महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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मेघा भगत बोले- “जो अपना युद्ध छोड़ कर पराये युद्ध का तमाशा देखनें जाता है वह निकम्मा और निर्बुद्धि होता है।”
कैलास इस उपदेश से कुछ कुछ चिढ़ गऐ, बोले -“कभी-कभी सत्य को विचार में देखकर भी यह इच्छा होती है कि उसे प्रत्यक्ष ही देखा जाए तो भला।”
मित्र की इच्छा देखकर तुलसी ने कहा- “मेघा भाई, यदि हम लोग युद्ध में फँस भी गए तो आपको वहाँ से किसी सुरक्षित स्थान पर हटा देंगे।हमारे कवि जी के अन्दर वीर भाव जागा है, इनका हौसला बढ़ाना ही चाहिए।”
भगत जी हँसे, कहा-“होतव्यथा होकर ही रहती है। चलो, जो दु:ख झेलना बदा है वह तो झेलना ही पड़ेगा। हम सोचते थे कि यदि उससे बच जाते तो अच्छा था।”
“मुझे अपने मन में इतना बच-बच के चलना पड़ रहा है मेघा भाई कि अपनी अति सतर्कता से घुटने लगा हूँ। बाहर का संघर्ष और कुछ नहीं तो मन को तगड़ा ही करेग।”
“बाहर का संघर्ष चाहते हो तुलसी ?अच्छा, तो वही सही।तुम्हें अपने जीवन में बाहर का इतना संघर्ष झेलना पड़ेगा कि पग-पग पर तुम्हे राम ही राम याद आयेंगे।”
तुलसी हँस पड़े, कहने लगे- “मेघा भाई, यदि आप मुझें यह शाप दें रहें हैं तो भी मेरे लिए यह परम कल्याणकारी है। जिस विधि से राम अधिकाधिक याद आवें वह विधि कण्टकारी होते हुए भी मुझे मान्य होगी। अपने भीतर की अकेली जूझ से उबर तो सकूँगा।”
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कुरुक्षेत्र में उन दिनों बड़ा भीपषण अकाल पड़ रहा था। दिल्ली, आगरा, मथुरा आदि सभी जगह प्रजा त्राहि-त्राह कर रही थी। खेती विहीन उजड़ा भूखण्ड, रूखी काया, फीके कष्ट और चेहरों वाली कंकालवत कायायें इधर-उधर डोलती थीं। इन्हें देखकर लोग घेरते- “बावा भूखे हैं, बाबा रोटी.. रोटी।”
“कहाँ हैं रोटी मेरे भइया? चलो हेमचन्द्र महाराज से माँगे। हिन्दू राजा है, निश्चय ही तुम्हारी दशा पर दया करेगा।”
एक खिचड़ी वालों वाला जीर्ण-शीर्ण व्यक्ति अपने कमजोर स्वर में भी यथा- शक्ति जोर से हँस पड़ा, बोला- “हिन्दू ह-ह -ह अरे बाबा, हिंन्दू-मुसलमान तो हम तुम पंच होतें हैं, राजा राजा होता है। हेमू के हाथी, चावल चीनी और घी के लड्डू खा खाकर मरने मारने के लिए तैयार हो रहें हैं। वह बस लडवइयों को ही भर पेट खिला सकता है। हमारा कोई नहीं। राम भी नहीं।”
उस समय का हाल सुनाते हुए बाबा बोल रहें हैं -“अकाल के क्षेत्र में हमने बड़े ही विषम दृश्य देखे। एक जगह चार-चार मुठ्ठी गेहूँ चावल के लिए लोग बाग अपनी जवान स्त्रियाँ, लड़के लड़कियाँ तक बेच रहे थे। करुण कराहें सुन सुन कर मुझे बस राम ही राम याद आते थे। मन से श्रृंगार रस सूख गया था। सर्वत्र करुणा ही करुणा देखकर ऐसा लगता था कि मानों पृथ्वी पर आनन्द का अस्तित्व ही नही है। वह केवल एक शब्द मात्र है जिसे पेट भरे हुए लोग ही आपस मे कह सुन लेते हैं।”
बाबा के चेहरे पर गम्भीर उदासी छा गई थी। कहते कहते कुछ पलों के लिए वे थम गए। फिर कहना आरम्भ किया- “मेरे अन्तर में यदि राम न रमते तो यह जीवन अपने और परायों के दु:खों की कथा मात्र बनकर ही रह जाता।हेमचन्द्र महाराज उन दिनों भरतपुर के पास एक स्थान पर अपना पड़ाव डाले पड़े थे इसलिए हम लोग भी उधर ही चले। दिन ढला तो एक गाँव में डेरा डाला।वह गाँव हेमचन्द्र की सेना को रसद पहुँचाता था।अत: अन्न धन शस्त्र से भरा पूरा था।वहीं हमें पता चला कि हेमू महाराज अपनी सेनाएँ लेकर पानीपत की ओर बढ़ गए हैं। पंजाब से मुगलों की सेना उधर ही बढ़ रही है।यहीं सब कहते सुनते रात हुई। हम लोग एक शिवालय में सो गए।
आधी रात का समय था। अचानक बड़ी जोर का हल्ला मचा। आहें, कराहें सुनाई देने लगीं । तोपचियों की फटाफट और मशालों के चमकते हुए शोले जहाँ तहाँ दिखलाई पडनें लगे। लाठी, तलवार, बल्लम, गंडासे चारों ओर चल रहे थे। थोड़ी ही देर में वह गाँव जिसमें हमनें रैनबसेरा किया था मुगल सेना की एक टुकड़ी के कब्जे में आ गया। गाँव का अन्न धन शस्त्र भण्डार मुगलों की सम्पत्ति हो गया।छोटे-बड़े , सम्पन्न विपन्न सभी प्रकार के ग्रामवासी नर- नारी मुगलों के द्वारा बन्दी बना लिए गए। मेघा, तुलसी और कैलास की भी वही दशा हुई। सबेरे पता चला कि मुगलों की बेगमों और सरदारनियों के खेमें युद्ध- क्षेत्र से दूर इस गाँव में लगाए गए है। इस प्रकार एक पंथ दो काज सिद्ध किए गए हैं। स्त्रियाँ सुरक्षित जगह पर टिक गई। साथ ही शत्रुओं का रसद भण्डार भी मुगलों के हाथ में आ गया। गधों ओर खच्चरों के साथ उनके सैनिकों की निगरानी में इन तीनों को भी अन्य बन्दियों के साथ कर दिया गया था। विचित्र वातावरण था। मनुष्य दासता की विवशता में पशु बना दिए गए थे। उनका हाकिम अब्दुल्ला वेग नामक एक तुर्क था। वह दो पीढ़ियों से यहाँ बसा था, हमारी भाषा ही अधिक बोलता था। बडा जल्लाद था वह अब्दुल्ला।इन तीनों को कुछ और भी व्यक्ति वहाँ बैठे हुए मिले। बातें होने लगीं।वे लोग मथुरा, वृन्दावन के निवासी थे और लगभग एक महीनें से बन्दी होकर बेगार ढो रहे थे। दिन भर वे या तो सामान की ढुलाई करते अथवा छावनियों में सफाई आदि अनेक काम करते हुए अपने दिन बिता रहे थे। उन्होंने बतलाया कि रात में रूखी सूखी खिलाकर उन्हें गधों के घेरे में छोड़ दिया जाता है। तुलसी बोले- “तब तो हमारी भी यही दशा होने वाली है कैलास।भाई जी ने सच ही कहा था कि अपना रण छोड़कर हमें पराये रण-क्षेत्र में नहीं आना चाहिए था।”
मथुरावासी बन्दी वोला- “हम लोग भी पछता रहें हैं भइया। ऐसी मनहूस साइत में द्वारका जी की यात्रा करने चले कि मार्ग में एक नहीं सैकड़ों छोटी बड़ी विपत्तियाँ सामने आईं। हमारे एक साथी को बाघ खा गया। हम दो चार आदमी उससे लडने झगड़ने में घायल हुए। एक गाँव के लोग हमें उठाकर ले गए।अपने यहाँ रखा।दवा दारू से हमको तो चंगा किया किंतु वहाँ एक सुन्दर खत्रानी पर हमारे एक साथी लटटू हो गए। हमनें लाख समझाया कि नन्ददास ऐसा न करो।
क्रमशः
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