँवरी के व्यवहार को ध्यान से देख रहे थे। एक दिन सहुवाइन से उनकी कहा सुनी भी हो गई। राजा ने अन्त में उसे डण्डे मारने की धमकी देकर भगा दिया। इस चीख चिल्लाहट से तुलसी दास का ध्यान भंग हुआ, द्वार खोलकर उन्होंने पूछा- “क्या हुआ रजिया?” राजा भगत ने कहा- “जब तक भौजी घर में न आएंगी तब तक मुझे तुम्हारी इच्छा के लिए ऐसियों से लड़ाई झगड़ें भी मोल लेने पड़ेंगे।” 
तुलसी हँसे, कहा- “भाई, तुम्हारी भौजी तो मुझे इस कुटी में आती दिखलाई नहीं देती और रही चौकीदारी की बात, सो तुमने यह बेकार की चिंता ओढ़ रखी है। नदियाँ पहाड़ को बहा नही सकती, राजा।” 
“हाँ हाँ हाँ, पर धीरे-धीरे उसे काटती जरूर हैं भइया। हम तो कहते हैं कि न हम तुम्हारी चौकीदारी करें न तुम्हें ही खुद अपनी चौकीदारी करनी पड़े। भौजी  आ जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।” तुलसी बोले- “एक ओर तो विलासिनी स्त्रियाँ मुझे तंग करती हैं और दूसरी ओर तुम्हारी यह 'भौजी-भौजी' की रट पीछा नहीं छोड़ती। मैं यहाँ से चला जाऊँगा , राजा।” 
राजा हँसे, बोले- “अब यहाँ से तुम्हारा निकलकर जाना सरल नही है भइया। महाराज ने हमसे कह दिया है कि तुम्हारा ब्याह अवश्य होगा। देखो न, ब्याह की बात जब से उठी है तभी से तुम्हारे पास कितना काम आने लगा है।”
यह सच था कि तुलसी पण्डित को पाठक जी के कारण ही पहले पहल ज्योतिष सम्बन्धी काम मिला।फिर तो बाँदा से लेकर चित्रकूट तक राजे रजवाड़े और साहूकारों मे वे प्रायः बुलाए जाते थे। कथा और प्रवचन आदि के अलावा उनकी ज्योतिष विद्या तथा साहित्य-पॉण्डित्य की ख्याति भी फैली हुई थी। मान के साथ ही साथ धन भी घीरे-घीरे बढ़ने लगा था।आमदनी अच्छी होने लगी थी।वह सारा रुपया-पैसा राजा के पास ही रहता था। उस दिन तुलसीदास राजा की बात को सहसा काट न सके।उनके मन का संघर्ष इस स्थिति पर पहुँच गया था कि वे विवाह का प्रस्ताव को हल्के फुलके ढंग से टाल नही सकते थे। संकटमोचन महावीर जी की स्थापना का आयोजन जोर-शोर से होने लगा। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा और हवन आदि कराने के लिए पण्डित मण्डली का चयन करने की बात उठी। राजा बोले- “तुम हमारे साथ पाठक महाराज के यहाँ चलो।”
तुलसी बोले- “तुम्हारी चालें मुझ पर सफल नही होंगी रजिया।”
राजा बोले- “अरे हमारी होयें चाहे न होयें, पर राम जी जो चाल चलेगें उससे बचना तो तुम्हारे लिए भी कठिन होगा। खैर, ब्याह की बात करने के लिए मैं तुम्हें वहाँ नहीं ले जाऊँगा, पर पंडितों के संबंध में सलाह-सूत लेने के लिए तुम्हे पाठक महाराज से मिलना ही चाहिए।”

तुलसी पण्डित ने राजा भगत की बात मान ली।पाठक जी ने तुलसीदास का बड़ा सत्कार किया। तुलसी पण्डित भी उनके सत्कार से बहुत सुखी हुए।पाठक जी बोले- “आपको देखकर मुझे आपके पिता की याद आ गई। पहली बार जब मैंने आपको कथा सुनाते हुए देखा तो लगा कि पण्डित आत्माराम जी बैठे हैं। तभी तो मैंने भगत से आपके विषय में पूछताछ की थी।” 
तुलसीदास गद्गद होकर बोले- “स्व० पिताजी के सम्बन्ध में कुछ बतलाने वाले आप पहले व्यक्ति हैं। ऐसा लगता है कि जैसे मैं उन्ही से मिल रहा हूँ।”
“वे मुझसे साल-सवा साल बड़े थे। अभागे थे बेचारे, अन्यथा उनके समान ज्योतिषी इस क्षेत्र में दूसरा कोई न था।अपने यजमानों की जन्म-पत्रिकाएँ आपके पिता से बनवाकर कई पण्डित पण्डितराज बनकर पुज गए और वे बेचारे, राम- राम।”
“मैं भी अभागा ही हूँ। अपने पिता के साथ यहाँ मेरा भी साम्य है, मैं कदा- चित्‌ अधिक ही अभागा हूँ। मेरा जन्म अभुक्तमूल नक्षत्र में हुआ था।” 
तुलसीदास ने इस विचार से कहा कि पाठक जी यह सुनकर उनसे अपनी कन्या का विवाह करने की बात अपने मन से उतार देंगे, किन्तु पाठक जी हँसकर बोले- “आयुष्मन्‌, आपकी कुण्डली मैंने भी बनाई थी। अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्मे बालक की ग्रह-दशा पर विचार करने का लोभ भला कौन ज्योतिषी छोड़ सकता था। मैं समझता हूँ कि इस क्षेत्र के तीन-चार पण्डितों के पास आपका टेवा अवश्य मिल जाएगा।” 
तुलसी बोले- “तब तो आप मेरे सम्बन्ध मे सभी कुछ विचार कर चुके होंगे। मैंने स्वयं अपनी कुण्डली पर कभी विचार नही किया। केवल पार्वती अम्मा के मुख से यह सुना भर था कि मेरे ग्रह-नक्षत्र विचारकर, मुझे मातृ पितृ घाती और महा अभागा जानकर ही पिताजी ने मुझे घर से निकाला था।”
पाठक जी बोले- “आपके जन्म के समय आपके गाँव पर घोर विपत्ति आई हुई थी।आपके पिताजी अपने बहनोई की धोखेबाजी के कारण उस समय अत्यन्त त्रस्त थे, उन्होंने कदाचित्‌ सूक्ष्मरूप से आपकी कुण्डली पर विचार नहीं किया था।”
“आप बड़े है। मेरे पिता के परिचितों में से हैं। मैं आपकी बात काटने की घृष्टता नहीं कर रहा, फिर भी अपने अब तक के जीवन को देखते हुए स्वयं मुझे भी मानना पड़ता है कि मैं महा अभागा हूँ।”
क्रमशः

Friday, 26 May 2023

tc 79

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
79-

बड़ी खेती वाड़ी है। एक राजा इन्हें हाथी भी दे रहे थे पर ये बोले कि आप लोग जब मुझे बुलाते हैं तो अपना हाथी भेज ही देते हैं और बाकी हमारे कोई लड़का तो है नही, एक बिटिया है। सो हम हाथी बाँध के क्‍या करेगें? बडे भले आदमी है।”
बात आई-गई हो गई। उस दिन से तुलसीदास ने पैसा को छूना भी बंद कर दिया। यों पैसे टके चार दिनों की पैंठ के समय ही चढा़ करते थे। बीच में राजा भगत की मार्फत जमनापार के पाठक महाराज ने दो वर्षफल बनाने का काम भी तुलसीदास के पास भेजा था।ताजिक रमल शास्त्र के कुछ ही जान कार थे। उन वर्षफलों के बनाने की दक्षिणा में उन्हें ग्यारह स्वर्ण॑मुद्राएं मिलीं। तुलसीदास के जीवन में इतती बड़ी कमाई पहली ही बार हुई थी। सोना छूकर प्रसन्न हुए। अशर्फ़ियाँ अपने हाथ में उठाकर उन्होंने प्रसन्न भाव से उन्हें एक हथेली से दूसरी हथेली को दे देने का बार बार खिलवाड़ किया। फिर एका- एक चौंककर राजा से पूछा- “क्यों जी, दो यजमानों के यहाँ से आई होगीं तो पाँच -पाँच मोहरें आईं होगीं, फिर यह एक ऊपर से हमारे पास कैसे आ गई?”
राजा हँसे, बोले- “हम तो समझते रहे भैया कि तुम एकदम भोलानाथ हो, तुम्हारा घ्यान ही नही जाएगा। यह बढ़ोत्तरी की अशर्फी पाठक महाराज ने अपनी तरफ से मिलाके भेंट भेजी है। कहने लगे, बड़े महाराज का नाम लेके, कि उनका लड़का, सो हमारा लड़का। ऐसा बढ़िया काम करके उसने हमें जिजमानों से जस दिलाया तो हम भी उसे इनाम दे रहे हैं।”
तुलसी प्रसन्न हुए, कहा-“रजिया, एक दिन हमें पाठक जी महाराज के पास ले चलो।मैंने अपने पिता को नहीं देखा तो कम से कम अपने पिता के एक मित्र को ही देख लूँ।”
“अरे वह तो आप ही तुमसे मिलना चाहते हैं। कहने लगे कि हमारी रत्ना जो लड़की न होकर लड़का हुईं होती तो मैं उसे तुलसीदास के पास ही सीखने के लिए भेजता। पाठक जी महाराज ने अपनी बिटिया को अपनी सारी विद्या दी है भैया। सब लोग रत्ना-रत्ना कहते हैं उसे । सुना है पूरी पण्डित हुई गई है।”
तुलसीदास ने हँसकर राजा का हाथ पकड़कर हल्के से घसीटते हुए कहा-“तुम हमसे चांईपना न करो रजिया। हम  ब्याह के फेर में नहीं पड़ेंगे, नहीं पड़ेंगे बताए देते हैं। मैं कह नही सकता राजा कि इस जगह मेरी कुटी छवाकर तुमने मुझे क्‍या दे दिया है।जानते हो मैं यहाँ एक पल के लिए भी अकेला नही रहता। बिना जतन किए अति सहज भाव से मुझे सियाराम जी और लखनलाल के दर्शन सुलभ होते रहते हैं। मेरे मन पर यह मैल जम ही नही सकता तुमसे सच कहता हूँ।”
राजा हँसकर बोले-“तुम ऊँची आत्मा हो भइया। बाकी एक बात कहें, तुम्हारे आस-पास अब ऐसी भगतिनें मँडराने लगीं हैं जो साधु-सन्यासियों का ही शिकार खेलतीं हैं।” 

तुलसीदास खिलखिला कर हँस पड़े और देर तक हँसते रहे, फिर कहा-“रजिया, नदी-नालों में डूब न जाऊँ इसलिए राम जी ने दया करके मुझे बहुत पहले ही समुद्र में डुबाकर फिर उबार लिया था।अब इन लंका की निशाचरियों के घेरे में भी मेरी आत्मा जनकदुलारी के साथ राम के ध्यान में ही रमती है।यह स्त्रियाँ आतीं हैं तो मानों मेरे ध्यान को और अधिक एकाग्र करने के लिए ही आतीं हैं। खैर, अब यह प्रसँग छोड़ो, यह धन तुम्हें सौंप रहा हूँ, पर यह मेरा है। रजिया, इस गाँव में संकटमोचन महावीर जी की स्थापना होगी। जब तक वह स्थापित नही होगें तब तक यहाँ बस्ती भी नहीं बसेगी।” यह सुनकर राजा उल्लास और आनन्द की सजीव मूर्ति बन गए। तुरंत तुलसीदास के पैर छूकर कहा- “भैया, तुम्हारी यह इच्छा बहुत जल्दी पूरी होगी।” 
राजापुर पहुँचकर तुलसीदास के जीवन में एक नया मोड़ आ गया था। यहाँ उनका अधिकांश समय अपने ध्यान-योग ही में बीतता था। बाजार के चार दिनों को छोड़कर दोपहर के बाद तुलसीदास की कुटी के द्वार बन्द हो जाते और वे एकांत साधना में रम जाते थे। राजा भगत भोजन करने के बाद रात  में बाबा की कुटी के आगे एक पेड़ के नीचे अपनी चटाई डालकर पड़े रहते थे। कुटी का द्वार बंद हो जाने के बाद वे न तो स्वयं ही भीतर जाते और व किसी को भीतर जाने देते थे। कुछ राजा भगत के इस प्रतिबन्ध के कारण और विशेष रूप से तुलसीदास की प्रवचन-कला तथा आकर्षक व्यक्तित्व के कारण आसपास के क्षेत्रों में उनकी महिमा बहुत बढ़ गई थी। स्त्रियाँ भी उनकी कथा सुनने तथा उनसे अपने दुःख-सुख निवेदन करने के लिए आया ही करतीं थीं। हाजीपुर की चम्मो सहुवाइन तुलसीदास शास्त्री पर बेपनाह रीझ उठी थी। वह पहली बार पैंठ में उनका प्रवचन होने पर आई थी। फिर जब-तब आने लगी। उसकी एक आँख ऐचींतानी थी। काया भी भगवान की दया से घी के कुप्पे के समान थी। यो रंग गोरा और चेहरे का नक्शा एक हद तक सुन्दर और आकर्षक भी था। भरी जवानी में चार वर्ष पहले विधवा हो गई पर उछलते अरमानों और पैसे की गर्मी ने उसे कभी वैधव्य अनुभव न करने दिया। अपनी तेलधानी चलाती, खेतों में काम कराती और लोक-व्यवहार के सारे काम, मर्दो की तरह बेफ़िक्र होकर स्वयं ही कर लेती थी। जब से तुलसी पण्डित की तेजवान सूरत और गोरी-चिट्टी कसरती देह पर उसकी डेढ़ आँख गड़ी है तब से सहुवाइन को हाजीपुर में रहना तक अखरता है। पहले तो हफ्ते में एक बार और फिर तो दो-दो, तीन तीर बार वह विक्रमपुर आने लगी। जब आती तब घी, अनाज, तेल आदि कुछ न कुछ साथ लेकर ही आती थी। वह सदा इस जतन में रहती कि जहाँ तक बने तुलसी पण्डित से अकेले में कथा सुने या बातें करे। वह उन्हें ऐसी रसीली दृष्टि से टकटकी बांधकर देखती कि तुलसीदास शास्त्री के मन का सारा रस ही सूख जाता था। कभी कभी मौका पाकर चरण छूने के बहाने उसके हाथ बहककर घुटनों के ऊपर जांघ तक पहुँच जाते और तुलसी को उलझन होने लगती थी। उन्होंने चम्मो सहुवाइन को कई बार इशारों में समझाया।
क्रमशः

Thursday, 25 May 2023

78

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
78-

“राम करे, तुम्हारे सुख मे निरन्तर वृद्धि हो, पर मुझे यदि इस प्रलोभन से बाँधने का जतन‌ करोगे राजा, तो विश्वास मानों, मैं यहाँ से ऐसा भागूँगा कि तुम मुझे फिर कभी खोज भी न पाओगे।”
राजा हसँने लगे, कहा-“सूत न कपास कोरियों से लठ्ठमलठ्ठा। अरे भइया, हम तुम्हारा ब्याह अभी थोड़ी ही रचा रहें हैं जो तुम भागने की सोचनें लगे। हमने तुम्हारी कुटी बनाने के लिए एक ऐसी पवित्र जगह चुनी है कि तुम मगन हो जाओगे।चित्रकूट जाते समय राम जी जिस जगह नाव से उतरे थे और जहाँ उन्होंने जानकी मइया तथा लछमन जी के साथ बिसराम किया था वहीं तुम्हारी कुटी छवाऊँगा।”
“हाँ, हमारे गाँव के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से यह बात दोहराते चले आए हैं।”
“राजा, तुम मुझे शीघ्र से शीघ्र उस जगह पर ले चलो।”
“आज नही भैया। आज हम तुम्हारे लिए कुटी बनाने का लग्गा जरूर लगा देगे। दो दिनों में वहाँ सव कुछ तैयार हो जायगा।तेरस से पूनों तक बडी भारी पैंठ लगती है। हमारा विचार हैं कि आजकल में हम आसपास के गाँव में सब जगह यह कहलवा दें कि तेरस से पुनों तक यहाँ कथा बचेंगी। बस उसी दिन तुम्हें वह जगह दिखा ही नहीं देंगे, वहाँ तुम्हे बसा भी देंगे। वहाँ कथा बांचना और आनन्द से ध्यान रमाना।”
ये दो दिन तुलसीदास ने बच्चों जैसी अकुलाहट के साथ बिताए। वह स्थान जहाँ राम जी भाई और सहर्धामिणी के साथ उनकी जन्मभूमि के गाँव में कुछ देर रहे थे और जहाँ अब वे आठों याम रहेंगे, उनके मन की दशा को विरहाकुल बनाने लग।विरह-साम्य से तुलसी के राम-प्रेम ने अन्य यादों को दबा दिया। इस समय राम प्रेम अधिक था।राजा भगत ने सचमुच ही बड़ी सुन्दर प्रचार व्यवस्था की थी।काशी जी से एक बड़े भारी व्यास जी के पधारने की बात दो ही दिनों में दूर-दूर तक पहुँच गई। यह काशी के नाम का महत्व ही था कि पेंठ के दिन हर बार की औसत भीड़ से अधिक लोग विकमपुर आए थे। तीसरे पहर बालू पर, तुलसी दास की नई बनी हुई कुटी के आगे, खासी भीड़ बैठी हुई थी।

तुलसीदास ने अपने प्रवचन का आरम्भ इसी जगह श्रीराम लक्ष्मण और जानकी के पधारने की बात ही से प्रारम्भ किया।भूमि प्रेम जगाते हुए उन्होंने सियाराम-लक्ष्मण के आगमन का शब्दचित्र खींचना आरम्भ किया। तीन लोक के नाथ, सचराचर के स्वामी अपनी ही लीला के वशीभूत होकर, वनवास करने के लिए पधार रहे है। आस-पास के गाँवों मे धूम मच गई है कि कोई दो सलोने राजकुमार आ रहे है। कैसे हैं वे कुमार-

जलजनयन, जलजानन, जटा है सिर, जौवन-उमंग अंग उदित उदार हूँ ।
 सांवरे-गोरे के बीच भाभिनी सुदामिनी-सी, मुनिपट धार, उर फूलनि के हार हैं।करनि सरासन सिरीमुख, नि्षंण कटि, अति ही अनूप काहू भूप के कुमार हैं।तुलसी विलोकि के तिलोक के तिलक तीनि, रहे नरनारि ज्यों चितेरे चित्रुसार हैं।
राम जी उनके संकोच को द्वर करके उनसे ऐसे प्रेमपूर्वक भेंट कररहे हैं कि मानों अपने सगे सम्बधियों से भेंट कर रहे हों। भगवान और जगदम्बा के दर्शन करके लोग निहाल हो रहे हैं। उसी समय एक तापस वहाँ पर आया। वह सबसे पीछे खड़ा हुआ झपलक दृष्टि से अपने आराध्य देव को देखता रहा। भगवान का ध्यान तापस की ओर गया। उन्होंने बड़े प्रेम से उसको अपने पास बुलाया और उसे हृदय से लगाया।तापस के वेश में तुलसीदास स्वयं अपनी ही कल्पना कर रहे थे। तुलसीदास इस तरह से तन्मय होकर सियाराम के शुभागमन का दर्शन कर रहे थे कि जैसे उनके सामने यह दृश्य प्रत्यक्ष हो और न देख पाने वालो के हित मे वे उसे बखान रहे हों। उस दिन का प्रवचन उन्होंने यह कहकर समाप्त किया कि राम दीन बन्धु हैं। जिसका कोई सहारा नहीं है उसके राम सहाय हैं।
तुलसी के स्वर में इतनी सचाई और वर्णन में इतनी सजीवता थी कि सभा में सम्मोहिनी बँध गई। चार दिन की पेंठ मैं तुलसीदास के प्रवचनों की धूम मच गई। लोगों को यह भी मालूम हो गया कि यह व्यास जी दरअसल इसी गाँव के हैं। वे काशी पढ़ने गए थे। बदरी केदार मान सरोवर के दर्शन करके अब यहीं बसने के विचार से आए हैं।प्रवचन के इन तीन दिनों से आरती में चढ़त भी अच्छी हुई। चाँदी और ताँबे के टके चढ़े और पैंठ के अंतिम दिन तुलसीदास जी की कुटी में अनाज और फल-फूलों का भी अच्छा ढेर लग गया। तुलसीदास संतुष्ट हुए। कुछ लोगों को अपनी ज्योतिष विद्या से भी उन्होंने प्रभावित किया। बस फिर तो धूम मच गई। कोई दिन ऐसा नही जाता था कि बाबा की कुटी में दस-पांच आदमी न आते हों। तुलसीदास अपनी आय के बारे मे तनिक भी चिन्ता नही करते थे। इधर आया और उधर किसी दीन दुःखी को दे दिया। राजा को यह रुचिकर न लगा, एक दिन उसने कहा-“भैया आज से जो कौड़ी टके सेवा में चढ़ें उन्हें तुम अपनी रकम मानकर खरच मत करो।”
“ठीक है, वह राशि तुम्हारी है।”
“मेरी नहीं है भैया, वह मेरी आने वाली भौजी की है।”
तुलसी त्योरियाँ चढ़ा कर बोले-“देखो, राजा, तुम अपने मन से इस प्रकार के विचार निकाल दो। मैं इस माया में नहीं पड़ूँगा।”
राजा हँसे, कहा-“जमना पार एक बड़े पंडित जी रहते हैं, वो भी बड़े भारी जोतसी हैं। आपके पिता से उनका नेह-नाता रहा। वह हमसे कहते थे, रजिया, इस लड़के का ब्याह जरूर होगा।”

तुलसीदास खिलखिला कर हँस पड़े और बोले-“राजा, साधु जब हँसी में भी ठग बनने का स्वागँ करता है तो वह तुरंत पकडा़ई में आ जाता है।”
यह सुनकर राजा भी हँस पड़े, फिर कहा- “हँसी मसखरी में हम कभी क‌भी झूठ जरूर बोलते है भैया पर हमारी यह बात भूठी नही है।”
“खैर, हम आज से यहाँ चढ़ने वाला दमड़ी टका अपने हाथ से न छुएंगे। वह तुम्हारा है, तुम्हीं खरच करना। बाकी हमको ब्याह के प्रलोभन मे फँसाने प्रयास मत करो।” 
राजा बोले- “फँसाता तो प्रारब्ध है भैया, जोड़ियाँ पुरवले जनम के संस्कारों से बनती हैं और हमारे दीनबंधु पाठक महाराज कोई ऐसे-बैसे थोड़े ही हैं, एकदम राज जोतसी है, भइया। पक्का घर है।
क्रमशः

Wednesday, 24 May 2023

77

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
77-

सीढ़ियाँ उतरते हुए एक बलिण्ठ और तेजस्वी श्याम वर्ण का युवक जोराखन साहु की बात पूरी होते ही बोला-“अरे हम तो आप हीं तुम्हारे पास आ रहे हैं। हमारे विनौते आए कि नही?”
“देखो, अब माल आया है।चार दिनों से रोज निराश ही लौट जाते थे हम।अबकी तो ऐसा कहना पड़ा है कि कोई चीज ही नहीं मिल रही है।” 
सीढ़ियाँ उतरते हुए ही राजा भगत की आँखें तुलसीदास की आँखों से जा मिलीं थीं।दोनों व्यक्ति मानों एक दूसरे की ओर खिंच रहे थे और दोनों ही एक-दूसरे के लिए चुम्बक भी बन गए थे।पास आकर राजा ने तुलसीदास को झुककर प्रणाम किया। तब तक साहु जी बोल पड़े -“अरे भगत जी, यह  ब्रह्मचारी जी हमसे साधू का स्थान पूछ रहे थे। (तुलसीदास से) महाराज, बैसे ये हैं तो गिरिस्त और चार पैसे वाले भी हैं।सौ-पचास गायें हैं, खेती है। ससुराल का माल भी इन्हीं को मिला है। बाकी हैं यह साधू ही।”
राजा की सरल आँखों में आँखें डालकर तुलसीदास ने प्रसन्न मुद्रा में कहा- “इनकी आँखों में राम झलक रहे हैं।मैं तो देखते ही पहचान गया।”
अपनी प्रशंसा से अति संकुचित होकर राजा भगत हाथ जोड़कर बोले-“मैं तो महाराज साधू संतों का सेवक हूँ।आइए, मेरी कुटिया में अपनी चरन धूल डालिए।”
तुलसीदास एक पग आगे बढ़ा कर फिर मुडे़ और साहु जी से राम-राम की।
साहु जी अपने कत्थे रंगे दांतों की बत्तीसी दिखाकर बोले- “हें हें, मैं तो
आपको अपने यहाँ ही ठहरा लेता पर आपने साधू का स्थान पूछा।”
भगत ने सीढ़ी चढ़ते हुए कहा-“ठीक है, ठीक है, बातों में कौड़ी थोड़े ही खर्च होती है साहु जी। मीठी बातों का दान दे देते हो, यही क्या कम है।” 
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भगत ने तुलसी से पूछा-“कहाँ से पधारना हुआ महाराज?”
“कई वर्षो से तीर्थाटन पर था भाई,पहले काशी में रहा और इस समय सोरों से आ रहा हूँ। बीच में अयोध्या सूकर खेत आदि के भी दर्शन किए।”
“चित्रकूट जाने के लिए इधर आना हुआ है?”
“हाँ , चित्रकूट के दर्शन का प्रलोभन तो है ही, पर विशेष रूप से मैं अपनी जन्म भूमि के दर्शन करने आया हूँ।”
“आपकी जनमभूमी कहाँ है महाराज?”
“यहीं, विक्रमपुर गाँव में ”

राजा भगत चलते-चलते थम गए और चकित दृष्टि से देखकर कहा-“ यहाँ है” 
“हाँ भाई, पर जन्मते ही यह स्थान मुझसे छूट गया था।”
“आपके पिता का क्या नाम था महाराज?”
“पंडित आत्माराम”
“अरे तो आप ही हैं जो अभुक्त मूल नक्षत्र से जन्मे रहे?”
“आपने ठीक पहचाना।”
“तब तो तुम हमारे भैया हो। हमसे एक दिन बड़े। हम अहिर हैं नाम है राजा। जी आपसे चार दिन बड़े बकरीदी भैया हैं। जुलाहे हैं। दस करधे चलते हैं और दर्जी का काम भी करते हैं। पुराने लोग सब बताते रहे, अब कोई नहीं रहा। पुराना विक्रमपुर गाँव तो हमारे तुम्हारे जनम के बखत ही उजड़ गया था। कुछ बरस हुए वो पुरानी बस्ती भी जमना जी की बाढ़ में बह गई।”
“जाने दो राजा, मेरी जन्मभूमि के पुण्य स्वरूप तुम तो हो।”
“अरे हम तो सतंन की चरनधूल हैं। बाकी भगवान ने तुम्हें यहाँ खूब भेज दिया। पहले हमारे गाँव में ब्राह्मनों के कई घर थे। अब सब इधर-उधर चले गए। ऐसा जी होता है भैया कि एक बार यह बस्ती फिर से बस जाय।”

राजा भगत के वाक्य के अक्षर गिनकर और मन ही मन में मीन मेख विचार कर तुलसी बोले-“तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी, भाई। बड़े शुभ मुहूर्त में यह बात तुम्हारे मन मे उदय हुई है।”
खेतों के किनारे चलते-चलते राजा भगत थमकर आनंद चकित मुद्रा मेंतुलसीदास को देखने लगे-“बस्ती बसेगी तो तुम्हारे नाम पर ही अबकी उसका नाम रखा जायेगा।तुम्हारा नाम क्या है भैया?”
“मेरा नाम तुलसी है, पर गाँव का नाम राजापुर होगा। तुम इस गाँव की आत्मा के रूप में ही मुझे मिले हो।”
दो-तीन दिनों में राजा तुलसी ऐसे घुल-मिल गए कि मानों अब तक वे साथ ही साथ रहे हो। तुलसी की ज्ञान भक्ति  भरी बातें सुन-सुनकर राजा और उनके कुनबे के लोग बड़े ही प्रभावित हुए। राजा बोले -“अब तो भैया, हम तुम्हे कहीं जाने न देंगे। यही जमना जी के किनारे तुम्हारे लिए कुटिया बना देंगे। मजे से कथा बाँचना और सुख से रहना।”
“अरे, बहते पानी और रमते जोगी को कौन रोक पाया है, भगत ? जन्म- भूमि देखने की लालसा पूरी हो गई, अब चित्रकूट जाऊँगा।”
“चित्रकूट हम तुम्हें ले चलेंगे। चार दिन वहाँ रहना फिर यहीं आ जाना।”
राजा भगत की यह बात सुनकर तुलसी दास चिन्तामग्न मुद्रा में फीकी हँसी हँसकर बोले- “जान पडता है कि मैं जिस स्थिति से बचना चाहता हूँ उसमें फँसे बिना मेरी और कोई गति नहीं। फिर भी यह देखना है राजा कि हममे से कौन जीतता है।”
तुलसीदास की बाद राजा भगत ठीक तरह से समझ न पाए। अचम्भे-भरी दृष्टि से पल-भर उनको देखते रहने के बाद राजा बोले- “मैं ठीक तरह से यह समझ नहीं पाया कि तुम काहे से बचना चाहते हो? साइति घर-गिरस्ती में फँसने का डर तुम्हारे मन में है, है न। ”
“तुमने ठोक सोचा। असल में बात यह है राजा कि जन्मकुडली के अनुसार मेरा विवाह यदि होगा तो मुझे दु.ख सहना पड़ेगा। यह जानकर ही मैं उससे बचना चाहता हूँ। यह जीवन रामचरणानुरागी होकर ही बीत जाय, बस इससे अधिक मैं और कुछ भी नही चाहता।”
सुनकर भगत हँसने लगे, कहा-“साधू के लिए घर-गिरिस्ती का सपना बड़ा डरावना होता है। हम भी ब्याह नही करना चाहते थे भइया। चौदह बरस की उमिर में हम गाँव के कुछ लोगों के साथ चित्रकूट गए थे। वहीं एक साधू की संगत में हमारे मन से बैराग उपजा। यह देखकर हमारे वप्पा और काका ने झटपट हमारा ब्याह कर दिया। पहले तो हम दु:खी भए पर अब ऐसा लगता है कि अच्छा ही हुआ, घरेतिन ने मेरे जप-तप को अपने भगती-भाव से बढ़ाया है। हम दोनों के लिए घर-गिरिस्ती के काम भी भगवान की पूजा के समान ही हैं।” 
क्रमशः

76

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
76-

फिर गिल्टियों भरी बाँह से डंड लगाने लगे, सो गिर गए। मैं जल्दी में हूँ भगत जी, एक गोता मार के बाबा के पास पहुँचना चाहता हूँ।” कहकर रामू तेजी से नीचे उतर गया। 
भगत जी वेनीमाधव से बोले -“भैया इतने बड़े ज्ञानी और महात्मा हैं पर कभी कभी बच्चों जैसा हठ करने लगतें हैं।” “क्या कहे?” वैनीमाधव जी बोले-“खेल का दीवाना बच्चा कष्ट को महत्व नहीं देता, भगत जी। ऐसा भिक्षु बनना भी बड़ा कठिन होता है।” 
सबेरे स्नान-पूजादि से निवृत्त होकर बाबा अपने अखाड़े के चबूतरे पर बैठतें हैं। वहीं अपने रोग-शोक निवारण के लिए जनता उनके पास आती है। आज उनके न पहुँचने पर तथा ज्वर का हाल सुनकर कुछ लड़के उनके पास पहुँचे। दण्डवत‌ प्रणाम आदि करने के बाद एक लड़के ने पूछा-“कैसी तबीयत है बाबा?” हँसकर बाबा बोले- “अच्छे हैं। आओ, हमसे पंजा लड़ाओगे?” 
सब लोग हँस पड़े, एक बोला-“अरे ये मंगलुआ आपसे हार जाएगा बाबा, आपके हजारों बार मना करने पर भी इसने अभी तक गाली बकना नहीं छोड़ा?” पहला युवक मगंल, मित्र की बात सुनकर चिढ़ गया। उसकी ओर आँखें निकालकर देखता हुआ बोला -“कौन उल्लू का पट्टा साला गाली बकता है?”
कोठरी मे उपस्थित सभी लोग फिर हँस पड़े। बाबा हँसते हुए हाथ उठा कर बोले- “अरे भाई, ये गाली मंगल थोड़े बक रहा है। इसका कुसंस्कार बक रहा है।”
मंगल झेंपकर खोपड़ी खुजलाते हुए बोला- “क्या करें बाबा, लाख जतन करतें हैं पर मुँह से निकल ही जाती है साली।”
एकाध लोग हँसने लगे, पर मंगल ने अपसी बात को स्वर में नया जोर देकर
आगे बढ़ाया, बोला--“आपका यह सारा कष्ट उस दुष्ट रवीदत के कारण ही है बाबा जी। वह मणिकणिका पर आपको मारने के लिए बड़ा भारी अनुष्ठान कर रहा है।”
“हाँ बाबा, मंगल ठीक ही कह रहा है। हमनें भी कल सुना था। दस-बीस लोग उसकी पीठ पर हैं, रुपिया खरच कर रहें हैं। पर बाकी लोग उन पर थू-थू कर रहें हैं बाबा।”
बाबा हँसे, कहा - “भैया किसी के करने धरने से कुछ भी सही गलत नहीं होता।मैं तो अपने पापों का दण्ड भोग रहा हूँ।”

मंगल की त्योरिया फिर चढ़ गईं, बोला -“बाबा, जब तुम इन साले दुष्टों की बात लेकर अपने को पापी कहते हो तब मेरे रोएं-रोएं में आग लग जाती है। तुम्हारे विरुद्ध हम तुमसे भी नहीं सुनेंगे, बताए देते हैं।”  बाबा हँसकर चुप हो गए। मंगलू गरमाता रहा-“इतने बड़े महात्मा है आप जरा एक सराप मुँह से निकाल देव कि मर ससुरे रवीदत्त भसम हुई जा।काठ के उल्लू के पट्ट।” बाबा बीच में हँसकर बोल उठे-“अरे भाई, उसका बाप काठ का नहीं, हाड़ माँस का था, उल्लू भी नहीं था। वह मेरा सहपाठी था।”  मंगल फिर गरमाया, हवा में मुक्का तानते हुए उसने कहा- “आप कहें सही, पर मैं आज उस साले को उठाकर किसी जलती चिता में जरूर फेंक आऊँगा। मुझसे आपका यह कष्ट देखा नहीं जा रहा है।”
बाबा गम्भीर हो गए, बोले- “मंगल जा, व्यायाम कर, मैं इन संत बेनीमाघव जी से कुछ आवश्यक बात करना चाहता हूँ। विश्वास रखो मैं अभी किसी के मारे नही मरूँगा। रविदत्त के साथ कोई खिलवाड़ न करना। उसे अपना मन बहलाने दो, जाओ।” 
युवकों के चले जाने पर बाबा ने राजा भगत से कहा- “राजा,वेनीमाधव को हमारे राजापुर पहुचने का प्रसँग तुम्ही सुनाना। हमे एकांत दो, पर इसका आशय यह भी नहीं है कि मेरी सेवा चाहने वाला कोई दीन-दुखी मेरे पास आ नहीं पाएगा।”
सब लोग उठने लगे तभी बेनीमाधव जी बोले- “हमने सुना था कि आप कुछ काल तक सोरों में भी रहे थे। फिर वहाँ से आपका कैसे आना हुआ? यह अंश भगत जी कदाचित् न सुना सकेंगे।”

“हाँ , पर वहाँ कोई विशेष प्रसँग नहीं घटा। वैसे सोरो रम्य स्थान है। भरत खण्ड के समीप, सुरसरि के तट पर बसी हुई संस्कार-सम्पन्न पुरी है। फिर हमें वहाँ संगति भी भी मिल गई थी । हम वहाँ कथा बाँचते, अध्यापन करते तथा अपनी साधना में रत रहते थे।केवल एक ही विध्न पड़ा । वहाँ हमारी राम-सेवा का जब थोड़ा -बहुत माहात्म्य फैला तो नन्ददास हमारे राम से अपने श्याम को लड़ाने लगे थे। वे स्वस्थ तो अवश्य हो गए थे पर उनकी श्याम-धुन बढ़ गई थी। उन्होंने बड़ा आन्दोलन मचाकर अपने गाँव का नाम रामपुर से बदलकर श्यामपुर कर दिया। मैंने सोचा कि मेरे सामने रहने से इनकी कृष्ण- भक्ति  प्रतिद्वन्द्विता में केवल अखाड़िया बनकर ही रह जाएगी। यह अच्छा न होगा। नन्ददास उच्चकोटि के भावुक पुरुष थे। मैं उन्हें और स्वयं अपने को भी मार्गच्युत नहीं करना चाहता था। तभी एक रात हनुमान स्वामी ने स्वप्न में आदेश दिया कि अपनी जन्मभूमि मे जाकर रह।सो चला आया। पहले अयोध्या गया फिर बाराह क्षेत्र में कुछ दिन उसी स्थान पर बिताए जहाँ नरहरि बाबा की कुटिया थी। मेरे काशी में अध्ययन करते समय बाबा जी के भक्‍तों ने वहा एक सीताराम जी का मन्दिर भी बनवा दिया था। फिर घूमते- घूमने प्रयाग पहुँचा और वहाँ से राजापुर।वह दिन हमारी आँखो के सामने ऐसा स्पष्ट झलक रहा है जैसे आज अभी ही की बात हो।
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यमुना तट पर एक बड़ी नाव आकर घाट से लगती है।उस पर बैठे हुए यात्री उतरने की हड़बड़ाहट में आ जाते हैं।घाट पर बैठे हुए एक अधेड़ सज्जन अपने दुपट्टे  को लहर की तरह हिलाते हुए आगे बढ़कर नाव के मल्लाह से पूछते हैं- “यह नाव कहाँ से आई है भैया”
“प्रयागराज से।”
“अरे हमारा माल लाए हो, जोराखन साहु का?”
“हाँ हां, साह जी, ये बोरियें रग्धूमल बटुकपरसाद के यहाँ से आप ही के…”
“ठीक है, ठीक है।” आश्वस्त भाव से साहु जी ने पलटकर सीढ़ियों के ऊपर खड़े अपने नौकर पलटू को चिल्लाकर मजदूरों को भेजने का आदेश दिया। तभी नाव से उतरकर कुछ क्षणों तक इधर-उधर देखने के बाद तुलसी ने अपने पास ही खड़े हुए साहु जी से पुछा-“यहाँ किसी साधु संत के स्थान या किसी धर्मशाला का पता बतलाएँगे साहु जी?”
“धर्मशाला तो कोई नही”
बाक़ी साधु लोग, सामने से आते  दिखाई पड़े। 
“अरे भगत जी, यहाँ आओं।”
क्रमशः

Tuesday, 23 May 2023

tc 75

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
75-

भगत जी एक अरदास है, राजापुर की कथा अकेले संत जी को ही न सुनाइएगा।”
राजा भगत और बेनीमाधव जी दोनों ही मुस्कराए। भीतर कोठरी में ध्यान- मग्न बाबा पर एक दुष्टि डालकर बेनीमाधव जी ने कहा- “अभी तो सोरों- प्रसँग भी सुनना है।“
उस रात बाबा की पीड़ा कुछ अधिक बढ़ गई थी। पीठ और बाँईं बाँह में कुछ नई गिल्टियां उभर आई थीं। उनका तनाव उन्हे कष्ट दे रहा था। बार बार वे करवट बदलकर कराह उठते थे। रामू दिये के उजाले में उन गिल्टियों पर लेप लगा रहा था। बाबा बोले- “अब हम अधिक दिनों तक इस जर्जर काया में रह नहीं पाएँगे , रामू। इसमे रहने में अब हमें कष्ट हो रहा है, हे राम।”
रामू विचलित हो उठा, कण्ठ भर आया। उससे कहा- “आप इस तरह से हताश होगें गुरुजी तो हमारी कौन गति होगी?”
“हताश नही होता पुत्र, मैं अपना यथार्थ बखान रहा हूँ। मेरे मन की नित्य बढ़ती हुई तरुणाई का साथ अब यह शरीर नही दे पाता।मेरा काम वेग अति मुखर रहा था। ग्राहस्थ जीवन बिताने के बाद फिर से ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना ही मेरे लिए अति कठिन चढ़ाई के समान सिद्ध हुआ।काम से सभी राग जागतें हैं और उसी से समस्त विभूतियों का भी उदय होता है। मैंने अपने काम लौह को रामरसायन से सोना बना लिया है। यह सच है, पर शरीर को तो उसके आघात सहने ही पड़ेंगे। (कराह कर) हे राम, बजरंग ! कहाँ हो प्रभु?” 
रामू बोला- “मैं वैद्य जी के पास जाऊँ प्रभु जी?”
“क्या करोगे। मेरा वैद्य तो हनुमान बली है। मेरे रोम-रोम में तनाव बढ़ रहा है। ऐसा लगता है कि अभी और गिल्टियाँ निकलेगीं। मैं कल्पना करता था कि ऐसा बन जाऊँ कि मेरे रोम-रोम में राम बस जाएँ। उनके अतिरिक्त और कुछ न सोचूँ , कुछ न कहूँ , कुछ न करूँ, पर लौकिक जीवन में रहकर ऐसा संभव नहीं हो सका। राग-विराग में पड़ते, लड़ते यों तों आयु का बहुत सा भाग नष्ट कर दिया। अब रोयाँ रोयाँ अपने अपको दिये गए बिफल प्रलोभन से कुण्ठित और क्षुब्ध होकर मुझे यों दण्ड दे रहा है। राम राम।”
“प्रभु जी, यों तो मैं आपके मर्म को समझने में समर्थ नहीं हूँ, फिर भी लोक में आपके समान समर्पित जीवन का दूसरा दृष्टान्त नहीं दिखलाई देता। आपके क्रोध, शोक, लोभादि मानवीय विकार भी राम स्वार्थ ही से जागते हैं।मैं स्वयं साक्षी हूँ। फिर आपका यह पछतावा, मुझे क्षमा करे प्रभु, स्वयं आपके अति अन्याय लगता है।मेरा कलेजा जब संघात सह न पाया तो कह दिया।” कहते-कहते रामू का कण्ठ भर आया। उसने उनकी बाहँ पर अपना सिर टिका लिया।
बाबा शांत स्वर में बोले -“अपने संकल्प और कमी को सदा तौलते रहना मेरा धर्म है। इससे साधू को शक्ति मिलती है।छोड़ो इसे, तुम्हे एक विचित्र संयोग सुनाऊँ रामू। जिन दिनो में लंका काण्ड में लक्ष्मण-शक्ति वाला प्रसँग रच रहा था उन दिनों भी मुझे वात पीडा़ ने बहुत सताया था। मैंने अपनी पीड़ित बाँह
से जमकर श्रीराम के सतांप विलाप वाली चौपाइयाँ लिखी थीं। मेरी पीड़ा राम के प्रताप में घुल जाती थी। जितनी देर लिखता उतनी देर बाँह में दरद नही होता था | रामू, सुनाओ तो बेटा वह प्रसँग। राम रसायन ही मेरी वेदना हरेगा।”
रामू गाने लगा-
“उहा राम लछिमर्नाह निहारी। 
बोले वचन मनुज अनुसारी॥”

रामू के स्वर के सहारे बाबा के बिम्ब  सजग हो रहे थे। मूर्छित लक्ष्मण का सिर अपनी गोद मे रखे हुए श्रीराम विलाप कर रहें हैं। सुग्रीव, अंगद, सुपेण वैद्य, आदि चिन्तामग्न मुद्रा में बैठें हैं।एकाएक हनुमान को पर्वत उठाए आकाश मार्ग से आते हुए देखकर सबके मुखों पर उल्लास चमक उठता है और उन मनोबिम्बों का सारा उल्लास सिमटकर बाबा के चेहरे पर आ जाता है।वे प्रार्थना करने लगतें हैं- “आओ बजरंगी, मेरी बेर भी ऐसे ही राम संजीवनी बूटी लेकर आओ, थाम लो नाथ ! अन्तकाल में कष्ट न दो।”
बाबा फिर आँख मूँदकर घ्यानमग्न हो गए। प्राण गुफा में अखण्ड दिया जल रहा है। लौं में राम-कथा की अनेक झलकियाँ झिलमिलाती हैं फिर दृश्य में स्थिरता आती है। लक्ष्मण और हनुमान-सेवित श्रीसीताराम मन पर तुलसी के सामने हैं। गुफा असँख्य मृदंग वादन से गूँज रही है, राम राम राम…. बाबा समाधिस्थ हो जातें हैं।

ब्रह्मबेला में बाबा ने आवाज़ दी-“रामू”।
रामू शायद तभी सोया था।बाबा ने दूसरी बार पुकारा। रामू चौंक कर जागा। बाबा ने उसे सहारा देकर उठाने को कहा। जब उसने उनका हाथ पकड़ा तो बोला- “आपको तो ज्वर हो रहा है प्रभु जी।”
“हाँ, गिल्टियों के कारण है।”
“आज आप यदि स्नान न करें तो ….”
“जब तक शरीर मे शक्ति है तब तक अपनी चाकरी से चूँकू? चल, उठा मुझे।”
रामू हिचका, बोला- “वैद्य जी मेरे ऊपर चिल्लाएगें।”
“शाही नौकर नहीं हूँ जो हराम की खाऊँ। जब तक शरीर में उठने की शक्ति रहेगी तब तक राम का यह चाकर अपनें कर्त्तव्यों से विमुख न होगा। वैद्य चाहे जो कहें।”
बाबा ने स्नान किया।कसरत भी करनी चाही पर पहली ही डंड लगाने में गिर पड़े। रामू नें उन्हें उठाकर कहा-“अब कोठरी में चलिए प्रभु जी, सेवक की बात इस समय आपको माननी ही पड़ेगी। वहीं बैठकर ध्यान कीजिए।”
बाबा कराहते हुए बोले-“अरे हमने सोचा कि व्यायाम करने से शरीर में रक्त-संचार होगा तो यह गिल्टियाँ दबेगीं। राम जी की इच्छा।”
“धृष्टता क्षमा हो प्रभु जी, पर मैं समझता हूँ कि गिल्टियों को आपके नियमित व्यायाम के कारण ही…..”
“धत्तेरे की रामभगनवा, तू भी शिवचरण वैद्य की तरह से बोलने लगा।अरे तुलसी के वैद्य रघुनाथ जी है यह मूढ़ मतिमन्द चूंकि हठ के सहारे ही रामचरणानुगामी होता रहा है इसीलिए अंधेरे मे चलने के समान इसे एकाध ठोकर बीच-बीच में लग जाती है। उसकी क्या चिंता?”
बाबा को आसन पर बिठाकर रामू फिर घाट पर पड़ी रह गई बाबा की लंगोटी और अंगौछे को धोने तथा एक गोता मारकर जल्‍दी से लौट आने के लिए लपका। राजा भगत और वेनीमाघव जी उस समय घाट की सीढ़ियाँ उतर रहे थे। रामू पंडित के रामजुहार करने पर राजा ने पूछा “भैया कहाँ है?”
“उन्हे कोठरी मे बिठला के आ रहा हूँ। ज्वर में भी नहाने का आग्रह किया।
क्रमशः

Monday, 22 May 2023

tc 74

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
74-

सच बात तो यह है रामू कि साधक को सिद्ध होकर भी तप से नहीं चूकना चाहिए।तीर्थंकर महावीर वर्द्धमान का यह सिद्धान्त सत्य है। रामभद्र परम उदर हैं। निन्‍दकों की कटु आलोचना से प्रतिपल-प्रतिछिन मन धुलता ही रहता है। एक जगह पर पीड़ा मेरे लिए रत्नावली के समान ही सचेतक बन जाती है, जैसे रत्ना का दाहकर्म करके मानव धर्म से उऋण हुआ था, वैसे ही इस काया के धर्म से उऋण होकर अपने स्वामी की सेवा में जाऊँगा।”
मौका पाते ही तुलसी कथा प्रेमी वेनीमाधव ने बात को फिर अपने रस में बहा देना चाहा।बाबा की बात पूरी होते न होते वेनीमाधव जी बोल उठे- “मैं आपके वैवाहिक जीवन की कथाएँ सुनने को आतुर हो रहा हूँ गुरू जी।“
बाबा मुस्कराए, फिर कहा-“मेरा विवाह राजा ने कराया था। वह कथा भी राजा से ही सुनना। रामू, मेरी जाँघ की गिल्टी बहुत कष्ट दे रही है। लेप लगा दे जरा।”
रामू तुरन्त ही लेप लाने के लिए उठकर गया। राजा बोले -“भैया, तुम्हारी यह गिल्टियाँ हैं तो बलतोड़ फुँसी ही, पर इतने बलतोड़ एक साथ भला कैसे हो सकते है? हमें तो कोई और ही रोग लगता है।”
रामू तब तक कोने मे रखी लेप की कटोरी लेकर आ गया और उनके दाहिने घुटनें के पास झुककर गिल्टी पर लेप लगाने लगा। बाबा बोले- “तुम्हारा अनुमान सही हो सकता है राजा।एक बार सोरों में भी हमें ऐसे ही दो गिल्टियाँ निकली थीं। तब वहाँ लालमणि वैद्य ने इन्हें वात रोग का परिणाम ही बतलाया था। उन्होंने जाने कौन-सा चूर्ण दिया कि दो ही पुड़ियाओं में मुझे चैन पड़ गया।
“तो किसी को सोरों भेजकर लालमणि का पता……”
“अरे वह तो मेरे सामने ही बैकुण्ठवासी हो गए थे। वह बूढ़े थे और बड़े भले थे।”
“तो नन्ददास जी को लेकर आप सीधे सोरों ही गए थे?” बेनीमाधव जी ने पूछा।
“नहीं, पहले मथुरा गया था। बात यह है कि नन्ददास ने अपनी प्रिया की बात टेक सी साध ली कि भईया मुझे मथुरा ले चलो। इस पर हमें भला क्‍या आपत्ति हो सकती थी।वहीं ले गए।”
राजा बोले- “पागल को साथ लेकर चलना भी अपने आप में बड़ा कठिन तपस्या होती है। एक बार हमको भी एक पागल को लेकर चित्रकूट से तिरवेन्द्रम पुर तक आना पड़ा था।इम उस कष्ट को जानते हैं।”
बाबा बोले- “नही, वैसा कोई विशेष कष्ट नन्ददास ने मुझे नहीं दिया। वे प्रायः गुमसुम ही बने रहते थे।मै जैसा कहता था वैसा वे कर लेते थे। उस स्‍त्री की फटकार से उनके दीवानेपन को एक करारा झटका लगा था। अजीव स्थिति थी, वे न इधर में थे, न उधर में। खैर, हम लोग मथुरा आ गए। नन्ददास वहाँ आकर मगन हुए। मुझे गोस्वामी गोकुल नाथ जी के यहाँ ले गए।” 
रामू बोला- “उस समय उनकी क्या आयु रही होगी प्रभु जी, आप से तो छोटे ही होगें?”
“गोस्वामी जी महाराज उस समय नौजवान थे।हमसे आयु में छोटे थे, पर
प्रखर बुद्धि और समर्पित व्यक्तित्वशाली थे। उससे मिलकर बड़ा सुख पाया, लेकिन सर्वाधिक सुख तो भक्तवर सूरदास जी के दर्शन पाकर हुआ था।”
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मन्दिर का एक दालान। पत्थर के एक मेहराबदार दालान में खम्भे से टिके एक छोटी सी गुदड़ी बिछाए सूरदास जी बैठे हैं। उनका इकतारा दाहिने हाथ की ओर पास ही रखा हुआ है। बाईं ओर उनकी लठिया और लौंग-मिश्री की डिबिया रखी है। देह दुबली, मुँह पोपला, हजामत थोड़ी - थोड़ी बढ़ी हुई, बाल सफेद बुर्रक और देह मंजे हुए ताँबें सी दमकती हुई। उनकी आयु लगभग छियासी- सत्तासी वर्ष की होगी।सूरदास अपने उठे हुए दाहिने घुटनें पर हाथ की उँगलियों से धपकियाँ देते हुए किसी भाव में मगन बैठे हुए हैं। उस बड़े दालान और आँगन में कई सेवक-सेविकाएँ काम करते दिखलाई दे रहे हैं। उनकी बातें भी चल रही हैं, परन्तु सूरदास जी सारे वातावरण से अलिप्त हैं। तुलसी और नन्ददास प्रवेश करते हैं।दोनों ही वयोवृद्ध संत-महाकवि के आगे भूमिष्ठ होकर प्रणाम करते हैं।सूरदास सजग होते है, पूछते हैं- “कौन है भैया?”
“मैं हूँ बाबा, रामपुर का नन्‍ददास।”
“अरे आओ आओ दन्ददास, हमनें सुना था कि तुम द्वारिकापुरी के दर्शन करने गए थे।”
नन्ददास के चेहरे पर एक बार लज्जा की लालिमा झाँकी, फिर सँभलकर उत्तर दिया- “हाँ, विचार तो यही था बाबा, पर श्रीनाथजी बीच रास्ते से घसीट लाए,  और मेरे साथ मेरे एक पूज्य, शिष्य और अग्रज गुरू भाई पण्डित तुलसी दास जी शास्त्री भी आपके दर्शन करने के लिए पधारे हैं।”
शास्त्री उपाधि सुनकर सूरदास जी झटपट अदब से बैठ गए और हाथ जोड़कर कहा- “जै माननचोर की, शास्त्री जी महाराज?”
“जै माखनचोर की बाबा ! जै सियाराम ! आप मुझे यों हाथ न जोड़े। मैं आपके बच्चे के समान हूँ।”
“अरे नही भैया, विद्या बड़ी चीज है। अब हमारे गोसाईं गोकुलनाथ जी महाराज को देख लो।आयु देखी जाए तो अभी निरे बालक ही हैं।”
“वे महात्मा और प्रखर प्रतिभाशाली हैं, बड़े बाप के बेटे हैं। मैंने तो बाबा, अपने को पालनेवाली पार्वती अम्मा से आपके पद सीखकर और उन्हें गा गा कर भीख माँगी है मैया मेरी कबहिं बढ़ेगी चोटी।”
सूरदास अपने पोपले मुँह से खिलखिला कर हँस पड़े, फिर कहा-“अरे तुम तो हमारे ही जी की बात कह गए भैया।मैं तरह-तरह से गीत गाकर उस बंसीवाले के द्वारे पर भीख ही माँगता हूँ।मेरा जनम इसी में बीत गया”
नन्‍ददास बोले-“तुलसी भैया बड़े राम-भक्त और बड़े अच्छे कवि हैं।संस्कृत और व्रज भाषा दोनों ही में कविता करते हैं।”
सूरदास के चेहरे पर आनन्द छा गया, कहा-“भला तब तो हमें कुछ जरूर सुनाओं भैया।”
सूरदास की स्मृति से बाबा गदगद थे, कहने लगे-“मुझे सूरदास जी के श्रीमुख से उनका एक पद सुनने का सौभाग्य भी मिला था। वाह, कैसा रसमय स्वर था उनका।”

(गाकर) अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल। काम-क्रोध को पहिर चोलना कंठ विषय की माल।
गाते हुए बाबा तन्मय हो गए। यद्यपि उनकी आँखें खुली हुई थी, पर यह लगता था कि वह अपने सामने के दृश्य से अलिप्त हैं। राजा भगत ने बेनीमाघव को संकेत किया, दोनों चुपचाप उठे। रामू भी उनके साथ ही साथ उठा किन्‍तु द्वार पर आकर ठहर गया, कहा-“मैं यहीं रहूँगा।
क्रमशः

Saturday, 20 May 2023

tc 73

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
73-

तुलसीदास ने एक बार फिर युवती को देखा।वह सचमुच सुन्दरी थी। उसका सौन्दर्य इस समय वेदना से तपकर और भी निखर उठा था। नन्ददास पर एक दृष्टि डालकर उसने तुलसीदास की ओर एक बार गहरी सतेज दृष्टि से देखा पर आँखें झुका लीं। कहा- “पालागन महाराज, क्या आप इनके कोई लगते हैं?”
“हाँ भाई हैं। आप इसे क्षमा करें। दरअसल इसे भक्ति का अचेत उन्माद हुआ है। मेरे भाई को आपके रूप में साक्षात्‌ देवी शक्ति के दर्शन हुए हैं। यह अभी अपनी उपलब्धि को समझ नहीं पाया है। इसे कृपापूर्वक क्षमा कर दें।”
नन्ददास युवती का स्वर कानों में पड़ते ही गाना रोककर उसकी ओर अपलक दृष्टि से देखने लगे थे। उनकी आँखों की पुतलियों में तृप्ति और प्यास दोनों ही झलक रही थी ओर दोनों ही अथाह थी। रूखे गालों पर आनन्द की कांति विराज रही थी। भैया ने कहा कि देवी रूप में दर्शन किए हैं। इस भाव संकेत को लेकर नन्‍ददास सचमुच ही अपनी चितचोर को देवी के रूप मे देखने लगे और फिर स्वयं ही बड़बड़ा उठे- “भैया ने सच कहा, देवी रूप है। मैं तुमसे कुछ नही माँगता भागवान्‌, बस यों ही दर्शन दे दिया करो।”
“दर्शन करने की अभिलाषा है तो मथुरा जाइए, जहाँ भगवान बसते हैं। यहाँ आदमी डरते हैं, उनकी अपनी समझ, अपना मान-सम्मान होता है।” युवती के स्वर में अंगारे भड़क रहे थे। सास ने समझाना चाहा तो और तेज हुई, कहा-“नही अम्मां जी, इतने दिनों से घुटते-घुटते अब मैं पक गई हूँ , या तो ये भोजन करें और यहाँ से जायें, अभी के अभी चले जायें। नही तो मैं सच कहती हूँ , यहीं कटार मार कर आज मैं अपने प्राण तज दूँगी।”
सास जो पीछे पानी का गड़वा लेकर खड़ी थी, घबराकर बोली- “न न बहु, ऐसा गजब न करना। तुम्हीं समझाओ महाराज, हे भगवान, यह तो कोई बड़ी बुरी गिरह-दसा आई है।”
“बुरी हो या भली, पर अम्मा जी, आज या तो यह यहाँ से जाएँगे या फिर मेरी जान ही जाएगी। अब मैं नही सहूँगी। एक नहीं सहूँगीं।”
नन्ददास यह सुनकर थरथर काँपने लगे, उनकी आँखें भर आईं, अश्रुकंपित स्वर में कहा- “मैंने ऐसा क्या अपराध किया है देवी।”
देवी क्रोध में अबोली ही रही। तुलसीदास ने नंददास की बाहँ पकड़ कर उठाते हुए कहा- “जो कुछ अपराध अनजाने में हुआ भी है उसके लिए इस देवी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगो। मैं इसे अभी ही ले जाऊँगा , माई।”
अपनी बांहँ छूडाकर नन्ददास दोनों हाथ जोड़कर और धरती पर अपना सिर झुकाकर बोले- “मैं तुमसे बार बार क्षमा माँगता हूँ। तुम और जो चाहो सो दण्ड मुझे दो पर न तो अपने प्राण दो और न मुझसे जाने को कहो।”
तुलसीदास ने फिर झुककर नन्ददास का हाथ पकड़ लिया और कहा-“उठो नन्ददास, क्या एक भद्र महिला की आत्महत्या का कारण बनोगे? प्रेम क्या इसी का नाम है? फिर इस देवी के साथ मैं भी प्राण दूगाँ।”
नन्ददास की बहकी आँखें यह धमकियाँ सुनकर इतने दिनों मे पहली बार अपना सधाव पा सकीं। नन्ददास की नवजाग्रत लोक-चेत्तना को यह सारी बाहरी स्थिति अत्यन्त विचित्र लग रही थी। संयत, गम्भीर स्वर में उन्होंने कहा- “तुम सदा सुख से जियो, देवी मैं जाता हूँ ।मेरी चूक क्षमा करो, मेरे भइया मुझे लेने आ गए हैं।” 
नन्ददास अपने बायें हाथ का पंजा धरती पर टेककर उठने का उपक्रम करने लगे।बुढ़िया सास बोली- “भोजन करके जाओ महाराज। मेरे द्वारे से बामन भूखा जायगा तो मेरा मन बहुत दुखेगा।”
तुलसी सुनकर एक क्षण चुप रहे, फिर कहा-“अब भोजन का आग्रह न करें। इसे में एक बार स्नान कराना चाहता हूँ।”
“तब भी भोजन की जरूरत पड़ेगी ही। कई दिनों से खाया नही है इन्होंने, आप भी भूखे जाएँगें।” युवती के स्वर में अब शान्ति और सहजता आ गई थी। उसकी आँखें बातें करते हुए बराबर नीचे झुकी रहीं।
तुलसीदास ने नन्ददास की बाहँ पकड़ कर अपना डग बढ़ाते हुए कहा-“पड़ोस के गाँव में मेरे एक परिचित रहते हैं। वहीं इसके स्नान-भोजन आदि की व्यवस्था हो जाएगी। आओ, नन्ददास भाई। आशिर्वाद दीजिए कि इसे भगवत्‌भक्ति मिले। राम जी सदा आपका कल्याण करें।”
तुलसीदास अपने गुरुभाई की बाहँ कसकर थाम हुए आगे बढ़ गए। नन्ददास की काया तुलसी के सहारे जा रही थी, वह स्वयं कहाँ थे इसका पता न था।कुछ डग चलने के बाद नन्ददास खड़े हो गए। तुलसी उन्हें देखने लगे।नन्‍ददास ने अपनी गर्दन युवती की ओर घुमाई फिर बिना उसे देखे ही पलट पड़े। नजरे जो झुकीं तो फिर झुकीं ही रहीं। तुलसीदास की दृष्टि ही नंददास की संरक्षिका थी।युवती करुण दृष्टि से उन्हें जाते हुए देखती रही। उसके दोनों हाथों में अस्वीकृत भोजन का थाल था और आँखों में प्रायश्चित के आँसू उमड़ आए थे।
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सुनाते हुए बाबा के वर्षों पहले बीते हुए क्षण अपनी अनुभूतियों के अणुओं को बटोर कर स्मृति में इतने समर्पित हो चुके थे कि उनसे उनका मन अब भी गूँज रहा था। वे कुछ क्षण आाखें मूँदें चित्त को सुस्थिर करने के लिए अपने भीतर निमग्न हो गए। भूत से वर्तमान में ध्यान को लाते हुए वे बोले- “भूतकाल के जीवन को देखते हुए मुझे अपनी जवानी में एक अयोध्यावासी संत के मुख से सुनी हुई बात इस समय अचानक ही याद आ गई। हम उन दिनों बहुत दुःखी थे। रामघाट पर एक दिन वे हमसे अपने आप ही कहने लगे- “तुलसीदास, यह कभी न भूलना कि जो देवमूर्ति मन्दिर में प्रतिष्ठित होकर लाखों के द्वारा पूजी जाती है वह पहले शिल्पी के हजारों हथौड़ों की चोटें भी सहती है।”
रामू बोल उठा- “पहले ही क्या प्रभु जी, इन कलिकाल के नराधमों ने आपको अब तक चैन नही लेने दिया।आप पुजते भी जा रहें हैं और हथौड़ों की मार भी सहते जा रहें हैं। ऐसा अनोखा देवता किसी देश ने किसी काल में अब तक नही देखा था।”
वेनीमाघव जी रामू की बात सुनकर गदगद हो गए। रामू की पीठ पर हाथ रखकर वे कुछ कहने ही जा रहे थे कि बाबा मुस्कराकर बोल उठे- “अब वह हथौड़े  ही मुझे फूलों जैसे ही लगते हैं। 
क्रमशः

Friday, 19 May 2023

tc72

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
72-

ब्राह्मन पण्डित, रूपवान, मीठा, भला, कोई ऐब नहीं। बाकी ऐबों का ऐब यही लग गया है कि उस भली खत्रानी के रूप का दीवाना हो गया है। वहाँ भी कोई उत्पात नहीं करता, बस बैठा-बैठा या तो गाता है, या हंसता, है, या रोता है। घर वालों की हँसी होती है। वह औरत बिचारी आप आठों पहर रो-रोकर घुली जाती है। नन्हेमल परदेस गए हैं। लोगों को क्रोध भी आता है, दया भी आती है। क्या करें, कुछ समझ में नही आता। उसके साथी छोड़कर चले गए और यहाँ के लोग मुसीबत में पड़े हैं।” 
सुनकर तुलसीदास अत्यन्त गम्भीर हो गए। वह व्यक्ति कहने लगा- “आप उसे जल्दी से जल्दी यहाँ से ले जाइए। आठ आठ, दस दस दिन न खाता है, न पीता है। सास बिचारी दया के मारे बहू के हाथों परोसी पत्तल भिजवाती रही, पर अब बहू बाहर नहीं आती। हठ करती है कि जो मुझे नाहक बदनाम करता है उसे खिलानें नहीं जाऊँगी , चाहे मरे चाहे जिये। आज कई दिनों से भूखा पड़ा है।” 
तुलसीदास अब बातें नहीं सुनना चाहते थे।वे नन्ददास के पास पहुँचने के लिए उतावले हो उठे थे, पूछा -“उस ठिकाने तक क्या आप मुझे पहुचा देंगे।” 
“मैं पहुँचा तो जरूर देता महाराज पर नन्हेमल के यहाँ जाना नहीं चाहता। एक असामी के कारण हम लोगों में दो बरस से खीचतान चल रहीहै उनकी गैरहाजिरी में आपको लेकर मेरा वहाँ जाना ठीक नहीं होगा।” 
“खैर कोई बात नही, आप उस जगह का अता पता ही बतलाने की कृपा करें।”
“हाँ -हाँ, सामने चले जाइए। नरम-नरम आधा कोस है। वहीं भरोपुर बाजार है। बस वहाँ पहुँचकर उत्तर की ओर मुड़ जाइएगा। हनुमान जी का मन्दिर पूछ लीजिएगा। बस मन्दिर से लगी जो पगडंडी दिखाई पड़े पूरब की ओर, उसी पर चल पढ़िएगा ,जैसे वह घूमें वैसे आप भी घूमिए। सामने नन्हेमल का घर आ गया। उनका घर सबसे अलग कोनें में है। बस उसी के सामने नीम के पेड़ तले आपकों अपने गुरूभाई मिल जाएगें।” 

भद्र व्यक्ति के द्वारा बतलाए गए पते पर पहुँचने में तुलसीदास को कठिनाई न हुई। नन्ददास धूल में मुँह गड़ाए कराहते हुए स्वर में कुछ बड़बड़ा रहे थे।तुलसी को अपार पीड़ा हुईं। वह सुन्दर गौरवर्ण कान्तिमय शरीर इस समय धूलभरा म्लान और दुर्बल हो रहा है। शिखा धूल-पसीने से सन-सनकर जटा हो गई है, दाढ़ी भी बढ़ी हुईं है। तुलसीदास उसके पास बैठ गए, सिर पर हाथ फेरकर पुकारा- “नन्ददास” 
अपनी रुदन भरी बड़बड़ाहट में ही नन्ददास ने उत्तर जोड़ दिया- “मर गया नन्‍ददास, अपनी राह लगो। मेरा जी अपने बस में नहीं है बाबा। मैं तो आप ही मरा जा रहा हूँ।” कहकर वैसे ही मुँह गड़ाए हुए रोने लगे।
“इधर देखो नंन्ददास, मैं तुलसी हूँ।” तुलसीदास की बात ने नन्ददास पर इच्छित प्रभाव किया। उनका रोना बड़बड़ाना रुक गया। तुलसीदास उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले-“काशी के बाद यहाँ इस दशा में तुमसे मिलना होगा, इसकी तो मैं कभी कल्पना भी नही कर सकता था।”
सिर उठा, चौंकी कनखियों से देखा, फिर काया में कुछ फुर्ती आई, गर्दन भी तनी, रूखी फीकी आँखों में स्निग्धता आईं, जीवन चमका। होंठो पर ऐसी करुण मुस्कान थी कि देखकर तुलसी दास का हृदय भर आया। नन्ददास अपने आपको सँभालते हुए बोले-“तुम कैसे आ गए भैया?”
“प्रीति डोर में बँधकर।”
नन्ददास की आँखें छलछला उठीं, भरे कण्ठ से कहा-“उसी में बँधकर तो मेरी ऐसी दशा हुई है।”
“कितने दिनो से यहाँ हो?”
प्रश्न सुनकर नन्ददास सामने वाले घर की ओर देखने लगे। द्वार की ओर देखा तो आँखें दोबारा उमड़ी, कांपते स्वर मे कहा- “पता नहीं।”
“तुम्हें क्या कष्ट है?” 
“कुछ नही”
“तुम फिर यहाँ क्यों पड़े हो?” 
“पता नही।” कहते हुए नन्ददास की आँखें सामने द्वार से लगीं रहीं। आँखें भरी तो थी ही और भर उठी। गोरे-मैले गालों पर धारे बह चलीं। तुलसी के कलेजे मे मोहिनी को लेकर अपनी दीवानी टीस याद आई। एक बार तो बीते हुए क्षणों में एक साथ सिमट कर लीन हो गए, परंतु वैसे ही मन के भीतर 'हर-हर' की आवाज सुनी। तुलसी को लगा कि यह स्वर उनके संरक्षक गुरु नरहरि बाबा का है। इस चेतावनी से मन और विकल हुआ, दृष्टि भी चंचल हुई, पर जिघर जाती थी उधर मोहिनी ही मोहिनी दिखलाई देती थी। बिम्ब में मोहिनी और ध्वनि में गुरू स्वर एक दूसरे के पीछे दौड़ते चले। 'हे राम' शब्द बड़ी करुणा से फूटे और आखें मिंच गईं। 
ध्यान में युगल चरण देखने का उपक्रम चला। मोहिनी यहाँ भी घंसने का प्रयत्न करने लगी किन्तु तुलसी अब सचेत और सुस्थिर थे। ध्यान युगल चरणों को ही अपने में लाकर संतोप पाएगा और वह संतोष अन्ततोगत्वा उन्हें मिलने लगा। मन की मुद्रा शान्त हुई। नन्ददास एक विरह भरा पद गाने लगे थे।तुलसी का ध्यान उनके दर्द भरे स्वर से भंग हुआ। वे नन्‍ददास को भावभीनी दृष्टि से देखने लगे। साक्षात‌ वेदनामू्र्ति बने हुए नन्ददास बड़ी तड़प के साथ गा रहे थे।उनकी आँखें मुँदी हुई थीं और चेहरे पर अपार शान्ति विराज रही थी।

तुलसीदास को लगा कि राम को देखने की ऐसी अन्य लगन जो मुझे लग जाय तो फिर बेड़ा ही पार हो जाय। धन्य है नन्ददास की यह प्रीति। धन्य है वह आलंबन जिसके सहारे यह प्रीति बेल चढ़ी।
तुलसी की सराहना की तरंग अभी नीची भी नही हुई थी कि सामने का बन्द द्वार खुला।आधे घूघँट से ढँका एक सुन्दर शालीन मुखड़ा झलका। उसके हाथ में भोजन का थाल है। युवती के पीछे उसकी बुढ़िया सास भी आ रही है।तुलसी समझ गए कि नवयुवती नन्हेमल की तीसरी पत्नी है और नन्ददास की प्रिया है।युवती ने नन्ददास के पास एक और व्यक्ति की बैठे देखा तो ठिठक गई। दोनों हाथ थाली में फँसे थे। वह अपने घूघँट को और गिरा नहीं सकती थी, हाथ केवल उचक कर फिर बेबसी की हालत में आ गए। आँखों की पुतलियों में एक नई ज्योति और चेहरे पर कसाव आया। झिझकते हुए पैर फिर तेजी से आगे बढ़ गए।नन्‍ददास आँखें मूँदे अपने गीत में रमे हुए थे। उन्हें यह होश नहीं था कि उनके सामने उनकी इष्टदेवी आ गई है।
क्रमशः

Thursday, 18 May 2023

tc 71

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
71-

उसने फिर पूछा-“बैरम खां कब मरेंगे?”
“चार वर्ष बाद।”
“क्या मुझे बादशाह से वही दर्जा मिलेगा जो बैरम खां को हासिल है?”
“हुजूर सिपहसालार बनेगें, अच्छे दिन देखेंगे और अगर सँभल कर चलेंगे तो इस कुण्डली वाले प्रतापी पुरुष की छत्रछाया में बड़ा सुख भोगेंगे लेकिन जान पडता है, अन्नदाता वह सुख भोग नही पाएँगे ।”
अब्दुल्ला वेग फिर उलझन में पड़ा।उसने तुलसी से हिन्दी में कहा-“नजूमी, अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी हो तो ऐसी बातें मुहँ से न निकालो।”
“में क्या करूँ जमादार जी, प्रदत का समय इनके अनुकूल नही है। अपने दम्भ के कारण यह ऊँचे दिन देखकर गिरेंगे और सम्राट की ओर से इन्हें प्राण- दण्ड भी दिया जाएगा।”
अदहम खां ने अब्दुल्ला से पूछा- “यह क्या कह रहा है?”
अब्दुल्ला ने सँभलकर, उत्तर दिया-“हुजूर इसका कहना है कि सरकार
बादशाह को कभी नाखुश न करें। आपको जो कुछ भी हासिल होगा वह बादशाह आलम की मेहरबानी से ही हासिल होगा।” 
कुण्डली देखते-देखते एकाएक तुलसी बोले- “राजों सम्राटों में भी ऐसी जन्मकुण्डली किसी विरले पुरुष की ही होती है, सूबेदार जी यह सम्राटों का सम्राट होगा लेकिन पैदल चलने में इसके समान कोई दूसरा आदमी नहीं हो सकता। जब यह किसी पर दयालु होगा तो उसे निहाल कर देगा लेकिन क्रोध आते पर इसकी क्रूरता को देखकर स्वयं यमराज भी सिहर उठेंगे। यह परम धार्मिक और परम विलासी होगा।”
अदहम खा हंसा, बोला- “दीनपरस्त यह चाहे हो या न हो मगर नफरस- परस्त तो यकीनन है। आफताव खां यह काफिर नजूमी तुम्हे यकीनन खुश कर रहा होगा क्योंकि तुम भी तो थोड़ी देर पहले यही सब कह रहे थे।”
आफताव खां बोले- “यकीनन यह जवान अपने फन में माहिर है। इसकी पेशानी देखकर मैं यह सोचता हूँ कि यह नजूमी भी अकबर शाह की तरह ही दुनिया में कुछ कर गुजरने के लिए ही आया है। एक दिन सारी दुनिया इसके कदम चूमेंगी और एक मानी में यह अकबर शाह से ज्यादा बड़ी सल्तनत का मालिक बनेगा।”
अदहम खां की त्योरियाँ चढ़ गईं। घृणा भरी दृष्टि से तुलसी की ओर देख कर उसने आफताव खां से कहा-“आफताव मियां, जरा यह तो बतलाइए कि इस नजूमी का सर अपने धड़ पर और कितनी देर कायम रहेगा?”
“यह काफिर जल्द मरते के लिए पैदा नही हुआ है खां साहव, इसे कोई नही मार सकता।”
अदहम खां को चुभ गया, लाल आँखें निकालकर बोला- “अब्दुल्ला बेग, इस नजूमी को बाहर ले जाओ और इसकी गर्दन काटकर मेरे आगे पेश करो।”

लेकिन उसी समय एक दासी आई, उसने कहा- “हुजूर आलिया ने हुजूर फैज गंजूर को याद फर्माया है।”
अदहम खां के माथे पर बल पड़ा, पूछा-“ऐसा क्या काम आ पड़ा?”
“हुजूर मरियम मकानी ने हुजूर रेवातिया को अभी अपने खेमे में बुलवाया था।वहाँ से तशरीफ लाते ही जनाबे आलिया ने इस कनीज को आपकी खिदमत में भेजा है।”
“अब्दुल्ला वेग इस नजूमी को फिलहाल अपनी नजरबंदी में रक्खो। कल सुबह यहाँ से कूच करने के पेश्तर मैं इसका सर धड़ से जुदा देखना चाहता हूँ। इसके कत्ल का कोई अच्छा सा बहाना भी तुम्हे सोचना होगा।” 
अब्दुल्ला ने सिर झुकाकर सूबेदार की आज्ञा सुन ली।आफताब मियाँ फिर हँसे बोले- “आलीजनाब, मैं फिर अर्ज करता हूँ कि इस शख्स को कोई मार नहीं सकता।” 
मसनद से उठते हुए नौजवान अर्दहम खां की त्योरियों में फिर बल पड़ा, बोला-“आफताब मिर्जा, आप बुजुर्ग हैं, मुझे चुनौती मत दीजिए।” 
आफताब मिर्जा ने फिर उसी बेफिक्री से कहा- “जनाबे आली, अल्लाह से बड़े होने की कोशिश न करें।”
अदहम खां की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। खड़े होकर तलवार म्यान से निकालते हुए तुलसी की तरफ आवेश में झपटा। तुलसी एक पग पीछे हटे लेकिन अदहम खां का शरीर झपटते ही अचानक थरथराया और घड़ाम‌ से गिर पड़ा । वह बेहोश हो गया, उसका मुँह टेढ़ा पड़ने लगा था।उसके बायें अंग पर फालिज गिरा था। बाँदी घबराकर अपनी स्वामिनी के पुत्र को देखने लगी।अब्दुल्ला भी नीचे झुका। आफताब मिर्जा बोले- “अब्दुल्ला, खुदा से बैर मोल न लो। इसे फौरन ही आजाद कर दो। यह काफिर फ़क़ीरों का शाहंशाह है।”
तुलसी और कैलास ही नही वरन‌ उनके आग्रह से ब्रज की यात्री मण्डली भी छोड़ दी गई। अब्दुल्ला ने चलते समय तुलसी के प्रति बडा़ आदर भाव दिखलाया और कहा -“नजूमी, हमारे हक में अपने खुदा से दुआ माँगना। आफताब मिर्जा बहुत बड़े नजूमी हैं। माहम मलका इन्हें बहुत मानती हैं लेकित यह नालायक अदहम खां बड़ा मगरूर और वेवफा है।”

अब्दुल्ला ने मुक्त करते समय तुलसी को चाँदी के बीस दिरहम सिक्के भी नजर किए थे। तुलसी अपने तथा अपने साथियों के मुक्त हो जाने के कारण बड़े ही प्रसन्‍न थे।छूटते ही वे मेघा भगत की टोह में लगे। उन्हे खोजने में विशेष कठिनाई नहीं हुई।सेना से लगभग पाव कोस अलग हटकर वे बराबर साथ ही साथ चल रहे थे। पास पहुँच कर मेघा भगत के पैर छूकर कहा -“आपकी कृपा से ही यह संकट टला है। अद्॒भुत चमत्कार हुआ। मुझे ऐसा लगता है कि राम जी ने नन्‍ददास की रक्षा करने के लिए ही मुझे इस अकाल मृत्यु से बचाया है।” 
भगत जी हँसे, कहा- “राम जी को तुमसे अभी बड़ी सेवा लेनी है भईया।वे न जाने कितनी विपत्तियों से अभी तुम्हें मुक्ति दिलाएँगे किन्तु अब मैं काशी जाना चाहता हूँ। अब और कहीं नहीं जाऊँगा। चिन्ता की आवश्यकता नहीं। तुम्हें नन्ददास के पास जाना ही है। कैलास- नाथ मेरे रक्षक बनेंगे।”
अब्दुल्ला बेग से पाए हुए रुपये तुलसी ने कैलासनाथ को दे दिए ओर ब्रज की यात्री मंडली से सिहँपुर ग्राम का मार्ग पूछकर वे पीछे की ओर लौटकर चल दिए। तीसरे दिन दोपहर के समय वह सिंहपुर के निकट पहुच गए।
“क्यों भाई इस गाँव में कोई ऐसा परदेशी पड़ा है जिसका मन बावला है” “हॉं हाँ, वह बावला क्या हुआ है महाराज, उसने सारे गाँव को बावला बना दिया आप उसे ढूँढ़ते हुए आए हैं? उसके नातेदार है?” 
“हाँ“
“भाई हैं”
“हाँ गुरुभाई। वह इस समय कहाँ होगा?” 
प्रौढ़ किसान ने फीकी हँसी हसँकर कहा- “वह हर समय नन्‍हेमल के घर के आगे ही पड़ा रहता है। उसे ले जाइए महाराज, सारी बस्ती के लोग दु:खी हैं।
क्रमशः

Wednesday, 17 May 2023

tc 70

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
70-

वह अफीम, भाँग आदि अमल तैयार करने और अपने बूढ़े मालिक को कोरी बातों से ही संतुष्ट करके सुला देने के लिए गाँव में सविनोद प्रख्यात थी। अब्दुल्ला ने तो उसकी यह मनोरंजक ख्याति सुनकर तथा उसका नाक नवशा सिजले देख कर ही भेजा था। मगर नरगिस आलसियों की सरदारिनी भी थी, यह उसे नहीं मालूम था। नरगिस से चूक यह हुई कि उसने मदकची बेग के अमल की मात्रा को कम समझा। आधी रात तक तो उसने मदकची बेग को रिझाने का अच्छा प्रयत्न किया, किन्तु उसके बाद वह सो गई। मदकची बेग का नशा जल्दी ही उचट गया पिनक से होश में आने पर उसने देखा कि नरगिस खुर्राटे भर रही है। उसने जगाकर उसे अफीम घोलने का हुक्म दिया। नींद की मारी नरगिस अनख कर उठी और उसने दो कटोरियों मे चटपट अफीम उंडेली। दुर्भाग्य से कम अफीम वाली कटोरी, जो कि उसने अपने वास्ते घोली थी, बूढें तातारी को दे गई और गहरी वाली खुद पी गई। इसके बाद तो जैसे वह घोड़े बेच कर सो गई और खर्राटे भरने लगी।मदकची वेग थोड़ी देर के बाद ही फिर अपनी पिनक से जाग पड़ा और अपनी अंकशायिनी के खुर्राटों से परेशान होता रहा। 
तातारी हाकिम के गुस्से के कारण उस की उबलन भरी बातों से जानकार होकर अब्दुल्ला समझ गया कि नया हाकिम खासा बौड़म आदमी है। उसे अपने मातहतों पर हुकूमत करना नहीं आता। उसका भय कुछ कुछ कम हुआ। उसने खुशामदाना अन्दाज में झुककर कहा-“हुजूरेआली, यह कम्बख्त हिन्दुस्तानी औरत हुजूर के अमल करने की ताकत को सही तरीके से आँक न सकी। मैं आज ही उसका कत्ल करवा दूँगा।” “नही, नही, वह बेवकूफ भले ही हो मगर सेज पर मौजे-दरिया की तरह , लहराती है। मैं उसको एक मौका और देना चाहता हूँ। तुम उसे सिर्फ इतना ही समझा दो कि मैं बहुत बड़ा हाकिम हूँ और अगर उसने मेरी खिदमत ठीक तरह से नही की तो मैं उसकी बोटी-बोटी नुचवा दूगाँ।”
“जी बहुत अच्छा हुजूर।” 
“उसे इसी वक्‍त जाकर जगा दो।कम्बख्त्त मुझसे जागती भी तो नहीं।” अब्दुल्ला ने उसे भीतर जाकर चुटकियाँ काट-काटकर बाद में तमाचे मार कर जगाने की कोशिश की मगर वह मुर्दों से बाजी लगाकर सो रही थी। अब्दुल्ला को कुछ न सूझा तो तैश में आकर उसकी एक टाँग और हाथ पकड़ कर धम्म से जमीन पर गिरा दिया।तब नरगिस की नींद टूटी। धमाके की आवाज सुनकर मदकची बेग भीतर पहुँच गया और उसे जमीन पर गिरा हुआ देखकर अब्दुल्ला पर नाराज हुआ। अब्दुल्ला ने बात बनाई कहा-“हुजूर इसे मैंने नहीं गिराया बल्कि मौजे-दरिया की तरह यह इतनी जोर से उठी कि आप ही आप उछलकर जमीन पर गिर पड़ी।” नरगिस बड़बड़ाई। उसके चेहरे पर गिड़गिड़ाने का अंदाज था। मदकची बेग ने अब्दुल्ला से पूछा- “यह क्या कह रही है?” 
अब्दुल्ला ने चूँकि नरगिस की बात को स्वयं भी न समझा था इसलिए बात बनाई, हाथ बाँधकर कहा- “हुजूर ये साली, यह कहती है कि इसने आपको उड़न खटोले से सैर कराने के ख्याल से छँलाग लगाई थी, लेकिन मुझे देखते ही शर्म और नफरत के मारे गिर पड़ी।” “ठीक है, ठीक है। उससे कहो कि हमको यों ही खुश किया करे।”अब्दुल्ला ने नरगिस को अमल तैयार करने की आज्ञा दी और हिन्दी में उससे कहा-"इसे गहरा नशा पिला, नहीं तो सबेरा होते ही यह तेरी और मेरी गर्दन उड़वा देगा।”
नरगिस ने फिर मदकची वेग को गहरी घोलकर ऐसी नशीली चितवन से पिलाई कि सुबह पडा़व उठने तक वह जाग ही न पाया। 
सबेरे अब्दुल्ला ने आकर तुलसी से कहा-“बिरहमन फौरन मेरे साथ चलो। सूबेदार साहब ने तुम्हें याद फर्माया है।” तुलसी और कैलासनाथ को लेकर अब्दुल्ला वेग चला। नया सरदार अदहम खां अपने खेमे के अन्दर बैठा हुआ एक मुगल बुजुर्ग से बातें कर रहा था। तुलसी को भीतर बुलवा लिया। कैलासनाथ खेमे से बाहर ही रहे। खेमे मे प्रवेश करते हुए तुलसी को अब्दुल्ला बेग की तरह ही झुककर दोनों हाथों से सलाम करनी पड़ी। अदहम खां ने मुस्कराकर कहा-“बिरहमन तुम होशियार नजूमी हो, हम तुमसे खुश हैं।” 
“तो श्रीमान‌ जी फिर मुझे और मेरे साथियों को मुक्त करे।” 
“हमने तुम्हे एक जायचा देखने के लिए बुलवाया है।” कहकर उसने तख्ती और लिखने की बत्ती मँगवाई।उसके आने पर मुगल बुजुर्ग ने एक राशि-चक्र खींचा। तुलसी को थोड़ी देर मुश्तरी को वृहस्पति और जोहरा को शुक्र के रूप में समझने में लगी। ग्रहों और राशियों के भारतीय नाम समझकर तुलसी कुण्डली विचारने लग गए। कुछ ही पलों में वह प्रसन्‍न होकर बोले- “यह कुण्डली किसी बडे़ ही चमत्कारी पुरुष की लगती है। ऐसे लोग कम देखने में आते हैं। वाह ! यह किसकी ,कुण्डली है, सूबेदार साहब?”
“इससे तुम्हे कोई वास्ता नही । तुम खुद ही बतलाओ कि यह कौन हो सकता है।”
अब्दुल्ला वेग ने अदहम खाँ और मुगल बुजुर्ग को तुलसी की हिन्दी, में कही हुई बात को फारसी भाषा में समझाया। सुनकर मुगल बोला- “इसके कुछ हालात बयान करो।” 
“साहब, यह है तो अभी बालक ही परन्तु अद्भत नक्षत्रधारी है। यह व्यक्ति परम अभागा और परम सौभाग्यवान एक साथ है। इसके जन्म के समय इसके माता-पिता पर बड़ा संकट आया होगा। बचपन में इसे अपने माता-पिता से अनेक वर्षो तक अलग भी रहना पड़ा होगा और इसनें- अपने माता-पिता का राज्य भी छोटी आयु में ही पाया होगा।”
अदहम खां ने पूछा- “इसकी मौत कब होगी?”
तुलसी कुण्डली देखते हुए हँसे, बोले- “जिसके राम रखवारे हो, उसे कोई मार नही सकता।इस बालक नृपति ने अब तक अनेक बार यमदूतों को पछाड़ा होगा। यह राम जी का आदमी है, इस संसार में उन्हीं का काम करने के लिए जन्मा है” तुलसी की बात सुनकर मुगल का चेहरा खिल उठा किन्तु अदहम खां का चेहरा कठोर हो गया।उसने पूछा-“मै कब बादशाह बनूँगा, नजूमी?” 
तुलसी ने विचारकर कहा- “इस जन्म में कदापि नहीं।”
खुशामदी अब्दुल्ला वेग अपनी स्वामी से ऐसी स्पष्ट बात कहने का साहस न कर सका। उसने अनुवाद करते हुए अदहम खां से कहा- “हजरते आली, यह‌ कहता है, हुजूर बादशाह पर हुकूमत करेंगे।” 
अदहम खां को बात सुनकर क्रोध तो न आया किन्तु संतोष भी न हुआ।
क्रमशः

Tuesday, 16 May 2023

tc69

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
69-

मगर उसका असर बड़ा भयानक हुआा जा रहा है। तनिक बिचारो कि मेरी जान को तो कोई खतरा नही है?”
तुलसीदास ने गणना करके कहा-“जमादार जी, आप लम्बी तान कर सोइए। आपके दोनों दुश्मनों का आज ही तबादला हो जाएगा। मार्ग के अगले पड़ाव तक आपका हाकिम बदल जायगा।”
सुनकर अब्दुल्ला बहुत प्रसन्न हुआ, बोला- “नजूमी, अगर तुम्हारी बात सच निकली तो मैं आज रात में तुमको ओर तुम्हारे साथी को आजाद कर दूँगा और बाकी रास्ते में तुमसे अब बोझा ढोने की बेगार भी नहीं ली जाएगी, लेकिन तुम्हें मेरा एक काम करना होगा।”
“क्या करना होगा?” 
“मैं तुमको अदहम खां के पास लिए चलता हूँ। तुम्हें किसी जुगत से यह बात अदहम खां के मन में बैठानी हो होगी कि उसके यहाँ तलाशी लिवाने में मेरा तनिक भी हाथ नहीं था। अदहम खां बादशाह का दूधभाई है। अब तक मुझसे खूब राजी भी रहा है, आगे भी वह मेरी मदद कर सकता है। मैं उससे बिगाड़ हरगिज नहीं करना चाहता।” 
सुनकर तुलसी दास ने सलाह के लिए कैलासनाथ की ओर देखा।कैलास ने आँखों ही में संकेत करके अपनी सहमति प्रदान की। अब्दुल्ला एक मातहत को कुलियों का काफिला आगे बढा़ने का हुकुम देकर उन दोनों के साथ नायव अदहम खां की ओर चल दिया।हरम की शाही बेगमों, रखेलौं, नाचनेवालियों, बाँदियों तथा दूसरे-तीसरे वर्ग तक के ओहदेदारों की स्त्रियों का काफिता एक साथ चलता था। उनकी रक्षा में सेना की दो टुकड़ियाँ चलती थीं।अदहम खां उन्हीं के काफिले के पीछे था।वह उस समय बहुत ही तैश में भरा हुआ था। अब्दुल्ला पर यद्यपि इस समय तक उसके मन में कोई खास शक तो पैदा नहीं हुआ था।उसका अहम अपने सौभाग्य से दीपित आवेश में हर एक को अपने आगे तुच्छ समझ रहा था। अब्दुल्ला तो मातहत होने की वजह से यों भी तु्च्छ ही था।उसको देखते ही वह भड़क पड़ा- “तू अपना काम छोड़ कर यहाँ क्यों आया।” 
अब्दुल्ला गिड़गिड़ा कर बोला- “सरकार को मुबारकबाद देने आया हूँ।मुझे तो  इस नजूमी ने बतला दिया था कि आप पर खुदा मेहर बान है। जरा भी आँच नहीं आएगी। मैं इसीलिए इनको आपकी खिदमत में ले आया हूँ ,मगर वल्लाह तारीफ है उस हुजूर की दूरदेशी की जो पहले से ही उन आने वाले ख़तरों को भाँप लेती है।कल तक तो हुजूर ने मुझसे कुछ और ही बात कह रखी थी।”
अदहम खां खुशामद से ढीला पड़ा गया, बोला-“अल्लाह का शुक्र है। वही दु्श्मनों को तबाह करता है। नजूमी, यह बतलाओ कि अभी हाल में ही हमने जो काम किया है उसका आखिरी अन्जाम क्या होगा? ”
तुलसी विचार करके बोले-“हुजूर, जिस वस्तु को आप अपने यहाँ से निकाल चुके वह अब आपके पास लौटकर नहीं आयेगी।”
सुनकर अदहम खां की त्योरियाँ कुछ-कुछ चढ़ गईं। मन में इस समय अपनी जीत के नशे में गुलनार बहुत ही प्यारी लग रही थी।वह उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। इसीलिए तुलसी की बात सुनकर उसका मिजाज बिगड़ने लगा। कैलासनाथ का ध्यान उधर गया। उन्होंने तुरन्त ही हाथ जोड़कर कहा- “हजूर, मेरे साथी अल्लाह ईश्वर के बड़े भगत भी हैं। इनकी बात में आपकी भलाई के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।”
अदहम खां के क्रोध के उबाल पर मानों ठंडे पानी का छींटा सा पड़ा।पल भर चुप रहकर उसने फिर पूछा- “वह माल कौन ले जाएगा? ”
तुलसीदास ने विचार कर कहा-“किसी बहुत ऊँचे घराने का आदमी।”
“उसकी औलाद क्या होगी?”
“लड़का ” तुलसीदास ने विचार कर फिर कहा- “वह राजा बनेगा।”
“क्या उससे या उसकी वालिदा से मेरी फिर कभी मुलाकात होगी?”
“माँ से कभी नही किन्तु बेटे से होगी….न होती तो अच्छा होता।”
“क्यों”
“लड़ाई के मैदान में या तो वह आपकी हत्या करेगा या आप उसे मारेंगे।”
अदहम खां का तेहा फिर भड़का, आँखें लाल हुईं। वह तुलसी के प्रति कोई कड़ा आदेश देने ही जा रहा था कि अचानक कुछ विचार आते ही गम्भीर हो गया, बोला-“ऐ विरहमन, मुझे तुम्हारी सच्चाई का इम्तहान लेना होगा। तुम मुझे कोई ऐसी बात बतलाओ जो घड़ी आध घड़ी या सूरज ढले से पहले तक होने वाली हो ” 
तुलसी ने तुरन्त उत्तर दिया -“थोड़ी ही देर मे सरकार का तबादला दूसरी फौज में हो जाएगा।”
अदहस खां चौंका, फिर उसके चेहरे पर आश्चर्य भरी खुशी झलकी,पूछा- "क्या मेरी तरक्की होगी?” 
“जी हाँ।”
“मेरे दुश्मन का क्‍या अन्जाम होगा?”
“उसका भी तबादला होगा हुजूर, और आज ही होगा।”
“क्या उसकी भी तरक्की होगी?”
“हाँ, अन्नदाता लेकिन वह शीघ्र ही मारा जाएगा।”
अदहम खां के चेहरे पर तुलसी की बात के पूर्वार्ध ने ईर्ष्या की भड़क उठाई और बाद की बात ने सन्तोष की झलक भी। वह दो पल चुप रहा, फिर कहा-“अबदुल्ला, उन ब्रह्मनों को आज शाम तक अपनी निगरानी में रखो।”
शाम को पड़ाव पर पहुँचने तक जमादार अब्दुल्ला को अदहम और करीम खां के तबादले का समाचार मिल चुका था। करीम खां बैरम खां के अंग-रक्षकों में नियुक्त हो गए थे और अदहम खां को सूबेदारी मिली थी।अबदुल्ला का नया हाकिम एक अधेड़ तातारी था जो मदक पीने के लिए खासा बदनाम भी था।अपने ज्योतिषी बन्दी के प्रति अब्दुल्ला की आस्था अब बहुत बढ़ गई थी, इसलिए मुक्त करने से पहले वह तुलसी को अपने नये हाकिम के पास भी ले जाना चाहता था। उसने तुलसी से अपने नये हाकिम के सम्बन्ध में पूछा कि उसके साथ उसकी कैसी  निभेगी? 
तुलसी ने कहा- “सूर्यास्त के बाद मैं ज्योतिष की गणना नहीं करता। अपने वचन के अनुसार आप मुझे अब मुक्ति प्रदान करें।” 
सुनकर अब्दुल्ला को क्रोध आ गया, उसने कहा- “तब फिर तुम्हें भी कल ही आजादी मिलेगी।” दूसरे दिन नये हाकिम ने, जिसे सब लोग पीठ पीछे मदकची वेग के नाम से पुकारते थे, कुलियों के जमादार अब्दुल्ला को सुबह मुँह अँधेरे ही बुलवा भेजा। उसके सामने पहुँचते ही मदकची बेग ने एकाएक भड़ककर कहा- “क्यों बे उल्लू के पठ्ठे, ऐसी बेहूदा औरत कल रात तूने मेरे पास भेजी जो कि सोते में खरार्टे भर भरकर सारी रात मुझें परेशान करती रही।”
अब्दुल्ता जमादार डर के मारे थर थर काँप उठा। उसने गाँव से पकड़ी गई हेमू के रसद व्यवस्थापक की रखैल को मदकची के पास भेजा था।
क्रमशः

Monday, 15 May 2023

tc68

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
68-

गुलनार में भी कोहकाफ की परियों का, ऐसे ही कुछ दूर-दराज का असर अवश्य दीख पड़ता था।नायब सूबेदार करीम खाँ ने उसे लाहौर के बाजार में खरीदा था।अब्दुल्ला वेग का हाकिम नायब सूवेदार अदहम खां था। वह अकबर को दूध पिलाने वाली धाय माहमअनका का पुत्र था। स्वभाव से कुटिल, स्वार्थी और विलासी। आयु में वह अभी सोलह-सत्रह वर्ष से अधिक नहीं था। अकबर का उसके प्रति ममत्व था, यद्यपि वह उसके स्वभाव को पसन्द नहीं करता था। अकवर के संरक्षक बैरम खां ने माहमअनका के इस बेटे को कभी पसन्द नही किया लेकिन वादशाह की सिफारिश से उसने शाही जनानखाने और मालखाने का रक्षक और प्रबन्धक सेना में उसे नायब का पद दे रखा था। करीम खाँ यद्यपि भारतीय पंजाबी मुसलमान था फिर भी बैरम खाँ उसकी स्वामिभक्ति और योग्यता से सन्तुष्ट था। अनेक ईरानी, तूरानी नायबों से अधिक वह उसका विश्वास करता था। बादशाह के दूध भाई अदहम खाँ को किसी हिन्दुस्तानी मुसलमान के आधीन रहकर काम करना बहुत अपमानजनक लगता था, लेकिन इस अपमान से न तो उसकी माँ उसे बचा सकती थी और न स्वयं बादशाह ही। करीम खाँ ने जिस दिन गुलनार को खरीदा था उसी दिन अदहम खाँ की कुदृष्टि उस पर पड़ गई थी। उसने अपने विश्वासपात्र अ्नुचर अब्दुल्ला से कहा कि करीम खां इस दासी का भोग न करने पाए। रात होने से पहले ही गुलनार उसके यहाँ से गायब होकर अदहम खाँ के पास पहुँच जाए।
अब्दुल्ता बेग महत्त्वाकाक्षी था।बादशाह के दूधभाई का महत्त्व जानता था।इसीलिए उसने अभदहम खाँ से भी बड़े हाकिम की खरीदी हुईं बाँदी को उड़ा लाने का दुस्साहस किया। करीम खां की एक दासी युवक और अविवाहित अबदुल्ला वेग पर अनुराग रखती थी। अब्दुल्ला ने उसे अपने प्रेम और अदहम खां के पंजे से बचा लिया। झुरपुटे में गुलनार उड़ा ली गई और 'आदमखोर बाघ ले गया-ले गया' की धूम मच गई। दूसरे ही दिन संयोग से फौज को लाहौर से दिल्‍ली की ओर कूच करना पडा़। सेना चूकि तेजी से गति कर रही थी इसलिए करीम ख़ां अपनी दासी के संबंध में गहरी खोजबीन न कर पाया। फिर भी पानीपत के करीब पहुँचने तक उसे यह मालूम हो चुका था कि गुलनार को आदमखोर बाघ नही बल्कि अधर्मी अदहम खां उड़ा ले गया है। वह बड़े ही क्रोध में था। उसने अदहम खां के पास तक यह सूचना भेज दी कि वह उसकी आजर- बैजानी दासी को यदि शीघ्र ही लौटाकर उससे क्षमा नहीं मागेगा तो युद्ध समाप्त होते ही वह बैरम खां अतालीकी से निश्चय ही इस बात की शिकायत करेगा।ऐसी हालत में उसे बादशाह का दूधभाई होने के बावजूद जो नतीजा भुगतना पडे़गा।अदहम खां उसे अच्छी तरह से जानता है। पर अहमद खां करीम खां से क्षमा माँगने को किसी भी तरह तैयार न था।
दूसरे गुलनार ने उससे यह भी कह दिया था कि वह उसका गर्भ घारण कर चुकी है। अदहम खां के लिए फिर यह सोचना तक असह्य था कि उसकी संतान उसके दुश्मन की दास कहलाए।गुलनार स्वयं भी अब अदहम खां को नहीं छोड़ना चाहती थी।लेकिन अदहम खां को अपनी नौकरी और जान भी प्यारी थी। अपनी नौकरी और जान दोनों की रक्षा करने के लिए अदहम खां ने एक उपाय सोचा। उसने गुलनार का विवाह अब्दुल्ला वेग से कराने की उक्ति सोची। योजना बनी कि कह दिया जाएगा कि रात को यह औरत भाग कर अब्दुल्ला के खेमे में घुस गई और गिड़गिड़ाकर शरण माँगने लगी। कहा कि हेमू बककाल के महलों की दासी हूँ, हाल ही में खरीदी गई थी। अब्दुल्ला ने देखा कि औरत अच्छी है, मुसलमान है, बाप-दादों के इलाके की है और वह चूँकि कुँवारा था इसलिए उसने जब अदहम खां से सारी बात कही तो उसने दोनों का निकाह पढ़वा दिया। अब वह एक तुर्की मुसलमान की ब्याहता बीवी है। उसे कोई नहीं छीन सकता। यह योजना बनाकर अदहम खां ने सोचा था कि कुछ दिनों के बाद मामला जब ठंडा पड़ जाएगा और अगर उसे गुलनार से बेटा हुआ, तो अव्दुल्ला से तलाक दिलवाकर वह उसे अपने पास फिर से ले आएगा।
अदहम खां की इसी युक्ति में नियति ने तुलसी और कैलासनाथ के भाग्य का संयोग भी जोड़ दिया था। तुलसी की भविष्यवाणी सुनकर अब्दुल्ला जमादार अपनी जान बचाने के लिए मन में कुलाबे भिड़ाने लगा। अब्दुल्ला महत्त्वा कांक्षी अवश्य था, जी हुजूर भी था मगर पराया पाप बिना किसी लज्जत के अपने सिर पर मढ़े जाना उसे तनिक भी स्वीकार न था। वह अरदहम खां की सारी चतुराई भाँप गया था। भूठा निकाह पढ़वाकर हाकिम की धरोहर अपने पास रखने के लिए वह हरगिज तैयार नहीं था।मगर वह अदहम खां के सामने इनकार करने का साहस भी नहीं कर सकता था। हिन्दुस्तानी तुर्क अब्दुल्ला भी अपुनी आन और जान बचाने के लिए खालिस तुर्के अदहम खां का दुश्मन बन गया। उसने नायब करीम खां को बतला किया कि अगर वह इसी वक्‍त सरकारी दौड़ ले आए तो अदहम खां के खेमो से गुलनार बरामद की जा सकती है।
संयोग से प्रदहम खां ने तय की हुई योजना उसी दिन बदल दी। उसके एक साथी तुर्क मोनेम खां की फूफी शहजादे की तातारी बेगम के महल की बाँदी थी। अ्दहम खां ने मोनेम खां की सलाह से गुलनार को शाही डोली पर चुपचाप शाही बादियों के महल्ले में भिजवा दिया था।जब नायब करीम खां सिपाहियों की दौड़ लेकर उसके यहाँ तलाशी लेने आया तो चिड़िया उड़ चुकी थी। अदहम खां ने त्योरियाँ चढ़ा कर करीम खां को सरेआम खूब कहनी पर कहनी सुनाईं।
बेचारे अब्दुल्ला की जान अब सीधी दो चक्कियों के पाटों मे आ गई थी। उसका हाकिम नायब अदहम खां और आलाहाकिम नायब करीम खां दोनों ही उसपर शक कर रहे थे।इसलिए तुलसी की भविष्यवाणी का उस पर तात्कालिक प्रभाव पड़ा था और उसने अपनी दौड़ धूप आरम्भ की थी।

कैलास और तुलसी को एक जगह अलग खड़ा करके तथा उन पर लदे माल को दूसरों पर लदवाने का प्रबन्ध करके अब्दुल्ला उन दोनों को लेकर एक सनन्नाटे की जगह में चला गया। उसने घबराकर कहा-“नजूमी, तुम्हारी बतलाई हुई बात सच निकली।
क्रमशः

Sunday, 14 May 2023

tc 67

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
67-

कैलाश और तुलसी अपनी क्षुब्धता से भी अधिक विवश थे।यह विवशता तुलसी को मथ रही थी। एक मन कहता कि राम को बिसारकर नारी में रमा, यह उसी का दण्ड है।दूसरा मन क्षुब्ध होकर कहता कि यह दुष्ट असुर जो कामिनी कांचन सत्ता और ऐश्वर्य के मद में आठों पहर डूबे रहतें हैं, कभी एक क्षण के क्षणांश में भी जो ईश्वर को नहीं भजते, इनको दण्ड क्यों नहीं मिलता?
दूसरों का क्या होगा या क्या हो रहा है, यह प्रश्न अप्रासंगिक और मिथ्या है।
मुझे नन्ददास को बचाना ही है। अपने स्नेही बन्धु को बचाए बिना मरना भी मेरे लिए बड़ा कठिन हो जाएगा।मुक्ति का प्रयत्न करो। राम हैं, राम हैं।
बोझ लादे, सिर और कमर झुकाए हुए जा रहे तुलसी के मुख पर छाई हुई कठोर गम्भीरता में मन की आस्था से तरावट आई। वे बोझ से लदी पीठ को तनिक सीधा करने का प्रयत्न करते हुए एक क्षण के लिए थम गए। उसी समय संयोग से कुलियों का जमादार अब्दुल्ला वेग अपना कोड़ा लिए हुए वहाँ आ पहुँचा। उसने कड़क कर कहा-“क्यों बे, हरामखोरी सूझी है?”
तुलसी ने जमादार के मुँह खोलते ही उसके अक्षर गिनने आरम्भ कर दिए थे। अक्षरों से राशियाँ गिनी और समय का अनुमान करके फुर्ती से लग्न बिचारी, फिर मुस्करा कर कहा-“जमादार जी, अगले पड़ाव पर आप जब पहुंचेंगे तो आपका हाकिम आपको अपनी एक गर्भवती दासी से जबरदस्ती ब्याह देगा। अभी से सावधान होना हो तो हो जाइए।”
जमादार का रोब तुलसी की बात सुनकर क्षण भर के लिए तो चकरा गया परन्तु फिर अपनी अकड़ के सूत्र बटोरते हुए उसने कहा-“मेरी बात का यही जवाब है? लगाँऊ दो-चार?”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “इस समय आपके ताबे में हूँ जमादार जी, मारिएगा तो वह भी सहना ही पड़ेगा किन्तु मैं फिर कहता हूँ कि किस्मत को मार से अपने को बचाइयो।”
जमादार फिर चौंक से बँध गया, ठंडे स्वर में पूछा-“तू नजूमी है?”
“जी हाँ ।” 
“अगर तेरी बात सच न हुई तो कोई न कोई इल्जाम लगाकर मै तेरा सिर कलम करवा दूगाँ, याद रखना।”
“बात मेरी नही जमादार जी, ज्योतिष विद्या की है।यह भूठ हो ही नही सकती। मैं आपका दर्द विचार रहा हूँ ।” कहकर तुलसी बढ़ चले। कैलासनाथ उनसे लगभग बीस-पच्चीस कदम अपनी पीठ पर लदे बोझ के साथ रेंग चुके थे। जमादार विचार में खोया हुआ सिर झुकाए आगे बढ़ गया। तुलसी ने उत्साह से तेज कदम बढ़ाएँ और जब तक बह अपने मित्र के पास पहुँचे कि जमादार फिर पलटकर उसके पास आया।पूछा-“नजूमी, तुम उस बाँदी का नाम बतला सकते हो?” 
“हाँ”
तुलसी ने फिर अक्षर गिने और मीन मेष बिचारकर कहा- “ग अक्षर से उसका नाम आरम्भ होगा, सरकार। वह सुन्दर होगी और कलाकार भी।”
जमादार की आँखें चमक उठीं, फिर सोच में पड़ गया, पूछा- “यह शादी मेरे हक से होगी?”
“नागिन नागों में ही अपना जोड़ा ढ़ूढ़ती है, जमादार जी। आपके हक में बहुत जहरीली है।” 
“इससे बच निकलने का क्‍या मेरे लिए कोई रास्ता नही है?”
तुलसी ने अपनी पीठ का बोझा धम्म से धरती पर पटक दिया। अबदुल्ला वेग यह देखकर चौंका लेकिन बोला नहीं। तुलसी की मुख मुद्रा गम्भीर थी और वह अपनी उँगलियों के पोरों को अगूँठे से गिन रहे थे। गणित करके उन्होंने कहा-“एक बात पूछूँ, गुस्सा तो न होगें?”
"पूछो”
“यह स्त्री चोरी का माल है? आपके मालिक ने इसे कहीं से चुराया है? ”
“हाँ , ठीक है।”
“जमादार जी,आग से न खेलिए,आपकी जान खतरे मे पड़ जाएगी। अभी से जतन करें तो बच भी सकते हैं।”
“लेकिन वह औरत जिसके पास हैं वह बहुत ताकतवर आदमी है।”
“हो सकता है, लेकिन नियति का चक्र मनुष्यों से अधिक ताकतवर होता है।” - कहकर वे अपना बोझ फिर लादने लगे।अब्दुल्ल वेग पीछे की ओर लौट गया। 

तुलसी फिर से कैलास के साथ हो लिए।कैलास ने पूछा- “यमदूत तुमसे क्या कह रहा था?”
“अरे वह हमारे लिए रामदूत सिद्ध होगा। मेरी ज्योतिष कहती है कि उसे राम ने ही हमें संकट से उबारने के लिए भेजा है।“
“बात क्या हुई ”
“उसका भविष्य मैंने विचारा था। गहरे संकट में है।”
"क्या वह तुमसे प्रभावित हुआ?” 
“लगता तो है।” 
“हाँ, मुक्ति का कुछ उपाय अब तो शीघ्र ही होना चाहिए। इतना बोझ उठाने को पहले कभी अवसर नहीं पड़ा था।कमर झुकी जाती है। पैर साधते साधते भी लड़खड़ा जाते हैं। जाने कौन पाप किए थे, राम।” कहते हुए कैलास नाथ की आँखें भर आईं।
तुलसी ने सान्त्वना देते हुए कहा-“हारिए न हिम्मत विसारिए न राम।हनुमान जी अवश्य ही हमारी रक्षा करने के लिए आएगें। मेरा मन कहता है।”
“दूसरों के पापों की गठरी अपनी पीठ, पर लादकर चलना मेरे मन को मर्मांतक कष्ट दे रहा है।तुलसी दासता अति कठिन होती है। मृत्यु उसके सामने बहुत ही रमणीय लगती है। भगत जी की बात न मानकर हमनें अच्छा नहीं किया।”

दु:ख सुख कहते, रोते झींकते, राम-राम करते दोपहर में कुलियों के चने चबाने का समय आ पहुँचा। एक बड़ी बॉवली के निकट सबने अपनी अपनी पीठों पर लदे बोझों को उतारा। पीठ सीधी की और सबेरे चलते समय बाँटे गए गुड़ चने की अपनी अपनी पोटलियाँ खोलने लगे। जमादार उसी समय फिर तुलसी के पास आ पहुँचा और कहा- “मेरे साथ चलो।”
“साहब, मेरे साथी को भी ले चलिए।”
“नहीं, तू अकेला चल।”
“तब तो आप मुझे मार भी डालें तो भी मैं नही जाऊँगा।” 
“अच्छा, तुम दोनों चलों। मैं अभी तुम्हारे बोझ को ढोने का इन्तजाम करके आता हुँ।”
दोनों मित्र आगे बढ़कर एक जगह खड़े हो गए। कैलास का चेहरा खिल उठा था, कहने लगे - “लगता है कि राम जी हमारी रक्षा कर लेगें।”
जमादार तुर्क था मगर दो पीढ़ी से हिन्दुस्तान मैं बसा हुआ था। ऊँचे उठने के लालच में वह एक कच्चा खेल खेल गया था जिसके अन्तिम परिणाम पर तुलसी की ज्योतिष के उजाले में नजर जाते ही जमादार अपने होश में आ गया।
गुलनार ठेठ आजर बैजानी माल थी, कहीं कोहकाफ के आसपास की। कहते हैं कि गुलाब के आसपास की मिट्टी में भी महक आ जाती है।
क्रमशः

Saturday, 13 May 2023

tc 66

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
66-

पर जब किसी की आँखें किसी से लड़ जातीं हैं तो वह फिर थोड़े कुछ सुनता है भैया।हमने सोचा कि इसके फेर में हम सभी मारे जाएंगें। आखिर गाँव वालों का हम लोगों पर बड़ा उपकार था। सो प्रेम दीवाने साथी को वहीं छोड़ कर चले आए। फिर इन सिपाहियों की पकड़ाई में आ गए, तब से बेगार ढो रहे हैं। तीर्थ यात्रा का यह‌ फल पाया।”
तुलसी ने कहा- “आपने एक स्त्री पर आसक्त हो जाने वाले अपने साथी का नाम नन्ददास ही बतलाया न?” 
“हाँ” 
“वह कवि भी है ?” 
“हाँ, हाँ बड़ी अच्छी कविताएँ करता है और गाता भी खूब है। अरे उसकी संगत में रस बरसता था भइया, रस।क्‍या करें अपनी आबरू बचाने के लिए हमने उसका साथ छोड़ा, पर यह अच्छा नहीं किया। उसी का दण्ड अब बन्दी बनकर पा रहे है।” 
तुलसी ने फिर प्रश्न किया-“वह गोरा-गोरा बड़ी बड़ी आँखों वाला है न?” 
“हाँ, सनाढ्य ब्राह्मण है, सोरों के पास कहीं का रहने वाला है।” 
“रामपुर का है”
“तुम उसे जानते हो?” एक अन्य बन्दी ने पूछा।
“वह मेरा, गुरुभाई है। काशी जी में साथ पढ़ता था।
“ठीक है। वह काशी पढ़ने गए थे। हमें मालूम है। वाकों नाम सुनके तुम हमारे साथी को पहचाने खूब महाराज।”
“वह अब भी उसी गाँव में है?”
“अगर मार-पीट कर निकाल न दिया होगा तो वहीं होगा।”
“क्या कहा जाये, भले घर का लड़का, पर प्रेम तो उल्लू बना देता है उल्लू।”
तुलसी गंभीर हो गए, पूछा- “उस गाँव का क्या नाम है?”
“सिहँपुर, यहाँ से लगभग पच्चीस कोस पूरब में है।”
तुलसी ने फिर कुछ न पूछा। वह विचार मग्न हो गए। कुछ देर के बाद उन्होंने कैलास से कहा- “अब तो कुछ भी हो कैलास, यहाँ से मुक्त हुए बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता। नन्‍ददास को बचाना ही है। तुम्हें भगत जी के पास छोड़ कर मैं एक बार नन्ददास की खोज में अवश्य जाऊँगा। वह मु्झे भाई के समान प्रिय है।”
कैलास बोले- “यह तो ठीक है, पर मुख्य प्रश्न तो म्याऊँ के ठौर का है।मुक्त होने का उपाय क्या हो सकता है?” 
“एक ही उपाय है। मैं किसी पर अपनी ज्योतिष की माया फैलाता हूँ। आड़े समय में यह विद्या बड़े काम आती है। कल से छोटे-मोटों के हाथ देखकर उनके प्रश्नादि विचार कर मैं उन्हे सहज ही में अपना प्रचारक बना लूगाँ और फिर शीघ्र ही किसी बड़े ओहदेदार तक मेरी पहुँच अवश्य हो जाएगी।”

पानीपत का युद्ध समाप्त हुआ। रात में हरम के पड़ाव पर समाचार आया कि मुगल सेना जीत गईं। हेमचन्द्र विक्रमादित्य पकड़ा और मारा गया। दासों और बन्दियों के यमराज अब्दुल्ला से पानीपत से आए हुए किसी व्यक्ति ने हेमू की लड़ाई का वर्णन किया उससे खबरे ही खबरें फैल गईं। हेमू अपने हवाई नामक हाथी पर सवार हो सेना के मध्य खड़ा सैन्य संचालन कर रहा था। मुगल सेनापत्ति खानेजमा अपनी जगह पर खड़ा दूरबीन से देख रहा था। उसने हेमू को देखा। एकाएक सेना को ललकार कर खानेजमा ने उस पर हमला किया। हेमू हाथियों की दूसरी पातँ में था। उसके चारों ओर बहादुर पठानों का मुण्ड था। खानेजमा ने फिर घेरे को ही तोड़ने का निश्चय किया। तुर्क तीरों की बौछार करते हुए बढ़े।हाथियों के हमले को हौसते और हिम्मत से रोका।वे तैयार होकर आगे बड़े। जब देखा कि घोड़े हाथियों से बिदकते हैं तो हेमू नीचे कूद पड़े और तलवारें खीचकर हाथी की पंक्तियों में घुस गए।उन्होंने वाणों की बौछार से हाथियों के मुँह फेर दिए और उन काले पहाड़ों की मिट्टी का ढेर सा बना दिया। अद्भुत घमासान रण पड़ा। हेमू की बहादुरी तारीफ के लायके थी। होदे के बीच में नंगे सिर खड़ा वह सेना की हिम्मत बढ़ा रहा था।शादी खान पठान हेमू के सरदारों की नाक था। वह धरती पर गिर पड़ा। सेना अनाज के दानों की तरह बिखर गई। फिर भी हेमू ने हिम्मत न हारी। हाथी पर सवार चारों तरफ फिरता था।सरदारों के नाम लेकेर हौसलें बढ़ाता था। वह अपनी भागती सेना को,फिर से एकत्रित करने के लिए भरसक प्रयत्न कर रहा था। इतने में एक तीर उसकी आँख में लगा। तब भी वह हिम्मत न हारा। उसने अपने हाथ से तीर खींचकर निकाला और आँख पर रूमाल बाँधते हुए भी अपनी सेना को हौसला देता रहा। मगर घाव इतना भीषण था कि कुछ ही पलों में बेहोश होकर हौदे में गिर पड़ा।यह देखकर उसके अनुयायियों की हिम्मत टूट गई, सब तितर-बितर हो गए।
दूसरे ही दिन दिल्‍ली के लिए कूच का हुकुम हुआ।शाही हरम और उसके साथ ही बड़े-बड़े सरदारों की पत्नियों, रखैलों तथा दासियों, नाचने-गानेवालियों और कुछ दूसरे-तीसरे दर्जे के ओहदेदारों की स्त्रियों के खेमे थे। उनके अगले पड़ाव के लिए तम्बू-कनात आदि गृहस्थी का वोझ ढोकर बन्दी लोग भोर पहर ब्रह्म- बेला में ही चल पड़े।इन राम ध्यान भक्त बन्दियों का स्नान ध्यान कुछ भी न होने पाया।तुलसी और कैलास मेघा भगत के लिए चिन्तित थे। वे बेचारे इतने सुकुमार और क्षीण गात थे कि उनके लिए बोझ ढोना असम्भव था। इसके अतिरिक्त वे चलते चलते ही भाव समाधि लीन होकर गिर पड़ते थे, जिसके कारण अब्दुल्ला, यमराज का सिपाही, उन्हें कोड़े लगाने से न चूकता था।तुलसी और कैलास इस कारण से विशेष दु:खी थे। सिपाही उजबक जाति का था।वह मुसलमान ही था किन्तु उसके देश में प्रचलित सनातन बौद्ध संस्कार भी उसमें थे। तुलसी ने उसको समझाया- “यह आदमी सूफी है, कलन्दर है। इसको कष्ट दोगे तो अल्लाह तुम्हारा बुरा करेगा।”
स्वयं सिपाही को भी मेघा भगत के लिए कदाचित‌ कुछ ऐसा ही आभास अपने मन में हो रहा था।कुछ सोचकर बोला-“इसका बोझा तुम लोग आपस में बाँट लो और इससे कहो कि कुलियों की कतार से निकलकर गाँव की ओर चला जाय।” 
मेघा भगत पहले तो राजी न हुए किन्तु तुलसी और कैलास के आग्रह से अन्त में उन्हें यह करना ही पड़ा।उन्हें पीछे छोड़ कर यह दोनों कुलियों के काफिले के साथ आगे बढ़ते गए। मेघा भगत बन्दियों से अलग होकर भी उसी दिशा में अकेले बढ चले।तुलसी और कैलास दोनों कविबंधु अपनी इस मुसीबत से बड़े ही क्षुब्ध थे।
क्रमशः

Friday, 12 May 2023

tc65

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
65-

मेघा भगत बोले- “जो अपना युद्ध छोड़ कर पराये युद्ध का तमाशा देखनें जाता है वह निकम्मा और निर्बुद्धि होता है।”
कैलास इस उपदेश से कुछ कुछ चिढ़ गऐ, बोले -“कभी-कभी सत्य को विचार में देखकर भी यह इच्छा होती है कि उसे प्रत्यक्ष ही देखा जाए तो भला।”
मित्र की इच्छा देखकर तुलसी ने कहा- “मेघा भाई, यदि हम लोग युद्ध में फँस भी गए तो आपको वहाँ से किसी सुरक्षित स्थान पर हटा देंगे।हमारे कवि जी के अन्दर वीर भाव जागा है, इनका हौसला बढ़ाना ही चाहिए।”
भगत जी हँसे, कहा-“होतव्यथा होकर ही रहती है। चलो, जो दु:ख झेलना बदा है वह तो झेलना ही पड़ेगा। हम सोचते थे कि यदि उससे बच जाते तो अच्छा था।”
“मुझे अपने मन में इतना बच-बच के चलना पड़ रहा है मेघा भाई कि अपनी अति सतर्कता से घुटने लगा हूँ। बाहर का संघर्ष और कुछ नहीं तो मन को तगड़ा ही करेग।”
“बाहर का संघर्ष चाहते हो तुलसी ?अच्छा, तो वही सही।तुम्हें अपने जीवन में बाहर का इतना संघर्ष झेलना पड़ेगा कि पग-पग पर तुम्हे राम ही राम याद आयेंगे।”
तुलसी हँस पड़े, कहने लगे- “मेघा भाई, यदि आप मुझें यह शाप दें रहें हैं तो भी मेरे लिए यह परम कल्याणकारी है। जिस विधि से राम अधिकाधिक याद आवें वह विधि कण्टकारी होते हुए भी मुझे मान्य होगी। अपने भीतर की अकेली जूझ से उबर तो सकूँगा।”
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कुरुक्षेत्र में उन दिनों बड़ा भीपषण अकाल पड़ रहा था। दिल्‍ली, आगरा, मथुरा आदि सभी जगह प्रजा त्राहि-त्राह कर रही थी। खेती विहीन उजड़ा भूखण्ड, रूखी काया, फीके कष्ट और चेहरों वाली कंकालवत‌ कायायें इधर-उधर डोलती थीं। इन्हें देखकर लोग घेरते- “बावा भूखे हैं, बाबा रोटी.. रोटी।”
“कहाँ हैं रोटी मेरे भइया? चलो हेमचन्द्र महाराज से माँगे। हिन्दू राजा है, निश्चय ही तुम्हारी दशा पर दया करेगा।”
एक खिचड़ी वालों वाला जीर्ण-शीर्ण व्यक्ति अपने कमजोर स्वर में भी यथा- शक्ति जोर से हँस पड़ा, बोला- “हिन्दू ह-ह -ह  अरे बाबा, हिंन्दू-मुसलमान तो हम तुम पंच होतें हैं, राजा राजा होता है। हेमू के हाथी, चावल चीनी और घी के लड्‌डू खा खाकर मरने मारने के लिए तैयार हो रहें हैं। वह बस लडवइयों को ही भर पेट खिला सकता है। हमारा कोई नहीं। राम भी नहीं।”
उस समय का हाल सुनाते हुए बाबा बोल रहें हैं -“अकाल के क्षेत्र में हमने बड़े ही विषम दृश्य देखे। एक जगह चार-चार मुठ्ठी गेहूँ चावल के लिए लोग बाग अपनी जवान स्त्रियाँ, लड़के लड़कियाँ तक बेच रहे थे। करुण कराहें सुन सुन कर मुझे बस राम ही राम याद आते थे। मन से श्रृंगार रस सूख गया था। सर्वत्र करुणा ही करुणा देखकर ऐसा लगता था कि मानों पृथ्वी पर आनन्द का अस्तित्व ही नही है। वह केवल एक शब्द मात्र है जिसे पेट भरे हुए लोग ही आपस मे कह सुन लेते हैं।” 
बाबा के चेहरे पर गम्भीर उदासी छा गई थी। कहते कहते कुछ पलों के लिए वे थम गए। फिर कहना आरम्भ किया- “मेरे अन्तर में यदि राम न रमते तो यह जीवन अपने और परायों के दु:खों की कथा मात्र बनकर ही रह जाता।हेमचन्द्र महाराज उन दिनों भरतपुर के पास एक स्थान पर अपना पड़ाव डाले पड़े थे इसलिए हम लोग भी उधर ही चले। दिन ढला तो एक गाँव में डेरा डाला।वह गाँव हेमचन्द्र की सेना को रसद पहुँचाता था।अत: अन्न धन शस्त्र से भरा पूरा था।वहीं हमें पता चला कि हेमू महाराज अपनी सेनाएँ लेकर पानीपत की ओर बढ़ गए हैं। पंजाब से मुगलों की सेना उधर ही बढ़ रही है।यहीं सब कहते सुनते रात हुई। हम लोग एक शिवालय में सो गए।

आधी रात का समय था। अचानक बड़ी जोर का हल्ला मचा। आहें, कराहें सुनाई देने लगीं । तोपचियों की फटाफट और मशालों के चमकते हुए शोले जहाँ तहाँ दिखलाई पडनें लगे। लाठी, तलवार, बल्‍लम, गंडासे चारों ओर चल रहे थे। थोड़ी ही देर में वह गाँव जिसमें हमनें रैनबसेरा किया था मुगल सेना की एक टुकड़ी के कब्जे में आ गया। गाँव का अन्न धन शस्त्र भण्डार मुगलों की सम्पत्ति हो गया।छोटे-बड़े , सम्पन्न विपन्न सभी प्रकार के ग्रामवासी नर- नारी मुगलों के द्वारा बन्दी बना लिए गए। मेघा, तुलसी और कैलास की भी वही दशा हुई। सबेरे पता चला कि मुगलों की बेगमों और सरदारनियों के खेमें युद्ध- क्षेत्र से दूर इस गाँव में लगाए गए है। इस प्रकार एक पंथ दो काज सिद्ध किए गए हैं। स्त्रियाँ सुरक्षित जगह पर टिक गई। साथ ही शत्रुओं का रसद भण्डार भी मुगलों के हाथ में आ गया। गधों ओर खच्चरों के साथ उनके सैनिकों की निगरानी में इन तीनों को भी अन्य बन्दियों के साथ कर दिया गया था। विचित्र वातावरण था। मनुष्य दासता की विवशता में पशु बना दिए गए थे। उनका हाकिम अब्दुल्ला वेग नामक एक तुर्क था। वह दो पीढ़ियों से यहाँ बसा था, हमारी भाषा ही अधिक बोलता था। बडा जल्लाद था वह अब्दुल्ला।इन तीनों को कुछ और भी व्यक्ति वहाँ बैठे हुए मिले। बातें होने लगीं।वे लोग मथुरा, वृन्दावन के निवासी थे और लगभग एक महीनें से बन्दी होकर बेगार ढो रहे थे। दिन भर वे या तो सामान की ढुलाई करते अथवा छावनियों में सफाई आदि अनेक काम करते हुए अपने दिन बिता रहे थे। उन्होंने बतलाया कि रात में रूखी सूखी खिलाकर उन्हें गधों के घेरे में छोड़ दिया जाता है। तुलसी बोले- “तब तो हमारी भी यही दशा होने वाली है कैलास।भाई जी ने सच ही कहा था कि अपना रण छोड़कर हमें पराये रण-क्षेत्र में नहीं आना चाहिए था।”
मथुरावासी बन्दी वोला- “हम लोग भी पछता रहें हैं भइया। ऐसी मनहूस साइत में द्वारका जी की यात्रा करने चले कि मार्ग में एक नहीं सैकड़ों छोटी बड़ी विपत्तियाँ सामने आईं। हमारे एक साथी को बाघ खा गया। हम दो चार आदमी उससे लडने झगड़ने में घायल हुए। एक गाँव के लोग हमें उठाकर ले गए।अपने यहाँ रखा।दवा दारू से हमको तो चंगा किया किंतु वहाँ एक सुन्दर खत्रानी पर हमारे एक साथी लटटू हो गए। हमनें लाख समझाया कि नन्ददास ऐसा न करो।
क्रमशः

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...