Sunday, 14 May 2023

tc 67

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
67-

कैलाश और तुलसी अपनी क्षुब्धता से भी अधिक विवश थे।यह विवशता तुलसी को मथ रही थी। एक मन कहता कि राम को बिसारकर नारी में रमा, यह उसी का दण्ड है।दूसरा मन क्षुब्ध होकर कहता कि यह दुष्ट असुर जो कामिनी कांचन सत्ता और ऐश्वर्य के मद में आठों पहर डूबे रहतें हैं, कभी एक क्षण के क्षणांश में भी जो ईश्वर को नहीं भजते, इनको दण्ड क्यों नहीं मिलता?
दूसरों का क्या होगा या क्या हो रहा है, यह प्रश्न अप्रासंगिक और मिथ्या है।
मुझे नन्ददास को बचाना ही है। अपने स्नेही बन्धु को बचाए बिना मरना भी मेरे लिए बड़ा कठिन हो जाएगा।मुक्ति का प्रयत्न करो। राम हैं, राम हैं।
बोझ लादे, सिर और कमर झुकाए हुए जा रहे तुलसी के मुख पर छाई हुई कठोर गम्भीरता में मन की आस्था से तरावट आई। वे बोझ से लदी पीठ को तनिक सीधा करने का प्रयत्न करते हुए एक क्षण के लिए थम गए। उसी समय संयोग से कुलियों का जमादार अब्दुल्ला वेग अपना कोड़ा लिए हुए वहाँ आ पहुँचा। उसने कड़क कर कहा-“क्यों बे, हरामखोरी सूझी है?”
तुलसी ने जमादार के मुँह खोलते ही उसके अक्षर गिनने आरम्भ कर दिए थे। अक्षरों से राशियाँ गिनी और समय का अनुमान करके फुर्ती से लग्न बिचारी, फिर मुस्करा कर कहा-“जमादार जी, अगले पड़ाव पर आप जब पहुंचेंगे तो आपका हाकिम आपको अपनी एक गर्भवती दासी से जबरदस्ती ब्याह देगा। अभी से सावधान होना हो तो हो जाइए।”
जमादार का रोब तुलसी की बात सुनकर क्षण भर के लिए तो चकरा गया परन्तु फिर अपनी अकड़ के सूत्र बटोरते हुए उसने कहा-“मेरी बात का यही जवाब है? लगाँऊ दो-चार?”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “इस समय आपके ताबे में हूँ जमादार जी, मारिएगा तो वह भी सहना ही पड़ेगा किन्तु मैं फिर कहता हूँ कि किस्मत को मार से अपने को बचाइयो।”
जमादार फिर चौंक से बँध गया, ठंडे स्वर में पूछा-“तू नजूमी है?”
“जी हाँ ।” 
“अगर तेरी बात सच न हुई तो कोई न कोई इल्जाम लगाकर मै तेरा सिर कलम करवा दूगाँ, याद रखना।”
“बात मेरी नही जमादार जी, ज्योतिष विद्या की है।यह भूठ हो ही नही सकती। मैं आपका दर्द विचार रहा हूँ ।” कहकर तुलसी बढ़ चले। कैलासनाथ उनसे लगभग बीस-पच्चीस कदम अपनी पीठ पर लदे बोझ के साथ रेंग चुके थे। जमादार विचार में खोया हुआ सिर झुकाए आगे बढ़ गया। तुलसी ने उत्साह से तेज कदम बढ़ाएँ और जब तक बह अपने मित्र के पास पहुँचे कि जमादार फिर पलटकर उसके पास आया।पूछा-“नजूमी, तुम उस बाँदी का नाम बतला सकते हो?” 
“हाँ”
तुलसी ने फिर अक्षर गिने और मीन मेष बिचारकर कहा- “ग अक्षर से उसका नाम आरम्भ होगा, सरकार। वह सुन्दर होगी और कलाकार भी।”
जमादार की आँखें चमक उठीं, फिर सोच में पड़ गया, पूछा- “यह शादी मेरे हक से होगी?”
“नागिन नागों में ही अपना जोड़ा ढ़ूढ़ती है, जमादार जी। आपके हक में बहुत जहरीली है।” 
“इससे बच निकलने का क्‍या मेरे लिए कोई रास्ता नही है?”
तुलसी ने अपनी पीठ का बोझा धम्म से धरती पर पटक दिया। अबदुल्ला वेग यह देखकर चौंका लेकिन बोला नहीं। तुलसी की मुख मुद्रा गम्भीर थी और वह अपनी उँगलियों के पोरों को अगूँठे से गिन रहे थे। गणित करके उन्होंने कहा-“एक बात पूछूँ, गुस्सा तो न होगें?”
"पूछो”
“यह स्त्री चोरी का माल है? आपके मालिक ने इसे कहीं से चुराया है? ”
“हाँ , ठीक है।”
“जमादार जी,आग से न खेलिए,आपकी जान खतरे मे पड़ जाएगी। अभी से जतन करें तो बच भी सकते हैं।”
“लेकिन वह औरत जिसके पास हैं वह बहुत ताकतवर आदमी है।”
“हो सकता है, लेकिन नियति का चक्र मनुष्यों से अधिक ताकतवर होता है।” - कहकर वे अपना बोझ फिर लादने लगे।अब्दुल्ल वेग पीछे की ओर लौट गया। 

तुलसी फिर से कैलास के साथ हो लिए।कैलास ने पूछा- “यमदूत तुमसे क्या कह रहा था?”
“अरे वह हमारे लिए रामदूत सिद्ध होगा। मेरी ज्योतिष कहती है कि उसे राम ने ही हमें संकट से उबारने के लिए भेजा है।“
“बात क्या हुई ”
“उसका भविष्य मैंने विचारा था। गहरे संकट में है।”
"क्या वह तुमसे प्रभावित हुआ?” 
“लगता तो है।” 
“हाँ, मुक्ति का कुछ उपाय अब तो शीघ्र ही होना चाहिए। इतना बोझ उठाने को पहले कभी अवसर नहीं पड़ा था।कमर झुकी जाती है। पैर साधते साधते भी लड़खड़ा जाते हैं। जाने कौन पाप किए थे, राम।” कहते हुए कैलास नाथ की आँखें भर आईं।
तुलसी ने सान्त्वना देते हुए कहा-“हारिए न हिम्मत विसारिए न राम।हनुमान जी अवश्य ही हमारी रक्षा करने के लिए आएगें। मेरा मन कहता है।”
“दूसरों के पापों की गठरी अपनी पीठ, पर लादकर चलना मेरे मन को मर्मांतक कष्ट दे रहा है।तुलसी दासता अति कठिन होती है। मृत्यु उसके सामने बहुत ही रमणीय लगती है। भगत जी की बात न मानकर हमनें अच्छा नहीं किया।”

दु:ख सुख कहते, रोते झींकते, राम-राम करते दोपहर में कुलियों के चने चबाने का समय आ पहुँचा। एक बड़ी बॉवली के निकट सबने अपनी अपनी पीठों पर लदे बोझों को उतारा। पीठ सीधी की और सबेरे चलते समय बाँटे गए गुड़ चने की अपनी अपनी पोटलियाँ खोलने लगे। जमादार उसी समय फिर तुलसी के पास आ पहुँचा और कहा- “मेरे साथ चलो।”
“साहब, मेरे साथी को भी ले चलिए।”
“नहीं, तू अकेला चल।”
“तब तो आप मुझे मार भी डालें तो भी मैं नही जाऊँगा।” 
“अच्छा, तुम दोनों चलों। मैं अभी तुम्हारे बोझ को ढोने का इन्तजाम करके आता हुँ।”
दोनों मित्र आगे बढ़कर एक जगह खड़े हो गए। कैलास का चेहरा खिल उठा था, कहने लगे - “लगता है कि राम जी हमारी रक्षा कर लेगें।”
जमादार तुर्क था मगर दो पीढ़ी से हिन्दुस्तान मैं बसा हुआ था। ऊँचे उठने के लालच में वह एक कच्चा खेल खेल गया था जिसके अन्तिम परिणाम पर तुलसी की ज्योतिष के उजाले में नजर जाते ही जमादार अपने होश में आ गया।
गुलनार ठेठ आजर बैजानी माल थी, कहीं कोहकाफ के आसपास की। कहते हैं कि गुलाब के आसपास की मिट्टी में भी महक आ जाती है।
क्रमशः

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