महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
66-
पर जब किसी की आँखें किसी से लड़ जातीं हैं तो वह फिर थोड़े कुछ सुनता है भैया।हमने सोचा कि इसके फेर में हम सभी मारे जाएंगें। आखिर गाँव वालों का हम लोगों पर बड़ा उपकार था। सो प्रेम दीवाने साथी को वहीं छोड़ कर चले आए। फिर इन सिपाहियों की पकड़ाई में आ गए, तब से बेगार ढो रहे हैं। तीर्थ यात्रा का यह फल पाया।”
तुलसी ने कहा- “आपने एक स्त्री पर आसक्त हो जाने वाले अपने साथी का नाम नन्ददास ही बतलाया न?”
“हाँ”
“वह कवि भी है ?”
“हाँ, हाँ बड़ी अच्छी कविताएँ करता है और गाता भी खूब है। अरे उसकी संगत में रस बरसता था भइया, रस।क्या करें अपनी आबरू बचाने के लिए हमने उसका साथ छोड़ा, पर यह अच्छा नहीं किया। उसी का दण्ड अब बन्दी बनकर पा रहे है।”
तुलसी ने फिर प्रश्न किया-“वह गोरा-गोरा बड़ी बड़ी आँखों वाला है न?”
“हाँ, सनाढ्य ब्राह्मण है, सोरों के पास कहीं का रहने वाला है।”
“रामपुर का है”
“तुम उसे जानते हो?” एक अन्य बन्दी ने पूछा।
“वह मेरा, गुरुभाई है। काशी जी में साथ पढ़ता था।
“ठीक है। वह काशी पढ़ने गए थे। हमें मालूम है। वाकों नाम सुनके तुम हमारे साथी को पहचाने खूब महाराज।”
“वह अब भी उसी गाँव में है?”
“अगर मार-पीट कर निकाल न दिया होगा तो वहीं होगा।”
“क्या कहा जाये, भले घर का लड़का, पर प्रेम तो उल्लू बना देता है उल्लू।”
तुलसी गंभीर हो गए, पूछा- “उस गाँव का क्या नाम है?”
“सिहँपुर, यहाँ से लगभग पच्चीस कोस पूरब में है।”
तुलसी ने फिर कुछ न पूछा। वह विचार मग्न हो गए। कुछ देर के बाद उन्होंने कैलास से कहा- “अब तो कुछ भी हो कैलास, यहाँ से मुक्त हुए बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता। नन्ददास को बचाना ही है। तुम्हें भगत जी के पास छोड़ कर मैं एक बार नन्ददास की खोज में अवश्य जाऊँगा। वह मु्झे भाई के समान प्रिय है।”
कैलास बोले- “यह तो ठीक है, पर मुख्य प्रश्न तो म्याऊँ के ठौर का है।मुक्त होने का उपाय क्या हो सकता है?”
“एक ही उपाय है। मैं किसी पर अपनी ज्योतिष की माया फैलाता हूँ। आड़े समय में यह विद्या बड़े काम आती है। कल से छोटे-मोटों के हाथ देखकर उनके प्रश्नादि विचार कर मैं उन्हे सहज ही में अपना प्रचारक बना लूगाँ और फिर शीघ्र ही किसी बड़े ओहदेदार तक मेरी पहुँच अवश्य हो जाएगी।”
पानीपत का युद्ध समाप्त हुआ। रात में हरम के पड़ाव पर समाचार आया कि मुगल सेना जीत गईं। हेमचन्द्र विक्रमादित्य पकड़ा और मारा गया। दासों और बन्दियों के यमराज अब्दुल्ला से पानीपत से आए हुए किसी व्यक्ति ने हेमू की लड़ाई का वर्णन किया उससे खबरे ही खबरें फैल गईं। हेमू अपने हवाई नामक हाथी पर सवार हो सेना के मध्य खड़ा सैन्य संचालन कर रहा था। मुगल सेनापत्ति खानेजमा अपनी जगह पर खड़ा दूरबीन से देख रहा था। उसने हेमू को देखा। एकाएक सेना को ललकार कर खानेजमा ने उस पर हमला किया। हेमू हाथियों की दूसरी पातँ में था। उसके चारों ओर बहादुर पठानों का मुण्ड था। खानेजमा ने फिर घेरे को ही तोड़ने का निश्चय किया। तुर्क तीरों की बौछार करते हुए बढ़े।हाथियों के हमले को हौसते और हिम्मत से रोका।वे तैयार होकर आगे बड़े। जब देखा कि घोड़े हाथियों से बिदकते हैं तो हेमू नीचे कूद पड़े और तलवारें खीचकर हाथी की पंक्तियों में घुस गए।उन्होंने वाणों की बौछार से हाथियों के मुँह फेर दिए और उन काले पहाड़ों की मिट्टी का ढेर सा बना दिया। अद्भुत घमासान रण पड़ा। हेमू की बहादुरी तारीफ के लायके थी। होदे के बीच में नंगे सिर खड़ा वह सेना की हिम्मत बढ़ा रहा था।शादी खान पठान हेमू के सरदारों की नाक था। वह धरती पर गिर पड़ा। सेना अनाज के दानों की तरह बिखर गई। फिर भी हेमू ने हिम्मत न हारी। हाथी पर सवार चारों तरफ फिरता था।सरदारों के नाम लेकेर हौसलें बढ़ाता था। वह अपनी भागती सेना को,फिर से एकत्रित करने के लिए भरसक प्रयत्न कर रहा था। इतने में एक तीर उसकी आँख में लगा। तब भी वह हिम्मत न हारा। उसने अपने हाथ से तीर खींचकर निकाला और आँख पर रूमाल बाँधते हुए भी अपनी सेना को हौसला देता रहा। मगर घाव इतना भीषण था कि कुछ ही पलों में बेहोश होकर हौदे में गिर पड़ा।यह देखकर उसके अनुयायियों की हिम्मत टूट गई, सब तितर-बितर हो गए।
दूसरे ही दिन दिल्ली के लिए कूच का हुकुम हुआ।शाही हरम और उसके साथ ही बड़े-बड़े सरदारों की पत्नियों, रखैलों तथा दासियों, नाचने-गानेवालियों और कुछ दूसरे-तीसरे दर्जे के ओहदेदारों की स्त्रियों के खेमे थे। उनके अगले पड़ाव के लिए तम्बू-कनात आदि गृहस्थी का वोझ ढोकर बन्दी लोग भोर पहर ब्रह्म- बेला में ही चल पड़े।इन राम ध्यान भक्त बन्दियों का स्नान ध्यान कुछ भी न होने पाया।तुलसी और कैलास मेघा भगत के लिए चिन्तित थे। वे बेचारे इतने सुकुमार और क्षीण गात थे कि उनके लिए बोझ ढोना असम्भव था। इसके अतिरिक्त वे चलते चलते ही भाव समाधि लीन होकर गिर पड़ते थे, जिसके कारण अब्दुल्ला, यमराज का सिपाही, उन्हें कोड़े लगाने से न चूकता था।तुलसी और कैलास इस कारण से विशेष दु:खी थे। सिपाही उजबक जाति का था।वह मुसलमान ही था किन्तु उसके देश में प्रचलित सनातन बौद्ध संस्कार भी उसमें थे। तुलसी ने उसको समझाया- “यह आदमी सूफी है, कलन्दर है। इसको कष्ट दोगे तो अल्लाह तुम्हारा बुरा करेगा।”
स्वयं सिपाही को भी मेघा भगत के लिए कदाचित कुछ ऐसा ही आभास अपने मन में हो रहा था।कुछ सोचकर बोला-“इसका बोझा तुम लोग आपस में बाँट लो और इससे कहो कि कुलियों की कतार से निकलकर गाँव की ओर चला जाय।”
मेघा भगत पहले तो राजी न हुए किन्तु तुलसी और कैलास के आग्रह से अन्त में उन्हें यह करना ही पड़ा।उन्हें पीछे छोड़ कर यह दोनों कुलियों के काफिले के साथ आगे बढ़ते गए। मेघा भगत बन्दियों से अलग होकर भी उसी दिशा में अकेले बढ चले।तुलसी और कैलास दोनों कविबंधु अपनी इस मुसीबत से बड़े ही क्षुब्ध थे।
क्रमशः
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